सोमवार, 22 जून 2020

पृथ्वी.सदृश ग्रहों की खोज

पृथ्वी.सदृश ग्रहों की खोज
सुदूर तारों के गिर्द घूमते पृथ्वी.सदृश ग्रहों की खोज के प्रति बढ़े हुए उत्साह के बीच अमेरिका के मैसाचुसेट्स
इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, बेल्जियम के यूनिवर्सिटी ऑफ लीग तथा अन्य राष्ट्रों से संबद्ध खगोलविदों
के एक अंतर्राष्ट्रीय दल ने पृथ्वी से लगभग 39 प्रकाश.वर्ष दूर कुंभ (ऐक्वेरियस) तारामंडल में स्थित
एक सफेद बौने तारे का परिक्रमण करते तीन ग्रहों को खोजने की रिपोर्ट जारी की है। खगोलविदों के
अनुसार, नए खोजे गए ग्रहों के आकार एवं तापमान हमारे शुक्र और पृथ्वी ग्रह से समानता रखते हैं और
यह सौरमंडल से बाहर जीवन की खोज के लिए अब तक ढूंढ़े गए सबसे अच्छे अभ्यर्थी साबित हो सकते
हैं। दल ने यूरोपीयन सदर्न आब्जर्बेटरी की चिली स्थित ला सिला वेधशाला की 0.6 मीटर रोबोटीय
ट्रैपिस्ट (ट्रांजिटिंग प्लेनेट्स एंड प्लेंटीसिमल्स स्मॉल टेलीस्कोप (TRAPPIST) टेलीस्कोप का
प्रयोग अति.शीतल बौने तारों यानी ऐसे तारों को अवलोकित करने के लिए किया, जो सूर्य से कहीं
कम तापमान वाले एवं अधिक धुंधले हैं। सफेद बौने तारे को ट्रैपिस्ट-1 नाम दिया गया है (नेचर, 2 मई
2016। DOI: 10.1038/ नेचर 17448)।
           सफेद बौने तारे का प्रेक्षण लेने के दौरान खगोलविदों के दल ने बेल्जियम की यूनिवर्सिटी
ऑफ लीग से संबद्ध इंस्टिट्यूट द एस्ट्रोफिजिक एट जियोफिजिक के माइकेल गिलॉन के नेतृत्व में पाया
कि यह धुंधला एवं न्यून तापमान वाला तारा निश्चित समय अंतरालों पर कुछ और हल्का हो रहा था। यह
इस बात का सूचक था कि तारे और पृथ्वी के बीच अनेक पिंड गुजर रहे थे। विशद विश्लेषण द्वारा पता
चला कि यह धुंधलाना उस तारे का परिक्रमण करते तीन ग्रहों, जो आकार में पृथ्वी के समान ही थे, के
कारण ही था। बड़े टेलीस्कोपों, जिनमें चिली स्थित यूरोपीयन सदर्न आब्जर्बेटरी के 8 मीटर वेरी लार्ज टेलीस्कोप
में लगा हॉक.1 नामक उपकरण भी शामिल है, द्वारा लिए गए प्रेक्षणों से पता चला कि ट्रैपिस्ट.1 तारे
का परिक्रमण करते ग्रहों का आकार पृथ्वी से बहुत समानता रखता है। इनमें से दो ग्रहों की कक्षीय अवधि
क्रमशः 1.5 दिन तथा 2.4 दिन है तथा तीसरे ग्रह की कक्षीय अवधि का परिसर 4.5 दिन से 73 दिन
के बीच है। खगोलविदों के अनुसार, ‘‘इतने लघु कक्षीय अवधियों के चलते, पृथ्वी से सूर्य जितना
दूर है, उसकी तुलना में ये ग्रह अपने तारे के 20 से लेकर 100 गुना तक अधिक निकट हैं।
इस ग्रहीय प्रणाली की आकारीय संरचना हमारे सौरमंडल की बनिस्बत बृहस्पति के चंद्रमाओं से
अधिक समानता रखती है।’’
              खगोलविदों के अनुसार, इस तथ्य के बावजूद कि तीनों ग्रह अपने मूल बौने तारे का बहुत नजदीकी से परिक्रमण करते हैं वे बहुत अधिक ऊष्ण नहीं हैं। दो आंतरिक ग्रह पृथ्वी द्वारा सूर्य से प्राप्त विकिरण की तुलना में क्रमशः चार गुना तथा दोगुना अधिक विकिरण प्राप्त करते हैं, क्योंकि इनका तारा सूर्य से अधिक धुंधला है। हालांकि अब भी ये ग्रह इतने ऊष्ण हैं कि पृथ्वी सदृश जीवन को पनपने देने की उपयुक्त परिस्थितियां इनमें मौजूद नहीं हैं, लेकिन फिर भी खगोलविदों का यह मानना है कि इन ग्रहों के पृष्ठों पर वासयोग्य क्षेत्रों के मौजूद होने की संभावना हो सकती है। तीसरे ग्रह, जो एक बाह्य ग्रह है, की कक्षीय अवधि पूर्णतः निश्चित नहीं है लेकिन सूर्य से पृथ्वी जितना विकिरण प्राप्त करती है, यह ग्रह संभवतः उससे कम विकिरण अपने तारे से प्राप्त
करता है; फिर भी यह जीवनानुकूल क्षेत्र में हो सकता है। सुदूर ग्रहों पर जीवन के चिह्नों की तलाश के लिए खगोलविद सामान्यतः यह देखते हैं कि पारगमन करते ग्रह के वायुमंडल का उसके मूल तारे से पृथ्वी पर पहुंचने वाले प्रकाश पर क्या प्रभाव पड़ता है। लेकिन, अधिकतर तारों के गिर्द घूमते ग्रहों के लिए इस अति सूक्ष्म प्रभाव को संसूचित कर पाना अत्यंत कठिन होता है क्योंकि प्रकाश में उत्पन्न सूक्ष्म परिवर्तन या ह्रास तारे के प्रकाश की चमक की पृष्ठभूमि में दब जाता है। लेकिन, नए खोजे गए ग्रहों पर जीवन के चिह्नों की तलाश करना खगोलविदों के लिए अपेक्षाकृत सरल हो सकता है क्योंकि प्रकाश में उत्पन्न परिवर्तन या ह्रास ट्रैपिस्ट.1 जैसे सफेद बौने तारे की मद्धिम पृष्ठभूमि में संसूचन योग्य हो सकता है।
          इस खोज ने निश्चित रूप से पृथ्वेतर जीवन की तलाश को एक नई दिशा प्रदान की है क्योंकि हमारे सूर्य के निकटस्थ लगभग 15 प्रतिशत तारे अति निम्न ताप वाले बौने तारे ही हैं। यह खोज इस तथ्य को भी रेखांकित करती है कि सौरमंडल से बाहर के ग्रहों (एक्सोप्लेनेट्स) की खोज अब पृथ्वी के जीवनानुकूल सहोदरों के पाए जाने की संभाव्यता के दायरे में आ गई है। असल में, ट्रैपिस्ट एक अधिक महत्वाकांक्षी प्रायोजना, स्पेकूलूस (SPECULOOS) जिसे चिली स्थित यूरोपीयन सदर्न आब्जर्बेटरी से संबद्ध पैरानल वेधशाला में स्थापित किया जाएगा, का ही आदिप्रारूप है।
        गुजरात में मिली मंगल के सतह की प्रतिकृति अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (स्पेस एप्लिकेशंस सेंटरः
ै।ब्.प्ैत्व्द्ध, अहमदाबाद, भारतीय प्रौद्योगिकी
संस्थान, खड़गपुर तथा नेशनल जियोफिजिकल रिसर्च
इंस्टिट्यूट (एन. जी. आर. आई.), हैदराबाद से जुड़े
भारतीय वैज्ञानिकों के एक दल ने गुजरात में मंगल
की सतह की प्रतिकृति या उसके ‘‘पार्थिव अनुरूप’’
की खोज की है। अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र.इसरो द्वारा
भारतीय मंगल अभियान के अंतर्गत आरंभ किए गए
कार्यक्रम का यह एक हिस्सा है। गुजरात के कच्छ
जिले में (भुज से 86 किलोमीटर उत्तर.पश्चिम स्थित)
मटानुमढ़ नामक स्थान से स्पेक्ट्रमिकीय अध्ययनों से
पाए गए ‘जैरोसाइट’ नामक एक विरल खनिज की
पहचान के आधार पर ही भारतीय दल ने अपनी
खोज को अंजाम दिया है। नासा की मंगल संधान
बग्घी (रोवर) अपॉरचुनिटी द्वारा सन् 2004 में लाल
ग्रह मंगल की सतह के विभिन्न भागों से इस विरल
खनिज के पाए जाने की खबरें आई थीं। उसके बाद
तो अन्य बग्घियों ने भी मंगल की सतह के अनेक
हिस्सों पर जैरोसाइट को संसूचित किया (जर्नल
ऑफ जियोफिजिकल रिसर्च: प्लेनेट्स, मार्च 2016,
क्व्प्रू 10ण्1002ध्2015श्रम्004949)।
सल्फेट खनिज जैरोसाइट को मंगल ग्रह की
आरंभिक सतह पर जलीय, अम्लीय तथा ऑक्सीकारी
अवस्थाओं का मूल संकेतक माना जाता है।
शोधकर्ता अपना यह तर्क देते हैं कि मटानुमढ़ क्षेत्र
का भौगोलिक विन्यास अपने इस असामान्य खनिज
के जमाव के कारण, मंगल पर जिन स्थलों पर
जैरोसाइट की पहचान हुई उनके भौगोलिक परिवेश
से सादृश्यता रखता है और ‘‘इस परिप्रेक्ष्य में इसे
मंगल के अनुरूप’’ माना जा सकता है। दरअसल,
शोधकर्ताओं का कहना है कि एक ‘क्लोन’ के रूप में
नए खोजे गए सौरमंडल से इतर ग्रहों में से एक
ग्रह के ऊपर से देखे गए ट्रैपिस्ट.1 नामक तारे का
एक कलाकार की कल्पना से बनाया गया चित्र
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