रविवार, 14 अगस्त 2016

बुधवार, 10 अगस्त 2016


गुजरात में दलितः असमानता और हिंसा के शिकार

गत 11 जुलाई को गुजरात के ऊना शहर में ‘मानव भक्षकों’ व ज़बरिया वसूली करने वालों के गिरोह ने-जो स्वयं को गौरक्षक बता रहे थे-एक दलित परिवार के सात सदस्यों की क्रूरतापूर्वक पिटाई की। उन्हें मोटा समधियाला गांव में एक मरी हुई गाय की खाल उतारने के लिए लोहे की छड़ों, लाठियों और चाकू से मारा गया। उसके बाद उनके कपड़े उतारकर उन्हें सार्वजनिक रूप से मारते हुए थाने ले जाया गया। इस भयावह व दिल हिला देने वाली हिंसा से दलितों के प्रति गुजरात में व्याप्त पूर्वाग्रहों और घृणा का पता चलता है। इस बर्बर घटना पर उतनी ही तीव्र प्रतिक्रिया हुई। दलित लेखक अमृतलाल मकवाना ने उन्हें मिला ‘जीवन श्रेष्ठ साहित्य कृति’ पुरस्कार लौटा दिया। गुजरात के दलित युवा सड़कों पर उतर आए और उन्होंने अपना विरोध व्यक्त करने के लिए कई बसों को आग के हवाले कर दिया और सड़कों व राजमार्गों को जाम किया। बनासकांठा जिले के करीब एक हजार दलितों ने बौद्ध धर्म अपनाने की इच्छा व्यक्त की। सुरेन्द्र नगर में दलितों ने मृत गायों को ठिकाने लगाने से इंकार कर दिया। 
पुलिस का रवैया ढीलाढाला था। पुलिस आसानी से दलितों की सार्वजनिक रूप से पिटाई को रोक सकती थी। पुलिस ने एफआईआर कायम करने में बहुत देरी लगाई। इससे भी बुरी बात यह थी कि एफआईआर, पीड़ितों के खिलाफ ही दर्ज की गई-जैसा कि मोहम्मद अख़लाक के मामले में हुआ था। मानव भक्षकों के खिलाफ एफआईआर तभी दर्ज की गई जब दलितों की पिटाई का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और दलितों ने विरोध प्रदर्षन किए। पुलिस की लेतलाली सामने आने के बाद, ऊना थाने के पुलिस इंस्पेक्टर और एक असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर को निलंबित कर दिया गया। घटना के नौ दिन बाद गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल पीड़ितों से मिलने के लिए समय निकाल सकीं और वह भी तब, जब इस घटना से पूरा देश आहत हो चुका था और दलितों के विरोध प्रदर्षनों से कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ रही थी। उत्तरप्रदेश चुनाव में भाजपा को इस घटना का खामियाजा न भुगतना पड़े, यह भी आनंदी बेन की यात्रा का एक उद्देष्य था।
भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार का दलितों के प्रति दृष्टिकोण जगजाहिर है। सन 2015 में फरीदाबाद में दलित बच्चों की हत्याओं के बारे मंे पूछे जाने पर केंद्रीय विदेश राज्यमंत्री वीके सिंह ने दलितों की तुलना कुत्तों से करते हुए कहा था, ‘‘अगर कोई एक कुत्ते को पत्थर मार दे तो क्या उसके लिए सरकार ज़िम्मेदार है?’’ हाल में केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने दलितों पर हमले को ‘सामाजिक बुराई’ बताया। स्पष्टतः, वे दलितों पर अत्याचार को रोकने में राज्य की असफलता का बचाव कर रहे थे। राजनाथ सिंह ने यह भी कहा कि ‘‘गुजरात में कांग्रेस शासन के दौरान दलितों पर अत्याचार की घटनाओं की संख्या कहीं ज़्यादा थी। भाजपा के सत्ता में आने के बाद से इन घटनाओं में तेज़ी से कमी आई है।’’ आंकड़े राजनाथ सिंह के इस दावे से मेल नहीं खाते। मई 2015 के बाद से दलितों पर अत्याचार की घटनाओं में 19 प्रतिषत की वृद्धि हुई है। 
इस संदर्भ में भाजपा के नेता केवल प्रतिकात्मक बातों और खोखले दावों से दलितों को संतुष्ट करना चाहते हैं। भाजपा के मुखिया अमित षाह ने कुुंभ में दलित साधुओं के साथ क्षिप्रा नदी में डुबकी लगाई। इस अवसर पर उन्होंने कहा ‘‘भाजपा एकमात्र ऐसी पार्टी है जो भारतीय संस्कृति को मज़बूत करने में विष्वास रखती है और यह मानती है कि पूरा विष्व एक परिवार है।’’ हम उनकी बातों पर कैसे भरोसा करें, जबकि उनके गृह राज्य गुजरात में छुआछूत की अमानवीय प्रथा का व्यापक प्रचलन है। गुजरात के दलित, भेदभाव और छुआछूत का दंष झेलने को मजबूर हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार,
98.4 प्रतिषत गांवों में अंतर्जातीय विवाहों पर प्रतिबंध है और ऐसे विवाह करने वाले लोगों के खिलाफ हिंसा हुई और उन्हें अपने गांव छोड़कर जाना पड़ा है। 98.1 प्रतिषत गांवों में किसी दलित व्यक्ति को गैर-दलितों के मोहल्लों में मकान किराए से नहीं दिया जाता है और 97.6 प्रतिषत गांवों में यदि दलित, गैर-दलितों के पानी के पात्रों या अन्य बर्तनों को छू लें तो इससे वे बर्तन अपवित्र माने जाते हैं, 97.2 प्रतिषत गांवों में किसी दलित को गैर-दलित क्षेत्र में कोई धार्मिक अनुष्ठान आयोजित करने की इजाज़त नहीं है। ये सर्वेक्षण नवसर्जन संस्था ने गुजरात के 1,589 गांवों में किया था। क्या राज्य सरकार ने छुआछूत की इस क्रूर व अमानवीय प्रथा के खिलाफ कोई कार्यवाही की? उत्तर है, नहीं। दलितों को 77 गांवों में सामाजिक बहिष्कार के कारण अपने घर छोड़कर जाना पड़ा। इस मामले की जांच राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने की और यह पाया कि इसके पीछे दलितों की शिकायतों का पुलिस द्वारा संज्ञान न लिया जाना, ऐसे मामलों में पुलिस द्वारा सही जांच और उपयुक्त कार्यवाही न की जाना और दलितों पर अत्याचार के प्रकरणों में दोषसिद्धी की दर अत्यंत कम होना है। राज्य ने इस मामले में उपयुक्त कार्यवाही करने की बजाए, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के निष्कर्षों को गलत ठहरा दिया।  
भाजपा के दलितों के प्रति दृष्टिकोण और ऊना जैसी घटनाओं के पीछे, दरअसल, हिन्दुत्व की विचारधारा है। हिन्दुत्व की विचारधारा, ऊँचनीच की अवधारणा पर आधारित है और इसमें दलित, सामाजिक पदक्रम के सबसे निचले पायदान पर हैं। सामाजिक असमानता और ब्राह्मणों का प्रभुत्व, हिन्दुत्व की मूल अवधारणाओं में षामिल है। हिन्दुत्व की 
विचारधारा, भाजपा की नीतियों का आधार है और यही कारण है कि ये नीतियां, दलितों को सांस्कृतिक, राजनैतिक व आर्थिक दृष्टि से कमज़ोर करने वाली हैं। दलितों को कमज़ोर करने के लिए कई तरीके अपनाए जाते हैं। इनमें से एक है राष्ट्रवाद के प्रतीकों का निर्माण। इन प्रतीकों को पूरे समाज पर लादने की कोषिष की जाती है। ये प्रतीक ऊँची जातियों के विषेषाधिकारों को स्वीकृति देते हैं और जातिगत पदक्रम को औचित्यपूर्ण ठहराते हैं। गाय, सरस्वती वंदना और योग, धार्मिकता और राष्ट्रवाद के प्रतीक बना दिए गए हैं। हिन्दुत्व की विचारधारा, उन परंपराओं और नियमों को मान्यता देती है जो मूलतः ऊँची जातियों के हैं और दलितों सहित अन्य समुदायों की परंपराओं और आचरण को निचला दर्जा देती है। स्वयं को राष्ट्रवादी साबित करने के लिए हर व्यक्ति से यह अपेक्षा की जाती है कि वह उच्च जातियों को स्वीकार्य परंपराओं और नियमों का पालन करे। 
उदाहरणार्थ, हमेशा से दलितों को मृत मवेषियों को ठिकाने लगाने और उनके मांस को खाने के लिए मजबूर किया जाता रहा है। किसी मृत जानवर को छूना, ऊँची जातियों के सदस्यों को मंजूर नहीं था और यह काम केवल दलितों के लिए उचित माना जाता था। आज भी दलित मृत जानवरों को ठिकाने लगाने का काम करते हैं। 
गुजरात में निजी निवेश, अधोसंरचनात्मक विकास और खेती के निगमीकरण पर ज़ोर ने सांठगांठ पर 
आधारित पूंजीवाद (क्रोनी कैपिटालिज्म) को बढ़ावा दिया जा रहा है। सार्वजनिक संसाधनों, जो सबाल्टर्न समुदायों की आजीविका के आधार हैं, को उनसे छीनकर अदानी व अंबानी जैसे उद्योग समूहों के हवाले किया जा रहा है। इससे दलित आदिवासी, मछुआरे आदि बेरोज़गार हो रहे हैं और आर्थिक असमानता बढ़ रही है। राज्य सरकार द्वारा भले ही कुछ भी दावे किए जा रहे हों, सच यह है कि गुजरात में 2005 से 2010 के बीच निर्माण और सेवा क्षेत्रों में रोज़गार में वृद्धि की दर नकारात्मक रही है। इससे दलितों की असंगठित क्षेत्र पर निर्भरता बढ़ी है। शहरी क्षेत्रों में असमानता में वृद्धि की दर अपेक्षाकृत तेज़ है और दलित आदिवासी पहले से अधिक गरीब हुए हैं। यद्यपि अनुसूचित जाति उपयोजना के तहत हर राज्य को इस उपयोजना के लिए राज्य की अनुसूचित जातियों की आबादी के अनुपात में धनराषि आवंटित करनी चाहिए परंतु गुजरात सरकार ने पिछले दस वर्षों में एक बार भी इस उपयोजना के लिए राज्य के बजट का 7.09 प्रतिषत-जो कि गुजरात की आबादी में अनुसूचित जातियों का हिस्सा है-आवंटित नहीं किया। जुलाई 2015 की अपनी एक रपट में सरकार ने एक बहुत अजीब सा तर्क दिया, जो कि अनुसूचित जाति उपयोजना के दिषानिर्देषों का स्पष्ट उल्लंघन था। सरकार ने कहा कि ‘‘केवल अनुसूचित जातियों के लिए क्षेत्र-आधारित विकास की परियोजनाएं लागू करना बहुत कठिन है’’! मनरेगा-जो कि ग्रामीण क्षेत्रों में अनुसूचित जातियों और जनजातियों को रोज़गार उपलब्ध करवाने का एक महत्वपूर्ण उपकरण है-के लिए बजट आवंटन में लगातार कमी की जा रही है और जिन ज़िलों में यह योजना लागू है, उनकी संख्या में लगातार कमी की जा रही है। इससे अनुसूचित जातियों और जनजातियों को बहुत नुकसान हुआ है। सन 2013-14 में मनरेगा के अंतर्गत 18 लाख अनुसूचित जाति व जनजाति के परिवारों को साल में 100 दिन का रोज़गार उपलब्ध हुआ। सन 2014-15 में यह आंकड़ा 7 लाख रह गया। 
अहमदाबाद के ह्यूमन डेव्लपमेंट रिसर्च सेंटर (एचडीआरसी) ने अपने नोटिस बोर्ड पर सफाईकर्मियों के रूप में कार्य करने के लिए आवेदन पत्र आमंत्रित करते हुए एक विज्ञापन लगाया। इसमें कहा गया था कि सामान्य श्रेणी के उम्मीदवारांे को नियुक्ति में प्राथमिकता दी जाएगी। इस विज्ञापन से हिन्दुत्व संगठन भड़क उठे। राजपूत षौर्य फाउंडेषन और युवा षक्ति संगठन के कार्यकर्ताओं ने एचडीआरसी के कार्यालय में जमकर तोड़फोड़ की। उन्होंने यह आरोप लगाया कि एचडीआरसी, समाज को विभाजित कर रही है और लोगों की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचा रही है। इस घटना से हिन्दुत्व संगठनों का दलितों के प्रति दृष्टिकोण ज़ाहिर होता है। उनका यह ख्याल है कि हाथ से मैला साफ करने और अन्य सफाई के कार्य केवल दलितों को ही करने चाहिए। यह विडंबनापूर्ण ही है कि जहां संयुक्त राष्ट्र संघ व अन्य अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं, हाथ से मैला साफ करने की प्रथा के उन्मूलन की बात कर रही हैं वहीं गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सन 2007 में प्रकाषित अपनी पुस्तक ‘कर्मयोग’ में यह लिखा था कि वाल्मीकि समुदाय के सदस्य हाथ से मैला साफ करने का काम अपनी आजीविका कमाने के लिए नहीं वरन इसलिए करते हैं क्योंकि वह उनके लिए एक आध्यात्मिक अनुभव है। हम चकित हैं कि अगर हाथ से मैला साफ करने से व्यक्ति आध्यात्म की और प्रवृत्त होता है तो ऊँची जातियां इस मौके को क्यों खो रही हंै और क्यों सरकार सभी जातियों के लोगों को यह काम करने के लिए प्रोत्साहित नहीं कर रही? 
जो दलित युवक भेदभाव के इस दुष्चक्र को तोड़ना चाहते हैं, वे बेहतर जिंदगी के लिए षिक्षा प्राप्त करने के मौके तलाष रहे हैं। परंतु उच्च षैक्षणिक संस्थानों में दलित विद्यार्थियों के साथ एबीव्हीपी जैसे दक्षिणपंथी विद्यार्थी संगठनों और प्रषासन द्वारा भेदभाव किया जाता है। और अगर वे इसका विरोध करते हैं तो उन्हें प्रताड़ित किया जाता है जैसा कि अंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्किल और रोहित वेमूला के मामलों से साफ है। इससे दलितों की आवाज़ और कमज़ोर हो रही है और दलित युवक अपने आप को असहाय अनुभव कर रहे हैं। असहमति की आवाज़ों को देषद्रोह बताकर क्रूरतापूर्वक कुचल दिया जाता है। इसी तरह, योग-जिसे राष्ट्रवाद का प्रतीक बना दिया गया है-से भी दलित स्वयं को नहीं जोड़ पा रहे हैं। इसके कारण ऐतिहासिक और सांस्कृतिक हैं। पहले से भूख और गरीबी से पीड़ित दलित, जो दिनभर कमरतोड़ षारीरिक श्रम करते हैं, में योग करने की ऊर्जा कहां से बची रहेगी। इसी तरह, दलितों से सरस्वती वंदना करने की अपेक्षा करना एक क्रूर मज़ाक है क्योंकि दलितों को कभी षिक्षा प्राप्त करने का अवसर नहीं दिया गया। आज भी गुजरात के स्कूलों में दलित बच्चों के साथ भेदभाव किया जाता है। इंडिया एक्सक्लूज़न रिपोर्ट 2014 के अनुसार राज्य के 32.4 प्रतिषत दलित बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं। 
हिन्दू के रूप में स्वयं को स्वीकार्य बनाने के लिए और हिंदुत्व संगठनों से जुड़ने के लिए दलितों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे मुसलमानों के खिलाफ हिंदुत्ववादी युद्ध में षिरकत करें। उनके मन में यह भ्रम पैदा किया जाता है कि वे हिन्दू समुदाय का हिस्सा बन गए हैं और उन्हें मुसलमानों से श्रेष्ठ बताकर, हिन्दू राष्ट्रवादी समूह मुसलमानों के खिलाफ हिंसा करने के लिए दलितों का इस्तेमाल कर रहे हैं। मुसलमानों को राष्ट्रविरोधी और सभी हिन्दुओं का षत्रु बताकर दलितों को उनके खिलाफ भड़काया जा रहा है। दलित सड़कों पर हिंसा करते हैं और बाद में आपराधिक न्याय प्रणाली की गिरफ्त में आसानी से आ जाते हैं। 
दलितों को स्वयं को राष्ट्रवादी साबित करने के लिए सभी हिन्दुत्ववादी नियमों का पालन व उसके प्रतीकों का सम्मान करना होता है ताकि उन्हें सत्ता और अवसरों के वे चंद टुकड़े मिल सकें, जिन्हें ऊँची जातियां उनकी और फेकेंगी। जहां तक चुनावों का सवाल है दलितों के सामने इसके सिवा कोई विकल्प नहीं है कि वे भाजपा का साथ दें क्योंकि भाजपा उन्हें कुछ हद तक सुरक्षा उपलब्ध करवा सकती है। अगर दलित इन हिन्दुत्ववादियों की अपेक्षा के अनुरूप आचरण नहीं करते तो उनके साथ वही होता है जो ऊना में हुआ। दलितों के साथ हिंसा कर उन्हें दबाने का काम धर्म के स्वनियुक्त ठेकेदारों के समूह करते हैं जिन्हें राज्य का संरक्षण प्राप्त होता है। इस कारण वे बिना किसी डर के खुलेआम हिंसा करते रहते हैं। 
सन 2000 की षुरूआत में गुजरात की विभिन्न अदालतों में अनुसूचित जाति, जनजाति अधिनियम के तहत 13,293 प्रकरण लंबित थे। साल के अंत तक वे सभी प्रकरण लंबित बने हुए थे अर्थात एक भी प्रकरण में निर्णय नहीं हुआ था। इस साल अप्रैल तक प्रदेष में दलितों पर अत्याचार के 409 मामले दर्ज किए गए। राज्य अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार, गुजरात में सन 2001 से लेकर अब तक दलितों पर हमले के 14,500 मामले दर्ज किए गए अर्थात औसतन 1,000 प्रति वर्ष या तीन प्रतिदिन। दलित अधिकार कार्यकर्ता कहते हैं कि दलितों पर अत्याचार करने वाले इसलिए बेखौफ रहते हैं क्योंकि इस तरह के प्रकरणों में दोषसिद्धि की दर मात्र तीन से पांच प्रतिषत के बीच है। 
क्या राज्य तंत्र द्वारा दलितों पर अत्याचारों को रोकने और दोषियों को सज़ा दिलवाने की ज़िम्मेदारी पूरी न करना स्वीकार्य हो सकता है? दलित समुदाय की बेहतरी और उसकी सुरक्षा की ओर जानबूझकर ध्यान नहीं दिया जाना हिन्दुत्व के असली चरित्र को दर्षाता है और भाजपा के इरादों का पर्दाफाष करता है। हिन्दुत्ववादी, दलितों का अपनी घृणा की राजनीति  में इस्तेमाल तो करना चाहते हैं परंतु उन्हें बराबरी का दर्जा देना नहीं चाहते। दलितों को अपने निचले दर्जे को चुपचाप स्वीकार करना होगा ताकि स्थापित सामाजिक पदक्रम को कोई खतरा न हो। दलितों के साथ यदि भेदभाव होता है और उनके साथ हिंसा की जाती है तो इसके लिए जातिप्रथा ज़िम्मेदार नहीं है। यह तो एक ‘सामाजिक बुराई’ है। 
भारत को आज एक षक्तिषाली दलित आंदोलन की आवष्यकता है। यह सही है कि धर्म के स्वनियुक्त ठेकेदारों के समूह और सरकार व षासक दल का रवैया दलितों के सषक्तिकरण की राह में बड़ी बाधा है परंतु नागरिक समाज संगठनों को आगे बढ़कर दलितों को एक करना होगा और उन्हें उनके अधिकारों के लिए लड़ना सिखाना होगा। अछूत प्रथा के खिलाफ लगातार अभियान चलाए जाने की ज़रूरत है और विकास का एक नया माॅडल बनाने की भी।
-नेहा दाभाड़े

अगस्त क्रांति और भारत का शासक वर्ग

अगस्त क्रांति और भारत का शासक वर्ग


आजादी की इच्छा का विस्फोट
‘‘यह एक छोटा-सा मंत्र मैं आपको देता हूं। आप इसे हृदयपटल पर अंकित कर लीजिए और हर श्‍वास के साथ उसका जाप कीजिए। वह मंत्र है - करो या मरो। या तो हम भारत को आजाद करेंगे या आजादी की कोशिश में प्राण दे देंगे। हम अपनी आंखों से अपने देश का सदा गुलाम और परतंत्र बना रहना नहीं देखेंगे। प्रत्येक सच्चा कांग्रेसीचाहे वह पुरुष हो या स्त्रीइस दृढ़ निश्‍चय से संघर्ष में शामिल होगा कि वह देश को बंधन और दासता में बने रहने को देखने के लिए जिंदा नहीं रहेगा। ऐसी आपकी प्रतिज्ञा होनी चाहिए।’’ (अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में दिए गए गांधीजी के भाषण का अंश)
      डाॅ. राममनोहर लोहिया ने 2 मार्च 1946 को भारत के वायसराय लार्ड लिनलिथगो को एक लंबा पत्र लिखा था। वह पत्र महत्वपूर्ण है और गांधीजी ने उसकी सराहना की थी। पत्र ब्रिटिश साम्राज्यवाद के क्रूर और षड़यंत्रकारी चरित्र को सामने लाता है। लोहिया ने वह पत्र जेल से लिखा था। भारत छोड़ो आंदोलन में इक्कीस महीने तक भूमिगत भूमिका निभाने के बाद लोहिया को बंबई में 10 मई 1944 को गिरफ्तार किया गया। पहले लाहौर किले में और फिर आगरा में उन्हें कैद रखा गया। लाहौर जेल में ब्रिटिश पुलिस ने उन्हें अमानुषिक यंत्रणाएं दीं। दो साल कैद रखने के बाद जून 1946 में लोहिया को छोड़ा गया। इस बीच उनके पिता का निधन हुआलेकिन लोहिया ने छुट्टी पर जेल से बाहर आना गवारा नहीं किया। 
      वायसराय ने कांग्रेस नेताओं पर भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान सशस्त्र बगावत की योजना बनाने और आंदोलन में बड़े पैमाने पर हिस्सा लेने वाली जनता पर हिंसक गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाया था। उस समय के तीव्र वैश्विक घटनाक्रम और बहस के बीच वायसराय यह दिखाने की कोशिश कर रहे थे कि ब्रिटिश शासन अत्यंत न्यायप्रिय व्यवस्था है और उसका विरोध करने वाली कांग्रेस व भारतीय जनता हिंसक और निरंकुश। आजादी मिलने में केवल साल-दो साल बचा था,लेकिन वायसराय ऐसा जता रहे थे मानो भारत पर हमेशा के लिए शासन करने का उनका जन्मसिद्ध अधिकार है!
      पत्र में लोहिया ने वायसराय के आरोपों का खंडन करते हुए निहत्थी जनता पर ब्रिटिश हुकूमत के भीषण अत्याचारों को सामने रखा। उन्होंने कहा कि आंदोलन का दमन करते वक्त देश में कई जलियांवाला बाग घटित हुएलेकिन भारत की जनता ने दैवीय साहस का परिचय देते हुए अपनी आजादी का अहिंसक संघर्ष किया। लोहिया ने वायसराय के उस बयान को भी गलत बताया जिसमें उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में एक हजार से भी कम लोगों के मारे जाने की बात कही। लोहिया ने वायसराय को कहा कि उन्होंने असलियत में पचास हजार देशभक्तों को मारा है। उन्होंने कहा कि यदि उन्हें देश में स्वतंत्र घूमने की छूट मिले तो वे इसका प्रमाण सरकार को दे सकते हैं। लोहिया ने पत्र में लिखा, ‘‘श्रीमान लिनलिथगोमैं आपको विश्‍वास दिलाता हूं कि यदि हमने सशस्त्र बगावत की योजना बनाई होतीलोगों से हिंसा अपनाने के लिए कहा होता तो आज गांधीजी स्वतंत्र जनता और उसकी सरकार से आपके प्राणदंड को रुकवाने के लिए कोशिश कर रहे होते।’’
      लोहिया ने वायसराय को उनका बर्बर चेहरा दिखाते हुए लिखा, ‘‘आपके आदमियों ने भारतीय माताओं को नंगा करपेड़ों से बांधउनके अंगों से छेड़छाड़ कर जान से मारा। आपके आदमियों ने उन्हें जबरदस्ती सड़कों पर लिटा-लिटा कर उनके साथ बलात्कार किए और जानें लीं। आप फासिस्ट प्रतिशोध की बात करते हैं जबकि आपके आदमियों ने पकड़ में न आ पाने वाले देशभक्तों की औरतों के साथ बलात्कार किए और उन्हें जान से मारा। वह समय शीघ्र ही आने वाला है जब आप और आपके आदमियों को इसका जवाब देना होगा।’’ कुर्बानियों की कीमत रहती हैइस आशा से भरे हुए लोहिया ने अलबत्ता  व्यथित करने वाले उन क्षणों में वायसराय को आगे लिखा, ‘‘लेकिन मैं नाखुश नहीं हूं। दूसरों के लिए दुख भोगना और मनुष्य को गलत रास्ते से हटा कर सही रास्ते पर लाना तो भारत की नियति रही है। निहत्थे आम आदमी के इतिहास की शुरुआत 9 अगस्त की भारतीय क्रांति से होती है।’’
      हालांकि कांग्रेस के कई बड़े नेता फासिस्ट’ शक्तियों के खिलाफ युद्ध में फंसे लोकतंत्रवादीइंग्लैंड को परेशानी में डालने पर अंत तक दुविधाग्रस्त बने रहे। उनका जिक्र लोहिया ने अपने पत्र में किया है। लेकिन खुद लोहिया को अंग्रजों को बाहर खदेड़ने के फैसले पर कोई दुविधा नहीं थी। आधुनिकतावादियों जैसी दुविधा उनमें भी होती तो वे जनता के संघर्ष में पूरी निष्ठा और शक्ति से नहीं रम पाते। पत्र में उन्होंने स्पष्ट किया, ‘‘हम भविष्य के प्रति जिज्ञासु हैं। चाहे जीत आपकी हो या धुरी शक्ति कीउदासी और अंधकार चारों ओर बना रहेगा। आशा की मात्र एक ही टिमटिमाहट है। स्वतंत्र भारत इस लड़ाई को प्रजातांत्रिक समापन की ओर ले जा सकता है।’’ (देखें, ‘कलेक्टेड वर्क्‍स आफ डा. राममनोहर लोहिया’ खंड 9संपा. मस्तराम कपूरपृ. 176-181)    
      भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में अगस्त क्रांति के नाम से मशहूर भारत छोड़ो आंदोलन का करीब तीन-चार साल का दौर अत्यंत महत्वपूर्ण होने के साथ पेचीदा भी है। यह आंदोलन देशा-व्यापी था जिसमें बड़े पैमाने पर भारत की जनता ने हिस्सेदारी की और अभूततपूर्व साहस और सहनशीलता का परिचय दिया। लोहिया ने ट्राटस्की के हवाले से लिखा है कि रूस की क्रांति में वहां की एक प्रतिशत जनता ने हिस्सा लिया जबकि भारत की अगस्त क्रांति में देश के 20 प्रतिशत लोगों ने हिस्सेदारी की। (देखें, ‘कलेक्टेड वर्क्‍स आफ डा. राममनोहर लोहिया’ खंड 9संपा. मस्तराम कपूर,पृ. 129)
हालांकि जनता का विद्रोह पहले तीन-चार महीनों तक ही तेजी से हुआ। नेतृत्व व दूरगामी योजना के अभाव तथा अंग्रेज सरकार के दमन ने विद्रोह को दबा दिया। 8 अगस्त 1942 को भारत छोड़ोप्रस्ताव पारित हुआ और 9 अगस्त की रात को कांग्रेस के बड़े नेता गिरफ्तार कर लिए गए। नेताओं की गिरफ्तारी के चलते आंदोलन की सुनिश्चित कार्ययोजना नहीं बन पाई थी। कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का अपेक्षाकृत युवा नेतृत्व सक्रिय था लेकिन उसे भूमिगत रह कर काम करना पड़ रहा था। जेपी ने क्रांतिकारियों का मार्गदर्शन और हौसला अफजायी करने तथा आंदोलन का चरित्र और तरीका स्पष्ट करने वाले दो लंबे पत्र अज्ञात स्थानों से लिखे। भारत छोड़ो आंदोलन के महत्व का एक पक्ष यह भी है कि आंदोलन के दौरान जनता खुद अपनी नेता थी।   
      भारत छोड़ो आंदोलन की कई विशेषताएं हैं। कई चरणों और नेतृत्व से गुजरे भूमिगत क्रांतिकारी आंदोलन और गांधी के नेतृत्व में चले जनता के अहिंसक आंदोलन का मिलन भारत छोड़ो आंदोलन में होता है। दोनों की समानता और फर्क के बिंदुओं को लेकर 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम के साथ भी भारत छोड़ो आंदोलन के सूत्र जोड़े जा सकते हैं। भारत छोड़ो आंदोलन हिंसक था या अहिंसक,इस सवाल को लेकर काफी बहस हुई है। गांधीजिन्होंने करो या मरो’ का नारा दिया और जिन्हें उसी रात गिरफ्तार कर लिया गयाने जनता से अहिंसक आंदोलन का आह्वान किया था। 
      जेपी ने गुप्त स्थानों आजादी के सैनिकों के नाम’ दो पत्र क्रमश: दिसंबर 1942 और सितंबर 1943 में लिखे। अपने दोनों पत्रों मेंविशेषकर पहले मेंउन्होंने हिंसा-अहिंसा के सवाल को विस्तार से उठाया। हिंसा-अहिंसा के मसले पर गांधी और कांग्रेस का मत अलग-अलग हैयह उन्होंने अपने पत्र में कहा। उन्होंने अंग्रेज सरकार को लताड़ लगाई कि उसे यह बताने का हक नहीं है कि भारत की जनता अपनी आजादी की लड़ाई का क्या तरीका अपनाती है। उन्होंने कहा कि भारत छोड़ो आंदोलन के मूल में हत्या नहीं करने और चोट नहीं पहुंचाने का संकल्प है।
      उन्होंने लिखा, ‘‘अगर हिंदुस्तान में हत्याएं हुईं - और बेशक हुईं - तो उनमें से 99 फीसदी ब्रिटिश फासिस्ट गुंडों द्वारा और केवल एक फीसदी क्रोधित और क्षुब्ध जनता के द्वारा। हर अहिंसात्मक तरीके से अंग्रेजी राज के लिए जिच पैदा करनाउसे पंगु बना कर उखाड़ फेंकना ही उस प्रोग्राम का मूल मंत्र है और अहिंसा के दायरे में सब कुछ कर सकते हो’ यही है हमारा ध्रुवतारा। इसमें शक की कोई गुंजाइश नहीं कि जिस प्रोग्राम पर 1942 के अगस्त से अब तक कांग्रेस संस्थाओं ने अमल किया है उसका बौद्धिक आधार अहिंसा है - उस अर्थ में अहिंसाजैसा उसके अधिकारी पुरुषों ने इस अर्से में बताया है।’’ (‘नया संघर्ष’, अगस्त क्रांति विशेषांकअगस्त-सितंबर 1991पृ. 31)
      भारत छोड़ो आंदोलन में अहिंसा-हिंसा के सवाल पर जनता से लेकर नेताओं तक जो विमर्श उस दौरान हुआउसका विश्‍लेषण होना चाहिए। हिंसा के पर्याय और उसकी पराकाष्ठा पर समाप्त होने वाले दूसरे विश्‍वयुद्ध के बीच एक अहिंसक आंदोलन का संभव होना निश्चित ही गंभीर विश्‍लेषण की मांग करता है। यह विश्‍लेषण इसलिए जरूरी है कि भारत का अधिकांश बौद्धिक 1857 और 1942 की हिंसा का केवल भारतीय पक्ष देखता है और उसकी निंदा करने में कभी नहीं चूकता। केवल हिंसा के बल पर तीन-चौथाई दुनिया को गुलाम बनाने वाले उपनिवेशवादियों को सभ्य और प्रगतिशील मानता है।      
      भारत छोड़ो आंदोलन दूसरे विश्‍वयुद्ध के दौरान हुआ। लिहाजाउसका एक अंतरराष्ट्रीय आयाम भी था। आंदोलन के अंतरराष्ट्रीय पहलू का इतना दबदबा था कि विश्‍वयुद्ध में अंग्रेजों का साथ देने के औचित्य और भारत की आजादी को विश्‍वयुद्ध में हुए अंग्रेजों के नुकसान का नतीजा बताने के तर्क भारत में आज तक चलते हैं। अंतरराष्ट्रीयतावादियों के लिए आजादी के लिए स्थानीय भारतीय जनता का संघर्ष ज्यादा मायने नहीं रखता। आज जो भारतीय जनता की खस्ता हालत हैउसमें आजादी के इस तरह के मूल्यांकनों का बड़ा हाथ है। हालांकि इसकी जड़ें और गहरी जाती हैं जिनके विश्‍लेषण का यहां स्थान नहीं है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस का आजाद हिंद फौज बना कर अंग्रेजों को बाहर करने के लिए किया गया संघर्ष भी भारत छोड़ो आंदोलन के पेटे में आता है। अंग्रेजों और स्थानीय विभाजक शक्तियों द्वारा देश के विभाजन की बिसात बिछाई जाने का काम भी इसी दौरान पूरा हुआ। जेपी ने इन सब पहलुओं पर अपने पत्रों में रोशनी डाली है। उन्हें एक बार फिर से देखा जाना चाहिए।   
      भारत छोड़ो आंदोलन देशा की आजादी के लिए चले समग्र आंदोलनजैसा भी भला-बुरा वह रहा होका निर्णायक निचोड़ था। विभिन्न स्रोतों से आजादी की जो इच्छा और उसे हासिल करने की जो ताकत भारत में बनी थीउसका अंतिम प्रदर्शन भारत छोड़ो आंदोलन में हुआ। भारत छोड़ो आंदोलन ने यह निर्णय किया कि आजादी की इच्छा में भले ही नेताओं का भी साझा रहा होउसे हासिल करने की ताकत निर्णायक रूप से जनता की थी। हालांकि अंग्रेजी शासन को नियामत मानने वाले और अपना स्वार्थ साधने वाले तत्व भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भी पूरी तरह सक्रिय थे। वे कौन थे,इसकी जानकारी जेपी के पत्रों से मिलती है।
      यह ध्यान देने की बात है कि गांधीजी ने आंदोलन को समावेशी बनाने के लिए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में दिए अपने भाषण में समाज के सभी तबकों को संबोधित किया था - जनतापत्रकारनरेशसरकारी अमलासैनिकविद्यार्थी। उन्होंने अंग्रेजोंयूरोपीय देशों और मित्र राष्ट्रों के नेतृत्व को भी अपने उस भाषण में संबोधित किया था। सभी तबकों और समूहों से देश की आजादी के लिए करो या मरो’ के व्यापक आह्वान का आधार उनका पिछले 25 सालों के संघर्ष का अनुभव था।  
      किसी समाज एवं सभ्यता की बड़ी घटना का प्रभाव साहित्य रचना पर पड़ता है। 1857 का पहला स्वतंत्रता संग्राम भारत की एक बड़ी घटना थी। अंग्रेजों का डर कह लीजिए या भक्ति1857 का संघर्ष लंबे समय तक साहित्यकारों की कल्पना से बाहर बना रहा। जबकि भारत छोड़ो आंदोलन ने रचनात्मक कल्पना (क्रियेटिव इमेजिनेषन) को तत्काल और बड़े पैमाने पर आकर्षित किया। विभाजन साहित्य (पार्टीशन लिटरेचर) के बाद भारतीय साहित्य में सबसे महत्वपूर्ण घटना के रूप में भारत छोड़ो आंदोलन का चित्रण रहा है। इसका कारण लगता है कि गांधी के राजनैतिक कर्म और विचारों ने पूंजीवाद के आकर्षण को भारतीय भद्रलोक के मानस से कुछ हद तक काटा थाऔर जनता के संघर्ष की बदौलत आजादी लगभग आ चुकी थी।
      मार्क्‍सवादी लेखकों ने भी भारत छोड़ो आंदोलन को विषय बना कर उपन्यास लिखे। हिंदी में यशपालजो अपने साहित्य को मार्क्‍सवादी विचारधारा के प्रचार का माध्यम मानते थेने आंदोलन के दौरान ही दो उपन्यास - देशद्रोही’ (1943) और गीता पार्टी कामरेड’ (1946)  - लिखे। यह ध्यान देने की बात है कि भारत छोड़ो आंदोलन अपने ढंग के विशिष्ट राजनीतिक उपन्यासकार यशपाल का देर तक पीछा करता है। यशपाल सशस्त्र क्रांतिकारी आंदोलन में सक्रिय रहे थे। उन्होंने अपने अंतिम महाकाय उपन्यास मेरी तेरी उसकी बात’ (1979) में एक बार फिर भारत छोड़ो आंदोलन का विस्तार से चित्रण किया। 
      सोवियत रूस के दूसरे विश्‍वयुद्ध में शामिल होने पर भारत के मार्क्‍सवादी नेतृत्व ने भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध और अंग्रेजों का साथ देने का फैसला किया। वह कांग्रेस समाजवादियों और मार्क्‍सवादियों के बीच कटु टकराहट का कारण तो बना हीउस निर्णय के चलते मार्क्‍सवादी कार्यकर्ता देशभक्ति और देशद्रोह की परिभाषा व कसौटी को लेकर भ्रमित हुए। यशपाल ने अपने तीनों उपन्यासों में मार्क्‍सवादी कथानायकों को देशभक्त सिद्ध किया है। सतीनाथ भादुड़ी का जागरी’, (1946) बीरेंद्र कुमार भट्टाचार्य का मृत्युंजय (1979)समरेश बसु का जुग जुग जियो’ (चार खंड,1977) जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण उपन्यासों के अलावा भारतीय भाषाओं मेंभारतीय अंग्रेजी उपन्यास सहितकई उपन्यास भारत छोड़ो आंदोलन की घटना पर लिखे गए या उनमें उस घटना का जिक्र आया है। फणीश्‍वरनाथ रेणु के उपन्यास मैला आंचल’ (1954) का समय करीब आजादी के एक साल पहले और एक साल बाद का है। उनके इस कालजयी उपन्यास पर भारत छोड़ो आंदोलन की गहरी छाया व्याप्त है। यह परिघटना दर्शाती है कि भारत छोड़ो आंदोलन राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होने के साथ हमारी जातीय स्मृति का हिस्सा है।
      भारत छोड़ो आंदोलन का जो भी घटनाक्रमप्रभाव और विवाद रहे होंमूल बात थी भारत की जनता की लंबे समय से पल रही आजादी की इच्छा – will to freedom  - का विस्फोट। भारत छोड़ो आंदोलन के दबाव में भारत के आधुनिकतावादी मध्यवर्ग से लेकर सामंती नरेशों तक को यह लग गया था कि अंग्रेजों को अब भारत छोड़ना होगा। अतः अपने वर्ग-स्वार्थ को बचाने और मजबूत करने की फिक्र उन्हें लगी। प्रशासन का लौह-शिकंजा और उसे चलाने वाली भाषा तो अंग्रेजों की बनी ही रहीविकास का माडल भी वही रहा। भारत का लोकतांत्रिकसमाजवादी व धर्मनिरपेक्ष’ संविधान भी पूंजीवाद और सामंतवाद के गठजोड़ की छाया से पूरी तरह नहीं बच पाया। अंग्रेजों के वैभव और रौब-दाब की विरासतजिससे भारत की जनता के दिलों में भय बैठाया जाता थाभारत के शासक वर्ग ने अपनाए रखी। वह उसे उत्तरोत्तर मजबूत भी करता चला गया। गरीबीमंहगाईबीमारी,बेरोजगारीशोषणकुपोषणविस्थापन और आत्महत्याओं का मलबा बने हिंदुस्तान में शासक वर्ग का वैभव अश्‍लील ही कहा जा सकता है। सेवाग्राम और साबरमती आश्रम के छोटे और कच्चे कक्षों में बैठ कर गांधी को दुनिया की सबसे बड़ी साम्राज्यशाही से राजनीतिक-कूटनीतिक संवाद करने में असुविधा नहीं हुई। अपना चिंतन/लेखन/आंदोलन करने में भी नहीं। गांधी का आदर्श यदि सही नहीं था तो शासक-वर्ग सादगी का कोई और आदर्श्‍स सामने रख सकता था। बशर्ते वैसी इच्छा होती।  
      वायसराय के आदमी    
      लोहिया ने आजाद भारत के शासक-वर्ग और शासनतंत्र की सतत और विस्तृत आलोचना की है। उन्होंने उसे अंग्रेजी राज का विस्तार बताया है। लोहिया को लगता रहा होगा कि उनकी आलोचना से शासक-वर्ग का चरित्र बदलेगातद्नुरूप शासनतंत्र में परिवर्तन आएगा और भारत की अवरुद्ध क्रांति आगे बढ़ेगी। हालांकि संसद और उसके बाहर जनता के पक्ष में उनका संघर्ष शासक-वर्ग की प्रतिष्ठा को नहीं हिला पाया। आज जब हम अगस्त क्रांति की सत्तरवीं सालगिरह मनाने जा रहे हैं तो सोचें - किसलिएक्या हम जनता का पक्ष मजबूत करना चाहते हैंया स्वतंत्रता आंदोलन के प्रेरणा प्रतीकोंप्रसंगों और विभूतियों का उत्सव मना कर उनके सारतत्व को खत्म कर देना चाहते हैं?
      नवउदारवाद के विरोध की किसी भी प्रेरणा को नष्ट करने की प्रवृत्ति भारत में जोर-शोर से चल रही है। 1857 के डेढ़ सौवें साल पर कांग्रेस ने दिल्ली से मेरठ और मेरठ से दिल्ली की यात्रा का आयोजन किया था। धूमधाम से किए गए उस आयोजन में कई नवउदारवाद विरोधी बुद्धिजीवियों और एक्टिविस्टों ने शिरकत की। देश की संवैधानिक संप्रभुता समेत उसके समस्त संसाधनों और श्रमशक्ति को नवसाम्राज्यवादी ताकतों का निवाला बना देने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने लालकिले पर मेरठ से लौटे क्रांति यात्रियों का लालकिले पर स्वागत किया था। यह कटूक्ति हैलेकिन इससे कम कुछ नहीं कहा जा सकता कि 1857 के शाहीदों का इससे बड़ा अपमान नहीं हो सकता था।
      डेढ़ सौवीं वर्षगांठ के अवसर पर दो वर्षों तक सरकार ने पैसा भी खूब बांटा। पैसा देखते ही बुद्धिजीवियों में भी जोश आ जाता है। जिन्होंने 1857 पर कभी एक पंक्ति न पढ़ी थीलिखी थीऐसे बहुत-से विद्वान सभा-सेमिनारों में सक्रिय हो गए। मार्क्‍सवादियों ने इस बार कुछ ज्यादा जोर-शोर से 1857 का जश्‍न मनाया। लेकिन साथ ही उनके नेतृत्व ने यह भी कह दिया कि पूंजीवाद के अलावा विकास का कोई रास्ता नहीं है। यानी मान्यता वही पुरानी रही - अपनी आजादी के लिए लड़ने वाले पिछड़ी/सामंती शक्तियां थे और उन्हें गुलाम बनाने वाले अंग्रेज आगे बढ़ी हुई। ऐसे में पिछड़ी और सामंती शक्तियों का हारना तय था। आज तक भारत का मार्क्‍सवादी और आधुनिकतावादी दिमाग,उत्सव चाहे जितना मना लेआजादी की इच्छा में अपने प्राणों पर खेल जाने वालों की हिमाकत को माफ नहीं करता है। उनके हिसाब से यह देशा अंधकूप था और अंग्रेज न आते तो अंधकूप ही रह जाता। यह केवल नब्बे के दशक का फैसला नहीं है कि भारत की राजनीति के सारे रास्ते कारपोरेट पूंजीवाद की ओर जाते हैं। 
      लोहिया ने भारत छोड़ो आंदोलन की पच्चीसवीं वर्षगांठ पर लिखा, ‘‘नौ अगस्त का दिन जनता की महान घटना है और हमेशा बनी रहेगी। पंद्रह अगस्त राज्य की महान घटना थी। लेकिन अभी तक हम 15 अगस्त को धूमधाम से मनाते हैं क्योंकि उस दिन ब्रिटिश वायसराय माउंटबैटन ने भारत के प्रधानमंत्री के साथ हाथ मिलाया था और क्षतिग्रस्त आजादी देश को दी थी। नौ अगस्त जनता की इस इच्छा की अभिव्यक्ति थी - हमें आजादी चाहिए और हम आजादी लेंगे। हमारे लंबे इतिहास में पहली बार करोड़ों लोगों ने आजादी की अपनी इच्छा जाहिर की। कुछ जगहों पर इसे जोरदार ढंग से प्रकट किया गया।’’  पच्चीस साल की दूरी से देखने पर लोहिया ने उस आंदोलन की कमजोरी - सतत दृढ़ता की कमी - पर अंगुली रखी। वे लिखते हैं, ‘‘लेकिन यह इच्छा थोड़े समय तक ही रही लेकिन मजबूत रही। उसमें दीर्घकालिक तीव्रता नहीं थी। जिस दिन हमारा देश दृढ़ इच्छा प्राप्त कर लेगा उस दिन हम विश्‍व का सामना कर सकेंगे। बहरहालयह 9 अगस्त 1942 की पच्चीसवीं वर्षगांठ है। इसे अच्छे तरीके से मनाया जाना चाहिए। इसकी पचासवीं वर्षगांठ इस प्रकार मनाई जाएगी कि 15 अगस्त भूल जाएबल्कि 26 जनवरी भी पृष्ठभूमि में चला जाए या उसकी समानता में आए। 26 जनवरी और 9 अगस्त एक ही श्रेणी की घटनाएं हैं। एक ने आजादी की इच्छा की अभिव्यक्ति की और दूसरी ने आजादी के लिए लड़ने का संकल्प दिखाया।’’ (देखें, ‘राममनोहर लोहिया रचनावली’ खंड 9संपा. मस्तराम कपूरपृ. 413)  
      अगस्त क्रांति की पचासवीं वर्षगांठ देखने के लिए लोहिया जिंदा नहीं रहे। लोग मरने के बाद उनकी बात सुनेंगेउनकी यह धारणा अभी तक मुगालता ही साबित हुई है। अगस्त क्रांति की पचासवीं वर्षगांठ 1992 में पड़ी। कहां लोहिया की इच्छा और कहां 1992 का साल! यह वह साल है जब नई आर्थिक नीतियों के तहत देश के दरवाजे बहुराष्ट्रीय कंपनियों की लूट के लिए खोल दिए गए और एक पांच सौ साल पुरानी मस्जिद को राममंदिर आंदोलन’ चला कर ध्वस्त कर दिया गया। तब से लेकर नवउदारवाद और संप्रदायवाद की गिरोहबंदी के बूते भारत का शसक-वर्ग उस जनता का जानी दुश्‍मन बन गया है जिसने भारत छोड़ो आंदोलन में साम्राज्यवादी शासकों के दमन का सामना करते हुए आजादी का रास्ता प्रशस्त किया था। जो हालात हैंउन्हें देख कर कह सकते हैं कि नब्बे के दशक के बाद उपनिवेशवादी दौर के मुकाबले ज्यादा भयानक तरीके से जनता के  दमन को अंजाम दिया जा रहा है। 
      अगस्त क्रांति दिवस के मौके पर हम यह विचार कर सकते हैं कि भारत छोड़ो आंदोलन की तर्ज पर बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत छोड़ो’ के नारे क्यों कारगर नहीं होते और क्यों कारपोरेट पूंजीवाद का कब्जा उत्तरोत्तर मजबूत होता जाता हैक्यों सारे देश को नगर और सारी आबादी को उपभोक्ता (कंज्यूमर) बनाने का दुःस्वप्न धड़ल्ले से बेचा जा रहा हैकारण स्पष्ट हैभारत का शासक वर्ग पूरी तरह से कारपोरेट पूंजीवाद का पक्षधर है। देश के नेताउद्योगपतिबुद्धिजीवीलेखककलाकार,फिल्मी सितारेपत्रकारखिलाड़ीजनांदोलनकारीनौकरशाहतरह-तरह के सिविल सोसायटी एक्टिविस्ट कारपोरेट पूंजीवाद के समर्थन और मजबूती की मुहिम में जुटे हैं। इनमें जो शामिल नहीं हैंउनके बारे में माना जाता है उनकी प्रतिभा में जरूर कोई खोट या कमी है। नवउदारवाद और उसके पक्षधरों की स्थिति इतनी मजबूत है कि अब उनकी आलोचना भी उनके गुणों का बखान हो जाती है और उनका पक्ष और मजबूत करती है।
      जैसा कि हमने पहले भी कई बार बताया हैनवउदारवादियों के साथ प्रच्छन्न नवउदारवादियों की एक बड़ी और मजबूत टीम तैयार हो चुकी है। वह शासक वर्ग के साथ नाभिनालबद्ध है और नवउदारवाद विरोध की राजनैतिक संभावनाओं को नष्ट करने में तत्पर रहती है। दरअसलसीधे नवउदारवादियों के मुकाबले प्रच्छन्न नवउदारवादी जनता और समाजवाद के बड़े दुश्‍मन बने हुए हैं। नवउदारवाद के मुकाबले में उभरे सच्चे जनांदोलनों और समाजवादी राजनीति के प्रयासों को प्रच्छन्न नवउदारवादियों ने बार-बार भ्रष्ट किया हैा। इन्होंने एक बड़ा हल्लाअंतर्राष्ट्रीय स्तर कावर्ल्‍ड सोशल फोरम (डब्ल्यूएसएफ) के तत्वावधान में बोला था और उससे बड़ा हमलाराष्ट्रीय स्तर परइंडिया अगेंस्ट करप्‍शन (आईएसी) के तत्वावधान में बोला हुआ है। प्रछन्न नवउदारवादियों के लिए सब कुछ अच्छा हो सकता हैबुरी है तो केवल राजनीति। हालांकि उनकी अपनी राजनीतिक ऐषणाएं शायद ही कभी एक पल के लिए सोती हों।
      डब्ल्यूएसएफ के समय कम से कम सांप्रदायिकता से बचाव था। गैर-राजनीतिक रूप में ही सही, ‘दूसरी दुनिया संभव है’ का नारा था। आईएसी के आंदोलन में संप्रदायवादी और धर्मनिरपेक्षतावादी आपस में मिल गए हैं और वे एक जन लोकपाल’ के बदले नवउदारवादी व्यवस्था और नेतृत्व को अभयदान देते हैं। आईएसी के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का शुरुआती नारा था - मनमोहन सिंह वोट चाहिए तो जन लोकपाल कानून लाओ। अब बाबा रामदेव कहते घूम रहे हैं, ‘राहुल गांधी काला धन वापस लाओप्रधानमंत्री बन जाओ। सुना है नवउदारवाद के उत्पाद इन बाबा ने विदेशों में जमा काला धन वापस लाने का आंदोलन फिर से छेड़ने के लिए अगस्त क्रांति दिवस को चुना है!
      मुख्यधारा मीडिया पूरी तरह नवउदारवादियों और प्रच्छन्न नवउदारवादियों के साथ हैजिसमें नेता और मुद्दे कंपनियों के उत्पाद की तरह प्रचारित किए जाते हैं। नतीजा यह है कि भारतीय मानस संपूर्णता में शासक-अभिमुख यानी नवउदारवादी रुझान का बनता जा रहा है। नवउदारवादी नीतियों से प्रताड़ित जनता भी इस मुहिम की गिरफ्त में है। यह प्रक्रिया जब मुकम्‍मल हो जाएगीकोई भी बदलाव संभव नहीं होगा। केवल फालतू लोगों का सफाया होगा। हम प्रच्छन्न नवउदारवादियों के इस तर्क के कायल नहीं हैं कि वे सरकार पर दबाव डाल कर गरीबों के लिए जनकल्याणकारी योजनाएं बनवाते हैं। उनकी यह मदद गरीबों को नहींकोरपोरेट घरानों को सुरक्षित करती है।  
      हम हाल का एक वाकया बताना चाहते हैं। 8 जुलाई 2012 को पूना में समाजवादी नेता और लेखक/पत्रकार पन्नालाल सुराणा के सम्मान में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया। अवसर उनके अस्सीवें साल में प्रवेश करने का था। कार्यक्रम के आयोजन में राष्ट्र सेवा दल की प्रमुख भूमिका थी जिसके वे अध्यक्ष रह चुके हैं। महाराष्ट्र के हर जिले से आए करीब पांच सौ लोगों ने साने गुरुजी स्मारक पहुंच कर पन्न्नालाल जी को बधाई दी। चंदा करके उगाहे गए ग्यारह लाख रुपयों का चेक भी भेंट किया गया। सत्ता की राजनीति से बाहर किए गए राजनीतिक संघर्ष के लिए उत्तर भारत में ऐसा कार्यक्रम होना असंभव है। हमने अपनी आंखों से देखा कि एक व्यक्ति नंगे पैर आया और स्वागत कक्ष में चंदा देकर रसीद ली।
      कार्यक्रम हालांकि पन्नालाल जी के अभिनंदन का थालेकिन चर्चा ज्यादातर राजनीतिक हो गई। स्वागत समिति के अध्यक्ष भाई वैद्य ने पन्नालाल जी के व्यक्तित्व और लेखकीय कृतित्व के साथ समाजवादी आंदोलन में उनके राजनीतिक संघर्ष पर भी प्रकाश डाला। मुख्य अतिथि जस्टिस राजेंद्र सच्चर ने अपने वक्तव्य में अवसरोपयुक्त टिप्पणी करने के साथ कार्यक्रम की अध्यक्ष अरुणा राय को संबोधित करते हुए कहा कि वे एक बार फिर उन्हें सक्रिय राजनीति में आने की अपील करके उलझन में डालना चाहते हैं। वे शायद पहले भी कतिपय अवसरों पर उनसे वैसी अपील कर चुके होंगे। उन्होंने दूसरे मुख्य अतिथि ऊर्जा मंत्री सुशील कुमार शिंदे को भी नवउदारवादी नीतियों के दुष्परिणामों की चर्चा करके उलझन में डाला। शिंदे साहब का भाषण लंबा था। वे नवउदारवादी नीतियों की जरूरत और उनसे होने वाले फायदों पर बोले। पन्नालाल जी को हालांकि आयोजकों और वहां आने वाले शुभेच्छुओं का धन्यवाद ही करना थालेकिन समाजवादी प्रतिबद्धता और राजनीतिक संघर्ष के तहत उन्होंने अपने भाषण में शिंदे साहब की धारणाओं का जोरदार ढंग से खंडन किया।
      हमें अच्छा लगा कि एक नागरिक अभिनंदन के कार्यक्रम में अच्छी-खासी राजनीतिक बहस सुनने को मिली। लेकिन आश्‍चर्य भी हुआ कि राष्ट्रीय सलाहकार समिति की सदस्य अरुणा राय ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में सक्रिय राजनीति की बात करने वालों पर बिना झिझक तानाकशी की। उनका निशाना कारपोरेट पूंजीवाद के खिलाफ समाजवाद की राजनीति करने वालों पर था। गोया सक्रिय राजनीति करने का अधिकार उस पार्टी और सरकार के लिए सुरक्षित हैजिसकी वे सलाहकार हैं! उन्होंने कहा कि वे राजनीति को ज्यादा अच्छी तरह समझती हैं और जो कर रही हैं वही सच्ची राजनीति है। उनके मुताबिकयह उसी राजनीतिक चेतना का असर है कि लोग अब सवाल पूछ रहे हैं। उन्होंने राजनीतिक चेतना फैलाने में नर्मदा बचाओ आंदोलन का हवाला भी दिया। मनरेगा को वे राजनीतिक चेतना की देशाव्यापी पाठशाला मानती ही होंगी। काफी ऊंचे ओटले से बोलते हुए उन्होंने घोषणा की कि असली आजादी तो अब आई हैजब उन जैसे सिविल सोसायटी एक्टिविस्टों ने लोगों को जागरूक करना शुरू किया है। अरुणा राय अपने वक्तव्य को लेकर इस कदर आत्मव्यामोहित थीं कि अपनी मान्यता और भूमिका पर रंच मात्र भी आलोचनात्मक निगाह डालने को तैयार नहीं दिखीं।
      दरअसलएनजीओ वालों का राजनीतिक संघर्ष से कोई वास्ता नहीं रहा होता। वे उसके बारे में वाकफियत भी नहीं रखना चाहते। वे गरीबों को साल में सौ दिन सौ रुपया का काम देने को बहुत बड़ी क्रांति मान कर अपनी पीठ ठोंकते हैं और इस सच्चाई से आखें फेरे रहते हैं कि देश में कारपोरेट क्रांति हो चुकी है। अगस्त क्रांति के दिन यह समझना जरूरी है इन लोगों का स्वार्थ शासक-वर्ग के साथ नाभिनालबद्ध है। वरना सीधी बात हैयदि आप किसी सरकार या पार्टी की विचारधारा से सहमत नहीं हैं तो उसके सलाहकार नहीं बन सकते। काम करने के लिए उस सरकार के प्रोजेक्ट नहीं ले सकते। सोनिया गांधी की सलाहकार समितिजिसका सदस्य बनने के लिए मारामारी होती है,द्वारा जो भी काम संपादित होता हैसरकार के लिए होता है और कांग्रेस नीत यूपीए सरकार कारपोरेट पूंजीवाद की पैरोकार सरकार है।
      मजेदारी यह है कि जनता को धोखा देने का यह खेल खुलेआम और बिना किसी ग्लानि के चलता है। अपने वायसराय को लिखे खत में लोहिया ने जिन्हें आपके आदमी’ बताया हैसरकारों के सलाहकार बने प्रच्छन्न नवउदारवादी उसी श्रेणी में आते हैं। सोनिया के इन सलाहकारों से पूछा जा सकता है कि आप भारत की करोड़ों माताओं की दुर्दशा में शामिल हैंउन माताओं के करोड़ों बच्चों के कुपोषणबीमारीअसमय मृत्युअशिक्षा की जिम्मेदारी आप पर आयद होती हैबहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा देश के संसाधनों की लूटलोगों के विस्थापन और लाखों किसानों की आत्महत्या किसी दैवीय प्रकोप की नहींआपकी देन हैंक्योंकि आप सरकार के सलाहकार हैं और उस सरकार की राजनीति से अलग राजनीति के धुर विरोधी!
 
      सीधे राजनीति ही रास्ता
      नवउदारवादी गुलामी के खतरे को सबसे पहले देख पाने वाले राजनेता और चिंतक किशन पटनायक ने यह माना था कि नवउदारवाद के विरोध और विकल्प के लिए जनांदोलनों का राजनीतिकरण और एकीकरण होना चाहिए। वह निष्चित ही एक प्रासंगिक और स्फूर्तिदायक विचार था। किशन पटनायक की साख भी थी और समस्या की सम्यक समझ भी। इस उद्देश्‍य की प्राप्ति के लिए उन्होंने कई वरिष्ठ और युवा समाजवादी साथियों के साथ मिलकर पहल की। 1995 में एक नई राजनीतिक पार्टी समाजवादी जन परिषद (सजप) का गठन हुआ जिसके तहत वैकल्पिक राजनीति और वैकल्पिक विकास का विचार लोगों के सामने रखा गया। हालांकि किशन पटनायक की आशा फलीभूत नहीं हो पाई। भारत सहित दुनिया के सभी देशों में एनजीओ का तंत्र नवउदारवाद विरोधी किसी भी राजनीतिक पहल को निष्क्रिय करने के लिए स्वाभाविक तौर पर सक्रिय रहता है। उसी तंत्र में फंस कर किशन पटनायक की मौत हो गई।
      नवउदारवाद के खिलाफ सजप के अलावा और भी कई राजनैतिक प्रयास हुए हैं। उदारीकरण के पहले 10 सालों में मुख्यधारा राजनीति की तरफ से भी उसके विरोध में कुछ न कुछ स्वर उठते रहे। देश पर देश के शासक-वर्ग द्वारा नवउदारवादी हमले के बाद उसका मुकाबला करने की प्रेरणा से चुनाव आयोग में बड़ी संख्या में राजनीतिक पार्टियों का पंजीकरण हुआ है। लेकिन कोई प्रयास कामयाब नहीं हो पा रहा है। बल्कि ऐसे प्रयासों को लोकतंत्र को कमजोर करना प्रचारित किया जाता है। इस गतिरोध के कई कारण हैंलेकिन शासक-अभिमुख प्रछन्न नवउदारवादियोंजो कभी जनांदोलनकारियों के और कभी सिविल सोसायटी एक्टिविस्टों की सूरत में होते हैंकी नकारात्मक भूमिका उनमें प्रमुख है।
      अगस्त क्रांति की सत्तरवीं सालगिरह पर हम यह समझ लेंकि एनजीओ आधारित जनांदोलनकारी राजनैतिक प्रयासों पर पानी फेरने का काम करते हैंतो आगे का रास्ता बनेगा। कहने को ये गैर-सरकारी संस्थाएं हैंलेकिन उनसे ज्यादा सरकारी सरकारों के अपने विभाग भी नहीं होते। इन्होंने जेनुइन प्रतिरोधी आंदोलनों - चाहे वे किसानों के होंआदिवासियों के होंमजदूरों के हों,छोटे व्यापारियों के होंनिचले दरजे के सरकारी कर्मचारियों के हों या छात्रों के - आगे नहीं बढ़ने दिया। वैश्विक कारपोरेट पूंजीवाद की हमसफर फोर्ड फाउंडेशनराकफेलर फाउंडेशन जैसी दानदाता संस्थाओं और उसी तरह की बहुत-सी ईनामदाता संस्थाओं के धन ने समाजवादी राजनीति के रास्ते को अवरुद्ध किया हुआ है। जैसे बड़े नेता और पार्टियां अपने यहां स्वतंत्र राजनीतिक सोच के कार्यकर्ताओं को नहीं पनपने देतेवैसे ही प्रच्छन्न नवउदारवादी समाज में राजनीतिक पहल और प्रक्रिया को नहीं संभव होने देते। इनका मानना है कि हर कार्यकर्ता की कीमत होती हैउसे चुकाने वाला एनजीओ अथवा ईनामदाता संस्था होनी चाहिए। कहना न होगा कि कीमत और मुनाफे से जुड़ी यह सोच पूंजीवाद की पैदाइश है। इन्हें सुरक्षा का दोहरा कवच प्राप्त है - भारत के शासक वर्ग का और वैश्विक आर्थिक संस्थाओं का। इन्हें कारेपोरेट पूंजीवाद के सिविल सुरक्षा बल’ कहा जा सकता है। एक और बात गौर की जा सकती हैअंग्रेजी नहीं जानने वाले लोग इनकी दुनिया के सदस्य नहीं बन सकतेउन्हें साम्राज्यवादी चाल के इन प्यादों का प्यादा बन कर रहना होता है। जनता की स्वतंत्र राजनीति भला ये कैसे बरदाश्‍त कर सकते हैं?
      अगस्त क्रांति दिवस की सही प्रेरणा यही हो सकती है कि नवसाम्राज्यवादी गुलामी और उसे लादने वाले शासक-वर्ग के खिलाफ संघर्ष की राजनीति संगठित और विकसित हो। बाकी सारे सामाजिक-सांस्कृतिक प्रयास उस राजनीति को पुष्ट और बहुआयामी बनाने में लगें। हालांकि पूंजीवाद की चैतरफा गिरफ्त और जीने की मजबूरियों ने देश की जनता को राजनीतिक रूप से लगभग अचेत कर दिया है। किसी नई राजनीतिक पहल को उसका समर्थन नहीं मिल पाता। मध्यवर्ग राजनीति-द्वेषी बन गया है और दिन-रात उसका प्रचार करता है। परोक्ष रूप से वह मौजूदा राजनीति को ही मजबूत करता है जो धनबलबाहुबलसंप्रदायवादजातिवादव्यक्तिवादपरिवारवादवंशवादक्षेत्रवाद आदि के बल पर चलती है। ऐसे कठिन परिदृश्‍य में जो राजनीतिक संगठन जनता के पक्ष को मजबूत बनाने के लिए खुला और सतत राजनीतिक संघर्ष करेगाएक दिन उसे सफलता मिलेगी।        
      हालांकि प्रच्छन्न नवउदारवादियों को दूर रखना बहुत मुश्किल हैलेकिन दूर रखे बगैर नवउदारवाद विरोध की राजनीति खड़ी नहीं हो सकती। 20-22 साल के अनुभव के बाद यह स्वीकार करना चाहिए कि अगर भारत में समाजवादी राजनीतिक ताकत खड़ी हो पाएगी तो प्रछन्न नवउदारवादियों से बच कर ही हो पाएगी।
-----------प्रेम सिंह

समान नागरिक संहिताः क्यों और कब?



जिसे हम समान नागरिक संहिता कहते हैं, उसका संबंध व्यक्तिगत कानूनों (विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गुज़ारा भत्ता व बच्चों की अभिरक्षा) से है। हमारे देष में फौज़दारी और दीवानी कानून सभी धार्मिक समुदायों के लिए समान हैं परंतु चूंकि व्यक्तिगत कानूनों का संबंध धर्म से होता है, इसलिए हिन्दुओं, मुसलमानों और ईसाईयों के लिए अलग-अलग व्यक्तिगत कानून (पर्सनल लाॅ) हैं। दिलचस्प यह है कि व्यक्तिगत कानूनों के मामले मंे, जैन, बौद्ध और सिक्ख समुदायों को हिन्दू धर्म का हिस्सा माना जाता है। स्पष्टतः, हिन्दू धर्म में बहुत विभिन्नताएं हैं और इस कारण, हिन्दू व्यक्तिगत कानून भी हिन्दू धर्म के सभी पंथों की धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप नहीं है। संविधान सभा में लंबी बहस के बाद यह निर्णय लिया गया था कि व्यक्तिगत कानूनों को जस का तस रखा जाए। राज्य के नीति निदेषक तत्वों (अनुच्छेद 44) में यह कहा गया है कि राज्य, सभी धर्मों के नागरिकों के लिए एक से कानून लागू करने का प्रयास करेगा। इस प्रावधान का उद्देष्य है व्यक्तिगत कानूनों को प्राकृतिक न्याय की अवधारणा के अनुरूप बनाना।
नेहरू के अनुरोध पर, तत्कालीन केंद्रीय विधि मंत्री बी.आर. अंबेडकर ने हिन्दू कोड बिल तैयार किया ताकि विभिन्न हिन्दू समुदायों के लिए एक से कानून का निर्माण किया जा सके। इसके पीछे सोच यह थी कि चूंकि हिन्दू समुदाय देष का सबसे बड़ा धार्मिक समुदाय है इसलिए अगर सबसे पहले हिन्दुओं के लिए एक से कानून बनाए जाते हैं तो आगे चलकर, अन्य समुदायों के मामले में भी ऐसा ही किया जा सकता है। अंबेडकर ने यह बिल तैयार किया। अंबेडकर की मान्यता थी-जो कि बहुत हद तक सही भी थी-कि वर्तमान कानून, महिलाओं के साथ न्याय नहीं करते। इस बिल के मसविदे का हिन्दू समुदाय के एक बड़े तबके ने कड़ा विरोध किया। इसका कारण यह था कि यह बिल तत्कालीन समाज में व्याप्त पितृसत्तात्मक मूल्यों के न केवल खिलाफ था वरन उनमें क्रांतिकारी बदलावों का हामी था। बाद में इस बिल के कई प्रावधानों को हटाकर उसे लागू किया गया। बिल को जस का तस पास करवाने में अपनी असफलता से निराष होकर अंबेडकर ने केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया।
समान नागरिक संहिता के मुद्दे पर अगली बहस षाहबानो प्रकरण में उच्चतम न्यायालय के निर्णय से उपजी। षाहबानो ने तलाक के बाद गुज़ारा भत्ता दिए जाने की मांग की, जिसे न्यायालय ने उचित ठहराया। मुसलमानों का परंपरावादी तबका इस निर्णय के खिलाफ लामबंद हो गया और सरकार उसके दबाव में आ गई। राजीव गांधी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने एक बिल पास कर उच्चतम न्यायालय के निर्णय को पलट दिया। इसके बाद, हिन्दू सांप्रदायिक ताकतें सक्रिय हो गईं और उन्होंने समान नागरिक संहिता लागू करने की मांग की। इस सिलसिले में जो मुख्य मुद्दा उठाया गया वह यह था कि मुसलमानों को चार पत्नियां रखने का हक़ है। इसके पीछे षायद यह सोच थी कि बहुपत्नी प्रथा के कारण मुसलमानों की आबादी, हिन्दुओं से ज़्यादा हो जाएगी। सच यह है कि मुसलमानों में बहुपत्नी प्रथा का प्रचलन, अन्य समुदायों की तुलना में अधिक नहीं है और ना ही किसी पुरूष द्वारा एक से अधिक पत्नियां रखने से उस समुदाय की आबादी अपेक्षाकृत तेज़ी से बढ़ती है। आबादी में वृद्धि का संबंध प्रजनन-योग्य आयु की महिलाओं की संख्या से है, फिर चाहे वे एक पुरूष की पत्नियां हों या अनेक पुरूषों की।
मुसलमानों के नेतृत्व के एक हिस्से, और विषेषकर मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड ने समान नागरिक संहिता को प्रतिष्ठा का प्रष्न बना लिया और यह घोषणा कर दी कि इसे लागू किए जाने से मुसलमानों के धार्मिक अधिकारों को चोट पहुंचेगी। ऐसा बताया गया मानो बहुपत्नी प्रथा, बुर्का व मुंहज़बानी तलाक ही इस्लाम के प्रतीक हैं। मुस्लिम समुदाय के भीतर से अनेक महिलाओं के समूह उठ खड़े हुए और उन्होंने इन प्रथाओं के उन्मूलन और लैंगिक न्याय के लिए अभियान षुरू किए। इन सबका नतीज़ा यह हुआ कि व्यक्तिगत कानूनों में सुधार का मसला, मुस्लिम समुदाय तक सीमित होकर रह गया और हिन्दुओं के व्यक्तिगत कानूनों में सुधार की आवष्यकता पर विचारविमर्ष ही बंद हो गया। सांप्रदायिक ताकतें, समान नागरिक संहिता की मांग तो करती हैं परंतु वह क्या और कैसी हो, इस बारे में उनकी सोच स्पष्ट नहीं है। यह मानकर चला जाता है कि समान नागरिक संहिता का निर्माण हिन्दू, मुस्लिम व ईसाई व्यक्तिगत कानूनों में से चुनिंदा कानूनों को मिलाकर कर दिया जाएगा। जाहिर है कि इस विमर्ष से लैंगिक न्याय का मुद्दा गायब है।
सांप्रदायिक ताकतों के अलावा, प्रगतिषील महिला संगठनों ने भी समान नागरिक संहिता की मांग करनी षुरू की परंतु जल्द ही उन्हें यह एहसास हो गया कि सभी धर्मों के व्यक्तिगत कानून, महिलाओं के साथ न्याय नहीं करते और इसलिए उन्होंने लैंगिक न्याय पर आधारित कानूनांे के निर्माण की मांग करना षुरू की। प्रष्न यह है कि समान नागरिक संहिता कैसे बनेगी? क्या इसका आधार लैंगिक न्याय होगा? कुछ लोगों को लगता है कि समान नागरिक संहिता का निर्माण सरकार द्वारा कर दिया जाएगा और वह सभी समुदायों पर लागू हो जाएगी। एक दूसरी सोच, नीचे से ऊपर की ओर बढ़ने की है अर्थात पहले समाज में सुधार की प्रक्रिया को प्रोत्साहन दिया जाए और बाद में इन सुधारों को कानून की षक्ल दे दी जाए। यहां महत्वपूर्ण यह है कि सुधार की यह प्रक्रिया लैंगिक न्याय पर आधारित होनी चाहिए।
इस सिलसिले में भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन द्वारा किए गए प्रयास महत्वपूर्ण हैं। आंदोलन ने मुंहज़बानी तलाक की प्रक्रिया के उन्मूलन के समर्थन मंे 50,000 हस्ताक्षर इकट्ठे किए हैं। भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन और उसके जैसे अन्य संगठनों का लक्ष्य है परिवर्तन के लिए दबाव बनाकर नए कानूनों का निर्माण करवाना ताकि न्यायपालिका, महिलाओं के साथ न्याय कर सके। ज़ाहिर है कि इस तरह के आंदोलनों से समाज में जागरूकता बढ़ती है और महिलाओं के साथ अन्याय की संभावनाएं कम होती हंै। इस तरह के अभियान, महिलाओं को न्याय दिलवाने में मददगार होते हैं। मुंहज़बानी तलाक पर प्रतिबंध की मांग को लेकर चलाया जा रहा अभियान, लैंगिक न्याय पर आधारित सुधार लाने की दिषा में महत्वपूर्ण कदम है।
सांप्रदायिक ताकतें ज़ोरषोर से समान नागरिक संहिता लागू किए जाने की मांग तो कर रही हैं परंतु लैंगिक न्याय मंे उनकी कोई रूचि नहीं है। उनका मुख्य उद्देष्य मुस्लिम समुदाय को आतंकित करना है। मुस्लिम महिलाओं के साथ हो रहे अन्याय पर वे केवल घड़ियाली आंसू बहा रही हैं। पुरूषों के वर्चस्व वाले मुस्लिम संगठन भी अपनी पितृसत्तात्मक सोच के चलते इस तरह के सुधारों के खिलाफ हैं।
कहने की आवष्यकता नहीं कि कोई भी भयग्रस्त समुदाय, लैंगिक न्याय के मुद्दे को महत्व नहीं दे सकता। उसकी प्राथमिकता सुरक्षा और सामाजिक-राजनैतिक क्षेत्रों में बराबरी हासिल करना हो जाती है। सांप्रदायिक राजनीति को बढ़ावा देने वाले सभी संगठनों का नेतृत्व पुरूषों के हाथ में है। स्वनियुक्त पर्सनल लाॅ बोर्डों पर पितृसत्तात्मक सोच हावी है। दूसरी ओर, महिलाएं, लैंगिक समानता के लिए संघर्ष कर रही हैं और सुधार की प्रक्रिया को नीचे से ऊपर की ओर ले जाने की हामी हैं। समान नागरिक संहिता के विरोध की जड़े सांप्रदायिक राजनीति के बढ़ते प्रभाव और पितृसत्तात्मक मूल्यों में है।
कुछ लोगों द्वारा यह तर्क भी दिया जा रहा है कि मुंहज़बानी तलाक जैसी प्रथाओं के विरोध में अभियान चलाने से हिन्दुत्ववादी संगठनों को यह मौका मिल जाएगा कि वे हिन्दू कानूनों को समान नागरिक संहिता के नाम पर देष पर लाद दें। यह तर्क कानूनों में सुधार की मांग में निहित खतरों की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करता है। परंतु हमें यह उम्मीद है कि वर्तमान परिस्थितियांे में हिन्दू कानूनों को समान नागरिक संहिता के रूप में देष पर लादे जाने की संभावना बहुत कम है क्योंकि महिला संगठन यह अच्छी तरह से जानते हैं कि हिन्दू कानून भी महिलाओं के साथ न्याय नहीं करते। समय आ गया है कि इस मुद्दे पर हमारा चिंतन, लैंगिक न्याय और विभिन्न समुदायों के भीतर स्वेच्छा से सुधारों पर आधारित होना चाहिए।

-राम पुनियानी
          

महाश्वेता देवी

शनिवार, 6 अगस्त 2016 


महान साहित्यकार एवं हिंदुस्तान की गरीब, शोषित, पीड़ित जनता की हमदर्द पक्षधर और उनके अधिकारों के लिए लड़ने वाली महाश्वेता देवी का दिनांक 28 जुलाई 2016 को 90 वर्ष की आयु में देहावसान हो गया। उनका जन्म 14 जनवरी, 1926 को ढाका, जो इस समय बांग्लादेश की राजधानी है, में हुआ था। उनके पिता का नाम मनीष घटक और मां का नाम धरित्री देवी था। वे नौ भाई-बहनों में सबसे बड़ी थीं। उनकी प्रारंभिक शिक्षा ढाका के इडेन मांटेसरी स्कूल में हुई। उसके बाद 1939 में कलकत्ता के आशुतोष कालेज से इंटर की परीक्षा पास की। बाद में वे शांति निकेतन में भी पढ़ीं।
20 जनवरी, 1947 को प्रसिद्ध रंगकर्मी व लेखक विजन भट्टाचार्य से उनका विवाह हुआ। उनके पति कम्युनिस्ट थे। उनके पति के कम्युनिस्ट होने के कारण उन्हें अनेक प्रकार की कठिनाईयों का सामना करना पड़ा। पचास के दशक में कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े लोगों को संदेह से देखा जाता था। महाश्वेता देवी को एक सरकारी नौकरी मिल गई परंतु थोड़े दिनों के बाद उन्हें उस नौकरी से निकाल दिया गया क्योंकि उनके पति कम्युनिस्ट थे।
प्रारंभ से ही उनका लिखने के प्रति झुकाव रहा। जीवन भर महाश्वेता की चिंता उन लोगों के लिए रही जो असहिष्णु समाज के शिकार हैं। पीड़ितों, उपेक्षितों और शोषितों के प्रति उनका लगाव स्थायी और वास्तविक था। शोषितों, विशेषकर आदिवासियों, के लिए उन्होंने अनेक मैदानी संघर्ष भी किए। उनकी रचनाएं अन्याए के विरूद्ध इंसान के संघर्ष, महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं। उन्होंने समाज के उन लोगों के दुःख को अपने साहित्य का आधार बनाया। महाश्वेता देवी उन लोगों में से थीं जो उनके साहित्य के साथ-साथ, आम लोगों के प्रति उनके मन में जो व्यथा थी उसके लिए भी वह जानी जाएंगी। उनके मन में निश्चल भोले-भाले सांस्कृतिक तौर पर अत्यंत समृद्ध आदिवासियों के प्रति जो दर्द था वह हमारे सभ्य समाज को चकित करता है।
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उन्हांेने आदिवासी अंचलों के सुख-दुःख के बारे में समय-समय पर लिखा। वे अमर साहित्यकार के रूप में हमेशा याद की जाएंगी। पलामू के बंधुआ मज़दूरों के बीच काम करते हुए महाश्वेता देवी ने कई तथ्य एकत्रित किए थे। उन्हीं तथ्यों के आधार पर एक पुस्तक तैयार हुई जिसका शीर्षक था ‘भारत के बंधुआ मज़दूर’। महाश्वेता देवी के साहित्य में, सामंती ताकतों के शोषण, उत्पीड़न, छलछद्म के विरूद्ध संघर्ष जारी रहता है। संघर्षरत व्यक्ति मार भी खाता है, क्रूरता और बबर्रता होने के बावजूद सीना तानकर खड़ा रहता है। उनकी अनेक कृतियों में झांसी की रानी के ऊपर लिखी एक कृति भी शामिल है। झांसी की रानी कौन थीं? उनकी गतिविधियां क्या थीं? क्यों उन्होंने संघर्ष किया? यह उन्होंने इतिहास की पुस्तकों से जाना। परंतु वे झांसी की रानी के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को आत्मसात करने के लिए झांसी भी गईं। उन्होंने बुंदेलखंड के चप्पे-चप्पे को अपने कदमों से नापा। वहां के लोकगीतों को कलमबद्ध किया। झांसी की रानी की जीवनी लिखने वाले वृदांवनलाल वर्मा से मिलीं। न्यूएज़ ने उनकी किताब को छापा और उन्हें 500 रूपए पारिश्रमिक के रूप में दिए। यह उनकी पहली रचना थी। जिसके बाद उनकी लोकप्रियता में दिन-प्रतिदिन बढ़ोत्तरी होती रही।
कुछ वर्षों पूर्व वे भोपाल आईं थीं। भोपाल के प्रवास के दौरान उनके अनेक कार्यक्रम हुए। उनमंे से एक कार्यक्रम को आयोजित करने का सौभाग्य मुझे भी मिला था। उनके भोपाल प्रवास के दौरान स्वर्गीय कमला प्रसाद ने उनका लंबा इंटरव्यू लिया था। इस लंबे इंटरव्यू में उन्होंने अपनी जीवन यात्रा का विस्तृत विवरण दिया है। इस लंबे इंटरव्यू में उन्होंने अनेक प्रश्नों के उत्तर दिए थे। जैसे उनसे पूछा गया कि लेखक को किसी संगठन का सदस्य होना चाहिए या नहीं? इसका जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि हां होना चाहिए। उन्होंने कहा कि मेरा जो आदिवासी क्षेत्र है सुबह से आप देखेंगे कि कितने परेशान आदमी इधर-उधर बिखरे रहते हैं। किसी की ज़मीन हड़प ली जाती है तो किसी की ज़मीन पर कब्जा कर लिया जाता है। उन्हें कौन सहारा देता है?
कमला प्रसाद जी ने उनसे नक्सलियों की गतिविधियों के बारे में सवाल पूछे थे। कमला प्रसाद जी ने उनसे पूछा था कि आपकी नक्सलियों के साथ सहानुभूति है, इसका क्या कारण है? उन्होंने उत्तर दिया ‘‘क्योंकि नक्सलियों का मूवमेंट मैंने देखा है। उसके पहले मैंने भारत घूमा था, उसके बहुत पहले जब 1942 का आंदोलन हुआ तब मैं लेखिका नहीं थी। जब 1943 का बंगाल फेमिन हुआ, बड़ा अकाल हुआ, मैं लेखिका नहीं थी। भारत भ्रमण किया तब मैं लेखिका नहीं थी, लेकिन जब मैं बड़ी हुई और चिंतन शुरू किया तब मैंने नक्सलियों का मूवमेंट देखा, उनमें सिनसियरिटी थी, वे जनता की आवाज़ उठाते थे। अत्याचार के खिलाफ लड़ना उनका काम था।’’
फिर उनसे पूछा गया कि उनकी हिंसक गतिविधियों के बारे में आपका क्या कहना है, तो उन्होंने जवाब दिया कि पूरे भारतीय समाज में कितनी हिंसा है। नक्सलियों ने कितनों को मारा और भारत सरकार ने कितनों को मारा। इमरजेंसी हुई कितने मरे, कोई इधर मरा तो कोई उधर मरा। हम भाग नहीं सकते हैं। कितना बड़ा राजनीतिक परिदृश्य था, उसमें कितने एंटीसोशल लोगों की राजनीति चलती थी। नक्सलवादी आंदोलन भारत में है, सरकार नक्सलियांे के खिलाफ है।
इसी तरह उन्होंने दलित आंदोलनों के बारे में अपनी सहानुभूति प्रकट की। दलितों के प्रति समाज के रवैये पर उन्होंने भारी चिंता प्रकट की। आज भी इन दलितों की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। महिलाओं की स्थिति के बारे में उन्होंने कहा कि अकेली महिला ही शोषित नहीं हैं। गरीब औरत, मर्द, बच्चे सभी शोषित हैं।
प्रेमचंद के बारे में पूछने पर उन्होंने कहा कि मैंने प्रेमचंद को खूब पढ़ा है। मैं उनकी रचनाओं का सम्मान करती हूं। उनसे जब यह पूछा गया कि उनकी भविष्य की योजनाएं क्या हैं, तो उन्होंने कहा कि मैं अभी एक संगठन बना रही हूं। मेरे साथ बहुत सारे बंधु हैं। उन सबसे मेरा बहुत विचार हुआ है। उनमें मैं विशेषकर दी-नोटिफाइड लोगों के लिए काम करना चाहती हूं। अभी उन्हें अपराधियों की कौम समझा जाता है। मेरी यह कोशिश है कि उन्हें भी इंसान का दर्जा दिया जाए।
एक व्यक्तिगत सवाल उनसे पूछा गया कि जब आप यहां-वहां जाती हैं तो अपने साथ क्या-क्या सामान ले जाती हैं? उन्होंने बताया मेरी बहू भी मौजूद है, मेरे घर के आसपास के लोग कहते हैं कि जब तुम जाती हो तो ज्यादा कपड़े क्यों नहीं ले जातीं? मेरे पड़ोसी मुझे साड़ी, ब्लाउज देते हैं। मुझे सबका भरपूर प्यार मिला है। उन्होंने अपने लंबे इंटरव्यू के दौरान प्रेमचंद को फिर याद किया और कहा कि सबको प्रेमचंद को पढ़ना चाहिए। मैं तो कहूंगी कि नानक को भी याद करो। जो भी अच्छे हैं उन सबको याद करो।
अपने जीवन के बारे में उन्होंने कहा कि मेरा जीवन मेरा-तेरा, ये मेरा-तेरा की बात है। इसका पालन आज के लेखकों को करना चाहिए। भारतीय लेखक को यह समझना चाहिए। मैं तो उस व्यक्ति को बहुत धनी समझती हूं, जिसके ऊपर छांव है, जिसे दो वक्त का खाना मिलता है। मैं यदि किसी और को दाल भांत खिला सकूं तो इससे बड़ा वरदान और क्या हो सकता है। देश में चारों तरफ दुःख है। कहीं पानी नहीं है, कहीं खाना नहीं हैं। आदिवासियों की हालत तो खस्ता है ही, बाकी लोगों की हालत भी दयनीय है। जब सारे देश की हालत खराब है तो मुझे क्या अधिकार है कि मैं सिर्फ अपने बारे में सोचूं। सभी को दूसरों के बारे में सोचना चाहिए। वही इंसान, इंसान है जो दूसरों के बारे में सोचे और दूसरों के लिए जिए।
इस लेख में महाश्वेता देवी की महानता की थोड़ी-बहुत चर्चा हुई है वे इससे भी बहुत महान थीं। आने वाली पीढ़ियां उन्हें हमेशा याद करेंगी।
-एल.एस. हरदेनिया

गुजरात में दलितः

बुधवार, 10 अगस्त 2016

गुजरात में दलितः असमानता और हिंसा के शिकार

गत 11 जुलाई को गुजरात के ऊना शहर में ‘मानव भक्षकों’ व ज़बरिया वसूली करने वालों के गिरोह ने-जो स्वयं को गौरक्षक बता रहे थे-एक दलित परिवार के सात सदस्यों की क्रूरतापूर्वक पिटाई की। उन्हें मोटा समधियाला गांव में एक मरी हुई गाय की खाल उतारने के लिए लोहे की छड़ों, लाठियों और चाकू से मारा गया। उसके बाद उनके कपड़े उतारकर उन्हें सार्वजनिक रूप से मारते हुए थाने ले जाया गया। इस भयावह व दिल हिला देने वाली हिंसा से दलितों के प्रति गुजरात में व्याप्त पूर्वाग्रहों और घृणा का पता चलता है। इस बर्बर घटना पर उतनी ही तीव्र प्रतिक्रिया हुई। दलित लेखक अमृतलाल मकवाना ने उन्हें मिला ‘जीवन श्रेष्ठ साहित्य कृति’ पुरस्कार लौटा दिया। गुजरात के दलित युवा सड़कों पर उतर आए और उन्होंने अपना विरोध व्यक्त करने के लिए कई बसों को आग के हवाले कर दिया और सड़कों व राजमार्गों को जाम किया। बनासकांठा जिले के करीब एक हजार दलितों ने बौद्ध धर्म अपनाने की इच्छा व्यक्त की। सुरेन्द्र नगर में दलितों ने मृत गायों को ठिकाने लगाने से इंकार कर दिया। 
पुलिस का रवैया ढीलाढाला था। पुलिस आसानी से दलितों की सार्वजनिक रूप से पिटाई को रोक सकती थी। पुलिस ने एफआईआर कायम करने में बहुत देरी लगाई। इससे भी बुरी बात यह थी कि एफआईआर, पीड़ितों के खिलाफ ही दर्ज की गई-जैसा कि मोहम्मद अख़लाक के मामले में हुआ था। मानव भक्षकों के खिलाफ एफआईआर तभी दर्ज की गई जब दलितों की पिटाई का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और दलितों ने विरोध प्रदर्षन किए। पुलिस की लेतलाली सामने आने के बाद, ऊना थाने के पुलिस इंस्पेक्टर और एक असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर को निलंबित कर दिया गया। घटना के नौ दिन बाद गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल पीड़ितों से मिलने के लिए समय निकाल सकीं और वह भी तब, जब इस घटना से पूरा देश आहत हो चुका था और दलितों के विरोध प्रदर्षनों से कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ रही थी। उत्तरप्रदेश चुनाव में भाजपा को इस घटना का खामियाजा न भुगतना पड़े, यह भी आनंदी बेन की यात्रा का एक उद्देष्य था।
भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार का दलितों के प्रति दृष्टिकोण जगजाहिर है। सन 2015 में फरीदाबाद में दलित बच्चों की हत्याओं के बारे मंे पूछे जाने पर केंद्रीय विदेश राज्यमंत्री वीके सिंह ने दलितों की तुलना कुत्तों से करते हुए कहा था, ‘‘अगर कोई एक कुत्ते को पत्थर मार दे तो क्या उसके लिए सरकार ज़िम्मेदार है?’’ हाल में केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने दलितों पर हमले को ‘सामाजिक बुराई’ बताया। स्पष्टतः, वे दलितों पर अत्याचार को रोकने में राज्य की असफलता का बचाव कर रहे थे। राजनाथ सिंह ने यह भी कहा कि ‘‘गुजरात में कांग्रेस शासन के दौरान दलितों पर अत्याचार की घटनाओं की संख्या कहीं ज़्यादा थी। भाजपा के सत्ता में आने के बाद से इन घटनाओं में तेज़ी से कमी आई है।’’ आंकड़े राजनाथ सिंह के इस दावे से मेल नहीं खाते। मई 2015 के बाद से दलितों पर अत्याचार की घटनाओं में 19 प्रतिषत की वृद्धि हुई है। 
इस संदर्भ में भाजपा के नेता केवल प्रतिकात्मक बातों और खोखले दावों से दलितों को संतुष्ट करना चाहते हैं। भाजपा के मुखिया अमित षाह ने कुुंभ में दलित साधुओं के साथ क्षिप्रा नदी में डुबकी लगाई। इस अवसर पर उन्होंने कहा ‘‘भाजपा एकमात्र ऐसी पार्टी है जो भारतीय संस्कृति को मज़बूत करने में विष्वास रखती है और यह मानती है कि पूरा विष्व एक परिवार है।’’ हम उनकी बातों पर कैसे भरोसा करें, जबकि उनके गृह राज्य गुजरात में छुआछूत की अमानवीय प्रथा का व्यापक प्रचलन है। गुजरात के दलित, भेदभाव और छुआछूत का दंष झेलने को मजबूर हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार,
98.4 प्रतिषत गांवों में अंतर्जातीय विवाहों पर प्रतिबंध है और ऐसे विवाह करने वाले लोगों के खिलाफ हिंसा हुई और उन्हें अपने गांव छोड़कर जाना पड़ा है। 98.1 प्रतिषत गांवों में किसी दलित व्यक्ति को गैर-दलितों के मोहल्लों में मकान किराए से नहीं दिया जाता है और 97.6 प्रतिषत गांवों में यदि दलित, गैर-दलितों के पानी के पात्रों या अन्य बर्तनों को छू लें तो इससे वे बर्तन अपवित्र माने जाते हैं, 97.2 प्रतिषत गांवों में किसी दलित को गैर-दलित क्षेत्र में कोई धार्मिक अनुष्ठान आयोजित करने की इजाज़त नहीं है। ये सर्वेक्षण नवसर्जन संस्था ने गुजरात के 1,589 गांवों में किया था। क्या राज्य सरकार ने छुआछूत की इस क्रूर व अमानवीय प्रथा के खिलाफ कोई कार्यवाही की? उत्तर है, नहीं। दलितों को 77 गांवों में सामाजिक बहिष्कार के कारण अपने घर छोड़कर जाना पड़ा। इस मामले की जांच राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने की और यह पाया कि इसके पीछे दलितों की शिकायतों का पुलिस द्वारा संज्ञान न लिया जाना, ऐसे मामलों में पुलिस द्वारा सही जांच और उपयुक्त कार्यवाही न की जाना और दलितों पर अत्याचार के प्रकरणों में दोषसिद्धी की दर अत्यंत कम होना है। राज्य ने इस मामले में उपयुक्त कार्यवाही करने की बजाए, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के निष्कर्षों को गलत ठहरा दिया।  
भाजपा के दलितों के प्रति दृष्टिकोण और ऊना जैसी घटनाओं के पीछे, दरअसल, हिन्दुत्व की विचारधारा है। हिन्दुत्व की विचारधारा, ऊँचनीच की अवधारणा पर आधारित है और इसमें दलित, सामाजिक पदक्रम के सबसे निचले पायदान पर हैं। सामाजिक असमानता और ब्राह्मणों का प्रभुत्व, हिन्दुत्व की मूल अवधारणाओं में षामिल है। हिन्दुत्व की 
विचारधारा, भाजपा की नीतियों का आधार है और यही कारण है कि ये नीतियां, दलितों को सांस्कृतिक, राजनैतिक व आर्थिक दृष्टि से कमज़ोर करने वाली हैं। दलितों को कमज़ोर करने के लिए कई तरीके अपनाए जाते हैं। इनमें से एक है राष्ट्रवाद के प्रतीकों का निर्माण। इन प्रतीकों को पूरे समाज पर लादने की कोषिष की जाती है। ये प्रतीक ऊँची जातियों के विषेषाधिकारों को स्वीकृति देते हैं और जातिगत पदक्रम को औचित्यपूर्ण ठहराते हैं। गाय, सरस्वती वंदना और योग, धार्मिकता और राष्ट्रवाद के प्रतीक बना दिए गए हैं। हिन्दुत्व की विचारधारा, उन परंपराओं और नियमों को मान्यता देती है जो मूलतः ऊँची जातियों के हैं और दलितों सहित अन्य समुदायों की परंपराओं और आचरण को निचला दर्जा देती है। स्वयं को राष्ट्रवादी साबित करने के लिए हर व्यक्ति से यह अपेक्षा की जाती है कि वह उच्च जातियों को स्वीकार्य परंपराओं और नियमों का पालन करे। 
उदाहरणार्थ, हमेशा से दलितों को मृत मवेषियों को ठिकाने लगाने और उनके मांस को खाने के लिए मजबूर किया जाता रहा है। किसी मृत जानवर को छूना, ऊँची जातियों के सदस्यों को मंजूर नहीं था और यह काम केवल दलितों के लिए उचित माना जाता था। आज भी दलित मृत जानवरों को ठिकाने लगाने का काम करते हैं। 
गुजरात में निजी निवेश, अधोसंरचनात्मक विकास और खेती के निगमीकरण पर ज़ोर ने सांठगांठ पर 
आधारित पूंजीवाद (क्रोनी कैपिटालिज्म) को बढ़ावा दिया जा रहा है। सार्वजनिक संसाधनों, जो सबाल्टर्न समुदायों की आजीविका के आधार हैं, को उनसे छीनकर अदानी व अंबानी जैसे उद्योग समूहों के हवाले किया जा रहा है। इससे दलित आदिवासी, मछुआरे आदि बेरोज़गार हो रहे हैं और आर्थिक असमानता बढ़ रही है। राज्य सरकार द्वारा भले ही कुछ भी दावे किए जा रहे हों, सच यह है कि गुजरात में 2005 से 2010 के बीच निर्माण और सेवा क्षेत्रों में रोज़गार में वृद्धि की दर नकारात्मक रही है। इससे दलितों की असंगठित क्षेत्र पर निर्भरता बढ़ी है। शहरी क्षेत्रों में असमानता में वृद्धि की दर अपेक्षाकृत तेज़ है और दलित आदिवासी पहले से अधिक गरीब हुए हैं। यद्यपि अनुसूचित जाति उपयोजना के तहत हर राज्य को इस उपयोजना के लिए राज्य की अनुसूचित जातियों की आबादी के अनुपात में धनराषि आवंटित करनी चाहिए परंतु गुजरात सरकार ने पिछले दस वर्षों में एक बार भी इस उपयोजना के लिए राज्य के बजट का 7.09 प्रतिषत-जो कि गुजरात की आबादी में अनुसूचित जातियों का हिस्सा है-आवंटित नहीं किया। जुलाई 2015 की अपनी एक रपट में सरकार ने एक बहुत अजीब सा तर्क दिया, जो कि अनुसूचित जाति उपयोजना के दिषानिर्देषों का स्पष्ट उल्लंघन था। सरकार ने कहा कि ‘‘केवल अनुसूचित जातियों के लिए क्षेत्र-आधारित विकास की परियोजनाएं लागू करना बहुत कठिन है’’! मनरेगा-जो कि ग्रामीण क्षेत्रों में अनुसूचित जातियों और जनजातियों को रोज़गार उपलब्ध करवाने का एक महत्वपूर्ण उपकरण है-के लिए बजट आवंटन में लगातार कमी की जा रही है और जिन ज़िलों में यह योजना लागू है, उनकी संख्या में लगातार कमी की जा रही है। इससे अनुसूचित जातियों और जनजातियों को बहुत नुकसान हुआ है। सन 2013-14 में मनरेगा के अंतर्गत 18 लाख अनुसूचित जाति व जनजाति के परिवारों को साल में 100 दिन का रोज़गार उपलब्ध हुआ। सन 2014-15 में यह आंकड़ा 7 लाख रह गया। 
अहमदाबाद के ह्यूमन डेव्लपमेंट रिसर्च सेंटर (एचडीआरसी) ने अपने नोटिस बोर्ड पर सफाईकर्मियों के रूप में कार्य करने के लिए आवेदन पत्र आमंत्रित करते हुए एक विज्ञापन लगाया। इसमें कहा गया था कि सामान्य श्रेणी के उम्मीदवारांे को नियुक्ति में प्राथमिकता दी जाएगी। इस विज्ञापन से हिन्दुत्व संगठन भड़क उठे। राजपूत षौर्य फाउंडेषन और युवा षक्ति संगठन के कार्यकर्ताओं ने एचडीआरसी के कार्यालय में जमकर तोड़फोड़ की। उन्होंने यह आरोप लगाया कि एचडीआरसी, समाज को विभाजित कर रही है और लोगों की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचा रही है। इस घटना से हिन्दुत्व संगठनों का दलितों के प्रति दृष्टिकोण ज़ाहिर होता है। उनका यह ख्याल है कि हाथ से मैला साफ करने और अन्य सफाई के कार्य केवल दलितों को ही करने चाहिए। यह विडंबनापूर्ण ही है कि जहां संयुक्त राष्ट्र संघ व अन्य अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं, हाथ से मैला साफ करने की प्रथा के उन्मूलन की बात कर रही हैं वहीं गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सन 2007 में प्रकाषित अपनी पुस्तक ‘कर्मयोग’ में यह लिखा था कि वाल्मीकि समुदाय के सदस्य हाथ से मैला साफ करने का काम अपनी आजीविका कमाने के लिए नहीं वरन इसलिए करते हैं क्योंकि वह उनके लिए एक आध्यात्मिक अनुभव है। हम चकित हैं कि अगर हाथ से मैला साफ करने से व्यक्ति आध्यात्म की और प्रवृत्त होता है तो ऊँची जातियां इस मौके को क्यों खो रही हंै और क्यों सरकार सभी जातियों के लोगों को यह काम करने के लिए प्रोत्साहित नहीं कर रही? 
जो दलित युवक भेदभाव के इस दुष्चक्र को तोड़ना चाहते हैं, वे बेहतर जिंदगी के लिए षिक्षा प्राप्त करने के मौके तलाष रहे हैं। परंतु उच्च षैक्षणिक संस्थानों में दलित विद्यार्थियों के साथ एबीव्हीपी जैसे दक्षिणपंथी विद्यार्थी संगठनों और प्रषासन द्वारा भेदभाव किया जाता है। और अगर वे इसका विरोध करते हैं तो उन्हें प्रताड़ित किया जाता है जैसा कि अंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्किल और रोहित वेमूला के मामलों से साफ है। इससे दलितों की आवाज़ और कमज़ोर हो रही है और दलित युवक अपने आप को असहाय अनुभव कर रहे हैं। असहमति की आवाज़ों को देषद्रोह बताकर क्रूरतापूर्वक कुचल दिया जाता है। इसी तरह, योग-जिसे राष्ट्रवाद का प्रतीक बना दिया गया है-से भी दलित स्वयं को नहीं जोड़ पा रहे हैं। इसके कारण ऐतिहासिक और सांस्कृतिक हैं। पहले से भूख और गरीबी से पीड़ित दलित, जो दिनभर कमरतोड़ षारीरिक श्रम करते हैं, में योग करने की ऊर्जा कहां से बची रहेगी। इसी तरह, दलितों से सरस्वती वंदना करने की अपेक्षा करना एक क्रूर मज़ाक है क्योंकि दलितों को कभी षिक्षा प्राप्त करने का अवसर नहीं दिया गया। आज भी गुजरात के स्कूलों में दलित बच्चों के साथ भेदभाव किया जाता है। इंडिया एक्सक्लूज़न रिपोर्ट 2014 के अनुसार राज्य के 32.4 प्रतिषत दलित बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं। 
हिन्दू के रूप में स्वयं को स्वीकार्य बनाने के लिए और हिंदुत्व संगठनों से जुड़ने के लिए दलितों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे मुसलमानों के खिलाफ हिंदुत्ववादी युद्ध में षिरकत करें। उनके मन में यह भ्रम पैदा किया जाता है कि वे हिन्दू समुदाय का हिस्सा बन गए हैं और उन्हें मुसलमानों से श्रेष्ठ बताकर, हिन्दू राष्ट्रवादी समूह मुसलमानों के खिलाफ हिंसा करने के लिए दलितों का इस्तेमाल कर रहे हैं। मुसलमानों को राष्ट्रविरोधी और सभी हिन्दुओं का षत्रु बताकर दलितों को उनके खिलाफ भड़काया जा रहा है। दलित सड़कों पर हिंसा करते हैं और बाद में आपराधिक न्याय प्रणाली की गिरफ्त में आसानी से आ जाते हैं। 
दलितों को स्वयं को राष्ट्रवादी साबित करने के लिए सभी हिन्दुत्ववादी नियमों का पालन व उसके प्रतीकों का सम्मान करना होता है ताकि उन्हें सत्ता और अवसरों के वे चंद टुकड़े मिल सकें, जिन्हें ऊँची जातियां उनकी और फेकेंगी। जहां तक चुनावों का सवाल है दलितों के सामने इसके सिवा कोई विकल्प नहीं है कि वे भाजपा का साथ दें क्योंकि भाजपा उन्हें कुछ हद तक सुरक्षा उपलब्ध करवा सकती है। अगर दलित इन हिन्दुत्ववादियों की अपेक्षा के अनुरूप आचरण नहीं करते तो उनके साथ वही होता है जो ऊना में हुआ। दलितों के साथ हिंसा कर उन्हें दबाने का काम धर्म के स्वनियुक्त ठेकेदारों के समूह करते हैं जिन्हें राज्य का संरक्षण प्राप्त होता है। इस कारण वे बिना किसी डर के खुलेआम हिंसा करते रहते हैं। 
सन 2000 की षुरूआत में गुजरात की विभिन्न अदालतों में अनुसूचित जाति, जनजाति अधिनियम के तहत 13,293 प्रकरण लंबित थे। साल के अंत तक वे सभी प्रकरण लंबित बने हुए थे अर्थात एक भी प्रकरण में निर्णय नहीं हुआ था। इस साल अप्रैल तक प्रदेष में दलितों पर अत्याचार के 409 मामले दर्ज किए गए। राज्य अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार, गुजरात में सन 2001 से लेकर अब तक दलितों पर हमले के 14,500 मामले दर्ज किए गए अर्थात औसतन 1,000 प्रति वर्ष या तीन प्रतिदिन। दलित अधिकार कार्यकर्ता कहते हैं कि दलितों पर अत्याचार करने वाले इसलिए बेखौफ रहते हैं क्योंकि इस तरह के प्रकरणों में दोषसिद्धि की दर मात्र तीन से पांच प्रतिषत के बीच है। 
क्या राज्य तंत्र द्वारा दलितों पर अत्याचारों को रोकने और दोषियों को सज़ा दिलवाने की ज़िम्मेदारी पूरी न करना स्वीकार्य हो सकता है? दलित समुदाय की बेहतरी और उसकी सुरक्षा की ओर जानबूझकर ध्यान नहीं दिया जाना हिन्दुत्व के असली चरित्र को दर्षाता है और भाजपा के इरादों का पर्दाफाष करता है। हिन्दुत्ववादी, दलितों का अपनी घृणा की राजनीति  में इस्तेमाल तो करना चाहते हैं परंतु उन्हें बराबरी का दर्जा देना नहीं चाहते। दलितों को अपने निचले दर्जे को चुपचाप स्वीकार करना होगा ताकि स्थापित सामाजिक पदक्रम को कोई खतरा न हो। दलितों के साथ यदि भेदभाव होता है और उनके साथ हिंसा की जाती है तो इसके लिए जातिप्रथा ज़िम्मेदार नहीं है। यह तो एक ‘सामाजिक बुराई’ है। 
भारत को आज एक षक्तिषाली दलित आंदोलन की आवष्यकता है। यह सही है कि धर्म के स्वनियुक्त ठेकेदारों के समूह और सरकार व षासक दल का रवैया दलितों के सषक्तिकरण की राह में बड़ी बाधा है परंतु नागरिक समाज संगठनों को आगे बढ़कर दलितों को एक करना होगा और उन्हें उनके अधिकारों के लिए लड़ना सिखाना होगा। अछूत प्रथा के खिलाफ लगातार अभियान चलाए जाने की ज़रूरत है और विकास का एक नया माॅडल बनाने की भी।
-नेहा दाभाड़े

बुधवार, 3 अगस्त 2016

Chie Ministers of Haryana

1966-67: कांग्रेस (भगवत दयाल शर्मा बतौर मुख्यमंत्री) 1967: विशाल हरियाणा पार्टी (राव बीरेंद्र सिंह) 1968-1975: कांग्रेस (बंसी लाल) 1975-77: कांग्रेस (बनारसी दास गुप्ता) 1977-79: जनता पार्टी (देवी लाल) 1979-1985: कांग्रेस (भजन लाल) 1985-1987: कांग्रेस (बंसी लाल) 1987-1991: जनता दल (देवी लाल, ओमप्रकाश चौटाला, बी.डी.गुप्ता और हुकुम सिंह) 1991-1996: कांग्रेस (भजन लाल) 1996-99: हरियाणा विकास पार्टी + भाजपा (बंसी लाल) 1999-2005: इंडियन नेशनल लोकदल (ओमप्रकाश चौटाला) 2005-2014: कांग्रेस (भूपिंदर सिंह हुड्डा)

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