मंगलवार, 22 जुलाई 2014

सोशल नेटवर्किंग का विस्तार


राजकुमार
अलगाव (एलियनेशन) को बढ़ावा देने और पूँजी के वर्चस्व (हेजेमनी) को स्थापित करने का एक नया माध्यम पूरी दुनिया में, और भारत में विशेष तौर पर, फ़ेसबुक, ट्विटर, गूगल-प्लस जैसी सोशल नेटवर्किंग साइटों का इस्तेमाल करने वाले लोगों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है। आम लोगों के लिए प्रचार के इस नये माध्यम को कई लोग एक वेब-क्रान्ति मान रहे हैं, जो मानते हैं कि इसका सीधा राजनीतिक फ़ायदा आम जनता को हो रहा है। 2013 के आँकड़ों के अनुसार भारत में लगभर 16 करोड़ इण्टरनेट उपभोक्ता हैं और फ़ेसबुक पर 9.2 करोड़ पंजीकृत उपयोगकर्ता हैं, जो अमेरिका के बाद दूसरे स्थान पर हैं। इनमें 10.6 प्रतिशत 17 साल से कम और 50 प्रतिशत 18 से 24 साल के हैं। सोशल नेटवर्किंग के उपयोग पर बात करने से पहले यह समझना ज़रूरी है कि फ़ेसबुक, ट्विटर या किसी भी अन्य सोशल नेटवर्किंग का इस्तेमाल समाज के कौन लोग कर रहे हैं, और उनकी सामाजिक, बौद्धिक पृष्ठभूमि तथा विश्व-दृष्टिकोण क्या है? यूँ तो पूँजीवादी समाज में वर्गों के बीच जीवनस्तर और आजीविका के अन्तर की एक चौड़ी खाई मौजूद है। और मोबाइल पर या कम्प्यूटर पर फ़ेसबुक तथा ट्विटर जैसी सोशल नेटवर्किंग साइटों को इस्तेमाल करने वाले ज़्यादातर लोग मध्यवर्ग से आते हैं। सोशल नेटवर्किंग के उपयोग को समझने के लिए समाज के अन्तरविरोधों को अलग-अलग हिस्सों में बाँटकर समझना होगा।
1- पूँजीवादी समाज में अलगाव की अभिव्यक्ति के रूप में उभर रहा सोशल नेटवर्किंग माध्यमों का उपयोग अलगाव को और बढ़ा रहा है
पहला हिस्सा है आम व्यक्तिगत उपयोगकर्ताओं का। इनमें ज़्यादातर स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थी और सरकारी या आईटी-बीपीओ के क्षेत्र में बौद्धिक काम करने वाले मध्यवर्ग का एक बड़ा हिस्सा है, जो स्वयं शारीरिक श्रम नहीं करता और समाज की शारीरिक श्रम करने वाली व्यापक आबादी से कटा है, और साहित्य-संस्कृति के बारे में जिसकी कोई ख़ास जानकारी नहीं है, जो बाल्ज़ाक, तोलस्तोय, चेखव, गोर्की, प्रेमचन्द या मुक्तिबोध जैसे विश्व प्रसिद्ध साहित्यकारों के बारे में नहीं जानता, जिसने आइंसटीन के सामाजिक चिन्तन के बारे में कभी नहीं सुना, जिसने मनुष्य (या कहें कि अपने) उस इतिहास को भी नहीं पढ़ा है जिससे पता चलता है कि समय-समय पर विकास को गति देने वाली महान जन क्रान्तियों के झंझावात ने शोषण पर खड़ी पुरानी व्यवस्थाओं को तहस-नहस कर नयी व्यवस्थाओं को खड़ा करते हुए विकास किया है जिसके फ़लस्वरूप आज मनुष्यता इस अवस्था में पहुँची है। आगे बढ़ने से पहले व्यक्तित्वों के इस विकृत विकास के कारण को स्पष्ट रूप से समझने के लिए पूँजीवादी उत्पादन सम्बन्धों के अन्तर्गत किसी और के मुनाफ़े के लिए काम करने वाले हर व्यक्ति पर और पूरे सामाजिक ढाँचे के बारे में मार्क्स के इस विश्लेषण पर ध्यान देना होगा, “यह सच है कि श्रम मज़दूर के लिए उससे अलग एक प्रक्रिया बन जाती है, यानी यह उसकी स्वाभाविक प्रकृति नहीं रहता, वह अपने काम के दौरान स्वयं का समर्थन नहीं करता बल्कि ख़ुद का निषेध करता है, कि वह श्रम के दौरान आनन्द महसूस नहीं करता बल्कि अप्रसन्न अनुभव करता है, कि वह अपनी शारीरिक और मानसिक क्षमता को स्वतन्त्र रूप से विकसित नहीं करता बल्कि अपने शरीर का अपमान करता है और अपनी बुद्धि का विनाश करता है। ऐसे में मज़दूर तभी स्वाभाविक महसूस करता है, जब वह काम नहीं कर रहा होता है, और उसका काम उससे अलग महसूस होता है। जब वह काम नहीं करता है तो वह घर जैसा अनुभव करता है, और जब काम कर रहा होता है तो घर जैसा अनुभव नहीं करता।”
ऐसे उत्पादन सम्बन्धों में अपना श्रम बेचकर जी रहे व्यक्तियों के बारे में मार्क्स आगे लिखते हैं, “मनुष्य (श्रम करने वाला प्राणी) ख़ुद को पशुवृत्ति क्रियाकलापों, जैसे खाना, पीना, पुनरुत्पादन, या अधिक से अधिक ध्यान लगाने या कपड़े पहनने आदि जैसी क्रियाओं में उन्मुक्त रूप से सक्रिय महसूस करता है; और अपने मानवीय क्रियाकलापों (श्रम करने) में वह स्वयं को एक पशु से अधिक कुछ नहीं समझता। जो पाशविक होता है वह मानवीय हो जाता है और जो मानवीय होता है वह पाशविक हो जाता है।” जिस समाज में हर मानवीय वस्तु बाज़ार में बिकने वाला माल होती है, जहाँ आम मेहनतकश आबादी का श्रम किसी दूसरे की सम्पत्ति होता है, ऐसे सम्बन्धों पर खड़े समाज में पल-बढ़ रही पीढ़ियों में मूल मानवीय स्वभाव, यानी श्रम करने की स्वाभाविक प्रवृत्ति, से अलगाव होना स्वाभाविक है।
आगे बढ़ने से पहले यहाँ रुककर एक बात पर ध्यान देने की आवश्यकता है। बौद्धिक श्रम करने वाले कई मध्यवर्गीय लोग यह सोचते हैं कि अलगाव का मार्क्स का यह विश्लेषण सिर्फ़ भौतिक उत्पादन में लगे शारीरिक श्रम करने वाले मज़दूरों पर ही लागू होता है। लेकिन वास्तव में पूँजीवादी उत्पादन सम्बन्धों में व्यक्तियों के चरित्र का अलगाव, काम करने वाले हर व्यक्ति पर लागू होता है। शारीरिक श्रम करने वाले मज़दूर चूँकि मुनाफ़ा-केन्द्रित पूँजीवादी उत्पादन सम्बन्धों के बीच पूँजी के साथ सीधे अन्तरविरोध में होते हैं, इसलिए उनके सामने यह सच्चाई अधिक मुखर रूप में मौजूद होती है। चूँकि बौद्धिक श्रम करने वाले अधिकतर लोगों को पूँजीवादी उत्पादन सम्बन्धों में मज़दूरों के शोषण से पैदा होने वाले अधिशेष का एक हिस्सा विशेषाधिकारों के भोग के लिए एक समर्थन आधार तैयार करने के वास्ते पूँजीपति वर्ग द्वारा घूस के रूप में दे दिया जाता है, इसलिए पूँजी के साथ उनके अन्तरविरोध ज़्यादा तीखे नहीं होते (जब तक कि किसी दिन बेरोज़गार होकर वह ख़ुद सड़क पर नहीं आ जाता)। लेकिन मानसिक श्रम करने वाला व्यक्ति भी मुनाफ़ा केन्द्रित उत्पादन सम्बन्धों के अन्तर्गत किसी और के मुनाफ़े के लिए श्रम (मानसिक) कर रहा होता है। मार्क्स के शब्दों में, “पूँजीवादी उत्पादन सिर्फ़ माल का उत्पादन नहीं, बल्कि वास्तव में यह अतिरिक्त मूल्य का उत्पादन है। मज़दूर अपने लिए नहीं बल्कि पूँजी के लिए उत्पादन करते हैं। इसलिए यह कहना पर्याप्त नहीं है कि वह सिर्फ़ उत्पादन करता है। वास्तव में वह अतिरिक्त मूल्य का उत्पादन करता है। पूँजीवादी तन्त्र में सिर्फ़ वही मज़दूर उत्पादक होता है जो पूँजीपति के लिए अतिरिक्त-मूल्य का उत्पादन करता है, और इस प्रकार पूँजी के स्व-विस्तार के लिए काम करता है। यदि हम भौतिक वस्तुओं के उत्पादन के क्षेत्र से बाहर का उदारहण लें तो स्कूल-मास्टर एक उत्पादन करने वाला मज़दूर बन जाता है जब अपने छात्रों के विचारों का निर्माण करने के साथ अपने स्कूल के मालिक को धनी बनाने के लिए वह घोड़े की तरह काम में लगा रहता है। सिर्फ़ इस बात से उत्पादन सम्बन्धों पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि किसी मालिक ने अपनी पूँजी सॉसेज बनाने वाली फ़ैक्टरी के बजाय शिक्षा देने की फ़ैक्टरी में निवेश की हुई है। इस तरह उत्पादक श्रम की धारणा श्रम और उसके महत्त्वपूर्ण परिणाम, श्रम और उत्पादक श्रम के बीच सम्बन्ध के साथ एक विशेष सामाजिक उत्पादन सम्बन्ध को निरूपित करती है। यह एक ऐसा सम्बन्ध है जो ऐतिहासिक रूप से पैदा हुआ है और जिसने मज़दूरों को अतिरिक्त श्रम पैदा करने वाले एक साधन में तब्दील कर दिया है। ऐसे में एक उत्पादन करने वाला मज़दूर होना कोई भाग्यशाली बात नहीं बल्कि एक दुर्भाग्य है।”
मुनाफ़ा-केन्द्रित पूँजीवादी उत्पादन सम्बन्ध मनुष्यों की श्रम शक्ति को माल बनाने के साथ ही मनुष्य को भी पूँजीवादी मण्डी में बिकने वाला माल बना देते हैं और काम करने वालों के सामने अपने ख़ुद के जीवन का कोई दूरगामी लक्ष्य नहीं रहता, जिसका परिणाम यह है कि उनमें मानवीय श्रम के प्रति और स्वयं अपनी सामाजिक स्थिति के प्रति भी एक अलगाव का भाव पैदा हो जाता है। कार्यक्षेत्र में पैदा होने वाला यह अलगाव समाज के पारिवारिक और सामाजिक सम्बन्धों और मूल्यों में भी प्रतिबिम्बित होता है।
ऐसी स्थिति समाज के जिस हिस्से के पास साधन मौजूद हैं, वे सोशल नेटवर्किंग जैसे माध्यमों में इस अलगाव से छुटकारा पाने की कोशिश करते हैं, और इसके पीछे अदृश्य मूल कारण को समझे बिना हर रूप में अपने आप को दूसरों के सामने महत्त्वपूर्ण प्रदर्शित करने, और उनका ध्यान आकर्षित करने के प्रयास में लगा रहता है। इसकी अभिव्यक्ति फ़ेसबुक, ट्विटर जैसी कई साइटों पर होती है, जहाँ कई लोग कुछ बेहद व्यक्तिगत पहलू सामाजिक प्लेटफ़ार्म पर साझा करते हैं, जैसे खाना खाने की तस्वीर, नहाने जाने की जानकारी देना, कुछ नया ख़रीदने पर उसकी फ़ोटो, शादियों की फ़ोटो, सोने जाते या सुबह जागने के बारे में टिप्पणियाँ डालना, आदि। इस प्रकार के सारे क्रियाकलाप वास्तव में समाज में अलगाव को दूर करने का माध्यम तलाश कर रहे लोगों की अभिव्यक्ति है।
2. पूँजीवादी वर्चस्व को स्थापित करने में सोशल नेटवर्किंग माध्यमों का उपयोग
आगे बढ़ने से पहले अभी दूसरी तरह के उपयोगकर्ताओं की बात करते हैं, जिनमें माल अन्धभक्ति का प्रचार करने वाली कारपोरेट एजेंसियाँ हैं, पूँजीवादी राजनीति का प्रचार करने वाली राजनीतिक पार्टियाँ और संगठन हैं, पूँजीवादी ग़ैर-सरकारी संस्थाएँ हैं, कई रूपों में काम करने वाले धार्मिक कट्टरपन्थी फासीवादी संगठन हैं, धर्म के नाम पर अन्धविश्वास का धन्धा चलाने वाले कई “गुरु” हैं और मुख्य धारा के कई पूँजीवादी न्यूज़ चैनल हैं। इनके साथ ही एक हिस्सा जनवादी कार्यकर्ताओं और जनपक्षधर संगठनों का भी है, जो किसी न किसी स्तर पर पूँजीवादी जनवाद के दायरों में या उसके विकल्प के रूप में जनता की माँगों को उठाने और प्रचार करने के लिए इन माध्यमों का प्रयोग कर रहे हैं। सोशल नेटवर्क की वेबसाइटों पर मौजूद व्यक्तिगत उपयोगकर्ता इन सभी ग्रुपों के लिए लक्षित श्रोता होते हैं, जिसके माध्यम से समाज के इस वर्ग के बीच पूँजीवाद के हित में आम सहमति को बनाने का काम भी होता है, और आम लोगों की वैचारिक समझ पर, उनके विश्व-दृष्टिकोण पर शासक वर्ग का वर्चस्व स्थापित करने का काम भी किया जाता है। जो काम पहले मुख्यधारा का मीडिया करता था, अब उसमें यह माध्यम भी जुड़ गया है। इस पूरी प्रक्रिया को कैसे अंजाम दिया जाता है कुछ तथ्य देखे जा सकते हैं।
मध्यवर्ग से आने वाले 50 फ़ीसदी सोशल नेटवर्किंग यूज़र 24 साल से कम उम्र के हैं और सामान्य रूप से इनकी राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक जानकारी का स्रोत सोशल नेटवर्किग या टीवी है। यह वर्ग बिना कोई ख़ास सोचने का प्रयास किये सभी सूचनाओं को कचरा-पेटी की तरह ग्रहण कर लेता है। जो काम किताबों और संजीदा लेखों के माध्यम से होना चाहिए उसकी जगह इन साइटों पर एक-दो लाइनों की टिप्पणियों ने ले ली है, जोकि आजकल की नयी ‘जेन-जी’ (नवयुवा) पीढ़ी के “ज्ञान” और सूचनाओं का स्रोत माना जा रहा है। एक या दो लाइनों की टिप्पणियों से कोई व्यक्ति अपने व्यावहारिक अनुभव और वर्गीय विश्व-दृष्टि के अनुरूप अनुभवसंगत रूप से सहमत या असहमत तो हो सकता है, लेकिन अपने विचारों का कोई विश्लेषण प्रस्तुत नहीं कर सकता। साथ ही इन छोटी-छोटी टिप्पणियों के माध्यम से किसी को सोचने के लिए मजबूर भी नहीं किया जा सकता, न ही आलोचनात्मक विवेक पैदा किया जा सकता है। पूँजीवादी मीडिया द्वारा किया जाने वाला तथ्यों का चुनाव और सूचनाओं का प्रस्तुतीकरण भी पूँजीवादी वर्ग हित से मुक्त नहीं हो सकता, इसलिए ज़्यादातर सूचनाएँ भी समाज के यथार्थ को सही ढंग से प्रस्तुत नहीं करतीं। ऐसे में निश्चित है कि सोशल नेटवर्किंग पर मौजूद कई समूहों से आम लोगों को जो सूचनाएँ मिलती हैं, वे समाज को देखने के उनके छिछले और अवैज्ञानिक नज़रिये का निर्माण करने में एक अहम भूमिका निभा रही हैं।
इसी सन्दर्भ में देखें तो अनेक सामान्य उपयोगकर्ता अपनी सचेतन जानकारी के बिना इन माध्यमों से होने वाले प्रचार से प्रभावित होकर अपने जीवन की अहम प्राथमिकताएँ भी निर्धारित कर रहे होते हैं। इसका प्रत्यक्ष असर हम समाज के परिवेश में देख सकते हैं कि शारीरिक श्रम से कटे हुए इण्टरनेट-मोबाइल इस्तेमाल करने वाला समाज का यह तबका नहीं जानता कि जिस समाज में वह रहता है उसकी आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक संरचना कैसी है; वह जो सामान इस्तेमाल कर रहा है वे कहाँ और किन परिस्थितियों में किसके द्वारा पैदा किया जा रहा है, और क्या समाज की असली तस्वीर वही है जो टीवी या सोशल नेटवर्किंग के माध्यम से उसके सामने प्रस्तुत की जा रही है?
हर चीज़ के बाज़ारीकरण के इस दौर में सोशल नेटवर्किंग के माध्यम से माल-अन्धभक्ति का जिस तरह से प्रचार किया रहा है वह अत्यन्त प्रतिक्रियावादी और घातक है। माल-अन्धभक्ति का स्पष्ट असर आज समाज में देखा जा सकता है, जिसने लोगों की ख़ुशी और दुःख के कारणों को अत्यन्त सतही बना दिया है, उनकी ख़ुशी के मुख्य स्रोत हैं कोक पीना, ब्राण्डेड जींस और जूते पहनना, लम्बी कार में सवारी करना, स्मार्ट फ़ोन इस्तेमाल करना, शराबख़ाने में जाकर शराब पीना या जिम में जाकर संचित की गई ऊर्जा को ख़र्च करना इत्यादि।
पिछले कुछ दिनों से भारत की सोशल नेटवर्किंग साइटें राजनीतिक प्रचार के एक बड़े माध्यम के रूप में उभर रही हैं। कई ऐसे राजनीतिक संगठन सोशल नेटवर्किंग साइटों पर सक्रिय हैं जो लोगों के बीच धार्मिक-जातीय आधार पर ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करके अन्धविश्वास का प्रचार कर रहे हैं। जो पूँजीवादी व्यवस्था में पैदा होने वाली बेरोज़गारी, ग़रीबी, कुपोषण, रोज़गार की अनिश्चितता जैसी अनेक बीमारियों के प्रति जनता में मौजूद गुस्से को उनकी व्यक्तिगत श्रद्धा के आधार पर भिन्न-भिन्न रूपों में फ़ासीवाद के समर्थन में मोड़ने की कोशिश करते हैं। इस प्रकार के संगठन अपने तर्कों या तथ्यों के समर्थन में कोई स्रोत नहीं देते, न ही कोई ठोस तथ्य लोगों के बीच बहस के लिए रखते या उन तक पहुँचाने की कोशिश करते हैं। इनके द्वारा प्रचारित की जाने वाली किसी भी सूचना में समाज के इतिहास की कोई सांगोपांग समझ, समाज के विकास या वर्तमान समाज की स्थिति का कोई वैज्ञानिक विश्लेषण नहीं होता, सिवाय खोखले शब्दों के। ये संगठन राजनीतिक रूप से अशिक्षित मध्यवर्ग के बीच इन आधे-अधूरे तथ्यों को इस तरह रखते हैं कि उन्हें बिना कोई तार्किक विवेक इस्तेमाल किये उसे श्रद्धा के साथ स्वीकार कर लेना चाहिए।
इस राजनीतिक प्रचार का लक्ष्य सिर्फ़ साइटों पर मौजूद 9 से 10 करोड़ यूज़र ही नहीं होते, बल्कि यहाँ से कोई जानकारी लेकर यही यूज़र अपने वर्ग के दूसरे लोगों तक उसे ले जाने के लिए एक वाहक की भूमिका भी निभाते हैं। इस रूप में यह माध्यम पूँजीवादी व्यवस्था के हित में शोषित-उत्पीड़ित-तबाह और पूँजी से शासित जनता के बीच आम राजनीतिक सहमति निर्मित करने में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
जिन धारणाओं के आधार पर ये संगठन लोगों के बीच प्रचार करते हैं, उन्हें समझने से पहले हमें समाज के “व्‍यक्तिगत” धार्मिक आधार पर एक नज़र डालनी होगी। प्रबोधनकालीन फ्रांस के महान दार्शनिक दिदेरो ने लिखा है, “धर्म के नाम पर बने पागल सबसे ख़तरनाक होते हैं, और जो लोग समाज में गड़बड़ पैदा करना चाहते हैं, वे अच्छी तरह जानते हैं कि किसी विशेष अवसर पर इन पागलों का इस्तेमाल कैसे करना चाहिए।” (देखें टिप्पणी 7)
ज़्यादातर लोग यह मानते हैं कि धर्म राजनीति से स्वतन्त्र एक व्यक्तिगत चीज़ है, इसलिए यह लोग अपने धर्म में व्यक्तिगत विश्वास करने के साथ-साथ अनेक धार्मिक कर्मकाण्ड भी पूरे मनोयोग से करते हैं (कभी-कभी बेमन से भी करते हैं), और अपने धर्म तथा राष्ट्र को दूसरे सभी धर्मों एवं राष्ट्रों से श्रेष्ठ मानते हैं। अक्सर देखा जा सकता है कि कुछ धार्मिक लोग, चाहे उस धर्म और जाति के लोगों का एक बड़ा हिस्सा भुखमरी-कुपोषण-बेरोज़गारी से जूझ रहा हो, अपने धर्म और अपने राष्ट्र की श्रेष्ठता को बढ़ा-चढ़ाकर महिमामण्डन करने से बाज़ नहीं आते! सोशल नेटवर्किंग साइटों पर कई “आध्यात्मिक” धर्म गुरुओं, साधुओं और संन्यासियों और अनेक धार्मिक संगठनों की प्रोफ़ाइलें मौजूद हैं जो समय-समय पर कुछ धार्मिक और राजनीतिक टिप्पणियाँ डालकर धर्म और जाति को महिमामण्डित करते रहते हैं, जिनसे कई धार्मिक लोग जुड़े होते हैं। धार्मिक राजनीतिक प्रचार के प्रभाव में आने वाले लोगों के सामने यह रेखांकित करना ज़रूरी है कि इन लोगों को इतिहास की इस सच्चाई के बारे में पता नहीं चलने दिया जाता कि किसी भी धार्मिक कट्टरपन्थी या अन्धराष्ट्रवादी पूँजीवादी सत्ता ने मानव जाति के लिए आज तक कोई उपलब्धि हासिल नहीं की है, सिवाय निर्दोष मेहनतकश जनता की हत्याओं और जनता के खुले दमन के आधार पर कुछ लोगों को विलासिता मुहैया करवाने और जनता के शोषण और दमन के दम पर बनी मौजूदा व्यवस्थाओं की रक्षा करने के। लोगों के व्यक्तिगत विश्वास के आधार पर व्यापार करने वाले लाखों “धर्म-गुरु” और धार्मिक राजनीति करने वाले संगठन इस माध्यम का फ़ायदा उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं और फ़ासीवादी राजनीतिक संगठन इसका पूरा फ़ायदा उठा रहे हैं। इस प्रकार कई धार्मिक लोगों की व्यक्तिगत भावनाएँ, जो ग़ैर-राजनीतिक सोच से शुरू होती हैं, अन्त में अन्धराष्ट्रवादी फ़ासीवादी राजनीति के समर्थन तक जाकर अपनी चरम परिणति को प्राप्त हो रही हैं। भारत में इस तरह हिन्दू धर्म का राजनीतिक प्रचार करने वाले तरह-तरह के राजनीतिक-धार्मिक संगठन, धार्मिक गुरु और संस्थाएँ सोशल नेटवर्किंग साइटों पर देखी जा सकती हैं।
3- राज्यसत्ता की ख़ुफ़िया संस्थाओं द्वारा सोशल नेटवर्किंग माध्यमों का उपयोग
सोशल नेटवर्किंग साइटों की पृष्ठभूमि पर एक नज़र डालें तो गुप्त रूप से इन पर निगाह रखने वाला एक और उपयोगकर्ता भी है, जो पूँजीवादी राज्यसत्ता का एक अंग है और सोशल नेटवर्किंग साइटों तथा इण्टरनेट के अन्य यूज़र डाटा को इकट्ठा करने, उसका परीक्षण करने और उसके आधार पर आईबी (भारत) या सीआईए (अमेरिका) जैसी ख़ुफ़िया संस्थाओं को सूचनाएँ मुहैया करवाने का काम करता है। भारत में रॉ (Research and Analysis Wing) और अमेरिका की प्रिज़्म (Surveillance program) इसके कुछ उदाहरण हैं। सुरक्षा और आतंकवाद से निपटने के नाम पर खड़ी की गयी ये संस्थाएँ मुख्य रूप से पूरी दुनिया के मज़दूर आन्दोलनों पर नज़र रखती हैं। और इनके द्वारा मुहैया करवाये गये तथ्यों के आधार पर पूँजीवादी-साम्राज्यवादी सिद्धान्तकार नीतियाँ निर्धारित करते हैं। जो पूरी दुनिया में पिछड़े और ग़रीब देशों के मज़दूर वर्ग को लगातार बर्बादी में धकेल रही पूँजीवादी व्यवस्था को बनाये रखने और समय-समय पर मुखर हो जाने वाले जन प्रतिरोधों को कुचलने के लिए इस्तेमाल होती हैं। इन गतिविधियों पर नज़र रखने का मुख्य उद्देश्य जनवादी अधिकारों की रक्षा करना नहीं बल्कि लूटमार पर टिकी पूँजीवादी व्यवस्था में समय-समय पर खड़े होने वाले जन आन्दोलनों को कुचलने और दुनियाभर के इज़ारेदार पूँजीपति घरानों की सम्पत्ति की रक्षा करना होता है। उपयोगकर्ताओं के डाटा पर नज़र रखने वाली कई संस्थाओं की जानकारी अभी हाल ही में हुए कई खुलासों से सामने आ चुकी है। (देखें टिप्पणी 4)
अमेरिका की NSA संस्था PRISM की मदद से गूगल, माइक्रोसॉफ्ऱट, फ़ेसबुक, जैसी कम्पनियों से आम उपयोगकर्ताओं और संगठनों के व्यक्तिगत डाटा को 2007 से इकठ्ठा कर रही है, और इनके आधार पर उनकी गतिविधियों पर नज़र रख रही है। भारत में भी सीएमएस (Centralized Monitoring System) जैसी संस्थाएँ भी पीआरएसआइएम की तर्ज पर काम कर रही हैं। सीएमएस और पीआरएसआइएम की मदद से राज्यसत्ता की गुप्त संस्थाएँ मोबाइल, एसएमएस, फ़ैक्स, वेबसाइट, सोशल मीडिया के उपयोग, इण्टरनेट सर्च, ईमेल, आदि पर रियल-टाइम में नज़र रख रही हैं।
गुप्त संस्थाओं द्वारा इस डाटा का इस्तेमाल किस तरह मज़दूर आन्दोलनों के विरुद्ध किया जाता है उसके कुछ उदाहरण इतिहास की कई घटनाओं के आधार पर समझे जा सकते हैं। जैसे 1973 में चिले में सीएमएस की मदद से आलिन्दे की सरकार का तख़्तापलट किये जाने के कई दस्तावेज़ मौजूद हैं, जिसमें हज़ारों बेकसूर लोगों का क़त्लेआम किया गया, लाखों को उत्पीड़ित किया गया; 1965 में इण्डोनेशिया की जनवादी सरकार के तख़्तापलट में सीआईए के सहयोग जैसी कई ख़बरें देखी जा सकती हैं जिसमें सीआईए ने 5,000 कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं और उनके सहयोगियों की एक सूची सेना को दी जिसके बाद लगभग 2.5 लाख बेकसूर लोगों की हत्या की गयी। 1953 में इराक़ में जनता द्वारा चुनी गयी जनवादी सरकार के तख़्तापलट की बात सीआईए ने ख़ुद ही स्वीकार कर ली है, 1980 में टर्की में सैन्य जुण्टा के नेतृत्व में जनवादी सरकार का तख़्तापलट करवाने में भी सीआईए द्वारा मदद देने के दस्तावेज़ मौजूद हैं, जहाँ ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं के दमन के साथ जनता के सभी जनवादी अधिकारों को समाप्त कर दिया गया। साम्राज्यवादी देशों के गुप्त संगठनों द्वारा लैटिन अमेरिका से लेकर एशिया तक आज भी जारी आम जनता के क़त्लेआम की भूमिका तैयार करने की कई घटनाओं में से यह कुछ घटनाओं के उदाहरण हैं। वेनेजुएला में सीआईए द्वारा राष्ट्रपति शावेज़ के तख़्तापलट की नाकाम कोशिश पर 2003 में बना एक वृत्तचित्र The Revolution Will Not Be Televised (2003) पूरी दुनिया के पूँजीवादी घरानों और सीआईए जैसी गुप्त संस्थाओं के सहयोग का काफ़ी नंगे रूप में भण्डाफोड़ करता है। जनता द्वारा चुनी गयी इन सभी सरकारों के तख़्तापलट का मुख्य उद्देश्य विश्व साम्राज्यवाद के विरुद्ध खड़ी हो रही मेहनतकश वर्ग की ताक़तों को कुचल कर अपने नियन्त्रण में कठपुतली सरकारों को स्थापित करना था, जिसका नेतृत्व गुप्त संस्था सीआईए ने किया और कुछ घटनाओं में अपनी भूमिका को वह स्वीकार भी कर चुकी है।
आज जिस प्रकार पूरी दुनिया के स्तर पर मेहनतकश जनता के शोषण के दम पर इज़ारेदारों की सम्पत्ति आसमान छू रही है, जहाँ पूरी दुनिया के 85 सबसे अमीर घरानों की सम्पत्ति दुनिया के बचे हुए कुल लोगों में से आधी ग़रीब आबादी की कुल सम्पत्ति से भी अधिक हो चुकी है, और इस असमानता पर आधारित व्यवस्था में कुछ परजीवी मुनाफ़ाखोरों का पोषण करने के लिए वैश्विक स्तर पर करोड़ों मेहनतकश लोग बेरोज़गारी, ग़रीबी और भुखमरी के शिकार हैं, ऐसी स्थिति में यदि आनेवाले समय में मेहनतकश जनता के आन्दोलन संगठित न हुए तो पूँजीवाद के बढ़ते संकटों के और अन्तरविरोधों के तीखा होने के साथ पैदा होने वाले स्वतः-स्फूर्त जनप्रतिरोधों को कुचलने में पूँजीवादी सत्ताओं द्वारा इन माध्यमों को नंगे फासीवादी रूप में प्रयोग किया जा सकता है।
समय-समय पर पूँजीवादी राज्यसत्ता के सिद्धान्तकार इन जानकारियों के आधार पर जनता के बीच पूँजीवादी दायरे के भीतर नियोजित ढंग से (ध्यान रहे कि यह नियोजन किसी व्यक्ति या समूह विशेष द्वारा नहीं किया जाता बल्कि पूँजीवादी वर्ग हित द्वारा नियोजित होता है) आन्दोलनात्मक कार्रवाइयाँ करवाने और जनता में व्यवस्था के प्रति मौजूद प्रतिरोध को किसी और दिशा में मोड़ने या उनके बीच निराशा का माहौल पैदा करने के लिए करती रहती हैं। सोशल नेटवर्किंग इस मामले में पूँजीवाद द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से नियोजित किये जाने वाले आन्दोलनों में एक काल्पनिक अन्तरविरोध के प्रति जनता में उत्तेजना पैदा करने का नया माध्यम बनकर उभर रहा है। पिछले कुछ समय से भारत में चल रहा अण्णा-केजरीवाल का सुधारात्मक-राजनीतिक आन्दोलन इसी कड़ी का एक हिस्सा है, जिसमें पूँजीवादी व्यवस्था की रक्षा के लिए सोशल नेटवर्किंग और पूँजीवादी मीडिया का संयुक्त रूप से इस्तेमाल किया जा रहा है।
4- सोशल नेटवर्किंग के माध्यमों के इस्तेमाल पर निष्कर्ष के तौर पर
संक्षेप में कहें तो यदि भविष्य में ज़मीनी स्तर पर पूँजीवाद के विरुद्ध मेहनतकश जनता के व्यापक जनप्रतिरोध खड़े न हुए तो सोशल नेटवर्किंग, इण्टरनेट और मोबाइल जैसी तकनीकें बुर्जुआ जनवाद में लोगों को मिले थोड़े बहुत जनवादी अधिकारों और आम लोगों के व्यक्तिगत गोपनीयता के लिए भी एक बड़ा ख़तरा साबित हो सकती हैं। जनप्रतिरोधों और गुप्त संस्थाओं का क्या रिश्ता है, इसे हम ऊपर देख ही चुके हैं, जो हर प्रगतिशील व्यक्ति के लिए निश्चित रूप से अलग से विचार करने का एक विषय है।
सोशल नेटवर्किंग के इस्तेमाल की जो तस्वीर हमने देखी है, उसे ध्यान में रखते हुए हम कह सकते हैं कि जिस तरह प्रतिक्रियावादी पूँजीपति वर्ग इस माध्यम से अलगाव को बढ़ावा दे रहे हैं, भ्रामक प्रचार के माध्यम से लोगों को अतार्किक बनाकर मानसिक क्षेत्र में शासक वर्ग के वर्चस्व को स्थापित कर रहे हैं, और राज्यसत्ता की गुप्त संस्थाओं द्वारा जनवादी अधिकारों के विरुद्ध कार्यवाहियों को अंजाम दे रहे हैं, उनको काउण्टर करने के लिए जन-पक्षधर वर्गों द्वारा सचेतन तौर पर विरोध के ठोस क़दम उठाने की आवश्यकता है। इन माध्यमों का एक सीमा तक इस्तेमाल किया जा सकता है, जैसे विश्व साहित्य, अनुसन्धान तथा विश्व इतिहास के स्रोतों को आम लोगों के बीच पहुँचाने और पूँजी के विरुद्ध संगठित होने वाले मज़दूर आन्दोलनों की कार्यवाहियों में शामिल करने के लिए प्रचार किया जा सकता है। लेकिन यह भी ध्यान रहना चाहिए कि इसे ही प्रचार का एकमात्र विकल्प नहीं माना जा सकता। यह जनता के बीच जाने के लिए मौजूद अनेक माध्यमों में से एक माध्यम हो सकता है, उनका विकल्प नहीं।
मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान, जनवरी-अप्रैल 2014

सोशल मीडिया के बहाने जनता, विचारधारा और तकनोलॉजी के बारे में कुछ बातें


कविता कृष्णपल्लवी
मार्क जुकरबर्ग ने फेसबुक ईजाद करके भूमण्‍डलीय मीडिया बाजार में एक इजारेदार पूँजीपति के रूप में अपनी जगह बना ली। लेकिन यह केवल मुनाफा कूटने का ही साधन नहीं है, बल्कि विश्‍व पूँजी के वैचारिक सांस्‍कृतिक वर्चस्‍व का भी एक प्रभावी औजार है। सोशल मीडिया को जनता का वैकल्पि‍क मीडिया समझना या सांस्‍कृतिक प्रति-वर्चस्‍व का औजार समझना एक भारी मुगालते में जीना है। हाँ, इस बुर्ज़ुआ संचार माध्‍यम के कुछ ऐसे अन्‍तरविरोधों का, कुछ ऐसी प्राविधिक विवशताओं का हम लाभ उठा सकते हैं, जो शासक वर्ग के पूर्ण नियंत्रण के एक हद तक बाहर हैं। यह लाभ भी तभी उठाया जा सकता है जब प्रगतिकामी, जनपक्षधर बौद्धिक जमातें वैचारिक रूप से काफी सजग हों और सोशल मीडिया को लेकर किसी प्रकार के विभ्रम की शिकार न हों। ध्‍यान रहे कि तब भी हम इसका एक हद तक ही इस्‍तेमाल कर सकते हैं, यह हमारा मीडिया कदापि नहीं हो सकता।
समाज की एक भारी मध्‍यवर्गीय आबादी इण्‍टरनेट-फेसबुक पर बैठी हुई सामाजिक जीवन के यथार्थ से बाहर एक आभासी यथार्थ में जीने का आदी हो जाती है। वह वस्‍तुत: भीषण सामाजिक अलगाव में जीती है, पर फेसबुक मित्रों का आभासी साहचर्य उसे इस अलगाव के पीड़ादायी अहसास से काफी हद तक निजात दिलाता है। बुर्ज़ुआ समाज की भेड़चाल में वैयक्तिक विशिष्‍टता की मान्‍यता का जो संकट होता है, पहचान-विहीनता या अजनबीपन  की जो पीड़ा होती है, उससे फेसबुक-साहचर्य, एक दूसरे को या उनके कृतित्‍व को सराहना, एक दूसरे के प्रति सरोकार दिखाना काफी हद तक राहत दिलाता है। यानी यह भी एक तरह के अफीम की भूमिका ही निभाता है। यह दर्द निवारक का काम करता है और एक नशे का काम करता है, पर दर्द की वास्‍तविक जड़ तक नहीं पहुँचाता। इस तरह अलगाव के विरुद्ध संघर्ष की हमारी सहज सामाजिक चेतना को यह माध्‍यम पूँजीवादी व्‍यवस्‍था-विरोधी सजग चेतना  में रूपांतरित हो जाने से रोकता है। साथ ही, फेसबुक, टि्वटर और सोशल मीडिया के ऐसे तमाम अंग-उपांग हमें आदतन अगम्‍भीर और काहिल और ठिठोलीबाज भी बनाते हैं। खुशमिजाजी अच्‍छी चीज है, पर बेहद अंधकारमय और चुनौतीपूर्ण समय में भी अक्‍सर चुहलबाजी के मूड में रहने वाले अगम्‍भीर लोग न केवल अपनी वैचारिक क्षमता, बल्कि अपनी संवेदनशीलता भी खोते चले जाते हैं। आभासी दुनिया में दिखायी जाने वाली खुशमिजाजी वास्‍तविक सामाजिक जीवन में यदि दिखायी जाये तो यह अलगाव के विरुद्ध एक नागरिक का असरदार प्रतिकार होगा। इसी सन्‍दर्भ में नोम चोम्‍स्‍की का यह कथन विशेष रूप से महत्‍वपूर्ण और सारगर्भित है कि ”जबतक लोग… एक दूसरे से कटे रहेंगे और गम्‍भीर आलोचनात्‍मक विचार-विमर्श पर ध्‍यान नहीं देंगे, तबतक (शासक वर्ग द्वारा) विचारों को नियंत्रित किया जाना सम्‍भव बना रहेगा।”
इसलिए मेरा विचार है कि जो राजनीतिक-सांस्‍कृतिक रूप से जागरूक व्‍यवस्‍था-विरोधी नागरिक हैं, उन्‍हें सोशल मीडिया के आभासी संसार को अपनी समस्‍त व्‍यक्तिगत आत्मिक-सांस्‍कृतिक गतिविधियों का मंच बनाने के बजाय केवल गम्‍भीर सामाजिक-सांस्‍कृतिक-राजनीतिक विचार-विमर्श, पूँजी तंत्र द्वारा पार्श्‍व भूमि में धकेल दी गयी निर्मम-विद्रूप यथार्थ के उदघाटन , विश्‍व पूँजीवादी सांस्‍कृतिक-वैचारिक मशीनरी द्वारा इतिहास के विकृतिकरण के भण्‍डाफोड़ तथा जीवन के सभी क्षेत्रों की पूँजीवादी वैचारिकी की समालोचना के लिए ही इस माध्‍यम का इस्‍तेमाल करना चाहिए। जनता के जनवादी अधिकारों के मसले पर एकजुटता के लिए पारस्‍परिक संवाद के लिए इस मंच का इस्‍तेमाल किया जाना चाहिए। बड़े पैमाने पर सोशल मीडिया के सभी अंगों-उपांगों का विज्ञान, तर्कणा और सही इतिहास बोध देने तथा जनता की कला-साहित्‍य-संस्‍कृति के प्रचार के लिए इस्‍तेमाल किया जाना चाहिए। फेसबुक के धोबीघाट पर ”वामपंथी घरों के गंदे कपड़े धोने” का दिखावा करने वाले वास्‍तव में प्रगतिकामी लोग हैं, या प्रतिशोधी आत्‍मदंभी लोग हैं, या छद्मवेषी घुसपैठिये हैं, इस प्रश्‍न पर भी सोचना होगा। वैचारिक-दार्शनिक प्रश्‍नों पर मतभेद कोई गुप्‍त बात नहीं है, इन पर तीखी से तीखी बहसें हो सकती हैं। पर सांग‍ठनिक या व्‍यक्तिगत चर्चाएँ, अफवाहबाजी और तोहमतबाजी, गाली-गलौज — यह सब फेसबुक-ब्‍लॉग के सार्वजनिक मंचों पर करने वाले लोगों की मंशा क्‍या है, मक़सद क्‍या है? राजनीतिक वाद-विवाद और व्‍यक्तिगत गाली-गलौज के बीच यदि हम अंतर नहीं कर पाते, तब तो वास्‍तव में हमारी मति मारी गयी है।
हम चाहे जितनी कुशलता से काम करें, सोशल मीडिया का जितना व्‍यापक इस्‍तेमाल पूँजी की ताकत से भाड़े के टट्टू खरीदकर हिंदुत्‍ववादी फासिस्‍ट कर सकते हैं, बुर्ज़ुआ पार्टियाँ कर सकती हैं, साम्राज्‍यवादी वित्‍त-पोषित एन.जी.ओ. सुधारवादी कर सकते हैं, उतना हम नहीं कर सकते। इस मंच पर हम उनसे पार नहीं पा सकते। प्रतिवर्चस्‍व का हमारा वैकल्पिक मंच अलग होगा। पर यदि दृष्टि, पहुँच और संकल्‍प की एकजुटता हो, तो इस मंच पर भी बुर्ज़ुआ प्रभाव की काफी प्रभावी काट की जा सकती है, इसका भी काफी इस्‍तेमाल किया जा सकता  है।
प्रगतिशील-जनपक्षधर बुद्धिजीवी वेबसाइट, ब्‍लॉग, फेसबुक, टि्वटर, ऑरकुट आदि-आदि  का इस्‍तेमाल करते हुए न केवल पूँजीवादी व्‍यवस्‍था का एक्‍सपोजर कर सकते हैं, न केवल ब्‍लैकआउट की गयी खबरों को सामने लाने और जनता के जनवादी अधिकार के मसलों को उठाने का काम कर सकते हैं, न केवल गम्‍भीर वैचारिक बहस और विचार-विमर्श कर सकते हैं, न केवल वैज्ञानिक जनपक्षधर दृष्टि से इतिहास और वर्तमान का विश्‍लेषण प्रस्‍तुत कर सकते हैं, बल्कि अपने सांस्‍कृतिक प्रतीकों, अपने महान पूर्वजों के उद्धरणों, प्रगतिशील कलात्‍मक-साहित्यिक-सांगीतिक कृतियों, चलचित्रों-वृत्‍तचित्रों आदि-आदि से इन मंचों को ज्‍यादा से ज्‍यादा पाटने की कोशिश कर सकते हैं, मित्रों का बड़ा से बड़ा दायरा बनाकर उनतक अपनी बातें पहुँचाने की कोशिश कर सकते हैं। यानी हमें इस आभासी दुनिया में ज्‍यादा से ज्‍यादा ‘स्‍पेस’ छेंकने की कोशिश करनी चाहिए।
कालांतर में इस तंत्र के नियामक और नियंत्रक तरह-तरह के तकनीकी छल नियोजन से भी जनपक्षधर प्रयासों को निष्‍प्रभावी बनाने या उनका गला घोंटने की कोशिश करेंगे। कुछ देशों का उदाहरण हमारे सामने है जहाँ आन्‍दोलनरत जनता ने सोशल मीडिया का जब ज्‍यादा प्रभावी इस्‍तेमाल किया तो शासक वर्ग ने वहाँ इस माध्‍यम को ही काफी हद तक पंगु बना दिया। गौरतलब है कि ये आन्‍दोलन स्‍वत:स्‍फूर्त उभार थे और शासक वर्ग तात्‍कालिक तौर पर परेशान होने के बावजूद यह भी समझ रहा था कि ये पूरी व्‍यवस्‍था को ध्‍वस्‍त करने वाली चुनौती नहीं है। जब ऐसी चुनौती उनके सामने होगी तो वे और प्रभावी ढंग से कदम उठायेंगे। लेकिन जब सारी जनता संगठित होकर उठ खड़ी होगी तो वह और भी रास्‍ते निकाल लेगी। जैसा कि ब्रेष्‍ट की एक प्रसिद्ध कविता का आशय है, मशीनें चाहे जितनी प्रभावी हों, चलाता उन्‍हें मनुष्‍य है। तकनोलॉजी चाहे जितनी प्रभावी और स्‍वचालित हो, वह मनुष्‍य के नियंत्रण में ही होती है। तकनोलॉजी का इस्‍तेमाल शासक वर्ग करता है, पर तकनोलॉजी व्‍यापक जाग्रत संगठित जनता को काबू नहीं कर सकती। और फिर जनता भी तो अपने संघर्ष में तकनोलॉजी का समांतर इस्‍तेमाल करती ही है! बस यह ध्‍यान रहे कि जनता मुख्‍य ताकत है, तकनोलॉजी नहीं। और तकनोलॉजी भी हमेशा उसीतरह विचारधारा और राजनीति के मातहत होनी चाहिए, जैसे कि हथियार।
मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं

पूँजीवादी विज्ञापन जगत का सन्देश: ‘ख़रीदो और खुश रहो!’

शिवानी
आज विज्ञापनों का बोलबाला हर तरफ़ है। पूँजीवादी प्रचार तन्त्र की एक व्यापक परिघटना के रूप में विज्ञापन आज सर्वत्र विद्यमान हैं। वर्तमान समय में विज्ञापन उद्योग की मौजूदगी के बग़ैर स्वयं पूँजीवाद की कल्पना करना ही कठिन है। टी.वी., रेडियो, अख़बार, पत्र-पत्रिकाएँ, इण्टरनेट, सड़कों के किनारे लगे बिलबोर्ड, बस-स्टॉपों और रेलवे स्टेशनों पर लगी प्रचार पट्टियाँ – जहाँ नज़र दौड़ाइये विज्ञापन ही विज्ञापन, प्रचार ही प्रचार। इस मायने में विज्ञापन महज़ वस्तुओं या सेवाओं की मार्केटिंग का औज़ारभर नहीं रह गये हैं, बल्कि पूँजीवाद द्वारा निर्मित एक विचारधारात्मक उपकरण के रूप में भी सामने आये हैं। पूँजीवादी अर्थव्यवस्था के अर्थों में बात करें तो पूरे विज्ञापन उद्योग का आकार कई हज़ार करोड़ का है। अगर भारत की बात करें तो वर्तमान में विज्ञापन उद्योग 91,700 करोड़ रुपये का कारोबार है जिसके 2017 तक 1,66,000 करोड़ रुपये तक पहुँच जाने की सम्भावना है। जहाँ तक अमेरिका का सवाल है तो 2010 में विज्ञापनों पर होने वाला ख़र्च 143 खरब डॉलर था और पूरे विश्व में यह आँकड़ा 467 खरब डॉलर था। ‘ऑगिलवाई एण्ड मैथर’, ‘जे वॉल्टर थॉमसन’, ‘मैककेन एरिकसन’ जैसी कई राष्ट्रपारीय एजेंसियाँ आज विज्ञापन उद्योग में लगी हुई हैं।
Insurance ad 2स्पष्टतः आज के समय में विज्ञापन उद्योग पूँजीवादी अर्थव्यवस्था का एक बेहद ज़रूरी हिस्सा बन चुका है। इस हद तक कि अधिकांशतः विज्ञापनों और प्रचार में होने वाला पूँजी निवेश का प्रतिशत स्वयं माल उत्पादन में लगी पूँजी से कहीं अधिक होता है। लेकिन सिर्फ़ पूँजीवादी अर्थतन्त्र में अपनी भूमिका की दृष्टि से ही नहीं बल्कि पूँजीवादी समाज में शासक वर्गों द्वारा इस्तेमाल में लाये जाने वाले विचारधारात्मक-सांस्कृतिक औज़ार के लिहाज़ से भी विज्ञापनों के पीछे की राजनीति को समझना आवश्यक हो जाता है। विज्ञापनों की सर्वव्याप्ति इस तथ्य का प्रमाण है कि विज्ञापन उद्योग पूँजीवाद का एक सशक्त विचारधारात्मक उपकरण तो है ही, साथ ही इसका एक वर्चस्वकारी सांस्कृतिक उत्पाद भी है। वर्तमान पूँजीवादी दौर में विज्ञापन उद्योग की भूमिका को समझने के लिए इसे ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में अवस्थित करना ज़रूरी है।
ToBuyorNottoBuyCroppedआधुनिक विज्ञापन उद्योग 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में औद्योगिक पूँजीवाद के सहवर्ती के तौर पर अस्तित्व में आया। औद्योगिक पूँजीवाद और बाज़ार द्वारा संचालित अर्थव्यवस्था के अस्तित्व में आने के साथ ही बड़े पैमाने पर माल उत्पादन शुरू हुआ। पूँजीवाद ने सामाजिक-आर्थिक जीवन का पूरा ताना-बाना ही बदल दिया। हर जगह माल उत्पाद और वस्तुएँ थीं। लेकिन मालों के असीमित भण्डार का उत्पादन ही पर्याप्त नहीं था, बल्कि इन अपरिमित भण्डारों का बिकना भी आवश्यक था। पूँजीवाद के अन्तर्गत मालों के उत्पादन के साथ ही उनका वितरण, विनिमय और उपभोग के सर्किट से गुज़रना भी ज़रूरी होता है ताकि पूँजीपति मुनाफ़ा कमा पायें और उत्पादन में फिर से निवेश कर सकें। इसलिए एक प्रतिस्पर्द्धी बाज़ार में अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए पूँजीपतियों द्वारा किसी भी क़ीमत पर मालों की बिक्री को सुनिश्चित करना पड़ता है। हालाँकि यह हर समय सम्भव नहीं हो पाता या यूँ कहें कि पूँजीवाद के अन्तर्गत यह हमेशा सम्भव हो ही नहीं सकता है (चूँकि पूँजीवाद अपनी आन्तरिक गतिकी और तर्क से बहुसंख्यक आबादी को ऐसी दयनीय स्थिति में पहुँचा देता है कि उसके पास मालों की ख़रीदने की क्षमता ही नहीं रह जाती है)। इसलिए मन्दी, अर्थव्यवस्था में ठहराव और परिणामस्वरूप दुकानों पर ‘सेल’ की घोषणा करते बोर्ड पूँजीवादी अर्थव्यवस्था की एक आम सच्चाई है। पूँजीपतियों और स्वयं पूँजीवाद के लिए उपभोग का प्रश्न इसलिए केन्द्रीय प्रश्न बन जाता है। परिणामस्वरूप, 19वीं शताब्दी में औद्योगिक पूँजीवाद के अस्तित्व में आने के साथ ही विज्ञापन उद्योग का जन्म हुआ जिसका उद्देश्य न केवल मालों और उत्पादों की बिक्री सुनिश्चित करना था, बल्कि उससे भी ज़्यादा मालों और उत्पादों के लिए उपभोक्ताओं में चाहत या इच्छा (डिज़ायर) या एक आभासी ज़रूरत को पैदा करना था। यही कारण है कि 20वीं शताब्दी के शुरू होते-होते विज्ञापन एक सम्पूर्ण उद्योग के रूप में अस्तित्व में आया। और इसकी सबसे उर्वर ज़मीन अमेरिका बना। विज्ञापन एजेंसियाँ अस्तित्व में आयीं, विज्ञापनों को किस तरह से प्रभावशाली बनाया जाये इसके गुर पाठ्यक्रमों में सिखाये जाने लगे, बड़े-बड़े कारपोरेट घरानों ने अपनी पूँजी का एक अच्छा-ख़ासा हिस्सा इन प्रचार कार्रवाइयों पर लगाया। आज के दौर में तो न सिर्फ़ विज्ञापनों पर लगने वाली पूँजी बल्कि उनको बनाने में लगने वाला बौद्धिक, शोधात्मक, रचनात्मक प्रयास भी अप्रत्याशित है।
Insurance adअब ज़रा देखें कि ये विज्ञापन काम कैसे करते हैं। तमाम पूँजीपतियों द्वारा अपने उत्पादों या सेवाओं को बेचने और उपभोक्ता उन्हें ख़रीदे – इसके लिए विज्ञापनों द्वारा प्रचार किया जाता है। ये विज्ञापन उपभोक्ता को बताते हैं कि जीवन का असली मज़ा लेने के लिए वस्तुओं का उपभोग न केवल सम्माननीय है बल्कि वांछित भी है। 1929 में अमेरिकी पूँजीवाद की एक प्रवर्तक क्रिस्टीन फ़्रेडरिक ने उपभोक्तावाद को अमेरिका द्वारा दुनिया को निर्यात किया गया महानतम विचार बताया। जिसके तहत मेहनतकश जनता को महज़ मज़दूरों और उत्पादकों के तौर पर नहीं बल्कि उपभोक्ताओं के रूप में देखा जाने लगा। एक ओर पूँजीवाद जहाँ मनुष्य को उपभोक्ता में तब्दील कर देता है, वहीं विज्ञापन उद्योग उस उपभोक्ता को बताता है कि कैसे अधिक से अधिक सामानों के उपभोग द्वारा वह एक अच्छा, स्मार्ट और आधुनिक उपभोक्ता बन सकता है। उदाहरण के लिए फलाना ब्राण्ड का डियोडोरेण्ट इस्तेमाल करने से आप कैसे लड़कियों में लोकप्रिय हो सकते हैं, या फिर फलाना ब्राण्ड की वाशिंग मशीन का इस्तेमाल करने से आप कैसे एक आधुनिक गृहिणी बन सकती हैं, आदि। विज्ञापन हमें बताने की कोशिश करते हैं कि हमारी हर सामाजिक चिन्ता और निजी असफलता का इलाज वस्तुओं के उपभोग में छिपा है। इस रूप में विज्ञापन उपभोक्ताओं की अभिरुचियों को गढ़ने में प्रभावशाली भूमिका निभाते हैं।
एक सांस्कृतिक उत्पाद के तौर पर भी विज्ञापनों का असर लम्बे समय तक रहता है। क्योंकि लगातार दुहराव के ज़रिये ये लोगों के मस्तिष्क पर लगातार प्रभाव छोड़ते रहते हैं। हमें पता भी नहीं चलता कि हम कब विज्ञापनों में इस्तेमाल किये जाने वाले जिंगल गुनगुनाने लगते हैं या फिर उनके स्लोगन और टैगलाइन ख़ुद दोहराने लगते हैं। पूँजीवाद विज्ञापनों द्वारा माल अन्धभक्ति (कमोडिटी फ़ेटिशिज़्म) को एक नये मुक़ाम पर पहुँचा देता है। बार-बार लगातार विज्ञापनों के ज़रिये हमें यह बताने का प्रयास किया जाता है कि यदि हमारे पास फलाना सामान नहीं है तो हम ज़िन्दगी में कितना कुछ ‘मिस’ कर रहे हैं। हमें बार-बार लगातार यह बताया जाता है कि सुखी-सन्तुष्ट जीवन का एकमात्र रास्ता बाज़ार के ज़रिये वस्तुओं का उपभोग है। केवल माल और सामान ही हमें खुशी और सामाजिक रुतबा प्रदान कर सकते हैं। बिना किसी अपवाद के हर विज्ञापन का यही स्पष्ट सन्देश होता है – चाहे वह विज्ञापन किसी कार कम्पनी का हो या किसी बीमा कम्पनी का, किसी सौन्दर्य प्रसाधन के ब्राण्ड का हो या फिर किसी शराब या मोबाइल फ़ोन की कम्पनी का – यही सन्देश बार-बार रेखांकित किया जाता है। सामानों, वस्तुओं, मालों को प्रसन्नता, स्वतन्त्रता और रुतबे का समतुल्य बना दिया जाता है।
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद विक्टर लिबोव नामक एक खुदरा व्यापार विश्लेषक ने इस सोच को कुछ इन शब्दों में व्यक्त किया, “हमारी बेहद उत्पादक अर्थव्यवस्था—यह माँग करती है कि हम उपभोग को जीवन का तरीक़ा बना दें, कि हम सामानों के बेचने और ख़रीदने के काम को रस्मों में तब्दील कर दें, कि हम आत्मिक सन्तुष्टि और अपने अहं की तुष्टि को मालों में ढूँढें—सामानों का लगातार बढ़ती दर से उपभोग किया जाना, जला दिया जाना, जर्जर हो जाना, प्रतिस्थापित किया जाना, और फेंक दिया जाना हमारी ज़रूरत है।” पूँजीवादी अर्थतन्त्र के तर्क को इन महाशय ने जितनी सुस्पष्टता और बेलाग-लपेट तरीक़े से रखा है वही तर्क आज विज्ञापन उद्योग बार-बार प्रचारित कर रहा है।
ऐसा भी नहीं है कि विज्ञापन उद्योग की कार्य-प्रणाली में कोई बदलाव नहीं आया है। यदि 19वीं शताब्दी के अन्त और 20वीं शताब्दी के शुरुआती वर्षों की बात करें तो हम पाते हैं कि उस दौर में विज्ञापन मालों के गुणों के बारे में बात करते थे। जैसेकि वे क्या-क्या कर सकते हैं, या फिर कितने अच्छे तरीक़े से कोई काम कर सकते हैं, आदि। लेकिन 1920 का दशक आते-आते विज्ञापनों की कार्य-प्रणाली में एक महत्त्वपूर्ण बदलाव आया। अब विज्ञापन सामानों और मालों को लोगों के सामाजिक जीवन से जोड़ रहे थे। लोग जिस किस्म के सामाजिक जीवन की इच्छा रखते थे – बिना किसी असुरक्षा और अनिश्चितता के, सुकून, आज़ादी और सुख से भरी ज़िन्दगी – वस्तुओं को उसी जीवन की प्रभावशाली छवियों से जोड़कर पेश किया जाने लगा। जो जीवन पूँजीवाद लोगों को वास्तविक जीवन में मुहैया नहीं करा सकता था, उसे विज्ञापनों में मालों के उपभोग द्वारा सम्भव दिखाया जाने लगा। यह एक फन्तासी की दुनिया रचने जैसा है – एक ‘एस्केप रूट’ जिसमें हमें एक ऐसी दुनिया का सपना दिखाया जाता है, जिसमें हम वस्तुओं के उपभोग से हर ख़ुशी पा सकते हैं। विज्ञापन इसी सपने को हमारी चाहत में बदलने का काम करते हैं। और फिर हमें बताया जाता है कि यह चाहत अधिक से अधिक सामानों के उपभोग से ही पूरी हो सकती है। इस मायने में विज्ञापन उद्योग पूँजीवाद का एक बेहद ख़तरनाक, सूक्ष्म और निपुण विचारधारात्मक हथियार है, जो लोगों को पूँजीवादी उपभोक्ता संस्कृति का अभ्यस्त बनाता है और बेहद वर्चस्वकारी तरीक़े से अपने हिसाब से चीज़ों को देखने का आदी बनाता है। लोग अनालोचनात्मक तरीक़े से इस तर्क से सहमत होने लगते हैं कि सामानों और मालों के अधिकाधिक संचय में ही खुशहाल जीवन का मन्त्र है।
Olay adइसके अलावा विज्ञापन पूँजीवादी संस्कृति, मूल्य-मान्यताओं और तौर-तरीक़ों को पुनरुत्पादित करने का स्थान भी है। लेकिन इसके साथ ही यह पलटकर तमाम सांस्कृतिक मूल्यों को ख़ुद भी प्रभावित करता है और सामाजिक भूमिकाओं को नये तरीक़े से परिभाषित करता है। उदाहरण के लिए, जहाँ एक ओर विज्ञापनों में औरतों को परम्परागत, जेण्डरगत भूमिकाओं के तहत घर के भीतर की ज़िम्मेदारियों का निर्वाह करते हुए पेश किया जाता है और पुरुषों को बाहर की ज़िम्मेदारियाँ उठाते हुए दिखाया जाता है, वहीं दूसरी ओर विज्ञापनों में ये सामाजिक भूमिकाएँ एक नये अन्दाज़ में भी पेश की जाती हैं। अब एक औरत घर की ज़िम्मेदारी उठाने के साथ-साथ बाहर भी काम करती हुई दिखायी जाती है, लेकिन वह यह ‘मल्टी-टास्किंग’ तमाम तरह के उत्पादों और सामानों की मदद से कर पाती है। इसलिए वह एक “सुपर-मॉम” है, एक नयी किस्म की आधुनिक स्त्री है, क्योंकि वह चतुराई से सामानों का उपभोग करना जानती है। इसके अलावा, तमाम तरह के विज्ञापन हमें पूँजीवाद के मूल-मन्त्र यानी कि पूँजी संचय, बचत और निवेश की हिदायत देते रहते हैं। इन विज्ञापनों में बेहद बेशर्मी के साथ बच्चों का इस्तेमाल किया जाता है जो अपने माँ-बाप, दादा-दादी आदि को बचत करने की सलाह देते हुए दिखाये जाते हैं। वास्तविक जीवन में व्याप्त असुरक्षा की भावना को इन विज्ञापनों द्वारा खुलकर भुनाने की कोशिश की जाती है। विज्ञापन उद्योग अपना सारा ध्यान और समस्त ऊर्जा मध्यवर्ग पर केन्द्रित करता है, क्योंकि एक मॉडल, आदर्श उपभोक्ता वही हो सकता है।
इस संक्षिप्त चर्चा के बाद हम देख सकते हैं कि पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में विज्ञापन एक अहम भूमिका अदा करते हैं। पूँजीवाद के विचारधारात्मक उपक्रम के रूप में पूँजीवादी दृष्टिकोण, मनोविज्ञान और संस्कृति का बेहद बारीकी और चालाकी से प्रचार-प्रसार करते हैं और अत्यन्त वर्चस्वकारी तरीक़े से इस नज़रिये से सोचने के लिए लोगों (जिसे कि वे महज़ उपभोक्ता ही मानते हैं) की सहमति लेते हैं। लेकिन न तो प्रकृति में और न ही समाज में कोई भी प्रक्रिया या परिघटना एकाश्मी तरीक़े से चलती रहती है। और चूँकि लोग सोचते हैं और लोग अपने हालात के बारे में भी सोचते हैं, इसलिए पूँजीवाद का कोई भी प्रोपगैण्डा कितना ही वर्चस्वकारी क्यों न हो वह लोगों को चिरन्तन काल तक चीज़ों के प्रति अनालोचनात्मक नहीं बनाये रख सकता। विज्ञापनों के बाहर विद्यमान वास्तविक दुनिया लोगों को विज्ञापनों में निर्मित की गयी फन्तासी की दुनिया की असलियत दिखला ही देती है। और जब लोग वास्तविक जीवन में अपनी स्थिति के कारणों के बारे में सोचने लगते हैं तो वे उसी पूँजीवादी व्यवस्था को कठघरे में पाते हैं जो सुखी-समृद्ध जीवन की इन भ्रामक तस्वीरों और छवियों को उन्हें बेच रहा है।


मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान, जनवरी-अप्रैल 2014

भारत का सोलहवाँ लोकसभा चुनाव: किसका, किसके लिए और किसके द्वारा

दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त्र के सोलहवें लोकसभा चुनाव सम्पन्न होने जा रहे हैं। चुनाव में भागीदारी बढ़ाने के लिए चुनाव आयोग ने तो ख़ूब ज़ोर और पैसा लगाया ही, तमाम चुनावी दलों ने भी हज़ारों करोड़ रुपया इस चुनावी महायज्ञ में स्वाहा कर दिया। नतीजतन, भारत के “स्‍वर्णिम” चुनावी इतिहास में मौजूदा चुनाव ने पैसा ख़र्च करने के मामले में चार चाँद लगा दिये हैं। भारत का सोलहवाँ लोकसभा चुनाव अमेरिका के बाद दुनिया का सबसे महँगा चुनाव है। यदि ख़र्च होने वाले काले धन को भी जोड़ दिया जाये तो अमेरिका क्या पूरी दुनिया के चुनावों के कुल ख़र्च को भी हमारा भारत देश टक्कर दे सकता है। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतन्त्र जो ठहरा! सिर्फ़ धन ख़र्च करने और काले धन की खपत करने के मामले में ही नहीं बल्कि झूठे नारे देकर, झूठे वायदे करके जनता को कैसे उल्लू बनाया जाये, जाति-धर्म के झगड़े-दंगे कराकर ख़ून की बारिश में वोट की फ़सल कैसे काटी जाये, जनता-जनता जपकर पूँजीपतियों का पट्टा गले में डलवाने में कैसे प्रतिस्पर्धा की जाये, इन सभी मामलों में भी भारतीय नेतागण विदेशी नेताओं को कोचिंग देने की कूव्वत रखते हैं! दुनिया भर में लोकतन्त्र का झण्डा बुलन्द करने वाले हमारे भारत देश के लोकतन्त्र के ठेकेदारों ने पिछले 62 सालों में जनता को इतने सारे वायदे और नारे दिये हैं कि वह चाहती तो मालामाल हो जाती, पर यदि जनता की झोली ही फटी हो तो बेचारे नेताओं का क्या कुसूर है! इसी कारण से लोकतन्त्र का खेल चल भी पा रहा है, वरना जिस देश में करीब एक तिहाई आबादी भूखे पेट सोती हो, जहाँ 36 करोड़ आबादी के सिर पर पक्की छत न हो, जहाँ करीब आधी जनता कुपोषित हो, वहाँ क्या वायदे-नारे न देने वाले नेताओं की दाल गल पाती? हर बार की तरह इस बार भी नेताओं के पारम्परिक घरानों से लेकर, हत्यारे, बलात्कारी, सेंधमार, ख़ुद पूँजीपति और सिनेमाई भाँड़-भड़क्के तक चुनावी रेलम-पेल में लगे हैं। जनतन्त्र का नाम लेकर जनता की दुर्गति कैसे की जाती है, विकल्पहीनता के बीच ‘तू नंगा-तू नंगा’ का खेल खेलकर झूठे गर्दो-गुबार को खड़ा कैसे किया जाता है और लोगों के लिए उम्मीद और विश्वास जैसे शब्दों को अर्थहीन बनाने की कवायद होती कैसे है? दुनिया भर के लोकतन्त्र-प्रेमी जनों को इन सब चीज़ों के दर्शन हमारी इस “पवित्र” भारत भूमि पर हो जायेंगे! अब ज़रा जन-प्रतिनिधियों के अलग-अलग गिरोहों, माफ़ कीजियेगा, मतलब पार्टियों के चुनावी एजेण्डों को सरसरी निगाह से देख लिया जाये।
Electionsसबसे पहले कांग्रेस पार्टी का ज़िक्र करते हैं। देश में उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों को लागू करके मेहनतकश जनता को और अधिक तबाह-बर्बाद करने का श्रेय इसी पार्टी को जाता है। देश आज़ाद होने के कुछ ही समय बाद जीप घोटाले से शुरू करके कभी बोफोर्स तोप घोटाले, कभी कॉमनवेल्थ खेल घोटाले, कभी 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले तो कभी कोयला घोटाले के द्वारा इस पार्टी ने घोटालों की ऐसी कहानी शुरू की है, जो रुकने का नाम ही नहीं ले रही है। कांग्रेस पार्टी ने घोटालों के मामले में वह सफ़ाई, कुशलता और दक्षता प्रदर्शित की है कि लोग घोटाला शब्द आते ही इसके नेताओं की मिसाल देने लगते हैं। इस मामले में कांग्रेस पार्टी का कोई सानी नहीं है, हालाँकि दिलीप सिंह जूदेव, बंगारू लक्ष्मण और येदयुरप्पा जैसों की बदौलत भाजपा ने भी इस प्रतिस्पर्द्धा में कांग्रेस को टक्कर देनी शुरू कर दी है। कांग्रेस इस मामले में शायद इसीलिए आगे है, क्योंकि देश की सत्ता अधिकांश समय उसके हाथों में रही है। लेकिन कुछ 6-7 वर्ष के ही राज में भाजपा-नीत राजग सरकार ने भी घोटालों के तमाम रिकॉर्ड तोड़ डाले थे। देश को देशी-विदेशी पूँजी की खुली लूट की चारागाह में तब्दील करने वाली कांग्रेस यह उम्मीद पाले बैठी थी कि चुनाव करीब आते ही लोक-लुभावन नारे और शोशे उछालकर जनता को फिर से उल्लू बना दिया जायेगा। मगर समय का फेर देखिये कि देश को महँगाई, बेरोज़गारी, भुखमरी और घपलों-घोटालों से आभूषित करने वाली कांग्रेस के हाथ जैसे बँध से गये हैं कि वह कुछ ही हवाई वायदे कर पायी क्योंकि घनघोर आर्थिक संकट जो चल रहा है। ‘भारत निर्माण’ के नारे की छत्रछाया में चुनावी बिसात बिछाये कांग्रेस से यह पूछा जाना चाहिए कि लोगों को चिकित्सा, रोज़गार और घर यदि आपको अभी देना था तो पिछले 5-6 दशक क्या आपने घास छीलने में निकाल दिये? असल में कांग्रेस के हाथ ने अपने ‘भारत निर्माण’ के नारे के तहत लोगों को एक बार फिर से उल्लू बनाने की ठानी है या इसने सोचा कि जनता तो पहले ही उल्लू है, किसी न किसी तरह चुनाव जीत ही लिया जायेगा।
अब आते हैं दूसरी सबसे बड़ी पार्टी भाजपा पर। भारतीय जनता पार्टी ने ‘अभी नहीं तो कभी नहीं’ की तर्ज पर अपना एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दिया है। चुनावी प्रचार हो, मीडिया को पालतू बनाना हो, धार्मिक कट्टरता फैलाना हो, या फिर दूसरी पार्टियों के नेताओं को अपने एजेण्डे पर (!!?) लाना हो, इन तमाम चीज़ों पर भाजपा ने पानी की तरह पैसा बहाया है। दंगों पर तो जैसे इसका एकाधिकार ही रहा है, हालाँकि कांग्रेस व अन्य चुनावी दल भी इस एकाधिकार का अतिक्रमण करने से नहीं चूकते, किन्तु भाजपा की तो जैसे पहचान ही साम्प्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने वाले के रूप में होती है। फ़िलहाल हुए मुज़फ्ऱफ़रनगर के दंगों और उससे पहले असम के दंगों ने यह और भी स्पष्ट कर दिया है कि फ़ासीवादी ताक़तें चुनावी गोटी लाल करने के लिए किसी भी हद से गुज़र सकती हैं। कारपोरेट जगत भी भाजपा पर पूरी तरह से फिदा है। हो भी क्यों नहीं, गुजरात के मुख्यमन्त्री नरेन्द्र मोदी जो इसके तारणहार बनकर सामने आये हैं! भाजपा का पूँजीपतियों से वायदा है कि मौजूदा आर्थिक संकट और मन्दी के दौर में वही उन्हें बचायेगी और उनके मुनाफ़े को सुरक्षित रखेगी। गुजरात इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहाँ देशी-विदेशी पूँजीपतियों का ‘अतिथि देवो भवः’ वाला मान-सम्मान होता है। गुजरात में मज़दूर तो जैसे नागरिक ही नहीं हैं। यही कारण है कि वहाँ पर नमक की खानों में काम करने वाले मज़दूरों, अलंग के जहाज़ तोड़ने वाले मज़दूरों और हीरा उद्योग से जुड़े मज़दूरों के हालात एकदम दयनीय हैं। मोदी महाराज के अनुसार तो गुजरात में बॉयलर इंस्पेक्टरों तक की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि कोई भी कारख़ानेदार ऐसा क्यों चाहेगा कि उसका बॉयलर ख़राब हो? लगता है, इसी कारण से गुजरात में न्यूनतम मज़दूरी करीब 5600 रुपये रखी गयी है, क्योंकि मज़दूरों की बाक़ी की चिन्ता तो पूँजीपति और कारख़ानेदार ख़ुद ही कर लेंगे! अब इन्हें यह बात कौन समझाये कि मालिक तो सिर्फ़ और सिर्फ़ मुनाफ़ा चाहता है, किसी भी क़ीमत पर! 2002 के गुजरात दंगों में लिप्त मोदी को प्रधानमन्त्री पद की उम्मीदवारी दिया जाना दिखाता है कि भारतीय राजनीति का ऊँट किस करवट बैठ रहा है। कारपोरेट जगत तो मोदी का दीवाना है ही निम्न मध्यवर्ग यानी टटपुँजिया वर्ग और मज़़दूरों का कुछ हिस्सा भी अराजनीतिक होने और वर्ग चेतना के अभाव के कारण ‘नमो-नमो’ की माला फेर रहा है। जनता के अज्ञान का फ़ायदा उठाते हुए झूठे प्रचार पर अरबों रुपया ख़र्च किया गया है। ‘वाइब्रेण्ट गुजरात’ की असलियत यह है कि देश के सबसे पिछड़े 50 ज़िलों में से 6 गुजरात में हैं। मोदी ने ‘ऐपको वर्ल्ड वाइड’ नामक कुख्यात कम्पनी से भी प्रचार का काम लिया है। ज्ञात हो इस कम्पनी की सेवाएँ अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी ली थी। इस कम्पनी पर युद्ध अपराधों और अफ्रीकी देशों में तख़्तापलटों को अंजाम देने जैसे आरोप लगते रहे हैं। इस कम्पनी को भी सिर्फ़ अगस्त 2007 से मार्च 2013 तक 25,000 डॉलर प्रतिमाह मोदी की छवि चमकाने के लिए ही दिये गये हैं, ताकि चेहरे पर लगे ख़ून के छीटों पर दुष्प्रचार और झूठ की एक परत चढ़ायी जा सके। असल में भाजपा के पास भी कोई नारा या विकल्प नहीं है, इसके भी तमाम नेताओं पर घोटालों-घपलों से लेकर बड़े-बड़े आपराधिक मामले दर्ज हैं। भाजपा का गुजरात मॉडल देश के उद्योग जगत और खाते-पीते लोगों के लिए विकास मॉडल हो सकता है, किन्तु व्यापक मेहनतकश जनता के लिए यह लूटतन्त्र और डण्डातन्त्र से अधिक कुछ नहीं है।
अब ज़रा ‘आम आदमी पार्टी’ पर थोड़ी बात कर ली जाये। वैसे तो दिल्ली में चली इनकी 49 दिनों की सरकार ने इन्हें पहले ही निपट नंगा कर दिया है। आम आदमी का दम भरकर जनता को टोपी पहनाने में अरविन्द केजरीवाल पारम्परिक नेताओं जैसे ही घाघ साबित हुए और साफ़-सुथरे पूँजीवाद का भ्रम फैलाने में तो इनके भी उस्ताद। दिल्ली के करीब 70 लाख मज़़दूरों से किये गये ठेकेदारी प्रथा ख़त्म करने के वायदे पर केजरीवाल सरकार साफ़ मुकर गयी। ‘आप’ सरकार के श्रम मन्त्री गिरीश सोनी को शर्म भी नहीं आयी, जब इन्होंने फरमाया कि ठेकेदारी प्रथा ख़त्म होने से मालिकों और ठेकेदारों का नुक़सान हो जायेगा (ज्ञात रहे ये श्रीमान ख़ुद एक चमड़ा फ़ैक्टरी के मालिक हैं)। अपनी 49 दिन की सरकार में केजरीवाल ने निजी क्षेत्र में एफ़डीआई पर रोक लगाने, वैट के सरलीकरण जैसे मुद्दों पर उद्योगपतियों और व्यापारियों के हक़ में फ़ैसला लिया, लेकिन दिल्ली की मज़़दूर आबादी के लिए इन्होंने ठेकेदारी प्रथा ख़त्म करना तो दूर रहा न्यूनतम मज़दूरी, काम के घण्टे और पीएफ़-ईएसआई आदि श्रम क़ानूनों को सख़्ती से लागू करवाने के लिए भी कोई क़दम नहीं उठाकर अपनी मंशा स्पष्ट कर दी। रही बिजली-पानी देने की बात तो जनता की जेब से दी गयी सब्सिडी केवल 31 मार्च तक ही थी। अन्तिम कुछ दिनों में होर्डिंगबाज़ी तो ख़ूब हुई पर सब हवा-हवाई। और फिर जल्द ही केजरीवाल साहब जनलोकपाल का बहाना बनाकर सिर पर रखे काँटों के ताज को फेंककर भाग खड़े हुए। इन्होंने सोचा था मुख्यमन्त्री की कुर्सी “ठुकराकर” एक तो जान छूट जायेगी, दूसरा राजनीतिक शहीद का दर्जा भी मिल जायेगा ताकि देश स्तर पर टोपी पहनायी जा सके यानी ‘दोनों हाथों में लड्डू’! किन्तु अफ़सोस, अरविन्द केजरीवाल और उनकी मण्डली अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सकी। इस्तीफ़े के कुछ ही दिनों बाद पूँजीपतियों के मंच सीआईआई की एक बैठक में केजरीवाल ने ऐसी पूँछ हिलायी कि परदे तक फड़फड़ा गये! यदि वहाँ श्वान जाति का कोई प्राणी होता तो वह हिलती पूँछ से प्रतिस्पर्धा न कर पाने की स्थिति में शर्म से पानी-पानी हो जाता! अरविन्द केजरीवाल ने पूँजीपतियों से वायदा किया कि यदि ‘आप’ की सरकार बनती है, तो दफ़्तरों का भ्रष्टाचार ख़त्म कर दिया जायेगा, जिससे इनका काम (क़ानूनी और ग़ैरक़ानूनी लूट) आसान हो जायेगा। साथ ही यह वायदा किया कि अगर केजरीवाल प्रधानमन्त्री बनते हैं तो सरकार का उद्योग-धन्धों से हस्तक्षेप समाप्त कर दिया जायेगा, सिर्फ़ अवसंरचनागत उद्योगों में ही सरकार पूँजी लगायेगी। इसका अर्थ अर्थशास्त्र का ‘क ख ग’ समझने वाला कोई भी व्यक्ति समझ रहा होगा। इसका अर्थ है कि हर प्रकार का विनियमन और बाधा हटाकर पूँजीपतियों के मुनाफ़े के लिए रास्ता साफ़ करना। यानी दूसरे शब्दों में वही आर्थिक नीति जोकि कांग्रेस और भाजपा की है। असल में आम आदमी पार्टी लोगों का इसी व्यवस्था में सुधार करके साफ़-सुथरे पूँजीवाद का ख़्वाब दिखा रही है जो एक आकाश-कुसुम के समान है। भाजपा-कांग्रेस और अन्य चुनावी दल कोई भ्रम नहीं फैला रहे, ये बेचारे तो जनता के सामने पहले ही अपनी प्राकृतिक अवस्था में रहते हैं और भ्रम फ़ैलाने के कारण ही ‘आप’ इनसे भी अधिक ख़तरनाक है। मौजूदा पूँजीवादी व्यवस्था के रप़फ़ूगर अरविन्द केजरीवाल असल में व्यवस्था के लिए सेफ़्टीवॉल्व का ही काम कर रहे हैं, वही काम जिसे किसी समय विनोबा भावे, जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया, मोरारजी देसाई आदि सज्जनों ने अंजाम दिया था। कुल मिलाकर आम आदमी पार्टी भी जनता के सामने कोई विकल्प नहीं है।
तमाम क्षेत्रीय दलों की घोर अवसरवादिता, अपने थूके को चाटने की इनकी बेहयाई के बारे में तो जितना कम कहा जाये, उतना ही बेहतर होगा। लोजपा के रामविलास पासवान जो भाजपा को पानी पी-पीकर कोसते थे, चुनावी मौसम आते ही भाजपा की गोद में जाकर बैठ गये हैं। कभी सीपीआई (एम) के छात्र संगठन एसएफ़आई से जुड़े रहे उदितराज भाजपा द्वारा फेंके टुकड़ों पर लपक गये हैं। हरियाणा के जनहित कांग्रेस के कुलदीप बिश्नोई तो भाजपा से काफ़ी दिन पहले ही हाथ मिला चुके हैं, कभी ये महाशय ख़ुद को कांग्रेस पार्टी की तरफ़ से मुख्यमन्त्री पद का दावेदार समझते थे। बसपा एक बार फिर से नये समीकरण वाली सामाजिक इंजीनियरिंग करने की फ़िराक़ में है, लेकिन आज दलित आबादी का भी एक बड़ा हिस्सा समझ रहा है कि दलित साम्राज्ञी मायावती भी आम ग़रीब दलित आबादी को केवल कुछ प्रतीकात्मक नारे और दलित साम्राज्ञी के राज पर गर्व करने का खोखला सन्देश देने के अलावा कुछ नहीं दे सकती है और उनकी भी असली वफ़ादारी जेपी ग्रुप आदि जैसे पूँजीपतियों के साथ है। नीतीश कुमार भाजपा का दामन छोड़ चुके हैं, क्योंकि कई वर्षों बाद उन्हें वह अचानक साम्प्रदायिक लगने लगी! असल बात यह है कि तमाम क्षेत्रीय दल चाहे यूपी के सपा, बसपा हों, हरियाणा के इनेलो, जनहित कांग्रेस हों, महाराष्ट्र के मनसे, शिवसेना हों, बिहार के राजद, लोजपा और जदयू हों या अन्नाद्रमुक, एनसीपी और तृणमूल कांग्रेस हों; ये बिन पेंदी के लोटे और थाली में रखे बैंगन की तरह जिधर भी मोटी थैली रूपी ढलान मिले या इसकी सम्भावना लगे उधर ही लुढ़क जाते हैं। देश में जनप्रतिनिधियों के नाम पर उबकाई ला देने वाली ऐसी लीद सड़ रही है, जिसे देखकर किसी भी संवेदनशील इंसान को बेहद दुःख भी होता होगा और गुस्सा भी आता होगा।
चलते-चलते एक बात कभी लोकपाल बिल के संग्राम के प्रधान सेनापति रहे अन्ना हज़ारे पर भी कर लेते हैं। आजकल इस बात पर खोज हो रही है कि इन्होनें किसी समय कलकत्ता की सड़कों पर नौजवानों का ख़ून बहाने वाले सिद्धार्थ शंकर रे की चेली और सुधारवादी जेपी की गाड़ी के सामने बेशर्मी का ताण्डव करने वाली ममता बनर्जी को गोद ले लिया है या तृणमूल कांग्रेस पार्टी ने अन्ना हज़ारे को ही गोद ले लिया है। अभी कुछ दिनों पहले दिल्ली के रामलीला मैदान में कुछ ऐसा ही भ्रमित करने वाला नज़ारा देखने को मिला था। इस बात को अलग से रेखांकित करने की ज़रूरत नहीं है कि इन सभी चुनावी पार्टियों के एजेण्डे से आम जनता के मुद्दे पूरी तरह से ग़ायब हैं और यदि घोषणापत्रों में कहीं पर लोकलुभावन वायदे किये भी गये हैं, तो वे केवल लोगों को भरमाने के लिए हैं। जनता से पाई-पाई करके निचोड़े गये अरबों रुपये की बर्बादी, फ़र्ज़ी मीडिया बहसें, तू नंगा-तू नंगा का यह चुनावी खेल सिर्फ़ इसीलिए है कि आने वाले पांच सालों में चोरों-बटमारों, पूँजी के चाकरों-अपराधियों का कौन-सा गिरोह देश की जनता और देश के प्राकृतिक संसाधनों को लूटेगा और पूँजीपतियों पर लुटायेगा।
अब हम जनतन्त्र के मन्दिर संसद और इस जनतान्त्रिक व्यवस्था की असलियत को थोड़ा और उघाड़ने की कोशिश करते हैं। चुनाव में बढ़ते धन और अपराध के इस्तेमाल, चुनाव में नेताओं-अपराधियों-पूँजीपतियों के चोली-दामन के साथ ने यह शीशे की तरह साफ़ कर दिया है कि भारत का लोकतन्त्र असल में धनतन्त्र और अपराधतन्त्र है। चुनाव आयोग द्वारा लोकसभा चुनाव 2014 में एक सांसद उम्मीदवार के प्रचार ख़र्च की सीमा 40 लाख से बढ़ाकर 70 लाख कर दी गयी है। यह तो है क़ानूनी सीमा बाक़ी ग़ैरक़ानूनी सीमा (जो असल में क़ानूनी ही है!) असीम है। विभिन्न समयों पर राजनेताओं के ख़ुद के बयान यह दिखा देते हैं कि एक-एक उम्मीदवार कैसे करोड़ों रुपये वोट ख़रीदने, शराब पिलाने, चुनाव रैलियों पर यानी कि इस पूरी नौटंकी पर ख़र्च करता है। असल में संविधान में लिखित ‘चुनने और चुने जाने की आज़ादी’ का कोई मतलब नहीं है। देश की 77 फ़ीसदी आबादी में से कोई जो 20 रुपये या उससे भी कम पर गुज़र-बसर करता हो (अर्जुन सेन गुप्ता आयोग), क्या सांसद उम्मीदवार के तौर पर खड़े होने के लिए 10,000 की जमानत भी जमा करा पायेगा? इस बार चुनाव पर सरकारी ख़ज़ाने से सीधे तौर पर 8 हज़ार करोड़ रुपये ख़र्च होंगे और सुरक्षा समेत तमाम तामझाम का ख़र्च होगा अलग से। चुनावी पार्टियों और उम्मीदवारों की तरफ़ से 30,000 करोड़ ख़र्च होने का अनुमान है। ‘सेण्टर फ़ॉर मीडिया स्टडीज’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ इस चुनाव में 11,000 करोड़ रुपये का काला धन ख़र्च होने की भी सम्भावना है। मतदान शुरू होने से पहले ही 90 करोड़ की धनराशि तो ज़ब्त हो ही चुकी थी और जो न तो ज़ब्त हुई और न ही होगी उसका क्या हिसाब-किताब? इतना ही नहीं अकेले बिहार, बंगाल और उत्तरप्रदेश यानी 3 राज्यों से ही 31 लाख लीटर शराब भी ज़ब्त हुई है। चुनाव ख़त्म होने तक यह आँकड़ा कहाँ तक पहुँच सकता है, इसका अनुमान लगाने का काम हम आप पर ही छोड़ देते हैं। यह भी देख लिया जाये कि हमारे जन प्रतिनिधियों के आर्थिक हालात देश की जनता से कितने मिलते हैं और क्या इनमें से अधिकांश की जगह संसद की बजाय जेल नहीं होनी चाहिए? अगर 2009 में चुनी गयी मौजूदा संसद की बात की जाये तो 543 में से 315 करोड़पति हैं यानी 58 प्रतिशत संसद सदस्य करोड़पति हैं। एक संसद सदस्य की औसत सम्पत्ति है 5 करोड़ तैंतीस लाख रुपये और 2004 की तुलना में इसमें 186 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज़ हुई है। 162 सांसदों पर भारतीय क़ानून के तहत आपराधिक मामले चल रहे हैं यानी करीब 27 प्रतिशत जनप्रतिनिधि अपराधी हैं। इस मामले में भी 2004 की तुलना में 27 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हुआ है। चलो हम किसी मामले में तो दुनिया में काफ़ी आगे चल रहे हैं! यह भी रेखांकित करते चलें कि ये आँकड़े ख़ुद इन प्रतिनिधियों द्वारा ही अपने शपथपत्रों के माध्यम से बयान किये गये हैं, यह पता नहीं किस मुँह से। असल में लोकतन्त्र का यह स्याह पहलू अमावस की रात से भी अधिक स्याह हो सकता है, क्योंकि तमाम राजनेता कितने सच्चे हैं इस बात को भी हम भली-भाँति समझते हैं। हमारे महान देश में एक न्याय और भी व्यवहार में लाया जाता है, हालाँकि पूरे विश्व में ही इसका चलन है, शायद हमारे देश के विश्व गुरु होने के भले वक़्तों में दुनिया वालों ने इसे हमसे सीख लिया होगा! वह न्याय यह है कि जैसे-जैसे पैसे के वज़न से जेब भारी होने लगती है, वैसे-वैसे क़ानून का शिकंजा आप पर से ढीला होने लगता है और जैसे ही यह ग्राफ़ कंगाली की तरफ़ घटना शुरू होता है, वैसे ही क़ानून का शिकंजा भी कसता चला जाता है। यानी सबसे अमीर का मतलब क़ानून को ख़रीदने में सबसे अधिक योग्य और सबसे ग़रीब का मतलब लुटेरों के पूरे तन्त्र के सामने असहाय और न्याय की ख़ातिर दर-दर की ठोकरें खाने के लिए सबसे अधिक अभिशप्त। अब बात करते हैं, लोकसभा चुनाव 2014 के उम्मीदवारों की करोड़पति और आपराधिक पृष्ठभूमि की। हमारे पास अभी तक 543 लोकसभा सीटों में से 232 सीटों के 3355 में से 3308 उम्मीदवारों के ही तथ्य उपलब्ध हो पाये हैं, किन्तु ‘पूत के पैर पालने में ही दिख जाते हैं’। हमारी बात के स्पष्टीकरण के लिए इतना पर्याप्त है। 232 सीटों के इन 3308 उम्मीदवारों में से 921 करोड़पति हैं, मतलब 28 प्रतिशत उम्मीदवार करोड़पति हैं। 558 उम्मीदवार ऐसे हैं, जिन पर भारतीय क़ानून के तहत ही आपराधिक मामले चल रहे हैं। चुनाव के पिछले इतिहास से सबक़ लेते हुए यह अनुमान लगाया जा सकता है कि इस बार भी करोड़पतियों और अपराधियों द्वारा बाज़ी मार लिये जाने की पूरी सम्भावना है। कांग्रेस जहाँ करोड़पति उम्मीदवारों की दौड़ में भाजपा के 74 प्रतिशत की तुलना में 84 प्रतिशत के साथ आगे चल रही है, वहीं भाजपा आपराधिक उम्मीदवारों के मामले में कांग्रेस के 23 प्रतिशत की तुलना में 34 प्रतिशत के साथ आगे चल रही है। आम आदमी पार्टी तक के 43 प्रतिशत उम्मीदवार करोड़पति और 16 प्रतिशत उम्मीदवार ऐसे हैं जिन पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त्र की कहानी कहाँ तक कहें ‘कबीरा कही न जाय’। जनप्रतिनिधियों के हालात देखकर अब ज़रा जन के हालात भी देख लिये जायें।
अक्टूबर 2013 की वैश्विक भूख सूचकांक की 120 देशों की सूची में भारत 63वें स्थान पर है। 2013 की मानव विकास सूचकांक की 186 देशों की सूची में भारत का स्थान 136वाँ है। देश में करीब 28 करोड़ लोग बेरोज़गार हैं। ग़रीबी रेखा के हास्यास्पद होने (सरकार के अनुसार प्रतिमाह गाँव में 816 रुपये और शहर में 1,000 रुपये कमाने वाला अमीर है!!) के बावजूद भी 22 फ़ीसदी आबादी इस रेखा से भी नीचे ज़िन्दगी बसर कर रही है। ध्यान रहे यह सरकारी आँकड़ा है, सरकार द्वारा आँकड़ों की बाज़ीगरी में यह कभी नहीं बताया जाता कि महँगाई और मुद्रास्फीति बढ़ाकर तथा लोगों की जेबों पर डाके डालकर वास्तविक औसत आय को कम कैसे किया जाता है। 2006 की अर्जुन सेन गुप्ता की सरकारी कमेटी की ही रिपोर्ट, जिसका ज़िक्र हम ऊपर कर आये हैं, के अनुसार देश की करीब 84 करोड़ आबादी प्रतिदिन 20 रुपये से भी कम पर गुज़ारा करने के लिए मजबूर है। निचोड़ के तौर पर बात यह है कि देश में ग़रीबी, बेरोज़गारी और भुखमरी के हालात भयंकर हैं। 1947 में देश के आज़ाद होने के समय भारत का ब्रिटेन पर 16.12 करोड़ रुपये का क़र्ज़ था जबकि आज भारत पर 32 लाख करोड़ का विदेशी क़र्ज़ है। नेताशाही-नौकरशाही और पूँजीपतियों के गठजोड़ ने देश की जनता की तबाही-बर्बादी में कोई कसर नहीं छोड़ी है। चुनावी प्रक्रिया के 6 दशक बाद भी आम जनता के हालात में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया है, बस लुटेरों के चेहरों और लूट के उनके तरीक़े में ज़रूर बदलाव आया है। असल में यह चुनावी व्यवस्था देश की जनता के लिए नौटंकी से अधिक कुछ नहीं है। मेहनत-मशक्कत करके तमाम संसाधनों का सृजन करने वाली व्यापक आबादी के लिए यह चुनावी तन्त्र एक भद्दा मज़ाक़ है। धनपशुओं और अपराधियों की कुत्ताघसीटी से ज़्यादा इसके कोई मायने नहीं हैं। वास्तव में चुनाव पूँजीपतियों का, पूँजीपतियों के लिए और पूँजीपतियों के द्वारा होता है। जनता को मिलते हैं सिर्फ़ झुनझुने ताकि आने वाले पाँच साल तक वह उन्हें बजाती रहे। लेकिन क्या यह सब सदा-सर्वदा ऐसे ही चलता रहेगा? क्या इतिहास नहीं बदलता है? क्या देश में ज़िन्दा-जुझारू, मुक्तिकामी और परिवर्तनकामी लोग हैं ही नहीं, जो बदलाव की अलख जगा सकें? क्या देश में ऐसे युवाओं का अकाल पड़ गया है जो वैज्ञानिक नज़रिये से समाज बदलाव के प्रोजेक्ट पर सोच-विचार कर सकें और भगतसिंह के शब्दों में इसे व्यापक मेहनतकश अवाम के सामने रख सकें? किसी भी समाज की परिवर्तन की गति अपने ऐतिहासिक कारणों से सापेक्षतः धीमी या तेज़ हो सकती है, किन्तु “बदलाव ही एकमात्र नियतांक होता है।” महान रूसी क्रान्तिकारी प्रबोधक निकोलाई दोब्रोल्युबोव के अनुसार, “विचारों और उनके क्रमशः विकास का महत्त्व केवल इस बात में है कि प्रस्तुत तथ्यों से उनका जन्म होता है और वे यथार्थ वास्तविकता में सदा परिवर्तनों की पेशवाई करते हैं। परिस्थितियाँ समाज में एक आवश्यकता को जन्म देती हैं। इस आवश्यकता को सब स्वीकार करते हैं, इस आवश्यकता की आम स्वीकृति के बाद यह ज़रूरी है कि वस्तुस्थिति में परिवर्तन हो, ताकि सबके द्वारा स्वीकृत इस आवश्यकता को पूर्ण किया जा सके। इस प्रकार किन्हीं विचारों तथा आकांक्षाओं की समाज द्वारा स्वीकृति के बाद ऐसे दौर का आना लाज़िमी है, जिसमें इन विचारों तथा आकांक्षाओं को अमल में उतारा जा सके।’’ आज अरब से लेकर लातिन अमेरिका तक और एशिया, अफ्रीका से लेकर यूरोप और अमेरिका तक में लोग पूँजीवादी व्यवस्था के खि़लाफ़ सड़कों पर उतर रहे हैं। यह बात भी उतनी ही सच है कि पूँजीवाद-विरोधी तात्कालिक आन्दोलनों के पास कोई व्यावहारिक विकल्प नहीं है। लेकिन क्या यह विकल्पहीनता का आलम बदलेगा नहीं? यह ज़रूर बदलेगा! भारत में भी समाज की दमनभट्ठी में बदलाव के बीज खदबदा रहे हैं। जनता का भ्रम पूँजीवादी व्यवस्था से धीरे-धीरे टूट रहा है। समाज के इस बदलाव के दौर में ऐसे जुझारू छात्रों-युवाओं की ज़रूरत है, जो जनता के साथ अपने सपनों और आकांक्षाओं को जोड़ सकें। बदलाव की सही विचारधारा के वाहक बन सकें और व्यापक मेहनतकश जनता को बुनियादी स्तर पर संगठनबद्ध कर सकें। ऐसे युवाओं के इन्तज़ार में हम बैठेंगे नहीं बल्कि हम सभी को, देश के हर एक इंसान को ही अपना पक्ष चुनना होगा। आने वाले दिनों में शोषण-विहीन समाज के लिए लोग उठेंगे; उनके बीच से ही अगुवाई करने वाले लोग भी आगे आयेंगे और तब जाकर मौजूदा पूँजीवादी व्यवस्था के व्यावहारिक विकल्प के लिए काम होगा। पूँजीवादी व्यवस्था के चुनावी भ्रमजाल से निकलकर अमर शहीदों के सपनों को पूरा करने की तरफ़ समाज आगे बढे़गा। आमूलचूल सामाजिक बदलाव की शुरुआत तक हमेशा की तरह पूँजीवादी व्यवस्था में चुनाव पूँजीपतियों का, पूँजीपतियों के लिए और पूँजीपतियों के द्वारा होता रहेगा और जनता सिर्फ़ मोहरा बनती रहेगी।

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान, जनवरी-अप्रैल 2014

कारपोरेट पूँजीवादी मीडिया का वर्चस्व और क्रान्तिकारी वैकल्पिक मीडिया की चुनौतियाँ

पूँजीवाद अपने से पहले आयी तमाम शोषणकारी व्यवस्थाओं से कई मायनों में भिन्न है। आर्थिक और राजनीतिक स्तर पर तमाम भिन्नताओं के साथ-साथ एक बड़ा फ़र्क़ यह है कि पूँजीवाद के तहत शोषक-उत्पीड़क वर्गों का शासन एकतरफ़ा प्रभुत्व पर नहीं, बल्कि वर्चस्व पर आधारित होता है। प्रभुत्व और वर्चस्व के बीच के फ़र्क़ को ग्राम्शी ने स्पष्ट किया था; प्रभुत्व पर आधारित शासन शासित जनता से ‘सहमति’ नहीं लेता और यह अपना वैधीकरण किसी दिव्य शक्ति से ग्रहण करता है। मिसाल के तौर पर, सामन्ती समाज या अन्य प्राक्-पूँजीवादी समाजों में शासक वर्गों के शासन का वैधीकरण ईश्वर-प्रदत्त होता था; राजा या सामन्त ईश्वर की छाया होता था और ईश्वर उसके मुख से बोलता था! लेकिन जब पूँजीपति वर्ग ने सामन्ती व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष शुरू किया तो उसने मानव-केन्द्रित समाज, सेक्युलरिज़्म (धर्म-निरपेक्षता वाले अर्थ में नहीं, बल्कि इहलौकिकता वाले अर्थ में), मानवतावाद आदि का नारा दिया। बुर्जुआ विचारों के पहले प्रस्फुटन, यानी पुनर्जागरण में ये ही स्वर प्रधान थे। उसके बाद धार्मिक सुधार आन्दोलन और प्रबोधन के दौरों में यह सिलसिला आगे बढ़ा और अब वाणिज्यिक से औद्योगिक प्रकृति ग्रहण कर रहे पूँजीपति वर्ग के दार्शनिकों ने तार्किकता और विज्ञान का बैनर उठाया। पूँजीवादी दार्शनिकों ने एक आदर्श समानतापूर्ण, भ्रातृत्वपूर्ण और स्वतन्त्रता वाली दुनिया का सपना देखा। प्रथम पूँजीवादी क्रान्तियों के बाद पूँजीपति वर्ग ने इस नारे पर इस तरह अमल किया कि समानता न्याय के समक्ष औपचारिक समानता, भाईचारा पूँजीपतियों का भाईचारा और स्वतन्त्रता मुनाफ़ा कमाने और अपनी श्रमशक्ति बेचने की स्वतन्त्रता में तब्दील हो गयी। निश्चित तौर पर, प्रबोधनकालीन दार्शनिकों का क्रान्तिकारी चिन्तन समानतामूलक समाज के एक यूटोपियाई आदर्शीकृत छवि से आगे नहीं जा सकता था, लेकिन इस छवि को चिन्तन के गर्भ में ग्रहण करना ही एक बड़ी क्रान्ति थी। पूँजीपति वर्ग ने अपने छल और फरेब को 1848 की यूरोपीय क्रान्तियों में उघाड़कर रख दिया। लेकिन इसके बावजूद पूँजीवादी समाज सामन्ती उत्पीड़न और दमन के बरक्स एक प्रगतिशील क़दम था। आर्थिकेतर शोषण-उत्पीड़न की जगह अब पूँजीवादी आर्थिक शोषण ने ले ली थी। कम-से-कम औपचारिक तौर पर राजनीतिक स्वतन्त्रता, अभिव्यक्ति और संगठन का अधिकार जनता को मिला। यह दीगर बात है कि बढ़ती आर्थिक असमानता वाले मुनाफ़ा-केन्द्रित समाज में इस क़ानूनी समानता और स्वतन्त्रता का कोई मतलब नहीं रह जाता है। यद्यपि, पूँजीवादी शासकों का यह दावा था कि वह जनता से सहमति लेकर शासन करते हैं। पूँजीवादी संसदीय जनतन्त्र के राजनीतिक रूप के तहत चुनावों में शासकों का फ़ैसला होना था। चूँकि शोषकों को अपने शासन का वैधीकरण अब जनता से वोटों के रूप में और चुनावों की प्रक्रिया में हासिल करना था, इसलिए जनता के बीच राय के निर्माण का बड़ा महत्त्व हो गया। पूँजीपति वर्ग का शासन किसी दिव्य रूप से प्रदत्त वैधीकरण पर नहीं बल्कि जनता की ‘सहमति’ पर आधारित था। यहीं पर ग्राम्शी अपने वर्चस्व (हेजेमनी) की अवधारणा को लाते हैं। चूँकि अब शोषकों को जनता से सहमति हासिल करनी थी, इसलिए सहमति का निर्माण करना भी ज़रूरी हो गया था और साथ ही ज़रूरी हो गया था, सहमति का निर्माण करने वाले उपकरणों का होना।
यह कोई इत्तेफ़ाक नहीं था कि प्रिण्टिंग प्रेस का आविष्कार 1440 में हुआ और पहली बार लिखित सामग्री का मास उत्पादन, वितरण और विसरण सम्भव हुआ; यह भी कोई संयोग नहीं था कि पहला अख़बार 1605 में जर्मनी में निकलना शुरू हुआ। इतिहास में ऐसी युगान्तरकारी घटनाओं के घटने में संयोग से केवल कुछ दशकों का फ़र्क़ हो सकता है, कई सौ या हज़ार सालों का नहीं। मानवता उन्हीं प्रश्नों पर सोचती है जो प्रश्न उसके युग के जीवित प्रश्न होते हैं। जैसा कि मार्क्स ने कहा था – मनुष्य अपने लिए वही लक्ष्य निर्धारित करता है, जिसे वह प्राप्त कर सकता है। प्रेस और अख़बार की शुरुआत 15वीं से 17वीं सदी के बीच होती है, तो यह इस पूरे युग के बारे में बहुत कुछ बयान करती है। उभरते बर्गरों और फिर उनकी सन्तानों ने चर्च और सामन्तवाद की बेड़ियों के विरुद्ध जो संघर्ष शुरू किया उसमें इस प्रकार के माध्यमों की ईजाद स्वाभाविक थी; 17वीं सदी के उत्तरार्द्ध तक राजनीतिक पर्चों, पुस्तिकाओं और पुस्तकों की संस्कृति यूरोप में मज़बूती से पाँव जमाने लगी थी। प्रथम पूँजीवादी जनवादी क्रान्तियों के बाद भी अख़बारों, पुस्तकों और मुद्रित साहित्य की तादाद में बढ़ोत्तरी होती रही। साथ ही, नाटक, संगीत व अन्य परफ़ॉर्मिंग कलाओं का भी तेज़ी से प्रसार हुआ। सामन्ती युग के विपरीत, जब कला के ये तमाम माध्यम सामन्तों-ज़मींदारों के जलसाघरों में क़ैद हुआ करते थे, अब कला के तमाम माध्यम पुनरुत्पादन-योग्य बनने लगे; 18वीं सदी के अन्त और 19वीं सदी की शुरुआत में फ़ोटोग्राफ़ी के आने और कुछ ही दशकों बाद चलचित्र के आने के साथ कलात्मक रचनाओं के पुनरुत्पादन में अभूतपूर्व क्रान्ति हुई। विचारों के प्रसार का पैमाना और रफ़्तार अद्वितीय हो गये। यह प्रक्रिया आज भी जारी है। इसी पूरी प्रक्रिया में पूँजीवादी मीडिया का विकास हुआ। निश्चित रूप से, मीडिया भी वर्ग संघर्ष का स्थल है, लेकिन ज़ाहिरा तौर पर ‘जिस वर्ग के हाथ में भौतिक उत्पादन के साधन होते हैं, बौद्धिक उत्पादन पर भी उसी का नियन्त्रण होता है।’
पूँजीवाद को मीडिया की ज़रूरत है और पूँजीवादी युग में ही मास मीडिया जैसी कोई चीज़ अस्तित्व में आ सकती थी। आप तकनीकी तौर पर किसी ‘सामन्ती मीडिया’ या ‘दास मीडिया’ जैसी चीज़ की बात नहीं कर सकते हैं। पूँजीपति वर्ग को मीडिया की ज़रूरत ठीक इसीलिए होती है, क्योंकि उसका शासन प्रभुत्व पर नहीं बल्कि वर्चस्व पर आधारित होता है। उसे अपने शासन के लिए ‘सहमति’ का उत्पादन और पुनरुत्पादन करना होता है। निश्चित तौर पर, आज की दुनिया की सच्चाई बताकर पूँजीपति वर्ग अपने शासन के लिए सहमति नहीं निर्मित कर सकता है। ज़ाहिर है कि ऐसा करने के लिए उसे एक छद्म चेतना का निर्माण करना होता है, उसे जनता की चेतना की प्रतिक्रियावादी सम्भावना- सम्पन्नता को क्रियान्वित करना होता है, उसे मिथकों को सामान्य-बोध (कॉमन सेंस) के रूप में स्थापित करना होता है, उसे दुनिया की एक काल्पनिक झूठी तस्वीर पेश करनी होती है, उसे दिखाने से ज़्यादा छिपाना होता है, और यहीं पर बुर्जुआ विचारधारा का महत्त्व सामने आता है।
Mainstream media at workपूँजीपति वर्ग जनता को विज्ञान और तर्क केवल तकनोलॉजिकल क्षेत्र में दे सकता है, या फिर सिर्फ़ उतना ही दे सकता है, जिससे कि उसका अस्तित्व ख़तरे में न पड़ जाये। इसलिए जहाँ एक ओर विज्ञान की शिक्षा दी जाती है, वहीं दूसरी ओर तमाम किस्म के रूढ़िवाद, परम्परावाद, कूपमण्डूकता, अन्धराष्ट्रवाद और साथ ही तमाम अवैज्ञानिक और अतार्किक विचारों को भी छात्रों-विद्यार्थियों के दिमाग़ में भरा जाता है। तालीम लेने वाले नौजवानों के लिए अक्सर विज्ञान और तर्क का क्षेत्र बस प्रयोगशाला रह जाता है; भौतिकी और रसायनशास्त्र के उन्नत प्रयोग करने वाले विज्ञान के छात्र भी साक्षात्कार देने से पहले पुट्टूपारथी, बालाजी आदि में आशीर्वाद लेने जाते हैं; वैज्ञानिक उपग्रह बनाने के बाद प्रक्षेपित करने से पहले उसे तिलक लगाने मन्दिर ले जाते हैं! इसलिए यह व्यवस्था विज्ञान के क्लर्क पैदा करती है, वैज्ञानिक नहीं। ठीक उसी प्रकार मीडिया भी काम करता है। यदि आज आप न्यूज़ चैनल (जिन्हें न्यूज़ चैनल कहना ही बेमानी है!) देखें तो उसमें टैरट कार्ड, राशिफल और वास्तु से लेकर रावण की ममी, सीता के ज़मीन में समाने की जगह आदि तक दिखलाया जाता है। यदि आप मनोरंजक धारावाहिकों को एक हफ़्ते से ज़्यादा देख लें तो आप शायद उदात्तता, व्यापकता, असीमता आदि जैसे शब्दों की परिभाषा ही भूल जायें, और हर तुच्छ चीज़ आपको गुदगुदाये! यदि आप म्यूज़िक चैनल व लाइफ़स्टाइल चैनल देखें तो उसके रियैलिटी शो देखकर आपको उबकाई या मितली आ सकती है (बशर्ते कि आपमें कुछ बुनियादी मानवीय मूल्य बचे हों।)। अगर आप अख़बारों को देखें तो पाते हैं कि जो समाचार बनाकर पेश किया जाता है, वह वास्तव में समाचार है ही नहीं! जो समाचार है उसे या तो अख़बारों में जगह ही नहीं मिलती या फिर वह एक कॉलम का फिलर आइटम बनकर रह जाता है। आज की फ़िल्मों के बारे में जितना कम कहा जाये उतना बेहतर है। कला समाज को सौन्दर्यात्मक चित्रण करती है। यदि यही कला की परिभाषा है तो अधिकांश फ़िल्मों को कलात्मक रचना कहा ही नहीं जा सकता है, बल्कि वे कचरा-करकट हैं, और इस कचरे में से भी आधे से ज़्यादा सेमी-पॉर्नोग्राफ़िक है।
पूँजीवादी मीडिया इन सभी माध्यमों के ज़रिये या तो दिमाग़ को सोचने की आदत से मुक्त करता है और एक हल्के नशे में रखता है, या फिर वह सिर्फ़ उन मुद्दों को सोचने को मजबूर करता है, जिन पर शासक वर्ग हमें सोचवाना चाहता है। निश्चित तौर पर, कुछ अच्छे टीवी कार्यक्रम, अख़बारी कॉलम और फ़िल्में भी होती हैं। लेकिन उनकी तादाद नगण्य होती है और सांस्कृतिक घटाटोप के आलम में वे कहाँ गुम हो जाती हैं, पता भी नहीं चलता है। वास्तव में पूँजीवादी मीडिया पूँजीपति वर्ग के विश्व-दृष्टिकोण, उसके दर्शन, राजनीति और संस्कृति के प्रभुत्व को जनता के मस्तिष्क पर स्थापित करने का प्रयास करता है। लेकिन यह काम मीडिया यान्त्रिक तरीक़े से नहीं करता है, बल्कि बेहद जटिल और संश्लिष्ट तरीक़े से करता है। यह प्रक्रिया अन्तरविरोधी और विरोधाभासी होती है। इस पूरी प्रक्रिया में मीडिया लोगों को चीज़ों को देखने का एक नज़रिया देता है। यह विभिन्न रोज़मर्रा की घटनाओं और परिघटनाओं को देखने का एक व्याख्यात्मक ढाँचा देता है। यह व्याख्यात्मक ढाँचा या चौखटा लोगों को आलोचनात्मकता से महरूम करता है और उन्हें एक छद्म आलोचनात्मकता देता है। यह यथास्थिति की कोई परिवर्तनकामी आलोचना पेश करने की क्षमता से जनता को वंचित करता है। ऐसा नहीं है कि पूँजीवादी मीडिया पूँजीवादी समाज की नग्न सच्चाइयों और बर्बर यथार्थ को बिल्कुल चित्रित ही नहीं करता है। लेकिन वह उन्हें चित्रित करते हुए जनता को एक छद्म, नपुंसक और पराजयवादी आलोचनात्मकता देता है। कई बार अगर व्यवस्था की कोई आलोचना मौजूद नहीं होती तो बुर्जुआ मीडिया ही उसकी एक छद्म आलोचना पेश कर देता है। जैसा कि नोम चॉम्स्की ने कहा है, लोगों के दिमाग़ों पर नियन्त्रण करने के लिए शासक वर्ग बहस-मुबाहिसे का सीमित और अप्रभावी स्पेस देता है, लेकिन उस स्पेस में वह काफ़ी जीवन्त बहस-मुबाहिसा आयोजित कराता है। ज़ाहिर है, ऐसे बहस-मुबाहिसे से व्यवस्था को कोई ख़तरा नहीं होता, बल्कि उसका वर्चस्व और विकसित होता है। इस पूरी प्रक्रिया में पूँजीवादी मीडिया पूँजीवादी मिथकों और पूर्वाग्रहों को सामान्य बोध बना देता है और साथ ही पूँजीपति वर्ग के शासक को तमाम बुराइयों के बावजूद सबसे नैसर्गिक और सबसे उपयुक्त क़रार देता है।
यह बात सच है कि पूँजीवादी मीडिया अपने इस काम में हमेशा कामयाब नहीं हो पाता है। पूँजीवादी समाज में आर्थिक संकट, बेरोज़गारी, अमीरी और ग़रीबी के बीच खाई और बदहाली बढ़ने के साथ मीडिया द्वारा ‘सहमति’ के निर्माण की वर्चस्वकारी प्रणाली गड़बड़ तरीक़े से काम करने लगती है। पूँजीवादी मीडिया द्वारा पूँजीवादी व्यवस्था का पक्षपोषण अधिक से अधिक प्रहसनात्मक और भोण्डा लगने लगता है। मीडिया में बैठे पूँजीपति वर्ग के ‘थिंक टैंक’ जिस रूप में सन्देश को लोगों के बीच पहुँचाना चाहते हैं, सन्देश उस रूप में लोगों के पास नहीं पहुँचता; लोग उसे कुछ अलग तरीक़े से ही ग्रहण करते हैं और उससे वे अर्थ निकालते हैं जोकि इस सन्देश को बनाने के वाले का क़तई इरादा नहीं था।
लेकिन निश्चित तौर पर हम पूँजीवादी मीडिया के ख़तरनाक असर और उसके विचारधारात्मक वर्चस्व का मुकाबला करने के लिए पूँजीवादी समाज के संकटग्रस्त होने का इन्तज़ार नहीं कर सकते हैं। लिहाज़ा, हमें उनके वर्चस्व के बरक्स अपना प्रति-वर्चस्व निर्मित करना चाहिए; हमें प्रभुत्वशाली पूँजीवादी मीडिया के बरक्स क्रान्तिकारी वैकल्पिक मीडिया निर्मित करना चाहिए; हमें मौजूद मीडिया द्वारा जनता को मुहैया कराये जा रहे बुर्जुआ व्याख्यात्मक चौखटे के विकल्प के तौर पर देश-दुनिया, समाज, संस्कृति और हरेक विषय-वस्तु के सही विश्लेषण के लिए एक क्रान्तिकारी वैज्ञानिक व्याख्यात्मक चौखटा मुहैया कराना चाहिए; निश्चित तौर पर, ऐसा क्रान्तिकारी वैकल्पिक मीडिया पूँजीवादी विराट मीडिया तन्त्र के बराबर आकार और पूँजी वाला नहीं हो सकता है, और न ही उसे होने की ज़रूरत है। हम कारपोरेट मीडिया की पूँजी की ताक़त का मुकाबला अपने स्वयंसेवकों और कार्यकर्ताओं द्वारा कर सकते हैं। हमारे पास ऐसे हज़ारों प्रतिबद्ध युवा संस्कृतिकर्मी, संगीतकार, नाटककार, कवि, लेखक, कहानीकार, पत्रकार, अभिनेता आदि होने चाहिए जो जनता को वह समाचार, वह संस्कृति, वे गीत, वे नाटक, वे कहानियाँ, वे कविताएँ, वे उपन्यास मुहैया करा सकें जिनकी जनता को ज़रूरत है; जो जनता को आज की दुनिया की सच्चाई से वाक़िफ़ करायें और साथ ही इस अमानवीय दुनिया के विकल्प के निर्माण की ओर भी प्रेरित और प्रोत्साहित करें; जो उन्हें एक नयी दुनिया के सपने देखने और उन सपनों को साकार करने की दृष्टि दें। कहाँ हैं आज ऐसे कलाकार? कहाँ हैं आज ऐसे लेखक और पत्रकार? हमें चाहिए ऐसे दर्जनों अख़बार जो देश के तमाम हिस्सों में जनता की भाषा में उनसे संवाद स्थापित कर सकें और जो ख़बरों की परिभाषा को बदल दें; हमें चाहिए ऐसी नाटक टीमें जो शहरों की झुग्गी बस्तियों और निम्नमध्यवर्गीय कालोनियों से लेकर कॉलेज, रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों पर जनता के जीवन से जुड़ी सच्चाई को बेपर्द करने वाले नाटक दिखा सकें; हमें चाहिए ऐसे गायक और संगीतकार जो देश के कोने-कोने में विद्रोह के राग भर दें और लोगों को जगा दें; हमें चाहिए ऐसे फ़िल्मकार जो पर्दे पर आज के मेहनतकश जीवन की त्रासदी को ऐसे उकेर दें कि लोग अपनी आदतों की ताक़त को हराकर जाग उठें और खड़े हो जायें; कहाँ हैं आज ऐसे युवा नाटककार, संगीतकार, गायक और फ़िल्मकार? हमें और भी बहुत कुछ चाहिए; हमें अपना टेलीविज़न चैनल और रेडियो चैनल चलाना चाहिए, जब तक आज का पूँजीवादी जनवाद इस बात का स्पेस देता हो। हमारे पास दज़र्नों सचल पुस्तक प्रदर्शनी वाहन होने चाहिए। और सबसे ऊपर इस पूरे ताने-बाने को संचालित करने के लिए पूँजीपतियों का पैसा और वेतनभोगी कर्मचारी नहीं, बल्कि हज़ारों की तादाद में समर्पित और प्रतिबद्ध क्रान्तिकारी कार्यकर्ता चाहिए! तभी एक ऐसा वैकल्पिक मीडिया खड़ा हो सकता है, जोकि पूँजीवादी मीडिया के वर्चस्व के बरक्स समाज में अपनी खन्दकें खोद सकता है, अपनी अवस्थितियाँ बाँध सकता है और एक क्रान्तिकारी प्रति-वर्चस्व का निर्माण कर सकता है। तभी हम मौजूदा मीडिया के घिनौने, बदशक्ल झूठ और फरेब का मुकाबला कर सकते हैं, तभी हम उसके द्वारा फैलाये जा रहे सांस्कृतिक घटाटोप के विरुद्ध क्रान्तिकारी जनसंस्कृति की मशाल को जला सकते हैं। और जब तक हम ऐसा नहीं करेंगे, निश्चित तौर पर हम एक समूचे परिवर्तनकामी और क्रान्तिकारी प्रोजेक्ट को नहीं खड़ा कर सकते हैं।
21वीं सदी की क्रान्तियों के एजेण्डे पर संस्कृति का प्रश्न काफ़ी ऊपर आ गया है। क्योंकि आज के पूँजीपति वर्ग ने संस्कृति और मीडिया का अपने वर्ग शासन के लिए वर्चस्व निर्मित करने के लिए ज़बरदस्त इस्तेमाल किया है। हमें उस वर्चस्व को चुनौती देनी होगी। और इसके लिए एक नये क्रान्तिकारी पुनर्जागरण और प्रबोधन की ज़रूरत है। और ऐसे नये क्रान्तिकारी पुनर्जागरण और प्रबोधन के लिए निश्चित तौर पर हमें ऐसा क्रान्तिकारी वैकल्पिक मीडिया चाहिए!
इसी समझदारी के साथ हम ‘आह्वान’ का मीडिया विशेषांक लेकर आपके बीच हैं। इस अंक के अधिकांश लेख आज के पूँजीवादी मीडिया के राजनीतिक अर्थशास्त्र, उसकी प्रणाली, उसके तमाम कार्यक्रमों, समाचार चैनलों, धारावाहिकों, रियैलिटी शो आदि पर केन्द्रित हैं और उनका विश्लेषण करते हैं। हम एक बार फिर से देर से अंक निकाल पाने के लिए क्षमाप्रार्थी हैं।

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान, जनवरी-अप्रैल 2014