सोमवार, 22 दिसंबर 2014

दैनिक ट्रिब्यून » News » सोच्चण की तै इसी-तिसी होरी

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सत्ते फत्ते नफे सविता कविता संतोष हर इतवार के दिन  चर्चा घर पहोंचगे और चर्चा शुरू की । नफे ने कविता से पूछा उदास लग रही हो क्या बात है तो व् उसने बताया कि मेरी बुआ के छोरे की बहु के साथ अकेली  देखकर एक पड़ौसी ने बद तमीजी की शोर मचाया तो आस पास से लोग इकठ्ठे होगे । सब कहने लगे एक हाथ से ताली थोड़े बजती है । पानी मरता होगा जिबे  तो हिम्मत पडी उसकी और भी इधर उधर की बातें की गयी । सत्ते उसको पुलिस में देना था । नहीं गाम की पंचायत ने दबाव बनाया कि वह अच्छी नौकरी पर है उसकी नौकरी चली जाएगी । उल्टा बहु को हिदायत दी कि चूंकि वह घूंघट करके नहीं रहती इसीलिए उसके साथ ऐसा हुआ । आगे से घूंघट में रहा करे । दो बच्चों  का बाप है वह अपने  आप इतना आगे नहीं बढ़ता । सुनकर सब हैरान हुए । संतोष ने  इस पर एक किस्सा सुनाया ----- 
"एक बर एक हंस और हंसिनी हरिद्वार के सुरम्य वातावरण तैं  भटकते हुए  हरयाणा के खुश्क से  इलाके मैं   गये! हंसिनी नै  हंस तहिं कह्या --- यो  किस उजड़े इलाके में आगे  ?? आड़ै ना पानी , न हरे भरे खेत अर ना हरयाली हरयाणा की ! म्हारा  जीना मुश्किल हो ज्यागा ! भटकते भटकते साँझ  होगी । उनै  हंसिनी तैं  कह्या  कि  कयूकरै आज कि रात बिताले , सुबह हम  हरिद्वार लौट ल्यांगे ! रात हुई तो जिस पेड़ के नीचे हंस और हंसिनी रुके थे उस पर एक उल्लू बैठया  था। वह जोर तैं  चिल्लावन लाग्या  हंसिनी नै  कह्या --,  आड़ै  तो रात मैं  सो भी नहीं सकते। उल्लू चिल्लावै सै हंस ने फिर हंसिनी को समझाया कि किसी तरह रात काट लो, मुझे अब समझ मैं   गया है कि ये इलाका वीरान क्यूँ है ?? ऐसे उल्लू जिस इलाके में रहेंगे वो तो वीरान और उजड़ा रहेगा ही। पेड़ पर बैठा उल्लू दोनों कि बात सुनै  था। सुबह हुई, उल्लू नीचे आया और उसने कहया  कि हंस भाई मेरी वजह से आपको रात में तकलीफ हुई, मनै  माफी  दे दयो  हंस ने कहा-- कोई बात नही भैया, आपका धन्यवाद! यह कहकर जैसे ही हंस अपनी हंसिनी को लेकर आगे बढ़ा, पीछे तैं  उल्लू चिल्लाया, अरे हंस मेरी पत्नी नै  लेकै कित चाल पड्या ? हंस चौंका।  उसने बूझ्या -- आपकी पत्नी ?? अर  बताया अरे भाई, यह हंसिनी है, मेरी पत्नी है, मेरे साथ आई थी, मेरे साथ जा रही है! उल्लू नै कह्या --  खामोश रहो, या  मेरी पत्नी सै  दोनों के बीच विवाद बढ़ता चल्या  गया। पूरे इलाके के लोग इक्कठा होगे  कई गावों की जनता आगी  पंचायत बुलाई गयी।  लोगों  बताया कि उल्लू कह रहा है कि हंसिनी उसकी पत्नी है और हंस कह रहा है कि हंसिनी उसकी पत्नी है! लम्बी बैठक और पंचायत के बाद पंच लोग किनारे हो गये और कहा कि भाई बात तो यह सही है कि हंसिनी हंस की ही पत्नी है, लेकिन ये हंस और हंसिनी तो अभी थोड़ी देर में इस गाँव से चले जायेंगे। हमारे बीच में तो उल्लू को ही रहना है। इसलिए फैसला उल्लू के ही हक़ में ही सुनाना है! फिर पंचों ने अपना फैसला सुनाया और कहा कि सारे तथ्यों और सबूतों कि जांच करने के बाद यह पंचायत इस नतीजे पर पहुंची है कि हंसिनी उल्लू की पत्नी है और हंस को तत्काल गाँव छोड़ने का हुक्म दिया जाता है! यह सुनते ही हंस हैरान हो गया और रोने, चीखने और चिल्लाने लगा कि पंचायत ने गलत फैसला सुनाया। उल्लू ने मेरी पत्नी ले ली! रोते- चीखते जब वह आगे बढ़ने लगा तो उल्लू ने आवाज लगाई - मित्र हंस, रुको! हंस ने रोते हुए कहा कि भैया, अब क्या करोगे ?? पत्नी तो तुमने ले ही ली, अब जान भी लोगे ? उल्लू ने कहा, नहीं मित्र, ये हंसिनी आपकी पत्नी थी, है और रहेगी! लेकिन कल रात जब मैं चिल्ला रहा था तो आपने अपनी पत्नी से कहा था कि यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ उल्लू रहता है! मित्र, ये इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए नहीं है कि यहाँ उल्लू रहता है। यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ पर ऐसे पंच रहते हैं जो उल्लुओं के हक़ में फैसला सुनाते हैं! शायद ६५ साल कि आजादी के बाद भी हमारे देश की दुर्दशा का मूल कारण यही है कि हमने हमेशा अपना फैसला उल्लुओं के ही पक्ष में सुनाया है। इस देश क़ी बदहाली और दुर्दशा के लिए कहीं कहीं हम भी जिम्मेदार हैँ!