रविवार, 23 अगस्त 2020

आज का हरियाणा-बहस के लिए

 आज का हरियाणा-बहस के लिए


आज का हरियाणा-बहस के लिए
र1857 की आजादी की पहली जंग में हरियाणा वासियों की काफी महत्वपूर्ण हिस्सेदारी रही। मगर उसके बाद विभाजन कारी ताकतों का सहारा लेकर अंग्रेजो ने हरियाणा की एकता को काफी चोट पहुंचाई। बाद में हरियाणा में यह कहावत चली कि ‘साहब की अगाड़ी और घोड़े की पिछाड़ी’ नहीं होना चाहिये ा नवजागरण के दौर में हरियाणा में आर्य समाज भी काफी लेट आया। महिला षिक्षा पर बहुत जोर लगाया आर्य समाज ने मगर सहषिक्षा का डटकर विरोध किया। एक और कहावत का चलन भी हुआ...म्हारे हरियाणा की बताई सै या विद्या की कमजोरी, बांडी बैल की के पार बसावै जब जुआ डालदे धोरी।
ंआज का साम्राज्यवाद पहले के किसी भी समय के मुकाबले ज्यादा संगठित,ज्यादा हथियारबन्द और ज्यादा विध्वंसक है। नवस्वतंत्र या विकासषील देषों की खेतियोंए देसी उद्योग धन्धों और सामाजिक संस्कृतियों को तबाह करने पर लगा है।दुनिया भर में साम्राज्यवादी वैरूवीकरण की यही विध्वंसलीला हम देख रहे हैं। नव सांमन्तवाद और नवउदारीकरण का दौर हरियाणा में पूरे यौवन पर नजर आता है। जहां एक तरफ हरियाणा ने आर्थिक तौर पर किसानों और कामगरों तथा मध्यमवर्ग के लोगांेे के अथक प्रयासों से पूरे भारत में दूसरा स्थान ग्रहण किया है वहीं दूसरी तरफ हरियाणा के ग्रामीण समाज का संकट षहरों के मुकाबले ज्यादा तेजी से गहराता जा रहा है। सामाजिक सूचकांक चिन्ताजनक स्थिति की तरफ इषारा करते नजर आते हैं।भूखी, नंगी, अपमानित और बदहाल आाबादी के बीच छदम सम्पन्नता के जगमग द्वीपों जैसे गुड़गांव पर जष्न मनाते इन नये दौलतमंदों का सफरिंग हरियाणा से कोई वासता नजर नहीं आता। कुछ भ्रश्ट राजनितिज्ञों, भ्रश्ट पुलिस अफसरों, भ्रश्ट नौकरषाहों तथा भ्रश्ट कानून के रखवालों , गुण्डों के टोलों के पचगड्डे ने काले धन और काली संस्कृति को हरियाणा के प्रत्येक स्तर पर बढ़ाया है। फिलहाल देष के और हरियाणा के दौलतमंदों का बड़ा हिस्सा साम्राज्यवादी वैष्वीकरण का पैरोकार बना हुआ नजर आता है। वह सुख भ्रान्ति का षिकार है या समर्पण कर चुका है। वह पूरे हरियाणा या पूरे देष के बारे में नहीं महज अपने बारे में सोचता है। फसलों की, जमीन के बढ़ते बांझपन के कारण, पैदावार कम से कमतर होती जा रही है। तालाबों पर नाजायज कब्जे कर लिये गये जिनके चलते उनकी संख्या कम हो गई और जो बचे उनके आकार छोटे होते गये। अन्धाधुन्ध कैमिकल खादों और कीट नाषकों के इस्तेमाल के कारण जमीन के नीचे का पानी प्रदूशित होता जा रहा है। गांव की षामलात जमीनों पर दबंग लोगांे ने कब्जे जमा लिए हैं। सरकारी पानी की डिगियों की बुरी हालत है। पीने के पानी का व्यवसायिकरण बहुत से गावों में टयूबवैलों के माध्यम से हो गया। मगर गलियों का बुरा हाल है। यदि पक्की भी हो गई हैं तो भी पानी की निकासी का कोई भी उचित प्रबन्ध न होने के कारण जगह जगह पानी के चब्बचे बन गये हैं जो बहुत सी बीमारियों के जनक हैं। बिजली ज्यादातर समय गुल रहती है। बैल आमतौर से कहीं कहीं बचे हैं। भैंसों के सुआ लगा कर दूध निकालने की कुरीति बढ़ती जा रही है। सब्जियों में भी सुआ लगाने का चलन बहुत बढ़ता जा रहा है। खेती की जोत का आकार कम से कमतर हुआ है और दो एकड़ या इससे कम जोत के किसानों की संख्या किसी भी गांव में कुल किसानों की संख्या में सबसे जयादा है। गांव के सरकारी स्कूलों का माहौल काफी खराब हो रहा है। इन स्कूलों में खाते पीते व दबंग परिवारों के बच्चे नहीं जाते। इसलिए उनकी देखभाल भी नहीं बची है। दलित और बहुत गरीब किसान परिवार के बच्चे ही इन स्कूलों में जाते हैं। उपर से सैमैस्टर सिस्टम और बहुत दूसरी नीतिगत खामियों के चलते माहौल और खराब हो रहा है।इस सबके चलते प्राइवेट स्कूलों की बाढ़ सी आ गई है। उंची फीसें इन स्कूलों का फैषन बन गया है। बीएड के कालेजों की एक बार बाढ़ आईए फिर नर्सिंग कालेजो की और फिर डैंटल कालेजों की। ज्यादातर प्राईवेट सैक्टर में हैं। बी एड कालेजों में से ज्यादातर बन्द होने के कगार पर हैं। प्राईवेट सैक्टर में दुकानदारी बढ़ी है और षिक्षा की गुणवता काफी कम हुई है। इन की समीक्षा अपने आप में एक लेख की मांग करता है। स्वास्थ्य के क्षे़त्र में 90 के बाद प्राईवेट सैक्टर 57 प्रतिषत हो गया है। गांव के सबसैंटर में,प्राईमरी स्वास्थ्य केन्द्र में या सामुदायिक केन्द्र में क्या हो रहा है यह गांव के दबंगों की चिन्ता का मसला कतई नहीं है। बल्कि इनमें काम करने वाले कुछ भ्रश्ट कर्मचारियों के साथ सांठगांठ करके ठीक काम करने वाले डाक्टरों व दूसरे कर्मचारियों को परेषान किया जाता है। गांव में सरकार द्वारा बनाई गई डिगियों का इस्तेमाल न के बराबर हो रहा है जिसके चलते प्राइवेट ट्यूबवैलांे से पानी खरीदना पड़ रहा है । अब भी पीने के पानी के कुंए अलग अलग जातियों के अलग अलग हैं। बहुत कम गांव हैं जहां सर्वजातीय कंुए हैं। खेती में ट्रैक्टर का इस्तेमाल बहुत बढ़ गया है। आज ट्रैक्टर से एक एकड़ की बुआही के रेट 350-400रुपये हो गये हैं। ट्यूबवैल से एक एकड़ की सिंचाई के रेट 80 रुपये घण्टा हो गये हैं। थ्रैशर से गिहूं निकालने के रेट1500रुपये प्रति एकड़ हो गये हैं। हारवैस्टर कारबाईन से गिहूं कटवाने के 1400 रुपये प्रति एकड़ और निकलवाने के रैपर के रेट 1200 प्रति एकड़ हो गये हैं। बड़ी बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का सामान हरेक गांव की छोटी से छोटी दुकानों पर आम मिल जाता है। 8-10 दुकानों से लेकर 40-50 दुकानों का बाजार छोटे बड़े सभी गांव में मौजूद है। छोटी छोटी किरयाने की दुकानों पर दारु के प्लास्टिक के पाउच आसानी से उपलब्ध हैं। पहले का डंगवारा जिसमें एक एक बैल वाले दो किसान मिलकर खेती कर लेते थे बिल्कुल खत्म हो गया है। पहले दो एकड़ वाला 10 एकड़ वाले की जमीन बाधे पर लेकर बोता रहा है और काम चलाता रहा है। साथ एक दो भैंस भी रखता रहा है जिसका दूध बेचकर रोजाना के खर्चे पूरे करता है। पहले कहावत थी‘ ‘दूध बेच दिया इसा पूत बेच दिया’। आज दूध भी बेचना पड़ता है और बेटा भी बेचना पड़ता है। मगर आज 10 किल्ले वाला भी दो किल्ले वाले की जमीन बाधे पर लेकर बोता है। खेती में मषीनीकरण तेजी से हुआ और हरित क्रांन्ति का दौर षुरु हुआ। हरित क्रान्ति ने बहुत नुकसान किये हैं जो अपने आप में एक बहस और रिसर्च का विशय है। मगर किसानी के एक हिस्से को लाभ भी बहुत हुआ है। एक नया नव धनाढ़य वर्ग पैदा हुआ है हरियाणा में जिसका हरियाणा के हरेक पक्ष पर पूरा कब्जा है। इन्ही के दायरों में अलग अलग जातों के नेताओं का उभरना समझ में आता हैं । मसलन चौधरी देवीलाल जाटों के नेता, चौधरी चान्द राम दलितों के नेता- उनमें भी एक हिस्से के-। पंडित भगवतदयाल षर्मा पंडितों नेता ,राव बिरेन्द्र सिंह अहीरों के नेता आदि। इस धनाढ़य वर्ग का एक हिस्सा आढ़तियों में षामिल हो गया है। यह कम जमीन वाले किसान की कई तरह से खाल उतार रहा है। पुराने दौर के परिवारों में से डी एल एफ ग्रूप और जिन्दल ग्रूपों ने राश्टीय स्तर पर पहचान बनाई है। इसी धनाढ़य वर्ग में से कुछ भठ्ठों के मालिक हो गये हैं ,दारु के ठेकों के ठेकेदार हैं, प्राप्रटी डीलर बन गये हैं। नेताओं के बस्ता ठाउ भी इन्ही में से हैं। हरेक विभाग के दलाल भी इन्हीं लोगों में से पैदा हुए हैं। इन ज्यादातरों के और भी कई तरह के बिजिनैष हैं। इनका जीवन ए.सी. जीवन में बदल गया है चाहे षहर में रहते हों या गांव में। हर तरह के दांव पेच लगाने में यह तबका बहुत माहिर हो गया है। जिन लोगांें की हाल में जमीने बिकी हैं उन्होंने पैसा इन्वैस्ट करने का मन बनाया मगर पैसा लगाने की उपयुक्त जगह न पाकर वापिस गांव में आकर मकान का चेहरा ठीक ठ्याक कर लिया और एक 8-10 लाख की गाड्डी कार ले ली। एक मंहगा सा मोबाइल ले लिया। जिनके पास कई एकड़ जमीन थी और संयुक्त परिवार था उन्होंने सिरसा की तरफ या कांषीपुर में या मध्यप्रदेष में खेती की जमीनों में यह पैसा लगा दिया। कुछ लोगों ने 200-300 गज का प्लॉट षहर में लेकर सारा पैसा वहां मकान बनाने पर खर्च कर दिया। आगे क्या होगा उनका? इन बिकी जमीनों पर जीवन यापन करने वाले खेत मजदूर और बाकी के तबकों का जीना मुहाल हो गया है। यह दबंगों और मौकापरस्तों के समूह हरेक कौम में पैदा हुए हैं। इनका वजूद जातीय , गोत्रों और ठोले पाने की राजनिति पर ही टिका है। ज्यादातर गांव में सड़कें पहुंच गई हैं बेषक खस्ता हालत में हों बहुत सी सड़कें। किसी भी गांव में चार पहियों के वाहनों की संख्या भी बढ़ी है। बहुराश्टीय कम्पनियों के प्रोडक्ट ज्यादातर गावों में मिलने लगे हैं। टी वी अखबार का चलन भी गांव के स्तर पर बढ़ा है। सी.डी. प्लेयर तो बहुत सें घरों में मिल जाएगा। मोबाइल फोन गरीब तबकों के भी खासा हिस्से के पास मिल जाएगा। संप्रेषन के साघन के रुप में प्रोग्रेसिव ताकतों को इसके बारे में सोचना होगा। माइग्रेटिड लेबर की संख्या ग्रामीण क्षेत्र में भी बढ़ रही है। किसानी के एक हिस्से में अहदीपन बढ़ रहा है। गांव की चौपालों की जर्जर हालत हमारे सामूहिक जीवन के पतन की तरफ इषारा करती है। नषा, दारु और बढ़ता संगठित सैक्ष माफिया सब मिलकर गांव की संस्कृति को कुसंस्कृति के अन्धेरों में धकेलने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।पुरुश प्रघान परिवार व्यवस्था में छांटकर महिला भ्रूण हत्या के चलते ज्यादातर गांव में लड़कियों की संख्या काफी कम हो रही है। बाहर से खरीद कर लाई गई बंहुओं की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। पुत्ऱ लालसा बहुत प्रबल दिखाई देती है यहां के माईडं सैट में। हर 10 किलो मीटर पर ‘षर्तिया छोरा’ के लिए गर्भवती महिला को दवाई देने वाले मिल जाएंगे। उंची से उंची पढ़ाई भी हमारे दकियानूसी विचारों में सेंध लगाने में असफल रही लगती है। जैंडर बलाइन्ड उच्च षिक्षा ने महिला विरोधी सामन्ती सोच को ही पाला पोसा लगता है। हमारे आपस के झगड़े बढ़े हैं। इस सबके चलते महिलाओं पर घरेलू हिंसा में बढ़ोतरी हुई है। महिलाओं पर बलात्कार के केस बढ़े हैं। महिलाओं के साथ छेड़छाड़ आदि के केस बढ़े हैं जिनमें से ज्यादातर केस दर्ज ही नहीं हो पाते। कचहरियों में तलाक के केसिज की संख्या बेतहासा बढ़ रही है। सल्फास की गोली खाकर हर रोज 1 या 2 नौजवान मैडीकल पंहुच जाते हैं। 30-40 ट्रक ड्राईवर हरेक गांव में मिल जाएंगे । एडस की बीमारी के इनमें से ज्यादातर वाहक हैं। सुबह से लेकर षाम तक ताष खेलने वाली मंडलियों की संख्या बढ़ती जा रही है। युवा लड़कियों का यौन षोशण संगठित ढ़ंग से किया जा रहा है तथा सैक्ष रैकेटियर गांव गांव तक फैल गये हैं। इसके अलावा युवा लड़कियों में षादी से पहले गर्भ की तादाद बढ़ रही है। मौखिक तौर पर कुछ डाक्टरों का कहना है कि इस प्रकार के केसिज में 50 प्रतिषत से ज्यादा परिवार के सदस्य, रिस्तेदार, पड़ौसी ही होते है जो यौन षोशण करते हैं । महिला न घर के अन्दर ्रसुरक्षित रही है न घर से बाहर। युवा लड़कियों का गांव की गांव में यौण उत्पीड़न हरियाणवी ग्रामीण समाज की भयंकर तसवीर पेष करता है। गांव के युवाओं -लड़के लड़कियों - को अपनी स्थगित ऊर्जा का सकारात्मक इस्तेमाल करने का कोई अवसर हमारी दिनचर्या में नहीं है। इस सब के बावजूद बहुत सी लड़कियों व महिलाओं ने खेलों में हरियाणा का नाम रोषन किया है। केबल टी. वी. ज्यादातर बड़े गांव में पहुंच गया है। टी वी में आ रही बहुत सी अच्छी बातों के साथ साथ देर रात बहुत सी जगह बल्यू फिल्में दिखाई जाती हैं। युवाओं में आत्म हत्या के केसिज बढ़ रहे हैं। महिलाओं के दुख सुख की अभिव्यक्ति महिला लोक गीतों में साफ झलकती दिखाई देती है। हमारे सांगों में पितृसतात्मक मूल्यों का बोलबाला दिखाई देता है। इसके साथ साथ महिला विरोधी और दलित विरोधी रुझान भी साफ झलकते हैं। मूल्यों के संदर्भ में हमारा साहित्य दबंग के हित की संस्कृति का ही निर्वाह करता नजर आता है खासकर ज्यादातर सांगों के कथानक में। पूरे हरियाणवी चुटकलों के भण्डार में एक सेकुलर चुटकुला गड़ों में इन्होंने समझौते करवाये उनमें 100 में से 99 फैंसले दबंग के हक में और पीड़ित के खिलाफ किये गये। बलात्कारी के केस के समझौतों में बलात्कारी को ही राहत दिलवाई गई। कत्ल के केस में जेल में बन्द कातिल को ही राहत दिलवाई गई ।ं तरीके अलग अलग हो सकते हैं मगर नतीजे हमेषा पीड़ित के खिलाफ ही हुए। कमजोर के हक में न्यायकारी फैंसला षायद ही कोई हों। इसी प्रकार ब्याह षादी के मामलों में गांव की गांव और गोत की गोत का केस एक मनोज बबली का ही केस है। बाकी सारे के सारे केस दो गौतों के बीच के हैं जिनमें ज्यादातर में बच्चों के माता पिताओं को बहन भाई बन कर रहने के फतवे जारी किए गये हैं और प्रेमियों के कत्ल किये गये हैं। या दूसरी तरह के उत्पीड़न किये गये हैं। राई का पहाड़ बनाया जा रहा है। असली मुद्दों से युवाओं का ध्यान बांटा जा रहा है। भावनात्मक स्तर पर लोगांे की भावनाओं से खिलवाड़ किया जा रहा है। किसानी के संकट से किसानों को दिषा भ्रमित किया जा रहा है। गांव के युवा लड़के और लड़की जिन्दगी के चौराहे पर खड़े हैं। एक तरफ नवसामन्तवादी और नवउदारवादी अपसंस्कृति का बाजार उन्हें अपनी ओर खींच रहा है। दूसरी ओर बेरोजगारी युवाओं के सिर पर चढ़ कर इनके जीवन को नरक बनाए है। नषा , दारु, सैक्स, पोर्नोग्राफी उसको दिषाभ्रमित करने के कारगर औजारों के रुप में इस्तेमाल किए जा रहे हैं। साथ ही समाज में व्याप्त पिछड़े विचारों और रुढ़ियों को भी इस्तेमाल करके इनका भावनात्मक षोशण किया जा रहा है। हरियाणा में खाते पीते मध्यमवर्ग और अन्य साधन सम्पन्न तबकों का साम्राज्यवादी वैष्वीकरण को समर्थन किसी हद तक सरलता से समझ में आ सकता है जिनके हित इस बात में हैं कि स्त्रियां,दलित,अल्पसंख्यक और करोड़ों निर्धन जनता नागरिक समाज के निर्माण के संघर्श से अलग रहें। लेकिन साधारण जनता अगर फासीवादी मुहिम में षरीक कर ली जाती है तो वह अपनी भयानक असहायता, अकेलेपन, हताषा,अन्णसंषय,अवरुद्ध चेतना , पूर्व ग्रहों उदभ्रांत कामनाओं के कारण षरीक होती है। फासीवाद के कीड़े जनवाद से वंचित ओर उसके व्यवहार से अपरिचित, रिक्त, लम्पट और घोर अमानुशिक जीवन स्थितियों में रहने वाले जनसमूहों के बीच आसानी सेपनपते हैं। यह भूलना नहीं चाहिये कि हिन्दुस्तान की आधी से अधिक आबादी ने जितना जनतन्त्र को बरता है उससे कहीं ज्यादा फासीवादी परिस्थ्तिियों में रहने का अभ्यास किया है। इसमें कोई षक नहीं कि हरियाणा में जहां आज अनैतिक ताकत की पूजा की संस्कृति का गलबा है वहीं अच्छी बात यह है कि षहीद भगत सिंह से प्रेरणा लेते हुए युवा लड़के लड़कियों का एक हिस्सा इस अपसंस्कृति के खिलाफ एक संुसंस्कृत सभ्य समाज बनाने के काम में सकारात्मक सोच के साथ जुटा हुआ है। साधुवाद इन युवा लड़के लड़कियों को। इतने बडे़ संकट को कोई जात अपनी अपनी जात के स्तर पर हल करने की सोचे तो मुझे संभव नहीं लगता । कैसे सामना किया जाए इसके लिए विभिन्न विचारकों के विचार आमन्त्रित हैं।
कुछ विचारणीय बिन्दू इस प्रकार हो सकते हैं- 1. भेड़ों कि तरह बेघर लोगों का शहरों के ख़राब से ख़राब घरों में बढ़ता जमावड़ा2. सभी सामाजिक नैतिक बन्धनों का तनाव ग्रस्त होना तथा टूटते जाना3. परिवार के पितरी स्तात्मक ढांचे में अधीनता, (परतंत्रता ] का तीखा होना4. पारिवारिक रिश्ते नाते ढहते जाना --- युवाओं के सामने गंभीर चुनौतीयाँ5. परिवारों में बुजुर्गों की असुरक्षा6. महिलाओं और बच्चों पर काम का बोझ बढ़ते जाना] असंगठित क्षेत्र में सुविधाओं का भी काफी अभाव है7. मजदूर वर्ग को पूर्ण रूपेण ठेकेदारी प्रथा में धकेला जाना8. गरीब लोगों के जीने के आधार संकुचित होना9. गाँव से शहर को पलायन बढ़ना तथा लम्पन तत्वों की बढ़ोतरी ] शहरों केविकासमें]अराजकता]ठेक्र्दारों और प्रापर्टी डीलरों का बोलबाला10. जमीन की उत्पादकता में खडोत ] पानी कि समस्या ] सेम कि समस्या11. कृषि से अधिक उद्योग कि तरफ व व्यापार की तरफ जयादा ध्याn12. स्थाई हालत से अस्थायी हालातों पर जिन्दा रहने का दौर13. अंध विश्वासों को बढ़ावा दिया जाना ] हर दो किलोमीटर पर मंदिर का उपजाया जाना14. अन्याय का बढ़ते जाना15. कुछ लोगों के प्रिविलिज बढ़ रहे है16. मारूति से सैंट्रो कार की तरफ रूझान] आसान काला धन काफी इकठ्ठा किया गया है17. उत्पीडन अपनी सीमायें लांघता जा रहा है ] रूचिका कांड ज्वलंत उदाहरण है ]18. व्यापार धोखा धडी में बदल चुका है19. शोषण उत्पीडन और भ्रष्टाचार की तिग्गी भयंकर रूप धार रही है20. प्रतिस्पर्धा ने दुश्मनी का रूप धार लिया है21. तलवार कि जगह सोने ने ले ली है22. वेश्यावृति दिनोंदिन बढ़ती जा रही है23. भ्रम व अराजकता का माहौल बढ़ रहा है ] धिगामस्ती बढ़ रही है24. संस्थानों की स्वायतता पर हमले बढ़ रहे हैं25. लोग मुनाफा कमा कर रातों रात करोड़ पति से अरब पति बनने के सपने देख रहे हैं और किसी भी हद तक अपने को गिराने को तैयार हैं26. खेती में मशीनीकरण तथा औद्योगिकीकरण मुठ्ठी भर लोगों को मालामाल कर गया तथा लोक जन को गुलामी व दरिद्रता में धकेलता जा रहा है27. बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का शिकंजा कसता जा रहा है28. वैश्वीकरण को जरूरी बताया जा रहा है जो असमानता पूर्ण विश्व व्यवस्था को मजबूत करता जा रहा है29. पब्लिक सेक्टर की मुनाफा कमाने वाली कम्पनीयों को भी बेचा जा रहा है30. हमारी आत्म निर्भरता खत्म करने की भरसक नापाक साजिश की जा रही हैं31. साम्प्रदायिक ताकतें देश के अमन चैन के माहौल को धाराशाई करती जा रही हैं32. गुट निरपेक्षता की विदेश निति से खिलवाड़ किया जा रहा है33. युद्ध व सैनिक खर्चे में बेइंतहा बढ़ोतरी की जा रही है34. परमाणू हथियारों की होड़ में शामिल होकर अपनी समस्याएँ और अधिक बढ़ा ली हैं35. सभी संस्थाओं का जनतांत्रिक माहौल खत्म किया जा रहा है36. बाहुबल. पैसे , जान पहचान , मुन्नाभाई , ऊपर कि पहुँच वालों के लिए ही नौकरी के थोड़े बहुत अवसर बचे है मैं इस पक्ष पर अभी जान बूझ कर कुछ नहीं कह रहा ताकि हिड्डन अजैंडे की समस्या से बचा जा सके। संस्कृति को भी सांझी संस्कृति के रुप में ही बचाया जा सकता है न कि संकुचित दायरों में बांधकर।
रणबीर सिह

सोमवार, 22 जून 2020

Kharak Jatan

 Kharak Jatan  2011 Census Details

Kharak Jatan Local Language is Hindi. Kharak Jatan Village Total population is 3893 and number of houses are 765. Female Population is 46.2%. Village literacy rate is 63.3% and the Female Literacy rate is 24.9%.

Population


Census ParameterCensus Data
Total Population3893
Total No of Houses765
Female Population %46.2 % ( 1798)
Total Literacy rate %63.3 % ( 2464)
Female Literacy rate24.9 % ( 968)
Scheduled Tribes Population %0.0 % ( 0)
Scheduled Caste Population %24.6 % ( 958)
Working Population %43.6 %
Child(0 -6) Population by 2011488
Girl Child(0 -6) Population % by 201146.3 % ( 226)

पृथ्वी.सदृश ग्रहों की खोज

पृथ्वी.सदृश ग्रहों की खोज
सुदूर तारों के गिर्द घूमते पृथ्वी.सदृश ग्रहों की खोज के प्रति बढ़े हुए उत्साह के बीच अमेरिका के मैसाचुसेट्स
इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, बेल्जियम के यूनिवर्सिटी ऑफ लीग तथा अन्य राष्ट्रों से संबद्ध खगोलविदों
के एक अंतर्राष्ट्रीय दल ने पृथ्वी से लगभग 39 प्रकाश.वर्ष दूर कुंभ (ऐक्वेरियस) तारामंडल में स्थित
एक सफेद बौने तारे का परिक्रमण करते तीन ग्रहों को खोजने की रिपोर्ट जारी की है। खगोलविदों के
अनुसार, नए खोजे गए ग्रहों के आकार एवं तापमान हमारे शुक्र और पृथ्वी ग्रह से समानता रखते हैं और
यह सौरमंडल से बाहर जीवन की खोज के लिए अब तक ढूंढ़े गए सबसे अच्छे अभ्यर्थी साबित हो सकते
हैं। दल ने यूरोपीयन सदर्न आब्जर्बेटरी की चिली स्थित ला सिला वेधशाला की 0.6 मीटर रोबोटीय
ट्रैपिस्ट (ट्रांजिटिंग प्लेनेट्स एंड प्लेंटीसिमल्स स्मॉल टेलीस्कोप (TRAPPIST) टेलीस्कोप का
प्रयोग अति.शीतल बौने तारों यानी ऐसे तारों को अवलोकित करने के लिए किया, जो सूर्य से कहीं
कम तापमान वाले एवं अधिक धुंधले हैं। सफेद बौने तारे को ट्रैपिस्ट-1 नाम दिया गया है (नेचर, 2 मई
2016। DOI: 10.1038/ नेचर 17448)।
           सफेद बौने तारे का प्रेक्षण लेने के दौरान खगोलविदों के दल ने बेल्जियम की यूनिवर्सिटी
ऑफ लीग से संबद्ध इंस्टिट्यूट द एस्ट्रोफिजिक एट जियोफिजिक के माइकेल गिलॉन के नेतृत्व में पाया
कि यह धुंधला एवं न्यून तापमान वाला तारा निश्चित समय अंतरालों पर कुछ और हल्का हो रहा था। यह
इस बात का सूचक था कि तारे और पृथ्वी के बीच अनेक पिंड गुजर रहे थे। विशद विश्लेषण द्वारा पता
चला कि यह धुंधलाना उस तारे का परिक्रमण करते तीन ग्रहों, जो आकार में पृथ्वी के समान ही थे, के
कारण ही था। बड़े टेलीस्कोपों, जिनमें चिली स्थित यूरोपीयन सदर्न आब्जर्बेटरी के 8 मीटर वेरी लार्ज टेलीस्कोप
में लगा हॉक.1 नामक उपकरण भी शामिल है, द्वारा लिए गए प्रेक्षणों से पता चला कि ट्रैपिस्ट.1 तारे
का परिक्रमण करते ग्रहों का आकार पृथ्वी से बहुत समानता रखता है। इनमें से दो ग्रहों की कक्षीय अवधि
क्रमशः 1.5 दिन तथा 2.4 दिन है तथा तीसरे ग्रह की कक्षीय अवधि का परिसर 4.5 दिन से 73 दिन
के बीच है। खगोलविदों के अनुसार, ‘‘इतने लघु कक्षीय अवधियों के चलते, पृथ्वी से सूर्य जितना
दूर है, उसकी तुलना में ये ग्रह अपने तारे के 20 से लेकर 100 गुना तक अधिक निकट हैं।
इस ग्रहीय प्रणाली की आकारीय संरचना हमारे सौरमंडल की बनिस्बत बृहस्पति के चंद्रमाओं से
अधिक समानता रखती है।’’
              खगोलविदों के अनुसार, इस तथ्य के बावजूद कि तीनों ग्रह अपने मूल बौने तारे का बहुत नजदीकी से परिक्रमण करते हैं वे बहुत अधिक ऊष्ण नहीं हैं। दो आंतरिक ग्रह पृथ्वी द्वारा सूर्य से प्राप्त विकिरण की तुलना में क्रमशः चार गुना तथा दोगुना अधिक विकिरण प्राप्त करते हैं, क्योंकि इनका तारा सूर्य से अधिक धुंधला है। हालांकि अब भी ये ग्रह इतने ऊष्ण हैं कि पृथ्वी सदृश जीवन को पनपने देने की उपयुक्त परिस्थितियां इनमें मौजूद नहीं हैं, लेकिन फिर भी खगोलविदों का यह मानना है कि इन ग्रहों के पृष्ठों पर वासयोग्य क्षेत्रों के मौजूद होने की संभावना हो सकती है। तीसरे ग्रह, जो एक बाह्य ग्रह है, की कक्षीय अवधि पूर्णतः निश्चित नहीं है लेकिन सूर्य से पृथ्वी जितना विकिरण प्राप्त करती है, यह ग्रह संभवतः उससे कम विकिरण अपने तारे से प्राप्त
करता है; फिर भी यह जीवनानुकूल क्षेत्र में हो सकता है। सुदूर ग्रहों पर जीवन के चिह्नों की तलाश के लिए खगोलविद सामान्यतः यह देखते हैं कि पारगमन करते ग्रह के वायुमंडल का उसके मूल तारे से पृथ्वी पर पहुंचने वाले प्रकाश पर क्या प्रभाव पड़ता है। लेकिन, अधिकतर तारों के गिर्द घूमते ग्रहों के लिए इस अति सूक्ष्म प्रभाव को संसूचित कर पाना अत्यंत कठिन होता है क्योंकि प्रकाश में उत्पन्न सूक्ष्म परिवर्तन या ह्रास तारे के प्रकाश की चमक की पृष्ठभूमि में दब जाता है। लेकिन, नए खोजे गए ग्रहों पर जीवन के चिह्नों की तलाश करना खगोलविदों के लिए अपेक्षाकृत सरल हो सकता है क्योंकि प्रकाश में उत्पन्न परिवर्तन या ह्रास ट्रैपिस्ट.1 जैसे सफेद बौने तारे की मद्धिम पृष्ठभूमि में संसूचन योग्य हो सकता है।
          इस खोज ने निश्चित रूप से पृथ्वेतर जीवन की तलाश को एक नई दिशा प्रदान की है क्योंकि हमारे सूर्य के निकटस्थ लगभग 15 प्रतिशत तारे अति निम्न ताप वाले बौने तारे ही हैं। यह खोज इस तथ्य को भी रेखांकित करती है कि सौरमंडल से बाहर के ग्रहों (एक्सोप्लेनेट्स) की खोज अब पृथ्वी के जीवनानुकूल सहोदरों के पाए जाने की संभाव्यता के दायरे में आ गई है। असल में, ट्रैपिस्ट एक अधिक महत्वाकांक्षी प्रायोजना, स्पेकूलूस (SPECULOOS) जिसे चिली स्थित यूरोपीयन सदर्न आब्जर्बेटरी से संबद्ध पैरानल वेधशाला में स्थापित किया जाएगा, का ही आदिप्रारूप है।
        गुजरात में मिली मंगल के सतह की प्रतिकृति अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (स्पेस एप्लिकेशंस सेंटरः
ै।ब्.प्ैत्व्द्ध, अहमदाबाद, भारतीय प्रौद्योगिकी
संस्थान, खड़गपुर तथा नेशनल जियोफिजिकल रिसर्च
इंस्टिट्यूट (एन. जी. आर. आई.), हैदराबाद से जुड़े
भारतीय वैज्ञानिकों के एक दल ने गुजरात में मंगल
की सतह की प्रतिकृति या उसके ‘‘पार्थिव अनुरूप’’
की खोज की है। अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र.इसरो द्वारा
भारतीय मंगल अभियान के अंतर्गत आरंभ किए गए
कार्यक्रम का यह एक हिस्सा है। गुजरात के कच्छ
जिले में (भुज से 86 किलोमीटर उत्तर.पश्चिम स्थित)
मटानुमढ़ नामक स्थान से स्पेक्ट्रमिकीय अध्ययनों से
पाए गए ‘जैरोसाइट’ नामक एक विरल खनिज की
पहचान के आधार पर ही भारतीय दल ने अपनी
खोज को अंजाम दिया है। नासा की मंगल संधान
बग्घी (रोवर) अपॉरचुनिटी द्वारा सन् 2004 में लाल
ग्रह मंगल की सतह के विभिन्न भागों से इस विरल
खनिज के पाए जाने की खबरें आई थीं। उसके बाद
तो अन्य बग्घियों ने भी मंगल की सतह के अनेक
हिस्सों पर जैरोसाइट को संसूचित किया (जर्नल
ऑफ जियोफिजिकल रिसर्च: प्लेनेट्स, मार्च 2016,
क्व्प्रू 10ण्1002ध्2015श्रम्004949)।
सल्फेट खनिज जैरोसाइट को मंगल ग्रह की
आरंभिक सतह पर जलीय, अम्लीय तथा ऑक्सीकारी
अवस्थाओं का मूल संकेतक माना जाता है।
शोधकर्ता अपना यह तर्क देते हैं कि मटानुमढ़ क्षेत्र
का भौगोलिक विन्यास अपने इस असामान्य खनिज
के जमाव के कारण, मंगल पर जिन स्थलों पर
जैरोसाइट की पहचान हुई उनके भौगोलिक परिवेश
से सादृश्यता रखता है और ‘‘इस परिप्रेक्ष्य में इसे
मंगल के अनुरूप’’ माना जा सकता है। दरअसल,
शोधकर्ताओं का कहना है कि एक ‘क्लोन’ के रूप में
नए खोजे गए सौरमंडल से इतर ग्रहों में से एक
ग्रह के ऊपर से देखे गए ट्रैपिस्ट.1 नामक तारे का
एक कलाकार की कल्पना से बनाया गया चित्र
ि

सोमवार, 6 जनवरी 2020

उपभोक्तावादी संस्कृति

उपभोक्तावादी संस्कृति

    जब हम उपभोक्तावादी संस्कृति की बात करते हैं तो उपभोग तथा उपभोक्तावाद में फरक करते हैं । उपभोग जीवन की बुनियादी जरूरत है । इसके बगैर न जीवन सम्भव है और न वह सब जिससे हम जीवन में आनन्द का अनुभव करते हैं । इस तरह के उपभोग में हमारा भोजन शामिल है जिसके बिना हम जी नहीं सकते या कपड़े शामिल हैं जो शरीर ढकने के लिए और हमें गरमी , सरदी और बरसात आदि से बचाने के लिए जरूरी हैं । इस तरह जीवन की रक्षा करनेवाली या शरीर की तकलीफों को दूर करनेवाली दवाएँ , ऋतुओं के प्रकोप से बचाने के लिए घर , ये सब उपभोग की वस्तुएं हैं । औरतों और मर्दों द्वारा एक दूसरे को आकर्षित करने के श्रृंगार के कुछ साधन भी उपभोग की वस्तुओं में आते हैं ।यह बिलकुल प्राकृतिक और स्वाभाविक जरूरत है । मनुष्य में ही नहीं , पशु-पक्षियों और पेड़-पौधों में भी नर और मादा के बीच आकर्षण पैदा करने के लिए सुन्दर रंगीन बाल , रोयें और पंख , भड़कीले रूप , मीठे संगीतमय स्वर तथा तरह-तरह की गंध प्रकृति की देन हैं । इन सब गुणों की उपयोगिता जीवों में विभिन्न मात्रा में रूप , रंग , गंध , स्वर आदि के प्रति स्वभाव से प्राप्त आकर्षण से आती है । यही स्वाभाविक आकर्षण एक ऊँचाई पर मनुष्यों में सौन्दर्यबोध को जन्म देता है । इसी बोध से मनुष्य विभिन्न कलाओं और विज्ञान को जन्म देता है । अपने परिवेश को नृत्य , संगीत , चित्र , मूर्त्ति आदि से सजाना या साहित्य और विज्ञान के जरिए अपने वातावरण का प्रतीकात्मक अनुभव करना , मनुष्य को सबसे ऊँचे दर्जे का आनन्द देता है । इस प्रक्रिया में निर्मित कलावस्तु , पुस्तक आदि सब मनुष्य के स्वाभाविक उपभोग के क्षेत्र में आते हैं । संक्षेप में उपभोग की वस्तुएँ वे हैं , जिसके अभाव में हम स्वाभाविक रूप से अप्रीतिकर तनाव का अनुभव करते हैं , चाहे वह भोजन के अभाव में भूख की पीड़ा से उत्पन्न हो अथवा संगीत एवं कलाओं के अभाव में नीरसता की पीड़ा से।
    इसके विपरीत ऐसी वस्तुएँ , जो वास्तव में मनुष्य की किसी मूल जरूरत या कला और ज्ञान की वृत्तियों की दृष्टि से उपयोगी नहीं हैं लेकिन व्यावसायिक दृष्टि से प्रचार के द्वारा उसके लिए जरूरी बना दी गयी हैं , उपभोक्तावादी संस्कृति की देन हैं । पुराने सामंती या अंधविश्वासी समाज में भी ऐसी वस्तुओं का उपभोग होता था जो उपयोगी नहीं थीं बल्कि कष्टदायाक थीं – उदाहरण के लिए चीन में कुलीन महिलाओं के लिए बचपन से पाँव को छोटे जूते में कसकर छोटा रखने का रिवाज । लेकिन यह प्रचलन औरतों की गुलामी और मर्दों की मूर्खता का परिणाम था । अत: शोषण की समाप्ति या चेतना बढ़ने के साथ इसका अंत होना लाजमी था । लेकिन उपभोक्तावादी संस्कृति ऐसी वस्तुओं को शुद्ध व्यावसायिकता के कारण योजनाबद्ध रूप से लोगों पर आरोपित करती है और मनोविज्ञान की आधुनिकतम खोजों का इसके लिए प्रयोग करती है कि इन वस्तुओं की माया लोगों पर इस हद तक छा जाये कि वे इनके लिए पागल बने रहें ।

  विज्ञापन का जादू

    एक उदाहरण बालों को सघन और काला रखने की दवाओं तथा तेलों का है । सर्वविदित है कि अभी तक बालों को गिरने या सफेद होने से रोकने का कोई उपचार नहीं निकला है । लेकिन हर रोज ऐसे विज्ञापन निकलते रहते हैं जो लोगों में यह भ्रम पैदा करते हैं कि किसी खास दवा या तेल से उनके बालों की रक्षा हो सकती है और इनसे प्रभावित हो कर लोग इन उपचारों पर अंधाधुंध खरच करते हैं । यही हाल दाँत के सभी मंजनों का है । अभी तक कोई ऐसा मंजन नहीं निकला है जो दाँतों की बीमारियों को दूर करे या उन्हें रोग लगने से बचाये। फिर भी पत्र-पत्रिकाओं के पृष्ठ चमकीले दाँतों वाली महिलाओं की तस्वीरों से भरे रहते हैं जो किसी न किसी कम्पनी के मंजन के चमत्कार के रूप में अपने दाँतों का प्रदर्शन करती होती है । एक के बाद एक सभी दाँतों के खराब हो जाने के बाद भी लोग उपचार कि दृष्टि से मंजनों की निरर्थकता नहीं देख पाते । ऐसा गहरा असर इस प्रचार के जादू का होता है । यह स्थिति बिलकुल अशिक्षित समाज में जादू-टोने के प्रति फैले अन्धविश्वास से भिन्न नहीं है । लेकिन इस अन्धविश्वास के शिकार मूल रूप से शिक्षित कहे जाने वाले लोग ही हैं ।
    किसी विशेष कम्पनी की साड़ी में सजी सुन्दर औरत , सूट में सजा सुन्दर नौजवान , कोका-कोला की बोतलें लिए समुद्र तट के रमणीक महौल में खड़े सुन्दर स्त्री-पुरुष , विशेष कम्पनी के बेदिंग सूट में समुद्र तट पर क्रीड़ा करती बालाएँ । इन सब के भड़कीले इश्तहार एक ऐसा मानसिक महौल तैयार करते हैं कि लोग मॉडलों ( इश्तहार के सुन्दर स्त्री-पुरुष ) की सुन्दरता का राज विभिन्न तरह के परिधानों और कोका-कोला में देखने लगते हैं । बड़ी तोंदवाले लालाजी और दो क्विंटल वजनवाली सेठानी भी इन कम्पनियों का सूट या बेदिंग सूट पहने विज्ञापन के मॉडलों जैसे अपने रूप की कल्पना करने लगती हैं । फिर दुकान में इन कम्पनियों के परिधानों और कोका-कोला की तलाश शुरु हो जाती है । इस तरह धीरे-धीरे सुन्दरता का अर्थ मनुष्य की स्वाभाविक सुन्दरता , जो उसके स्वास्थ्य और स्वभाव से आती है , नहीं रहकर खास-खास कम्पनियों के बने मोजे से ले कर टोपी तक में सजावट बन जाता है । सुन्दरता का मतलब खास तरह के परिधानों में सजना या खास तरह के क्रीम पाउडर से पुता होना बन जाता है । सुन्दर शब्द भी अब फैशन से बाहर होता जा रहा है , उसका स्थान ‘स्मार्ट’ ने ले लिया है जिसका सीधा सम्बन्ध , लिबास सजधज और अप-टू-डेट आदि से है । प्रचलित फैशन से सुन्दरता की परिभाषा कैसे बदल सकती है उसका एक उदाहरण हम रंग की मैचिंग में देख सकते हैं । सौन्दर्य की दृष्टि से एक ही रंग की मैचिंग यानी एक ही रंग का सारा लिबास रखना , भोंडी चीज है । सौन्दर्य रंगों की विविधता और उनके उपयुक्त संयोजन से आता है । इसी कारण राजस्थान की सरल ग्रामीण महिलाएँ अपने सस्ते लिबास में भी रंगों के उचित संयोजन से जहाँ इकट्ठी होती हैं फूलों की क्यारियों सी सज जाती हैं । लेकिन मैचिंग का पागलपन सवार हो जाने से जहाँ एक हैण्डबैग , एक जोड़ा जूता या चप्पल तथा एक रंग की लिपिस्टिक से काम चल सकता था वहाँ अब हर कपड़े के रंग के साथ सब कुछ उसी रंग का होना चाहिए ।इस तरह अब एक की जगह आधे दर्जन सामान खरीदने की जरूरत हो जाती है । पर सबसे हास्यास्पद तो यह होता है कि काले या नीले कपड़ों से मैच करने के लिए लाल होंठोंवाली सुन्दरियाँ होंठ काले या नीले रंग में रंगने लगती हैं । इस तरह की मूर्खतापूर्ण सजावट का फैशन फैलाने से लिपिस्टिक बनाने वाली कम्पनियों को अपना व्यापार बढ़ाने का सीमाहीन सुयोग प्राप्त हो जाता है ।
    यह सोचा जा सकता है कि अगर भिन्न रंग के कपड़े इकट्ठे हो गये तो वे हि कपड़े अदल-बदल कर ज्यादा दिन पहने जा सकते हैं । लेकिन ऐसा भी नहीं हो पाता , क्योंकि एक सुनियोजित ढंग से फैशन-प्रदर्शनों और प्रचार के द्वारा ऐसा मानसिक वातावरण तैयार कर दिया जाता है कि फैशन जल्दी-जल्दी बदल जायें । इस साल का बनाया कपड़ा अगले साल तक फैशन के बाहर हो जाता है और लोग इसका साहस नहीं जुटा पाते कि ‘संभ्रान्त’ लोगों की मंडली या दफ्तर आदि में ऐसे ‘आउट ऑफ डेट’ लिबास में पहुँचें ।इस तरह धड़ल्ले से कपड़े , जूते , टोपी  आदि का बदलाव होता रहता है । लोग मजबूरी में ही एक दो साल पहले का बनाया हुआ कोई कपड़ा पहनते हैं । पश्चिमी देशों में तो एक तरह की ‘थ्रो अवे’ संस्कृति , (जिसकी छाया हमारे यहाँ भी पड़ रही है) फैल रही है , यानी ऐसी चीजों का उत्पादन और प्रयोग बढ़ रहा है जिन्हें कुछ समय या एक ही बार उपयोग में लाकर फेंक दिया जाय ।
    लेकिन इस संस्कृति  को फैलाने के लिए की जाने वाली विज्ञापनबाजी का बोझ भी वे ही लोग ढोते हैं जिनके सिर पर यह संस्कृति लादी जाती  है । सबसे पहले तो कम्पनियों द्वारा प्रचारित वस्तुओं की कीमत का एक बड़ा हिस्सा विज्ञापन पर खरच होता है । कभी-कभी तो कम्पनियाँ उत्पादन से अधिक खरच अपनी वस्तुओं को प्रचारित करने में करती हैं । इस विज्ञापनबाजी के लिए काफी खरचीले शोध होते रहते हैं । पर परोक्ष रूप से विज्ञापन का बोझ फिर दुबारा उपभोक्ताओं पर ही पड़ता है । विज्ञापन पर किए गए खरच को अपनी लागत में दिखलाकर कम्पनियाँ आयकर में काफी कटौती करा लेती हैं । कम्पनियों पर की कटौती से आम लोगों पर वित्तीय बोझ बढ़ता है । इस तरह विज्ञापनबाजी से लोगों पर दुहरी आर्थिक मार पड़ती है ।
    ( आगे : कृत्रिमता ही जीवन )