शिवानी
आज विज्ञापनों का बोलबाला हर तरफ़ है। पूँजीवादी प्रचार तन्त्र की एक व्यापक परिघटना के रूप में विज्ञापन आज सर्वत्र विद्यमान हैं। वर्तमान समय में विज्ञापन उद्योग की मौजूदगी के बग़ैर स्वयं पूँजीवाद की कल्पना करना ही कठिन है। टी.वी., रेडियो, अख़बार, पत्र-पत्रिकाएँ, इण्टरनेट, सड़कों के किनारे लगे बिलबोर्ड, बस-स्टॉपों और रेलवे स्टेशनों पर लगी प्रचार पट्टियाँ – जहाँ नज़र दौड़ाइये विज्ञापन ही विज्ञापन, प्रचार ही प्रचार। इस मायने में विज्ञापन महज़ वस्तुओं या सेवाओं की मार्केटिंग का औज़ारभर नहीं रह गये हैं, बल्कि पूँजीवाद द्वारा निर्मित एक विचारधारात्मक उपकरण के रूप में भी सामने आये हैं। पूँजीवादी अर्थव्यवस्था के अर्थों में बात करें तो पूरे विज्ञापन उद्योग का आकार कई हज़ार करोड़ का है। अगर भारत की बात करें तो वर्तमान में विज्ञापन उद्योग 91,700 करोड़ रुपये का कारोबार है जिसके 2017 तक 1,66,000 करोड़ रुपये तक पहुँच जाने की सम्भावना है। जहाँ तक अमेरिका का सवाल है तो 2010 में विज्ञापनों पर होने वाला ख़र्च 143 खरब डॉलर था और पूरे विश्व में यह आँकड़ा 467 खरब डॉलर था। ‘ऑगिलवाई एण्ड मैथर’, ‘जे वॉल्टर थॉमसन’, ‘मैककेन एरिकसन’ जैसी कई राष्ट्रपारीय एजेंसियाँ आज विज्ञापन उद्योग में लगी हुई हैं।
एक सांस्कृतिक उत्पाद के तौर पर भी विज्ञापनों का असर लम्बे समय तक रहता है। क्योंकि लगातार दुहराव के ज़रिये ये लोगों के मस्तिष्क पर लगातार प्रभाव छोड़ते रहते हैं। हमें पता भी नहीं चलता कि हम कब विज्ञापनों में इस्तेमाल किये जाने वाले जिंगल गुनगुनाने लगते हैं या फिर उनके स्लोगन और टैगलाइन ख़ुद दोहराने लगते हैं। पूँजीवाद विज्ञापनों द्वारा माल अन्धभक्ति (कमोडिटी फ़ेटिशिज़्म) को एक नये मुक़ाम पर पहुँचा देता है। बार-बार लगातार विज्ञापनों के ज़रिये हमें यह बताने का प्रयास किया जाता है कि यदि हमारे पास फलाना सामान नहीं है तो हम ज़िन्दगी में कितना कुछ ‘मिस’ कर रहे हैं। हमें बार-बार लगातार यह बताया जाता है कि सुखी-सन्तुष्ट जीवन का एकमात्र रास्ता बाज़ार के ज़रिये वस्तुओं का उपभोग है। केवल माल और सामान ही हमें खुशी और सामाजिक रुतबा प्रदान कर सकते हैं। बिना किसी अपवाद के हर विज्ञापन का यही स्पष्ट सन्देश होता है – चाहे वह विज्ञापन किसी कार कम्पनी का हो या किसी बीमा कम्पनी का, किसी सौन्दर्य प्रसाधन के ब्राण्ड का हो या फिर किसी शराब या मोबाइल फ़ोन की कम्पनी का – यही सन्देश बार-बार रेखांकित किया जाता है। सामानों, वस्तुओं, मालों को प्रसन्नता, स्वतन्त्रता और रुतबे का समतुल्य बना दिया जाता है।
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद विक्टर लिबोव नामक एक खुदरा व्यापार विश्लेषक ने इस सोच को कुछ इन शब्दों में व्यक्त किया, “हमारी बेहद उत्पादक अर्थव्यवस्था—यह माँग करती है कि हम उपभोग को जीवन का तरीक़ा बना दें, कि हम सामानों के बेचने और ख़रीदने के काम को रस्मों में तब्दील कर दें, कि हम आत्मिक सन्तुष्टि और अपने अहं की तुष्टि को मालों में ढूँढें—सामानों का लगातार बढ़ती दर से उपभोग किया जाना, जला दिया जाना, जर्जर हो जाना, प्रतिस्थापित किया जाना, और फेंक दिया जाना हमारी ज़रूरत है।” पूँजीवादी अर्थतन्त्र के तर्क को इन महाशय ने जितनी सुस्पष्टता और बेलाग-लपेट तरीक़े से रखा है वही तर्क आज विज्ञापन उद्योग बार-बार प्रचारित कर रहा है।
ऐसा भी नहीं है कि विज्ञापन उद्योग की कार्य-प्रणाली में कोई बदलाव नहीं आया है। यदि 19वीं शताब्दी के अन्त और 20वीं शताब्दी के शुरुआती वर्षों की बात करें तो हम पाते हैं कि उस दौर में विज्ञापन मालों के गुणों के बारे में बात करते थे। जैसेकि वे क्या-क्या कर सकते हैं, या फिर कितने अच्छे तरीक़े से कोई काम कर सकते हैं, आदि। लेकिन 1920 का दशक आते-आते विज्ञापनों की कार्य-प्रणाली में एक महत्त्वपूर्ण बदलाव आया। अब विज्ञापन सामानों और मालों को लोगों के सामाजिक जीवन से जोड़ रहे थे। लोग जिस किस्म के सामाजिक जीवन की इच्छा रखते थे – बिना किसी असुरक्षा और अनिश्चितता के, सुकून, आज़ादी और सुख से भरी ज़िन्दगी – वस्तुओं को उसी जीवन की प्रभावशाली छवियों से जोड़कर पेश किया जाने लगा। जो जीवन पूँजीवाद लोगों को वास्तविक जीवन में मुहैया नहीं करा सकता था, उसे विज्ञापनों में मालों के उपभोग द्वारा सम्भव दिखाया जाने लगा। यह एक फन्तासी की दुनिया रचने जैसा है – एक ‘एस्केप रूट’ जिसमें हमें एक ऐसी दुनिया का सपना दिखाया जाता है, जिसमें हम वस्तुओं के उपभोग से हर ख़ुशी पा सकते हैं। विज्ञापन इसी सपने को हमारी चाहत में बदलने का काम करते हैं। और फिर हमें बताया जाता है कि यह चाहत अधिक से अधिक सामानों के उपभोग से ही पूरी हो सकती है। इस मायने में विज्ञापन उद्योग पूँजीवाद का एक बेहद ख़तरनाक, सूक्ष्म और निपुण विचारधारात्मक हथियार है, जो लोगों को पूँजीवादी उपभोक्ता संस्कृति का अभ्यस्त बनाता है और बेहद वर्चस्वकारी तरीक़े से अपने हिसाब से चीज़ों को देखने का आदी बनाता है। लोग अनालोचनात्मक तरीक़े से इस तर्क से सहमत होने लगते हैं कि सामानों और मालों के अधिकाधिक संचय में ही खुशहाल जीवन का मन्त्र है।
इस संक्षिप्त चर्चा के बाद हम देख सकते हैं कि पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में विज्ञापन एक अहम भूमिका अदा करते हैं। पूँजीवाद के विचारधारात्मक उपक्रम के रूप में पूँजीवादी दृष्टिकोण, मनोविज्ञान और संस्कृति का बेहद बारीकी और चालाकी से प्रचार-प्रसार करते हैं और अत्यन्त वर्चस्वकारी तरीक़े से इस नज़रिये से सोचने के लिए लोगों (जिसे कि वे महज़ उपभोक्ता ही मानते हैं) की सहमति लेते हैं। लेकिन न तो प्रकृति में और न ही समाज में कोई भी प्रक्रिया या परिघटना एकाश्मी तरीक़े से चलती रहती है। और चूँकि लोग सोचते हैं और लोग अपने हालात के बारे में भी सोचते हैं, इसलिए पूँजीवाद का कोई भी प्रोपगैण्डा कितना ही वर्चस्वकारी क्यों न हो वह लोगों को चिरन्तन काल तक चीज़ों के प्रति अनालोचनात्मक नहीं बनाये रख सकता। विज्ञापनों के बाहर विद्यमान वास्तविक दुनिया लोगों को विज्ञापनों में निर्मित की गयी फन्तासी की दुनिया की असलियत दिखला ही देती है। और जब लोग वास्तविक जीवन में अपनी स्थिति के कारणों के बारे में सोचने लगते हैं तो वे उसी पूँजीवादी व्यवस्था को कठघरे में पाते हैं जो सुखी-समृद्ध जीवन की इन भ्रामक तस्वीरों और छवियों को उन्हें बेच रहा है।
मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान, जनवरी-अप्रैल 2014
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