रविवार, 1 अप्रैल 2018

उपराष्ट्रवाद की दस्तकें

रविवार, 1 अप्रैल 2018

उपराष्ट्रवाद की दस्तकें

 गुजरात में भारतीय जनता पार्टी के  छठी  दफे सत्ता में आने का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के परोक्ष  ‘उपराष्टवाद’ को  भी जाता है। पाँच बार मुख्यमंत्री और अब प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने इसे जमकर भुनाया या सूबाई स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक ‘गुजरात अस्मिता’, ‘विकास का गुजरात मॉडल‘ जैसे नारों को प्रचंड आवाज में गुंजित कर वृहद्स्तरीय राष्ट्रवाद या अखिल भारतीय राष्ट्रवाद (Pan Indian Nationalism) पर स्थापित कर दिया। भारतीय राष्ट्र राज्य की सत्ता कमान को अपनी मुट्ठियों में भींच लिया। गुजरात विधानसभा चुनावों के अंतिम चरण में उन्होंने बड़ी सफाई के साथ कांग्रेसी नेता मणिशंकर अय्यर के शब्द “नीच आदमी” को ‘गुजरात का अपमान‘ या ‘गुजरात के बेटे‘ का अपमान के साथ जोड़ दिया। यहीं से हवा बदल गई और  मतदाताओं की उपचेतना में उपराष्ट्रवाद जाग उठा। इसका परिणाम यह निकला कि उपराष्ट्रवाद की बदौलत प्रधानमंत्री मोदी अपनी पार्टी को फिर से सत्ता दिलाने में सफल रहे। बेशक, दूसरे भी कारण रहे हैं, लेकिन, उपराष्ट्रवाद का अलख न जगाया होता तो भाजपा आज सत्तासीन नहीं होती।
    प्रधानमंत्री मोदी इसके सूत्रधार रहे हैं, यह निष्कर्ष गलत होगा। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम, अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डी.एम.के. या ए.डी.एम.के.), तेलगु देसम (टी.डी.पी.), शिव सेना, असम गण संग्राम परिषद्, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी), अकाली दल, गोमान्तक जैसी कई क्षेत्रीय पार्टियाँ हैं जोकि विभिन्न रूपों में उप राष्ट्रवाद का प्रतिनिधित्व करती आ रही है। मोदीजी ने इस उप राष्ट्रवाद को कॉर्पोरेट पूँजी और हाई टेक के पंख जरूर लगाए हैं।
    वास्तव में, कांग्रेस युग से ही उपराष्ट्रवाद की धारा बहती चली आ रही है। कभी यह सुप्त रहती है, कभी उग्र व आक्रमक हो जाती है लेकिन राष्ट्रवाद की मुख्यधारा में इसकी अन्तर्धारा  निहित जरूर रहती है। आजादी के बाद से इसने भाषा के चोले में नव उभरते भारतीय राष्ट्रवाद पर अपने हमले शुरू कर दिए, भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन हुआ, नए राज्य (दक्षिण के राज्य, पश्चिम के राज्य, उत्तर-पूर्व राज्य, हरियाणा, हिमाचल, पंजाब) अस्तित्व में आए। भाषा का ही एक मात्र सवाल नहीं था, सम्बंधित सूबों के आर्थिक पिछड़ेपन, सांस्कृतिक भिन्नताएँ और अस्मिताएँ भी इन हमलों में शामिल थे। इसके अलावा, इन क्षेत्रों के अपने-अपने सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक गौरव भी थे। स्वतंत्रता आन्दोलन में इनकी विशेष भूमिकाएँ भी रही हैं। चूँकि अंग्रेजों की ओपनिवेशिक दासता देश का प्रमुख अंतर्विरोध थी इसलिए उप राष्ट्रवाद के आक्रमण दबे रहे। जब स्वतंत्र भारत में प्रमुख अन्तर्विरोध पृष्ठभूमि में चला गया, तब विभिन्न सूरतों में उप राष्ट्रवाद के हमले उभरने लगे। वैसे भारत में कई राष्ट्रीयताएँ मानी जाती हैं। लेकिन, हिन्दुत्ववादी विचारधारा के समर्थक इसे स्वीकार नहीं करते हैं। वे भारत को एक ही सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की माला में पिरोने के प्रबल पक्षधर रहे हैं। ऐसे लोगों के मत में कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक ही ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ है जो अनादि काल से चला आ रहा है। वह अक्षय है। धर्म-संस्कृति इसके आधारभूत वाहक हैं। जाहिर है, धर्म-संस्कृति के जितने भी प्रतीक, लक्षण, साहित्य, जीवन शैलियाँ, मिथक, पूजा-अर्चना पद्धतियाँ, देवी-देवता, चिंतनधाराएँ आदि हैं भौगोलिक फासलों के बावजूद, उनमें अन्तर्निहित साम्यताएँ एक विराट सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की जनक हैं। आस्था और भावना, इसकी  प्राणवायु हैं।
    1947 के बाद नए अंतर्विरोधों की दस्तकें सुनाई देने लगीं, और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर  यथार्थवादी उप राष्ट्रवाद के हमले होने लगे। क्षेत्रीय विषमताएँ, आर्थिक असंतुलन, निर्धनता-बेरोजगारी, राजनैतिक महत्वाकांक्षाएँ, राष्ट्रीय पूँजी में उभरती क्षेत्रीय पूँजी की स्थिति जैसे सवाल अंतर्विरोध के रूप में उभरने लगे। नेहरू-काल में ही द्रविड़ आन्दोलन तेजी से उभर रहा था। क्षेत्रीय भाषा तमिल ने हिंदी, जोकि अखिल भारतीय राष्ट्रवाद का आरोपित प्रतिनिधि मानी जा रही थी, को  जबर्दस्त सांस्कृतिक-राजनैतिक चुनौती दी। नतीजतन, अन्नादुराई के नेतृत्व में 1967 में पहली  डीएमके सरकार अस्तित्व में आई। तब से लेकर आज तक कांग्रेस सहित कोई भी राष्ट्रीय स्तर की पार्टियाँ डीएमके व एडीएमके को अपदस्थ नहीं कर सकी हैं। दूसरे शब्दों में, वृहद्स्तरीय राष्ट्रवाद पर उप राष्ट्रवाद भारी पड़ रहा है। पिछले कुछ समय से हिन्दुत्त्व राष्ट्रवाद या सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की एकलौती प्रतिनिधि काफी हाथ-पैर जरूर मार रही है। दोनों दलों के नेताओं को घेरने की कोशिश कर रही है लेकिन हाथ मलना पड़ रहा है। तमिलनाडु में उप राष्ट्रवाद की धारा व्यापक व सुदृढ़ है। इसकी अपनी एक अलग पहचान-अस्मिता है। कभी हाशिए पर रही जातियों ने इसे अपनी नव अर्जित क्षेत्रीय पूँजी-सत्ता से लैस कर दिया है। इसमें नई ‘मिलीटेंसी पैदा कर दी है। आठवें दशक के आरम्भ में तेलगु देसम के झंडे तले आंध्रा का उप राष्ट्रवाद उभरा दूसरी बार। राजनैतिक दृष्टि से यह दूसरी बार काफी आक्रमक था। इससे पहले भाषा को लेकर था। लेकिन तेलुगू फिल्मों के महानायक से राजनीति में आए एन.टी.रामाराव ने नए ढंग से तेलुगू देसम के उप राष्ट्रवाद को जाग्रत किया और 1983 में कांग्रेस को सत्ता से अपदस्थ किया। उनकी चुनाव प्रचार शैली को इस लेखक ने कवर किया था। वे प्रायः प्रत्येक सभा में तेलुगू आंध्रा के अतीत गौरव को जमकर उछाला करते थे। सिनेमा हाल में उनके द्वारा अभिनीत पौराणिक फिल्में दिखाई जाती थीं। इसका जबरदस्त फायदा उनके दल को हुआ और आज तक हो रहा है। जिस प्रकार आज प्रधानमंत्री मोदी स्वयं को गुजरात पुत्र या गुजरात का पर्याय चित्रित करते हैं, उसी तर्ज में एन.टी.आर. पहले ही कर चुके हैं। उन्हें तेलुगू बिट्टा पुकारा जाने लगा था। बाद में प्रधानमंत्री बनने के बाद नरसिंह राव को भी इसी उपाधि से नवाजा गया।
    ब्राहमणवादी सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ द्रविड़ नेताओं का सामाजिक सुधार का आन्दोलन सबसे दीर्घकालीन रहा है। द्रविड़ राजनैतिक दृष्टि से इसने मुख्यधारा की राजनीति को अपनी तमिल सरहद पर रोके रखा है। तमिल उपराष्ट्रवाद के आधार पर ही करुणानिधि, एम.जी. आर., जयललिता जैसे नेता सत्ता की राजनीति कर सके। आज के सन्दर्भों में करुणानिधि की संतान और जयललिता के उत्तराधिकारी भी उसी विरासत को थामे हुए हैं, लेकिन दक्षिण राज्यों में केरल जरूर आज तक अपवाद बना हुआ है। कोई एक दल, नेता या धर्म मलयाली उप राष्ट्रवाद की भावना को राजनैतिक स्तर पर भुना नहीं सका। याद रहे, इसी प्रदेश में देश की पहली साम्यवादी सरकार सत्ता में आई थी। ई.एम.एस.नम्बूदरीपाद के नेतृत्व में चुनावों के माध्यम से साम्यवादियों ने सरकार बनाई थी, जिसे दो वर्ष बाद केंद्र की नेहरू-सरकार ने गिरा दिया था। बावजूद इसके, केरल का उप राष्ट्रवाद नहीं जगा। आज भी नहीं। मुख्यधारा के राष्ट्रवाद की राजनीति का वर्चस्व प्रदेश की स्थानीयता पर हावी है। हालाँकि, भाजपा और संघ परिवार धर्म के माध्यम से इस पर हावी होने के प्रयास जरूर कर रहे हैं, लेकिन, सफलता काफी दूर है उनसे। हरियाणा में भी जाटवाद की आक्रमक उपस्थिति इस अन्तर्विरोध का प्रतिनिधित्व करती है। सर छोटूराम, चौधरी बंसीलाल, देवीलाल, ओम प्रकाश चौटाला, चरण सिंह (पश्चिमी उ त्तर प्रदेश) जैसे नेताओं ने जाटवाद की भावना को जाग्रत करने की कोशिश की। सफल भी हुए, हरियाणा-पश्चिमी उत्तर प्रदेश को ‘जाटलैंड‘ से परिभाषित किया गया। एक प्रकार से जाटवाद के आवरण में यह भी एक प्रकार से उप राष्ट्रवाद है। यदि यह नहीं हुआ होता तो पंजाब से अलग नहीं होता। पंजाब की बात करें, आजादी के पहले से ही अकाली एक स्वतन्त्र राष्ट्र की माँग करते रहे हैं, मास्टर तारासिंह से लेकर संत जरनैल सिंह (जून 1984) तक खालिस्तान की माँग की जाती रही है। भिंडरावाले के नेतृत्व में वर्षों तक मिलिटेंट खालिस्तान आन्दोलन चला भी है। आज भी विभिन्न नामों से यह आन्दोलन चल रहा है। कनाडा में इसके अच्छे-खासे समर्थक भी हैं। भिंडरावाले सिखों को हिन्दुओं से अलग एक  ‘स्वतंत्र कौम’ कहा करते थे। सारांश में, सिख अस्मिता आज भी अस्तित्वमान है। उत्तर-पूर्व के क्षेत्र में उपराष्ट्रवाद का एक इन्द्रधनुषी परिदृश्य मिलेगा। मेघालय, मणिपुर, मिजोराम, नागालैंड, सिक्किम, अरुणाचल जैसे प्रदेश के लोग स्वयं को मुख्यधारा के राष्ट्रवाद से अलग-थलग मानते हैं उत्तर भारत और उत्तर पूर्व भारत की जीवन शैलियाँ नितांत भिन्न हैं। यदि इन क्षेत्रों में भारतीय सेना की उपस्थिति नहीं रहे तो स्थितियाँ कोई भी रूप ले सकती हैं। आज भी इन क्षेत्रों में भूमिगत आन्दोलन मौजूद हैं। भारतीय सेना के साथ अलगाववादियों की झड़पें होती रहती हैं। असम भी इन घटनाओं से कम प्रभावित नहीं है। उल्फा जैसे भूमिगत संगठन काफी सक्रिय हैं। इसके आलावा बोडो लैंड सहित आदिवासियों के भी कई संगठन हैं जिनमें उप राष्ट्रवाद की जड़ें गहरे तक हैं। नागालैंड और मणिपुर के आदिवासियों के बीच आए दिन हिंसक झड़पें होती रहती हैं। इन घटनाओं की व्याख्या करने की कौन सी कसौटियाँ होनी चाहिए, इस पर चिंतन जरूरी है। नव राष्ट्र व्यापक दायरे के बावजूद इन अंतर्विरोधों को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। देखना यह चाहिए, इनका चरित्र ‘मित्रतापूर्ण‘ है या शत्रुतापूर्ण? मुख्यभूमि द्वारा सर्व स्वीकृत राष्ट्रवाद से अलग हट कर इनका भी कोई अस्तित्व है या नहीं, इस सवाल पर विचार किया जाना चाहिए। यद्यपि, सैन्य बल के आधार पर इन क्षेत्रीय अंतर्विरोधों का शमन समय समय पर किया जाता है, लेकिन इससे इनका अस्तित्व व अस्मिता विलुप्त नहीं हो जाते हैं।
    वास्तव में, एक अखिल राष्ट्रीय स्तर के राष्ट्रवाद में विभिन्न उप राष्ट्रीयताओं की धाराएँ समाहित रहती हैं। कभी कौन सी धारा केंद्र में होती है, कभी कौन सी आ जाती है। किसी भी धारा की स्थिति परिस्थितियों और उसकी राजनैतिक-आर्थिक हैसियत से निर्धारित होती है। आदिवासी समाज की धारा आज तक केंद्र में नहीं आ सकी है। हाशिए पर ही अटकी हुई है। राष्ट्रीय राष्ट्रवाद ने इन धाराओं को अपेक्षित तवज्जोह नहीं दी है। रणनीति के तहत आदिवासी क्षेत्रों को कच्चे माल (खनिज-वन) के अकूत दोहन का खजाना बना रखा है। विधायिका व नौकरियों में आरक्षण के जरिए राष्ट्रीय राष्ट्रवाद उप राष्ट्रवाद के उभरते अंतर्विरोधों को ‘डीफ्यूज‘ करता है, लेकिन उनके नायकों व जीनियस को राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार नहीं करता है। इसे  आंतरिक उपनिवेशवाद भी कहा जा सकता है।    अखिल राष्ट्रीय राष्ट्रवाद यह भूल जाता है कि राष्ट्र और राष्ट्रवाद की प्राम्भिक कसौटियाँ बदलती जा रही हैं। यह सोच कि धर्म, संस्कृति, भाषा जैसे
मध्ययुगीन कारक आधुनिक हाई टेक.राष्ट्र के आधार स्तभ हैं, अपनी प्रासंगिकता खोते जा रहे हैं। समान इस्लामी मजहब होने के बावजूद, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, इराक में विभिन्न उप राष्ट्रीयताएँ (कुर्दिश, बलूच आदि) अपनी आजाद अस्मिता के लिए संघर्ष कर रही हैं। 1971 में पूर्वी पाकिस्तान पश्चिमी पाकिस्तान से अलग होकर स्वतंत्र बांग्लादेश के रूप में एक नया राष्ट्र बना। हालाँकि, दोनों का धर्म इस्लाम था, भाषा जरूर अलग थी। ईरान व इराक, दोनों ही देश शिया बाहुल्य राष्ट्र हैं। फिर भी दोनों राष्ट्रों के बीच मुठभेड़ें होती रही हैं। ऐसा क्यों है?     
  ईसाई देशों में भी उप राष्ट्रवाद की समस्याएँ हैं। कनाडा में फ्रेंच भाषी और अंग्रेजी भाषी क्षेत्रों के बीच आज भी तनाव हैं। दो-तीन वर्ष पहले फ्रेंच भाषी लोअर कनाडा (कूबेक, मोंट्रेल आदि) अंग्रेजी भाषी अप्पर कनाडा (ओंटोरियो, टोरेन्टो, ओट्टावा) से अलग होना चाहता था। इसके साथ-साथ कनाडा के मूल निवासियों की राष्ट्रीयताओं का सवाल अलग से है। पहले उन्हें ‘रेड इंडियन‘ कहा जाता था। अब ‘फर्स्ट नेशन‘ के रूप में इन नेटिवों या सामान्य भाषा में आदिवासियों को मान्यता मिली है, लेकिन इनकी उप राष्ट्रीयताओं की समस्या यथावत है। हाल ही में स्पेन भी इसी समस्या का सामना कर चुका है, केटलोनिआ की अलगाववादी पार्टी मुख्य स्पेन से अलग होना चाहती है। इसी मुद्दे पर मत संग्रह तक हो चुका है। श्रीलंका में सिंहलियों और तमिलों के बीच दशकों तक हिंसक टकराव हुए हैं। एक राष्ट्र के बावजूद जाफना के तमिल भाषी लोग खुद को एक अलग ‘राष्ट्र‘ मानते हैं। सारांश में एक राष्ट्र के निर्माण के लिए अब नए आधारों पर विचार जरूरी है। उप राष्ट्रीयताओं के अपने-अपने ‘आइकॉन‘ होते हैं। जहाँ  तथाकथित मुख्यधारा के नायक-नायिका या आइकॉन को मान्यता दी जाती है, उतनी ही मान्यता के हकदार हाशिए की उप राष्ट्रीयताओं के नायक-नायिका भी हैं। राष्ट्रीय नेतृत्व को इस सच्चाई को समझना होगा वरना दोनों के बीच टकराव बने रहेंगे।
    भारत में सीमान्त जन (दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक) आज भी स्वयं को अखिल भारतीय राष्ट्रवाद (Pan Indian Nationalism) के साथ एकाकार नहीं कर सके हैं। इन वर्गों और राष्ट्रवाद के बीच अलगाव बना हुआ है। इस वर्ष महाराष्ट्र के भीमा कोरेगाँव में 1 जनवरी, 2018 को  पेशवा बाजीराव (ब्राह्मण शासक) पर महार सैनिकों (दलित) की विजय के दो सौ वर्ष पूरे होने पर उत्सव मनाया जा रहा है। गुजरात के बड़गाम से हाल ही में निर्वाचित विधायक व दलितों के उभरते युवा आइकॉन जिग्नेश मेवाड़ी को भी इस उत्सव को संबोधित करने के लिया बुलाया गया। साथ ही बस्तर की आदिवासी आइकॉन सोनी सोरी और जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय के छात्र नेता उमर खालिद को भी निमंत्रित किया गया। उप राष्ट्रीयता का एक नया समीकरण दिखाई दे रहा है। इस उत्सव के संयोजकों के विचार में यह समीकरण राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, भाजपा, शिव सेना, अभिनव भारत, सनातन संस्था और श्री राम सेना जैसे संगठनों के रूप में उभरते  ‘नव पेशवाओं‘ को एक दफे फिर से पराजित करेगा। यह समीकरण अपने प्रोजेक्ट में कितना सफल रहता है, यह तो भविष्य ही तय करेगा, लेकिन फिलहाल इतना साफ  है कि भारतीय समाज के इन वर्गों के लिए अखिल भारतीय राष्ट्रवाद  आज भी ‘पराया‘ है। दोनों के बीच एकरसता अनुपस्थित है। यह आज भी सामाजिक-सास्कृतिक आजादी के लिए संघर्षरत हैं। डॉ. अम्बेडकर राजनैतिक आजादी के साथ साथ सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक आजादी भी चाहते थे। दरअसल, देश के निचले व उपेक्षित वर्गों तक राष्ट्रीय राष्ट्रवाद की धारा सही ढंग से नहीं पहुँच सकी है। विचार व प्रभाव के स्तरों पर इसे सवर्णों का राष्ट्रवाद माना जाता है। क्योंकि जितने भी राष्ट्रीय आइकॉन हैं उनमें लगभग शतप्रतिशत ऊँची जातियों (राजा राममोहन राव, मंगल पांडे, बाल गंगाधर तिलक, गोखले, विवेकानंद, गांधी, नेहरु, सुभाष, टैगोर, चक्रवर्ती राजगोपाला चारी, सुब्रमण्यम भारती, रामप्रसाद बिस्मिल, चन्द्र शेखर आजाद, महर्षि अरविन्द आदि) के व्यक्ति शामिल   हैं। यहाँ पौराणिक साहित्य भी वर्चस्ववादी वर्गों की संस्कृति का ही प्रतिनिधित्व करता है। संघ परवार इसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के आधार के रूप में देखता है। हिन्दुत्ववादी शक्तियों को कैसा राष्ट्रवाद चाहिए, इसका विशद विश्लेषण गुरूजी के रूप में विख्यात एम.एस. गोलवलकर की विवादस्पद पुस्तक “बंच ऑफ थॉट्स“ में दिया गया है। प्रतिरोध की धारा प्रबल होने के कारण आज बाबा साहब को राष्ट्रीय आइकॉन के रूप में जरूर स्वीकार किया जाने लगा है।
    एक यथार्थ यह भी है कि राष्ट्रीय या क्षेत्रीय नेतृत्व अपने अस्तित्व की सुरक्षा के लिए दोनों प्रकार की राष्ट्रीयताओं के निरंकुश दोहन में संकोच नहीं करते हैं। जब भी नेताओं का राजनैतिक अस्तित्व संकटग्रस्त होता है राष्ट्रीय या उप राष्ट्रीयता के साथ खुद को जोड़ देते हैं और घोषणा करने लगते हैं कि उनका अपमान नहीं है वरन उनके क्षेत्र की जनता का अपमान है। मिसाल के लिए, 2015 के बिहार चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने नीतीश कुमार व लालू यादव पर व्यंग्य कसा था। उन्होंने तुरंत ही बिहार की जनता के  ‘डीएनए‘ से प्रधानमंत्री के शब्दों को जोड़ दिया। आनन-फानन में बिहार के लोग अपना ब्लड प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजने लगे। 1983 में रामाराव ने भी यही किया। अपने राजनैतिक अस्तित्व को तेलगू गौरव के साथ जोड़ दिया। मराठा अस्मिता के साथ शरद पवार का राजनैतिक अस्तित्व जुड़ा हुआ है। शिवसेना और महाराष्ट्र नव निर्माण सेना भी यही कर रही है। मुम्बई में उत्तर भारतियों के विरुद्ध आन्दोलन मराठा अस्मिता के
आधार पर चलाया जाता है। 1972-73 में जब ‘दलित पैंथर‘ का आन्दोलन जोऱ पकड़ रहा था तब उसको निस्तेज करने के लिए कांग्रेस ने शिव सेना को खड़ा किया। मराठावाद को हवा दी। आज यह भस्मासुर बन गया है।
    ओड़िसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की कहानी भी इससे भिन्न नहीं है। उनके पिता बीजू पटनायक का भी यही स्थान प्रदेश की राजनीति में रहा है। 1975 की इमरजेंसी में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती गांधी ने भी राष्ट्रीय राष्ट्रवाद के स्तर पर यही कार्य किया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने इंदिरा जी को  “इंडिया इज इंदिरा, इंदिरा इज इंडिया“ घोषित कर दिया। इमरजेंसी के कारण इंदिरा जी काफी विवादास्पद बन चुकी थीं। उनकी छवि तेजी से धूमिल होने लगी थी। उनका राजनैतिक अस्तित्व संकटों से घिरने लगा था। इसलिए उनकी अस्तित्व रक्षा के लिए ऐसे नारे उछालने पड़े। जनता की उपचेतना में यह बात बैठानी पड़ी कि इंदिरा जी का कोई विकल्प नहीं है। उनसे ही भारत है। यदि वे नहीं रहेंगी तो भारत मिट जाएगा। इसलिए मोदी जी ने ऐसा करके कोई अपवाद नहीं किया, बल्कि विगत में आजमाए फार्मूलों को अपनी पूरी आक्रमकता के साथ  नए ढंग से आजमाया है। वे सफल भी रहे। उन्होंने हाइटेक का भरपूर प्रयोग किया है। यह सुविधा उनके पूर्ववर्तियों को उपलब्ध नहीं थी। कॉर्पोरेट पूँजी भी इसे पंख लगा देती है। अम्बानी-अडानी जैसों की भूमिका को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। राजस्थान में वसुंधरा के लोग फिल्म रानी पद्मावती के
विरोध के माध्यम से ‘राजपूताना वाद’ को खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। किसी जमाने में कुम्भाराम  आर्य जाटवाद को जगा चुके थे।
    कर्नाटक में 2018 में चुनाव होने वाले हैं। इस राज्य में ‘लिंगायत‘ और कन्नड़ भाषा प्रमुख मुद्दे के रूप में उभर रहे हैं। कांग्रेस और भाजपा इन मुद्दों को अपने-अपने ढंग से भुना रही हैं। इस राज्य का लिंगायत समुदाय  लिंगयात को हिन्दू धर्म से एक अलग धर्म का दर्जा देने की माँग करता आ कर रहा है। राज्य की जनसंख्या में इस मत के मानने वाले 17 प्रतिशत हैं। दोनों राष्ट्रीय दलों को इस समुदाय के वोट चाहिए। यह समुदाय आर्थिक दृष्टि से भी समृद्ध है। राजनीति व सांस्कृतिक क्षेत्रों में इस समुदाय की खासी पैठ है। इसीलिए लिंगायतों की माँग पर विचार के लिए एक सात सदस्यों का पैनल भी गठित किया गया है। राज्य में एक समुदाय वीरा शैवास का भी यही महत्त्व है। यह समुदाय भी लिंगायत के समान ही आर्थिक-राजनैतिक दृष्टि से शक्तिशाली है। दोनों में वर्चस्व को लेकर तीव्र मतभेद हैं। लेकिन, सार यह है कि भारतीय राष्ट्रवाद के व्यापक दायरे में इनका माकूल समाधान होना शेष है। एक सच यह भी है कि पिछड़ी अर्थव्यवस्थाओं में यह ‘परिघटना‘ अधिक सफल रहती है क्योंकि सामंती संस्कार और अर्द्ध विकसित लोकतांत्रिक चेतना व व्यवहार उग्र रहते हैं। सामान्यतः अंधविश्वास, भक्ति, आस्था और भावुकता जनता को घेरे रहते हैं। मध्य युगीन मिथकों के जरिए नेता स्वयं को जनता की चेतना के सारथी बन बैठते हैं और धर्म़राष्ट्रवाद उप राष्ट्रवाद का घोल उसे पिलाते रहते हैं। निश्चित ही, भारत में जाति व्यवस्था भी इसमें घुली रहती है। सुविधानुसार नेता वर्ग इसका इस्तेमाल करता रहता है। इसी के बल पर ही वह आइकॉन बन बैठता है।
    राष्ट्रवाद के बड़े दायरे में उप राष्ट्रवाद की धाराओं से जहाँ लाभ होता है वहीं इसके प्रतिकूल परिणाम भी सामने आते हैं। उप राष्ट्रवाद के आइकॉन  ‘लाजर देन लाइफ‘ बन बैठते हैं। मुख्यधारा का राष्ट्रवाद लघु-बेबस दिखाई देने लगता है। उस पर अंकुश नहीं लगा पाता। ‘गुजरात मॉडल‘ इसकी ताजा मिसाल है। इस मॉडल को देश की  विविधता-विषमता से बड़ा प्रोजेक्ट किया जा रहा है। इसके सूत्रधार को देशवासियों का ‘मसीहा’ के रूप में पेश किया जा रहा है जबकि विकास का यह मॉडल लगभग पिट चुका है। इसके विपरीत पंचवर्षीय योजनाओं को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में रखा गया था। मोदी जी का यह मॉडल, राज्य स्तरीय नेता की प्रचंड राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा की चरम अभिव्यक्ति है।

-रामशरण जोशी 
लोकसंघर्ष पत्रिका मार्च 2018 विशेषांक में प्रकाशित 

नवंबर क्रांति और वर्तमान

रविवार, 1 अप्रैल 2018

नवंबर क्रांति और वर्तमान

दो साल पहले जब हमारी पुस्तकें ‘समाजवाद की समस्याएँ’ और धर्म, संस्कृति और राजनीति प्रकाशित हुई थीं, हम दिल्ली में नामवर सिंह जी के घर पर उनसे मिलने गए थे और उसी समय उन्हें दोनों किताबें भेंट कीं। किताबों को पाकर नामवर जी उन्हें उलटने-पुलटने लगे, और ‘समाजवाद की समस्याएँ’ को देख कर मुस्कुराते हुए कहा- 

                                  रकीबों ने रपट लिखवाई है जा-जा के थाने में
                                  कि अकबर नाम लेता है खुदा का इस जमाने में

        और इसके साथ ही हम तीनों एक बार ठहाका मार कर हँस दिए थे। बाद में काफी देर तक यही सोचते रह गए कि यह कैसा समय चल रहा है जब जिसे सब समाजवाद समझते-कहते रहे हैं, कुछ भी उसके पक्ष में जाता दिखाई नहीं देता है। एक अजीब सी आँरवेलियन परिस्थिति है जिसमें ऑरवेल के शब्दों में हम सभी समाज में वर्ग-विभाजन के खिलाफ तो हैं लेकिन बहुत कम लोग ही इसे खत्म करने के बारे में गंभीर हैं। ऐसा लगता है मानो हर क्रांतिकारी मत अंदर ही अंदर कुछ इस प्रकार के विश्वास से अपनी ताकत ग्रहण कर रहा है कि कहीं कुछ बदलने वाला नहीं है। क्रांतिकारी परिवर्तन की बातें उनके लिए महज एक रूढ़ि है, कोरा मंत्र-जाप। इस हद तक जाप कि मंत्र के फलीभूत हो जाने पर इस बात का डर लगने लगे कि तब आगे करने को क्या रह जाएगा। क्योंकि दिमाग ने आगे का कोई नक्शा बनाने की शक्ति को ही खो दिया है। सिर्फ राम-राम करते रहे या हनुमान चालीसा का पाठ करते रहें कि सर पर जो बला आ गई है वह किसी प्रकार टल जाए, उधर जन-असंतोष सड़कों पर भी दिखाई देने लगे लेकिन समाजवाद के प्रभाव के बाद भी कोई नई समाजवादी परिकल्पना और उसकी रणनीति का अभाव हमें कोई सकारात्मक सोच का उत्साह नहीं दे पाए।
    इस प्रकार की एक चरम नाउम्मीदी का ही परिणाम है कि नामवर सिंह की तरह शिक्षाजगत की एक घोषित वामपंथी हस्ती और हिंदी के एक श्रेष्ठतम माने गए मार्क्सवादी बुद्धिजीवी को अपने जन्मदिन के अवसर पर ऐन उसी वक्त मोदी सरकार के मंत्री से अभिनंदित होने में जरा भी शर्म नहीं महसूस हुई जब भारी संख्या में लेखकों के द्वारा पुरस्कार वापसी के आंदोलन की आग अभी ठंडी भी नहीं हुई थी। जैसे हाइडेगर को नाजी सत्ता से अपना मेल बैठाने में कोई कठिनाई नहीं महसूस हुई थी क्योंकि अगर पूँजीवादी क्षितिज के बाहर कुछ है ही नहीं तो फिर उसका उदार चेहरा हो या कोई विकट राक्षसी चेहरा, क्या फर्क पड़ता है! नामवर सिंह ने भी सोच लिया कि भोंकने वाले यूं ही भोंकते रहेंगे! सरकार से प्रस्ताव आया है, उसे ठुकरा कर क्या हासिल हो जाएगा। परिवर्तन की बातें खुद में भी एक रूढ़ि ही है!
     जीवन में निराशा की सच्चाई से कोई इंकार नहीं कर सकता। भविष्य को लेकर दुश्चिंताएँ भी बनी रहती हैं। नवंबर क्रांति के पहले जब लेनिन के सामने यह साफ हो गया था कि यह एक कोई वैश्विक क्रांति नहीं होगी, न ही यूरोपीय क्रांति, एक देश में समाजवाद का विचार उन्हें चिंताग्रस्त किए हुए था, तभी उन्होंने ट्राटस्की से एक बार पूछा था कि अगर हमारी क्रांति विफल होती है तो क्या होगा, तो ट्राटस्की ने उनके सामने प्रति-प्रश्न रखा कि अगर वह सफल ही होती है तो क्या हो जाएगा? यह पूरा विमर्श वही है कि क्रांति तो हो गई, आगे क्या? जन-असंतोष पैदा हुआ, उसे एक संगठित दिशा में मोड़ा गया और फिर एक नए राज्य के निर्माण में लग गए, तो फिर राज्यविहीन समाज के निर्माण के लक्ष्य का क्या हुआ? मूल और अंतिम लक्ष्य एक अपेक्षाकृत कल्याणकारी राज्य की स्थापना ही तो नहीं था।
    अभिनवगुप्त के प्रत्यभिज्ञादर्शन में भेद-भेदाभेद-अभेद की जो मानव स्वातन्त्रय की ओर यात्रा का जिक्र आता है उसमें विकल्पों से भरे जीवन में अर्थात भेदों में क्रांति के जरिए निर्विकल्प दिशा, अभेद का प्रवेश होता है लेकिन आगे की दिशा अभेद में अर्थात परम स्वातंस्य में लयीभूत होने की है। समाजवाद को भेदाभेद की एक स्थिति मान लिया जाए तो साम्यवाद उसका निर्विकल्प अभेद है और लेनिन-ट्राटस्की के जेहन में यही चिंता बनी हुई थी कि जब तक क्रांति का स्वरूप वैश्विक नहीं होगा, क्या राज्य-विहीन राजनीति की दिशा में बढ़ना मुमकिन होगा! स्टालिन परवर्ती समय में ‘एक देश में समाजवाद’ को ही मनुष्य की यात्रा का अभेद क्षितिज मान कर पूरी ताकत से उसे ही साकार करने में लग गये थे, और हमने देखा कि द्वितीय विश्वयुद्ध ने कैसे पूरी सोवियत व्यवस्था को एक कठोर नौकरशाही की व्यवस्था के रूप में विकृत कर दिया। राज्य-विहीनता का लक्ष्य और भी दमनकारी राज्य में पर्यवसित हुआ।
    आज के प्रसिद्ध मार्क्सवादी फ्रांसीसी दार्शनिक ऐलेन बदउ का एक नाटक है  एंटियोक की घटना। इसकी पृष्ठभूमि में कहीं न कहीं ईसाई मिशन में लगे सेंट पॉल्स और पीटर के बीच एंटियोक में बाइबल की सार्वलौकिकता को लेकर हुआ संघर्ष भी है। नाटक का विषय यह है कि क्या किसी भी क्रांतिकारी को परंपरागत रूढ़ियों का पालन करते रहना चाहिए? मसलन, देवदूत पीटर को क्या पुराने यहूदी रीति-रिवाजों का पालन जारी रखना चाहिए या मसलन, आज क्रांति-विमुख लोगों को बाजार अर्थ-व्यवस्था और संसदीय जनतंत्र की निर्विकल्पता से ही चिपके रहना चाहिए? अथवा ईसाइयों ने यहूदी-विद्वेष का जो रास्ता अपनाया, या पौल पौट के खमेर रूज ने पुराने काल के समर्थकों के सफाये की जो नीति अपनाई, उस लाइन को अपनाया जाना चाहिए ? इस नाटक के एक अंश में क्रांति का नेता कमिउ क्रांति हो जाने के बाद कहता है कि मेरा काम पूरा हो गया, अब चलता हूँ।
    उसका साथी डेविड कहता है कि आज जब काम करने का समय आया है, तभी तुम मुँह फेर रहे हो। तो कमिउ कहता है “विजय के बाद जो बचता है वह है पराजय। फौरन पराजय नहीं, जो भी वर्तमान के साथ निबाह करके चलेगा उसकी धीरे-धीरे निश्चित पराजय। उस प्रकार की पराजय की शान को मैं तुम्हारे लिए छोड़ता हूँ, किसी अहंकारवश या धीरज की कमी की वजह से नहीं, बल्कि इसलिए क्योंकि मैं उसके लिए उपयुक्त नहीं हूँ।“
    बदउ इसकी व्याख्या करते हुए एक जगह लिखते हैं कि उसने इसलिए नई सत्ता का त्याग किया क्योंकि कुछ लोग सिर्फ विध्वंस से प्यार करते हैं और चूँकि वह देख रहा है कि अब एक नए राज्य के पुनर्निर्माण का काम होगा, उस पुनर्निर्माण में उसे एक प्रकार के दोहराव की ऊब दिखाई देने लगती है, इसीलिए उसकी उसमें कोई दिलचस्पी नहीं रहती है। (Alain Badiou) The Communist Hypothesis Verso 2015 page –15-17)
    यह कुछ वैसा ही है जैसे महाभारत के महा-विध्वंस के अंत में महर्षि व्यास पांडवों को हिमालय की ओर रवाना कर देते हैं। पांडु जो गुरुओं के लिए हिंसक पशुओं का वध करने ऋषि-मुनियों के साथ वन में ही रह गए थे, उनके वंशधर पाँचों पांडवों की अस्मिता भी युद्ध और विध्वंस से ही जुड़ी हुई थी, वे राजर्षि योग के लिए अनुपयुक्त थे। इसीलिए जब युद्ध के अंत में राजगद्दी पर बैठकर एक नए राज्य के निर्माण का समय आता है, भूत, वर्तमान और भविष्य तक की चतुर्वणीय समाज-व्यवस्था की कथा कहने वाले व्यास ने नहीं चाहा कि अपने इन नायकों को फिर से उसी हमेशा के ध्वंस-निर्माण-ध्वंस के वृत्त में शामिल कर दिया जाए। पांडवों के इस संन्यास के जरिए व्यास कौरवों के राज्य के संहारकर्ताओं को किसी नए दमनकारी राज्य के निर्माण के लिए या तो उपयुक्त नहीं पाते जैसे ऊपर बदउ के चरित्र कमउ ने अपने को नहीं पाया था, या वे पांडवों के इस वैराग्य के जरिए किसी ऐसी सामाजिक व्यवस्था की ओर बढ़ने का संदेश देना चाहते हैं जो राज्य-विहीन मानव की स्वातन्स्य सत्ता पर टिकी समाज-व्यवस्था हो। व्यास ने महाभारत के आदि पर्व में ही एक जगह शैवमत के भैरव-भाव के प्रतीक, पाशुपत की चर्चा की हैं, लेकिन उसके साथ वे उसे राजसत्ता के किसी भी रूप को जोड़ने के बजाए न्याय, शिक्षा और स्वास्थ्य की तरह के आत्म-सत्ता के पक्षों से जोड़ कर पेश करते हैं। “न्याय शिक्षा चिकित्सा च दानं पाशुपतं“। इसे मनुष्य के किसी भी राजसत्ता से, हर बंधन से मुक्ति के भाव को राजनीति के धरातल पर राज्य-विहीन साम्यवादी समाज की परिकल्पना का संकेत भी कहा जा सकता है।
    बदउ के उपरोक्त नाटक में क्रांति के बाद की आगे की कहानी भी है। क्रांति का नेता कमिउ तैयार नहीं था पुनर्निर्माण की एक धीमी और निरंतर जारी उबाऊ प्रक्रिया के बीच से आने वाली अनिवार्य विफलता को अपनाने के लिए, लेकिन क्रांति की इस आंतरिक कमजोरी के साथ ही, इस नाटक में उसकी विफलता का आगे एक और, दूसरा आख्यान भी आता है, जब क्रांति के बाद के नए शासक डेविड की माँ पौला उससे कहती है तुम सत्ता छोड़ दो। डेविड माँ से कहता है कि तुम मेरी माँ होकर प्रति-क्रांतिकारी काम क्यों कर रही हो।
    तो पौला उससे कहती है  “प्रति-क्रांति तुम हो। तुमने न्याय के सारे
बोध को गंवा दिया है। तुम्हारी राजनीति कुत्सित है। सुनो! हमारी परिकल्पना सिद्धांततः यह नहीं थी कि हम एक अच्छी सरकार की समस्याओं का समाधान करेंगे। हमने कहा था कि दुनिया एक ऐसी नीति के रास्ते पर चल सकती है जिसे बदला जा सकता है, राजनीति को ही खत्म कर देने वाली नीति। उस परिकल्पना के ऐतिहासिक स्वरूप को राजसत्ता ने निगल लिया है। एक मुक्तिदायी संगठन का राजसत्ता में विलय हो गया है। कोई भी सही नीति यह दावा नहीं कर सकती है कि वह अब तक किए जा चुके कामों की ही निरंतरता है। हमारा उद्देश्य एक बार और हमेशा के लिए उस चेतना को मुक्त कर देने का है जो न्याय, समानता को कायम करती है और राजसत्ता और दरबारों की साजिशों का हमेशा के लिए अंत करती है, और उस बची हुई जमीन का भी सफाया करती है जिससे पैदा होने वाली सत्ता की लिप्सा आदमी ऊर्जा के प्रत्येक रूप को लील लेती है।“
    डेविड माँ से कहता है “दुनिया हमेशा के लिए बदल गई है। विश्वास करो। मेरी प्यारी माँ तुम चीजों को नीचे से देख रही हो। तुम निर्णय लेने वालों में नहीं हो।“ “पौला-यही पुरानी आजमाई हुई चाल है। जरूर तुम कुछ नया करोगे। तुम सूरज को भूरे रंग से रंग दोगे।“
    इसी सिलसिले में बौखला कर डेविड माँ से पूछता है कहो तो, तुम कौन हो? तुम निश्चय ही हमें और शक्तिशाली बनने के लिए नहीं कह रही हो। बल्कि हमें सत्ता को त्याग देने, आने वाले लंबे काल के लिए उसे छोड़ देने के लिए कह रही हो। तो पौला कहती है, “मानव जाति की महानता सत्ता में नहीं है। बिना परों वाले दोपाये का खुद पर नियंत्रण हो, और वह, जो उतना संभव भी नहीं लगता, प्रकृति के सभी नियमों, इतिहास के सभी नियमों के खिलाफ जाए और उस राह पर चले जिसमें हर व्यक्ति प्रत्येक के प्रति समान होगा। सिर्फ कानून में नहीं, भौतिक यथार्थ में भी।“ (जोर हमारा)
    इसपर डेविड कहता है, “ तुम इतनी पागल हो!“
    पौला कहती है “नहीं, मैं नहीं। मैं तुमसे कहूँगी सारे उन्माद को छोड़ो। तुम्हें बहुत धीर-स्थिर हो कर निर्णय करना है। जो भी व्यक्ति मरीचिका के पीछे भागता है, वह यह नहीं समझ सकता है। विजय और समग्रता के प्रति अपने आग्रह को भूल जाओ। वैविध्य के सूत्र को पकड़ कर चलो।“
    “राजनीति का अर्थ एक राजनैतिक भविष्य दृष्टि के आधार पर इकट्ठा होना है ताकि आदमी राजसत्ता की मानसिक जकड़बंदी से मुक्त रह सके।“ (वही, पृष्ठ 15-22) (जोर हमारा)
   Our hypothesis was not in theory that we were going to resolve the problem of good government…We said that the world could stand the trajectory of a policy that could be reversed…Historical realization of that hypothesis was swallowed up by the state- A liberating organisation merged completely into the state…No correct policy can now argue that it is a continuation of the work that has already been done- Our mission is to unseal once and for all the consciousness that organises justice equality the end of states and imperial rackets and the residual platform where the concern for power sucks in every form of energy…Ofcourse you i do something new- You paint the surface of the sun grey…Power is not the mark of the human races greatness- The featherless biped must get a grip on himself and  unlikely as it seems go against all the laws of nature and all the laws of history and follow the path that means that anyone will be equal of everyone…For anyone who gives in to the passion for images it is incomprehensible- Forget about the obsession with conquest and totality- Follow the thread of multiplicity…Politics means uniting around a political vision that escapes the mental hold of the state-
    अभिनव गुप्त का भैरव भाव क्या है? अंतहीन लालसाओं से भरे स्वातन्स्य का वह भाव जो किसी से कोई अपेक्षा नहीं रखता है। यह नाउम्मीदी का साहस है। सुविधा के लिए इसे एक सच्ची सर्वहारा चेतना भी कह सकते हैं। अभिनव अपने तंत्रालोक को परम भोग और परम त्याग का दर्शन कहते हैं। बदउ की कम्युनिस्ट परियोजना में प्रत्येक निर्लोभी और स्वतंत्र मनुष्य की समानता की कामना और विजय और समग्रता के आग्रह को छोड़कर वैविध्य के सूत्र को पकड़ने का जो मंत्र दिया गया है, उसी विभिन्नस्य भावौघस्यापि सङ्गति, वैविध्य के भाव से संगति की बात अभिनव कहते हैं। तंत्रालोक इसी वैविध्य को अपनी चेतना शक्ति में समाहित करने की प्रक्रिया का, तर्क की एक विधि से विकल्पों के संस्कार अर्थात द्वंद्वों का निवारण करते हुए ज्ञान के सोपानों पर चढ़ने और फिर चेतना-शक्ति के स्फुरण की, कहा जा सकता है। मनुष्य की रचना-प्रक्रिया पर समग्र विमर्श की एक महान कृति है। संस्कार की इस प्रक्रिया में द्वंद्व द्वंद्व नहीं रहते, विमर्श बन जाते हैं। यह अपने आपसे एक प्रकार का प्रत्यविमर्श भी होता है। दुविधा एक बंधन, बद्धता है। द्वंद्वों, दुविधाओं से सत्तर्क मुक्त अभेद चेतना शक्ति के प्रहार से भेद की जमीन तोड़कर ही स्फुटता, रचनात्मकता का उदय होता है। जड़ता टूटती है और रचनात्मकता का विस्फोट होता है।
    बदउ के नाटक के उपरोक्त पूरे प्रसंग को हम अपने यहाँ आजादी की लड़ाई के महानायक गांधी पर पूरी तरह से घटित होते देख सकते हैं। लड़ाई के दौर में हमेशा नेतृत्व की कमान थामे रहने वाला, खुद को डिक्टेटर तक कहने वाला वह नायक आजादी के ठीक बाद अपने को नई राजसत्ता के खेल में पूरी तरह से अनुपयुक्त पाता है और उससे विरत हो जाता है। वह गुलामी की जंजीर को तोड़ने आया था, उसे तोड़ दिया। अब आजाद भारत का नया राज्य बनेगा, नई जंजीरें तैयार होंगी, बापू उसमें क्यों शामिल होंगे! वे देख रहे थे जीत के बाद आगे सिर्फ हार खड़ी प्रतीक्षा कर रही है, फौरन नहीं, धीरे-धीरे। इस पराजय को सबको मानना होगा क्योंकि यह निरर्थक पराजय नहीं होगी, एक प्रकार के स्वातंर्त्य से स्फूरित पराजय, जीवन में किंचित शांति लाने और राज्य को मजबूत करने वाली पराजय। गांधी इस पराजय के गौरव को दूसरों के लिए छोड़ने को तैयार थे क्योंकि नाफरमानी के उनके विचार क्यों किसी के भी फरमान को मानने के लिए मजबूर हों! वे आजादी की लड़ाई के उत्साह की समाप्ति के बाद की लोगों की तिरछी नजरों की कल्पना कर पा रहे थे और अपने को उन बुरी नजरों के वृत्त के बाहर रखना ही श्रेयस्कर समझते थे। उन्होंने अपने जीवन को ही अपना संदेश कह कर राजनीति मात्र को उस भविष्य दृष्टि का रूप देने की बात कही जो नैतिक स्वातंर्त्य के बल पर आदमी को राजसत्ता के मानसिक दबावों से मुक्त रहने की ताकत देती है, नाफरमानी की ताकत देती है, जैसा कि बदउ के नाटक में डेविड की माँ पौला उससे कहती है। इसी पूरे प्रसंग, क्रांति और उसके बाद फिर एक नए राज्य के निर्माण के दोहराव की त्रासदी के अतिरिक्त एक तीसरा पहलू भी हो सकता है, जिससे इस पूरे विमर्श का एक और त्रिक बनता है, वह यह कि शुरू में ही जनरोष किसी संगठित शक्ति के अभाव में बदलाव की कोई शक्ल न ले और सिर्फ अराजकता पैदा करके बिखर जाए, जैसा हमने खास तौर पर अफ्रीका और मध्य एशिया के अरब वसंत (2010-2014) के तूफानी घटना क्रम में देखा। यह राजसत्ता-केंद्रित परिवर्तन की पूरी त्रासदी का वह पहलू है जो आदमी के सामयिक क्रोध की तरह भड़कता है लेकिन कोई विवेकपूर्ण रूप नहीं ले पाता है बल्कि और भी पतन की दिशा में बढ़ जाता है कांग्रेस के भ्रष्टाचार के खिलाफ रोष से मोदी की तरह के सांप्रदायिक फासीवादी तुगलक के शासन का उदय भी एक ऐसा ही उदाहरण है। इस पूरे संदर्भ में हमें अपने देश के वास्तविक संदर्भों को और भी गहराई से समझते हुए, ऊपर जिस भेदाभेद की चर्चा है, विकल्पों के साथ ही निर्विकल्प दिशा को समझने की, उसे बहुत ठोस रूप में देखने समझने की जरूरत है। रूस अथवा चीन, कहीं भी समाजवादी क्रांति के समय ही वे परिस्थितियाँ नहीं रही हैं जो आज के भारत की हैं।
    अभी चंद रोज पहले ही 8 नवंबर को हमारे यहाँ नोटबंदी को एक साल पूरा हुआ है। नोटबंदी के दौर में हम अपने देश में एक ऐसे दृश्य के साक्षी हुए थे, जो हम सब, आजादी के बाद की पीढ़ी के लोगों की स्मृतियों में, एक अजीब प्रकार की डर और आश्चर्य मिश्रित अनुभूति पैदा करने वाले दृश्य की तरह शायद हमेशा रह जाएगी। अजीब इसलिए कि ऊपरी तौर पर तो इसमें एक भारी राष्ट्र-व्यापी उथल-पुथल की तरह की आपात स्थिति जैसी भागम भाग की परिस्थिति दिखाई दे रही थी, लेकिन आश्चर्य इसलिए कि जो ऊपर से इतना तनावपूर्ण, मूलगामी और बड़ी चीज दिखाई दे रहा था, अंदर से वह उतना ही अधिक खोखला, निरर्थक और परिहास मूलक पाया गया और अन्ततः अब एक अबूझ सी पहेली बनकर रह गया।
    राज्य सभा में मनमोहन सिंह ने इस पर एक संक्षिप्त टिप्पणी में कहा था कि यह भारत की जनता की आमदनी की एक खुली लूट है और इसके चलते भारत के जीडीपी में कम से कम दो प्रतिशत की गिरावट आएगी। जिस रिजर्व बैंक की अतिरिक्त आमदनी के सपने दिखाए गये थे, उसे उल्टे 30 हजार करोड़ से ज्यादा का नुकसान उठाना पड़ा है। कुल मिलाकर, दुनिया की सबसे तेज गति से विकसित हो रही भारत की अर्थ-व्यवस्था को मोदी ने अपनी सनक में एक बार के लिए पूरी तरह से पटरी से उतार दिया। हाल में ईपीडब्लू में किए गए एक अध्ययन से पता चलता है कि सत्तर साल के आजाद भारत में पहली बार भारत में रोजगारों में वृद्धि के बजाए कमी आई है। नोटबंदी के समय असंगठित क्षेत्र के जो मजदूर काम बंद हो जाने के कारण गाँव लौट गए थे, उनमें से एक अच्छा-खासा हिस्सा इतना हताश हो गया है कि वापस काम की तलाश में वह शहर में लौटा ही नहीं है। पहले हम जहाँ भारत की युवा आबादी पर गर्व करते हुए कहते थे कि यह श्रम शक्ति सारी दुनिया में भारत को एक पहली पंक्ति के देश में बदल देगी, वहीं भारत आज दुनिया में काम न चाहने वाले समर्थ लोगों की सबसे बड़ी आबादी का देश बन गया है। यहाँ की श्रम शक्ति का लगभग 54 प्रतिशत हिस्सा हताशावश अपने को श्रम के बाजार से ही अलग कर चुका है!
    जब आदमी में आमदनी के प्रति ही विरक्ति का भाव बढ़ता है तो स्वाभाविक रूप से उसका पूरी अर्थ-व्यवस्था पर मंदी के रूप में कितना नकारात्मक असर पड़ता है, आज भारतीय अर्थ-व्यवस्था उसी मंदी में फँस चुकी है। अर्थशास्त्री हमेशा कहते हैं कि मंदी का एक प्रमुख कारण आम उपभोक्ता के मनोविज्ञान से जुड़ा होता है। खुश और निश्चिंत आदमी अपनी क्षमता से भी ज्यादा खर्च करने से नहीं घबड़ाता, जबकि परेशान और आमदनी के बारे में अनिश्चयता का शिकार आदमी अपनी न्यूनतम जरूरतों में भी कटौती करके विपत्ति के समय के लिए धन जुटाने में लगा रहता है। आज आम लोगों की यही मनोदशा है। सब थोड़े में गुजर करने की पूर्वजों की शिक्षा पर अमल कर रहे हैं और हम देख रहे हैं कि भारत का आंतरिक बाजार सिकुड़ता जा रहा है।
    बहरहाल, ये तमाम ऐसी बातें हैं, जिन्हें हम सभी अपने निजी अनुभवों से और देश-दुनिया की जानकारी के आधार पर भी जानते-समझते हैं। इसके खिलाफ आज देश के हर कोने से आवाजें उठ रही हैं और मीडिया आदि के जरिए वर्तमान सरकार अपने सीने को कितना भी अधिक चौड़ा दिखाने की कोशिश क्यों न करे, क्रमशः आज स्थिति यह है कि अपने सबसे मजबूत गढ़ में भी मोदी के लिए अपनी जीत को कायम रखना एक भारी चुनौती का रूप ले चुका है, अन्य जगहों की बात तो जाने ही दीजिए।
    इसी बीच हड़बड़ी और राजनैतिक संकीर्ण स्वार्थों के लिए ही पुनः जीएसटी के कदम ने जले पर नमक छिड़कने का काम किया है। यह एक और प्रसंग है, जिस पर फिर अलग से चर्चा हो सकती है। 30 जून की रात बारह बजे संसद के संयुक्त सदन के जरिए जिस नाटकीय अंदाज में इसे लागू किया गया, उसकी यह कितनी बड़ी ट्रैजेडी है कि आज वही प्रधानमंत्री गुजरात के लोगों से यह कहते हुए क्षमा माँग रहा है कि जीएसटी के लिए अकेले उन्हें अपराधी के कठघरे में खड़ा न किया जाए! इसके पीछे मूलतः कांग्रेस का हाथ रहा है!
    जो भी हो, इस भयानक अनुभव के साल भर बाद, बुद्धजीवी कहलाने के नाते हमारे सामने कुछ और सवाल भी हैं। आम जीवन के इन अपने प्रकार के बेहद डरावने अनुभवों से गुजरने के बाद भी क्या हम बुद्धिजीवी के नाते, इस भयानक सचाई के अन्तरनिहित तात्विक सच को पकड़ पा रहे हैं? क्या हम अपने आज के समय के पूरे संदर्भ में इसकी सही व्याख्या कर पा रहे हैं ताकि हम इस प्रकार के स्वेच्छाचारी कदमों के अंदर की उन दरारों पर रोशनी डाल सकें जिनसे हम न सिर्फ अपनी जनतांत्रिक व्यवस्था के नैतिक, न्यायिक और राजनैतिक
आधार की तात्विक कमजोरी को पहचान पाएँ, बल्कि हमारे यहाँ फासीवाद के विरोध के विमर्ष की जो अब तक अपनी कमजोरियाँ सामने आती रही हैं, उन्हें भी एक हद तक देख पाएँ। फासीवाद क्या है, मोदी और आरएसएस फासीवादी हैं, या नहीं इस प्रकार के सवाल आज भी खास तौर पर वामपंथ के दायरे में गाहे-बगाहे उठते रहते हैं। आम तौर पर वामपंथियों के बीच फासीवाद के बारे में, चालीस के जमाने से ही यह एक शास्त्रीय परिभाषा प्रचलित है कि यह वित्तीय पूँजी के सबसे निकृष्ट रूप की एक अभिव्यक्ति है। अर्थात, पूँजीवाद तो हमारे यहाँ एक मान्य सत्य है ही, जब हम फासीवाद के खिलाफ लड़ाई की बात करते हैं तब हम सिर्फ उस क्षण को टालने के लिए लड़ रहे होते हैं जब यह पूँजीवाद अपने सबसे निकृष्ट रूप में सामने आता है और यही वह समझ है जो खास तौर पर बुद्धिजीवियों के एक अच्छे-खासे हिस्से के सोच में एक ऐसा गतिरोध पैदा कर देती है कि उसे इस पूरी लड़ाई के महत्व के सार पर ही संदेह होने लगता है और उल्टे वह फासीवादी सत्ता के साथ ही सुलह करके रहने में कोई बुराई महसूस नहीं करता है। हिटलर के जमाने में जर्मनी के सबसे बड़े दार्शनिक हाइडेगर ने नाजीवाद के बारे में अपनी तात्विक समझ की इसी बिना पर हिटलर के साथ निबाह करके चलने के अपने रास्ते की पैरवी की थी। जब कोई इस प्रकार की उलझन में फंस जाता है तब उसके सामने आगे चलने का कोई निर्विकल्प रास्ता शेष नहीं रह जाता है, सब कुछ गड्ड-मड्ड दिखाई देने लगता है। खास तौर पर वामपंथियों के एक अच्छे खासे तबके में इससे ऐसी भारी उलझने पैदा होने लगती हैं जिसके कारण फासीवाद के खिलाफ व्यापकतम एकता के साथ समझौताहीन संघर्ष के लिए जरूरी रणनीति से वह इन नाना तात्विक उलझनों के चलते कई प्रकार से समझौते करने लगता है। वह जनतांत्रिक ताकतों की वर्गीय पहचान के नाम पर उन सबकी एकजुट लड़ाई के प्रति संशयग्रस्त हो जाता है।
    कहना न होगा, वामपंथी खेमे की इन उलझनों के मूल में पूँजीवादी जनतंत्र, जिसमें मानव अधिकारों की कद्र की जाती है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मान किया जाता है, कानून का शासन होता है जिसके सामने सब समान होते हैं, और फासीवाद, जिसमें मानव अधिकारों का कोई मूल्य नहीं होता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोट दिया जाता है, कानून के शासन के बजाए एक तानाशाह के हुक्म चला करते हैं इन दोनों को एक पूँजीवाद के ही दो रूप मान लेने की मूलभूत रूप से एक गलत विचारधारात्मक समझ काम कर रही होती है।
    यहाँ हमारे विचार की प्रस्तावना का मूल विषय यही है कि जब तक हम पूँजीवाद, फासीवाद और समाजवाद इन तीनों को एक दूसरे से पूरी तरह से भिन्न, अलग-अलग स्वायत्त समाज-व्यवस्थाओं के रूप में नहीं देखेंगे, हम कभी भी फासीवाद के खिलाफ संघर्ष की सही दिशा में सोच-विचार नहीं कर पाएँगे।
    मार्क्स ने कहा था कि उत्पादन का स्वरूप ही किसी भी समाज में आदमी के जीवन का स्वरूप होता है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी बताया था कि उत्पादन के साधनों की मिल्कियत अर्थात उत्पादन-संबंध किसी भी समाज के सामाजिक संबंधों, सामाजिक-व्यवस्था को व्यक्त करते हैं। जब हम उत्पादन के स्वरूप के आधार पर ही समाज व्यवस्थाओं पर राय देने लगते हैं तब हम वही भूल करने के लिए मजबूर हो जाएँगे जो भूल हर्बर्ट मारक्यूस से लेकर फ्रैंकफर्ट स्कूल कहे जाने वाले दार्शनिकों ने साठ के दशक में पूँजीवाद और समाजवाद, दोनों को एक ही आधुनिक तकनीक के औद्योगिक युग की समाज-व्यवस्था मान कर, दोनों को समान बता देने की भूल की थी। उन्होंने उत्पादन के साधनों के सामाजीकरण के उस सच की अवहेलना की थी जो समाजवाद को पूँजीवाद से मूलभूत रूप में अलग करता है।
    यही बात फासीवाद के बारे में भी समान रूप से लागू होती है। थोड़ी सी गहराई में जाने से ही हम देख पाएँगे कि फासीवाद उत्पादन संबंधों के उस रूप पर टिका हुआ है जिसमें उत्पादन के साधनों की निजी मिल्कियत के बावजूद उनका तानाशाही शासन की कमांड व्यवस्था से संचालन किया जाता है । हिटलर ने ट्रेडयूनियन आंदोलन को कुचल कर पूँजीपतियों को मजदूरों की सौदेबाजी के दबाव से मुक्त कर दिया, लेकिन इसके साथ ही खुद पूँजीपतियों के लिए भी यह तय कर दिया कि जर्मनी के कारखानों में किस चीज का कितना उत्पादन किया जाएगा, किस प्रकार वे विश्व विजय की हिटलर की योजना की सेवा में लगे रहेंगे। अर्थात, उद्योग चलेंगे पूरी तरह से हिटलर के फरमानों के अनुसार। जैसे भारत में मोदी ने पूरी अर्थ-व्यवस्था को अपनी निजी मुट्ठी में कस लेने के लिए नोटबंदी की तरह का सामान्य रूप से निंदित कदम उठाने में जरा सी भी हिचक का परिचय नहीं दिया। अर्थ-व्यवस्था के सामान्य मान्य नियमों को ताक पर रख कर उसे एक तानाशाह की सनक के अधीन कर देने की यही लाक्षणिकता मोदी और आरएसएस के फासीवादी चरित्र का एक सबसे बड़ा सबूत पेश करती है। हिटलर ने अपने काल में उन सभी उद्योगपतियों को जेल की सलाखों के पीछे पहुँचा दिया था जिन्होंने हिटलर के उदय में उसकी सबसे ज्यादा आर्थिक सहायता की थी। इसकी तुलना में सामान्य पूँजीवादी जनतंत्र मूलतः उत्पादन के साधनों की निजी मिल्कियत पर टिका होने पर भी वह किसी कमांड व्यवस्था के जरिए नहीं, बल्कि मूलतः बाजार के नियमों से संचालित होता है, जिसमें पूँजी के मूलभूत अधिकार को स्वीकृति के साथ ही सामान्य उपभोक्ता समाज की एक सक्रिय भागीदारी भी हुआ करती है। उपभोक्ता के हितों की रक्षा भी राज्य का एक प्रमुख दायित्व होता है। नागरिक के अधिकार, मानव अधिकार, कानून का शासन की संगति में ही पूँजीपति और उपभोक्ता के अधिकार भी अपनी न्यायोचितता को प्रमाणित करते हैं।
    इस प्रकार, आधुनिक तकनीक के औद्योगिक युग के एक ही क्षितिज में उभर कर आने वाली इन तीन अलग-अलग समाज-व्यवस्थाओं, पूँजीवादी जनतंत्र, फासीवाद और समाजवाद को हम तात्विक रूप में बिल्कुल तीन अलग-अलग जगहों पर रखकर स्वतंत्र रूप में समझ सकते हैं और इन तीनों व्यवस्थाओं के तहत सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक मान-मूल्यों को भी अलग-अलग करके देखा जा सकता है। यही वह संदर्भ है जिससे पता चलता है कि जहाँ से पूँजीवादी जनतंत्र का संकट यदि फासीवाद के आगमन का कारण बन सकता है, वहीं से समाजवाद के द्वार भी खोल सकता है। मूल प्रश्न मनुष्य द्वारा पहले से उपार्जित शक्तियों और अधिकारों की रक्षा से जुड़ा होता है। यह समय और स्थान के एक वृत्त से मुक्त होकर बिल्कुल दूसरे वृत्त में प्रवेश की तरह है।     जहाँ तक नवंबर क्रांति का सवाल है, दुनिया के इतिहास में यह अपने प्रकार का मार्क्सवाद का प्रथम प्रयोग था। पेरिस कम्यून तो सिर्फ ऐसी किसी संभावना की एक झलक भर थी। आगे ऐसे न जाने कितने और प्रयोग, कितने स्तरों पर कितने रूपों में जारी रहेंगे, इसकी कोई पूरी कल्पना नहीं कर सकता है। लेकिन यह सच है कि इस क्रांति के परिणाम आज की पीढ़ी के जीवंत अनुभवों के अंग हैं। इन अनुभवों की महत्ता और इनकी भूमिका से भी कोई इंकार नहीं कर सकता है।
    वैश्विक संदर्भों में देखें तो मानव समाज आज कृत्रिम बुद्धि द्वारा उत्पादन के एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है। सन् 91 के बाद एकधु्रवीय विश्व के पहले चरण में ही रोजगार-विहीन (Jobless) विकास के सारे लक्षणों की पहचान कर ली गई थी। इसके राजनैतिक और सामाजिक प्रतिफल के रूप में एक श्रीहीन (Growthless), वाणी-हीन, (Voiceless) और निर्दयी (Ruthless) परिस्थितियों की बातें भी स्पष्ट थीं। लेकिन अभी रोजगार-विहीनता का नहीं, बल्कि रोजगार-संकुचन का समय आ रहा है। बिल्कुल सही अनुमान किया जा रहा है कि आगामी एक दशक से भी कम समय में भारत में 69 प्रतिशत रोजगार कम हो जाएँगे। कमोबेस कुछ ऐसा ही हाल बाकी दुनिया का भी होगा। भारत में तो इसके प्रत्यक्ष प्रमाण मिल गए हैं जिस पर नोटबंदी के संदर्भ में हम आगे चर्चा कर आए हैं।
    इस समग्र सच्चाई को भाँप कर ही विकसित देशों में आने वाले मानवीय अस्तित्व के संकट की परिस्थितियों से बचने के लिए राज्य की ओर से सभी नागरिकों के लिए एक न्यूनतम आमदनी को हर हाल में सुनिश्चित करने के नाना रूपों पर विचार शुरू हो गया है। हाल में स्विट्जरलैंड में ‘यूनिवर्सल बेसिक इन्कम’ (UBI) की ऐसी स्कीम पर एक जनमत संग्रह हो चुका है और फिनलैंड ने ऐसी एक योजना पर अमल की घोषणा भी कर दी है। इसके समानांतर ही, विचारों के स्तर पर, इस पूर्ण आटोमेशन के काल में पूर्ण आटोमेटेड आनंदमय कम्युनिस्ट समाज (Fully automated luxury communism) की कुछ हवाई किस्म की बातें भी की जा रही हैं। मूल बात यह है कि हवाई हों या ठोस, मनुष्यों द्वारा अर्जित नई उत्पादन शक्तियों के अनुरूप मानव समाज के नए स्वरूपों के निरूपण को कोई रोक नहीं सकता है। इसका प्रभाव मनुष्यों के सामाजिक जीवन पर जितना पड़ेगा, उससे कम चिंतन के स्तर पर तत्व मीमांसा और ज्ञान मीमांसा के स्तर तक नहीं पड़ेगा।
    मार्क्स की शब्दावली में इन्हीं बातों को कहें तो, ‘‘समाज-उसका रूप चाहे जो हो-क्या है? वह मानवों की अन्योन्यक्रिया का फल है। क्या मनुष्य को समाज का जो भी रूप चाहे चुन लेने की स्वतंत्रता प्राप्त है? कदापि नहीं। उत्पादन, वाणिज्य और उपभोग के विकास की कोई खास अवस्था ले लीजिए, तो आपको उसके अनुरूप ही सामाजिक गठन का रूप, परिवार का, सामाजिक श्रेणियों या वर्गों का संगठन भी, या एक शब्द में कहें तो नागरिक समाज भी मिलेगा। किसी खास नागरिक समाज को ले लीजिए तो आपको खास राजनैतिक व्यवस्था भी मिलेगी, जो नागरिक समाज की आधिकारिक अभिव्यक्ति मात्र है।’’
    मार्क्स इसके साथ ही यह भी कहते हैं कि ‘‘मानव अपनी उत्पादन शक्तियों का-जो उसके पूरे इतिहास का आधार है-स्वाधीन विधाता नहीं होता, क्योंकि प्रत्येक उत्पादक शक्ति अर्जित शक्ति होती है, भूतपूर्व कार्यकलाप की उपज होती है।’’
    मार्क्स ने आन्नेनकोव के नाम अपने इसी पत्र में, यह भी लिखा था कि ‘‘मानव का सामाजिक इतिहास उसके व्यक्तिगत विकास के इतिहास के अलावा और कुछ भी नहीं है-भले ही उसको इसकी चेतना हो या न हो।’’ और, ‘‘मनुष्य जो उपार्जित करता है उसे फिर कभी छोड़ता नहीं। पर इसका अर्थ यह नहीं कि वह उस सामाजिक रूप का भी परित्याग नहीं करता जिसमें उसने किन्हीं उत्पादक शक्तियों को प्राप्त किया है। इसके विपरीत, प्राप्त परिणाम से वंचित न होने, और सभ्यता के फलों को न गँवाने के लिए, मनुष्य उस क्षण से ही अपने सारे परंपरागत सामाजिक रूपों को बदलने को बाध्य होता है जब से उसके वाणिज्य के रूप का अर्जित उत्पादक शक्तियों के साथ सामंजस्य नहीं रह जाता।’’
    नवंबर क्रांति के शताब्दी वर्ष पर दुनिया को हिला देने वाली इस दूरगामी प्रभाव की क्रांति का गहराई से अवलोकन स्वयं विषय के इस हद तक संस्कार, शोधन और परिमार्जन की भूमिका अदा करता है कि वह बिल्कुल नए अर्थों में स्फुट होने लगता है। यह कोई भाववाद नहीं, यही भावों का भौतिकवाद है। हम नहीं मानते कि रूस में लेनिन के नेतृत्व में मार्क्सवाद के प्रयोग से जिस सामाजिक क्रांति का निरूपण हुआ उसके अब और नए-नए रूपों और अर्थों के विस्तार की संभावनाएँ तेज हो गई हैं। अर्थात, नवंबर क्रांति के अब कोई अवशेष नहीं बचे हैं। रात गई बात गई या दुनिया बदल गई है, वह समय नहीं रहा और इसीलिए नवंबर क्रांति भी नहीं रही। किसी भी परिकल्पना की विफलता से वह परिकल्पना बुरी साबित नहीं होती है। यदि विफलताओं के बाद भी मुक्ति की, समानता की मनुष्य की परिकल्पना कायम है, उसे त्याग नहीं दिया गया है तो विफलताओं को उस परिकल्पना की सत्यता की प्रामाणिकता के इतिहास के रूप में देखा जाना चाहिए। जो लोग नवंबर क्रांति को किसी उल्का पिंड की तरह स्वर्ग से अवतरित और फिर एक चमक दिखा कर अंतरिक्ष में ही गुम हो जाने के रूपक की तरह देखते हैं, वे ही उसे मनुष्य के सामाजिक विकास के इतिहास से पृथक मान कर उसके पूर्ण विलोप की तरह का विचार व्यक्त कर सकते हैं।
    मूल बात यह है कि हवाई हो या ठोस, मनुष्यों द्वारा अर्जित नई उत्पादन शक्तियों के अनुरूप मानव समाज के नये स्वरूपों के निरूपण को कोई रोक नहीं सकता है। रोजमर्रे की व्यावहारिक राजनीति के लिए यथार्थ हमेशा टुकड़ों में काम आता है लेकिन समाजवाद की तरह की परिकल्पना इस तथ्य का प्रमाण है कि सत्य का अपना काम जारी है, वह रुका नहीं है। फिर भी इन जटिल हालात में समाजवादी व्यवस्थाओं की विफलता से अच्छे और बुरे के बीच चयन की कोई साफ स्थिति नहीं रहती है। हमें अच्छा लगे या बुरा लगे, हमारे सामने जैसे कोई चारा नहीं है और सरकार बड़े आराम से अरबों रूपये की क्षतिपूर्ति देश के सबसे अमीर लोगों को देने के लिए तत्पर रहती है, उनके बैंक के कर्ज माफ करने के लिए रातो-रात नए कानून बन जाते हैं, लेकिन आम आदमी को राहत पहुँचाने वाली क्षति-पूर्तियों के बारे में सोचने में ही कई साल गुजर जाते हैं, और कोई कुछ कर नहीं पाता है ।
    शोषण की ताकतें इस नई परिस्थिति का इस्तेमाल राज्य को अधिक से अधिक दमन-मूलक बनाने के लिए करेंगी। हमारे जैसे देश में बेरोजगारों की बढ़ती हुई फौज को गुंडों-बदमाशों (गोगुंडों) की फौज में बदलने की कोशिश आज भी जारी है और आगे भी जारी रहेगी। इससे दंगाइयों की, अन्ध-राष्ट्रवाद के नशे में चूर आत्म-घाती युद्धबाजों की फौज बनाई जाएगी, लेकिन उतना ही बड़ा सच यह भी है कि यह हिटलर का, औद्योगिक पूँजीवाद के प्रथम चरण का जमाना नहीं है। यह मनुष्यों के आत्म-विखंडन से लेकर समान स्तर पर विखंडित, अकेले मनुष्यों की नई सामाजिकता का जमाना भी है।
    पूँजीवाद के प्रवक्ताओं का काम है कोई वितंडा खड़ा करना, वह नहीं चला तो फिर एक वितंडा खड़ा करना फिर वितंडा खड़ा करना। इसके प्रत्युत्तर में जनता का तर्क है लड़ो, विफल हो, फिर लड़ो, फिर विफल हो जब तक विजय प्राप्त न हो।
            यहीं पर हमारे सामने एक नए और खुले विमर्श का प्रश्न, विचारधारात्मक संघर्ष का प्रश्न  सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है। विवादों के बीच से ही अपने मत के निरूपण की परंपरा सिर्फ मार्क्सवादी विचारकों की परंपरा नहीं रही हैं। भारतीय चिंतन में तो शास्त्रार्थों का बहुत ही गौरवशाली इतिहास रहा है। अभिनवगुप्त ने शैवमत में उत्पलदेव के प्रत्यभिज्ञादर्शन की स्थापना के उपक्रम में बौद्ध दर्शन, ब्राह्मणवादी कुलीनता, शंकर के वेदांत और उनसे स्वतंत्र रूप में विकसित हुई वेदांत की तमाम धाराओं, पंचरात्र के वैष्णवपंथ और लगभग 92 शैवागमों की सूक्ष्म से सूक्ष्म स्थापनाओं के खंडन-मंडन के जरिए ही ‘तंत्रालोक’ ‘ध्वन्यालोक’ और ईश्वर प्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी के स्तर की अपनी सर्वकालिक महान कृतियों की रचना की थी। इसके बावजूद, आधुनिक काल में दुनिया के धरातल पर मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन सहित तमाम मार्क्सवादी क्रांतिकारियों और विचारकों ने वाद-विवाद-संवाद की चिंतन की इस शैली को एक ऐसे जीवंत और द्वंद्वात्मक स्वरूप में साधा और विकसित किया जो विचारों के खंडन-मंडन के प्रचलित रूपों से बहुत आगे जाकर, अन्तर-बाह्य दोनों स्तरों पर विचारों के रचनात्मक विकास का, और साथ ही विचारों को एक भौतिक शक्ति में बदलने का बहुत ही कारगर औजार साबित हुआ है। मार्क्सवाद के सामाजिक प्रयोगों की सफलता-विफलता के आरोह-अवरोहों के बीच भी मार्क्सवादी चिंतन की धारा पर कभी भी कोई जड़ता या गतिरोध व्याप गया दिखाई नहीं देता है। कार्ल मार्क्स के बाद के इन दो सौ सालों में कोई भी नया विचारोत्तेजक बौद्धिक विमर्श मार्क्सवाद के दायरे को लांघ कर संभव नहीं हुआ है। इसे ही जॉक दरीदा ने अपनी उत्तर-आधुनिकतावादी विचार-यात्रा में मार्क्स के भूत की सदा-सर्वदा मौजूदगी के रूप में याद किया है।
    यद्यपि विचार और व्यवहार के इस द्वंद्वात्मक उपक्रम में निश्चित तौर पर चीन की जनता के जीवन में एक सांस्कृतिक विरेचन का कारण बनने वाली माओ की ‘सांस्कृतिक क्रांति’ अथवा पूँजीवादी रुझानों से संघर्ष के नाम पर बौद्धिकों मात्र के सफाए की पौल पोट की तरह की कुछ वैसी ही अतियाँ भी सामने आई हैं, जैसी भारत में बौद्धों और ब्राह्मणों के बीच, वैष्णवों और शैवों के बीच खूनी संघर्षों के इतिहास में मिलती हैं। इसके अलावा एक महत्वपूर्ण दूसरा पहलू समाजवाद के पराभव का भी है, जब विश्व क्रांति की निर्विकल्प दिशा के प्रति नाउम्मीदी ने ‘एक देश में समाजवाद’ की तरह के विकल्पों को ही निर्विकल्प मान कर, शैवागमों की भाषा में मल को ही विमल मानकर, अपना लिया गया और बाद में उसके अपरिहार्य पराभव ने एक ऐसे शून्य की सृष्टि कर दी जिसमें झूठी उम्मीदों के सहारे चलने के अलावा जैसे कम्युनिस्ट आंदोलन के पास कोई चारा नहीं दिखाई देता है।  
    बहरहाल, इस प्रकार के किसी भी विचलन या परिणाम के हवाले से वैचारिक टकराहटों की अपनी रचनात्मकता को, उसकी भौतिक भूमिका की चरितार्थता को कभी खारिज नहीं किया जा सकता है। हमारे यहाँ अभिनवगुप्त ने तंत्रालोक में पुष्प, धूप, नैवेद्य, या मंत्र जाप को नहीं, विमर्श की दृढ़ता, विभिन्न भावों के साथ भैरवी संविद (चेतना शक्ति) की संहति की स्थापना को पूजा कहा है।


“पूजा नाम विभिन्नस्य भावौघस्यापि सङ्गतिः
स्वतंत्रविमलानन्तभैरवीयचिदात्मना । (तंत्रालोक, चतुर्थ आह्निकम, 121)
पूजा नाम न पुष्पाद्यैर्या मतिः क्रियते दृढा
निर्विकल्पे महाव्योम्नि सा पूजा ह्यादराल्लयः

    भिन्न-भिन्न रूप रस आदि भाव समूह का देशकाल आदि से अविभाज्य शुद्ध और अनंत भैरवीय संविद् ( स्वतंत्र चेतना शक्ति) रूप से जो संगति, एकाकारता होती है, वही पूजा मानी जाती है। पुष्प आदि से पूजा नहीं होती, बल्कि निर्विकल्प महाव्योम में जो दृढ़ विश्वास किया जाता है, जो आदर के साथ लय है, वह पूजा है।
    सिर्फ इतना ही नहीं, अभिनव आगे यह भी लिखते हैं कि यह परामर्शरूपिणी चेतना शक्ति ही अपने स्वातंर्त्य के कारण अन्तः और बाह्य (वैचारिक और भौतिक) दोनों स्तरों पर मौजूद रह कर स्फुरण करती है-

“तथाहि संविदेवेयमन्तर्बाह्योभयात्मना
स्वतर्न्त्याद्वर्तमानैव परामर्षस्वरूपिणी । (वही, 122)
    यहाँ जो विमर्श परामर्शरूपिणी है, परामर्शमूलक है, उसे ही हम वैचारिक द्वंद्वात्मकता के रूप में समझ सकते हैं। तभी जो बाहर प्रकाशित होता है, वही अंतर में भी व्यक्त होता है। बाह्य और अन्तर, दोनों स्तरों पर इसके रचनात्मक परिणामों से इसमें कोई बिखराव नहीं आता है। यही इसकी विशिष्टता है। अन्य की अन्य के साथ एकता को यहाँ पूजा बताया गया है। यह परामर्शरूपिणी द्वंद्वमूलक चेतना शक्ति अपने स्वातंर्त्य की वजह से ही अन्तः बाह्य एवं दोनों रूपों में मौजूद रह कर अपनी रचनात्मक भूमिका अदा करती है। भिन्न-भिन्न भाव समूह का चिदात्म्य के साथ, एक सार्वलौकिक सत्य के साथ एकात्म्य। इस प्रकार विमर्श मात्र की अपनी सार्वलौकिक स्वातंर्त्य की विश्वदृष्टि भी है। इसी स्वातंर्त्य से जुड़कर नाउम्मीदी के भी एक अनोखे साहस की सृष्टि होती है, जो वर्तमान की सभी रूढ़ियों की जंजीरों को तोड़ कर नई सामाजिक संरचना का हेतु बन सकता है।
    कहना न होगा, नवंबर क्रांति और उससे निर्मित समाजवादी समाज इन लड़ाइयों के निरूपण की विफलताओं से गूंथी गई इसी शृंखला के लिए  हमेशा एक प्रकाश स्तंभ का काम करेगा, इसमें कोई शक नहीं है।
    मूल बात यह है कि मुक्ति की राजनीति के सामने राजसत्ता का दमन जितना बड़ा शत्रु नहीं है, उससे कहीं बड़ा शत्रु उसमें लालसाओं का अंत हो जाना, कुछ भी नहीं होगा के नकारवाद और उस खोखलेपन से पैदा होने वाली अमानुषिक निष्ठुरता का पैदा होना है, जैसी हमने नामवर सिंह में देखी। ऐसे में, अंत में यही कहेंगे कि विमर्श ही आदमी के अंतर के शून्य को भरने का और मानव-कल्याण के समताकारी व्योम से उसके लय का, संगति बनाए रखने का अकेला साधन है।
    जो रोजमर्रा की व्यावहारिक राजनीति की विफलताएँ हैं, उन्हें हम रणनीति के साथ कार्यनीति की सही संगति न बैठा पाने की ठोस राजनैतिक घटनाओं के विश्लेषण से समझ सकते हैं और राजनैतिक पार्टियाँ इस काम में अपने तई लगी रहती हैं। सीपीआई (एम) के ऐसे कई फैसलों पर हम लगातार लिखते ही रहे हैं। ज्योतिबसु तक ने 1996 के फैसले को एक ऐतिहासिक भूल कहा था। पिछले दिनों ऐसी भूलों की एक पूरी शृंखला को देखते हुए ही हमने यहाँ रणनैतिक लक्ष्य की, एक जनतांत्रिक व्यवस्था में जनता की जनवादी क्रांति की भी नये रूप में समीक्षा करते हुए फासीवादी खतरे के बरक्श उसे फिर से परिभाषित करने की जरूरत की ओर संकेत किया है। व्यावहारिक राजनीति की विफलताओं की कोई सर्वकालिकता नहीं होती है, फिर भी उसका साम्यवाद के साथ शाम्भवयोग से कोई संबंध नहीं है, यह कहना इसलिए गलत है क्योंकि अन्यथा यह चरम नाउम्मीदी और नकारवाद के विस्तार का काम होगा। यह हमें एक जागृत और समानताकामी नागरिक के समसामयिक राजनैतिक दायित्वों से विरत करेगा, और इसके लिए यह जरूरी है कि हमारे लिए उतनी जगह जरूर बची रहे जिसमें हम अपनी यात्रा की विफलताओं के हर पहलू पर खुल कर चर्चा कर सकें और करते रहें। संभवतः ग्राम्शी ने इसे ही समाज में प्रभुत्व की लड़ाई (struggle for hegemony) के रूप में देखा था। विमर्श का स्थान कभी संकुचित न हो या वही अभिनवगुप्त की शब्दावली में चिदात्म्य से, समाजवाद के महाव्योम साम्यवादी यूटोपिया से लय का हेतु हो सकता है।

-अरुण माहेश्वरी 
लोकसंघर्ष पत्रिका मार्च 2018 विशेषांक में प्रकाशित  

भविष्य के लिए खतरा संघ की विचारधारा

रविवार, 1 अप्रैल 2018

भविष्य के लिए खतरा संघ की विचारधारा

मई 2014, भारतीय राजनैतिक इतिहास का अहम वक्त। नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री बनना और दक्षिणपंथी-हिन्दुत्व की राजनीति पर आधारित भारतीय जनता पार्टी का संपूर्ण बहुमत से केंद्र की सरकार में आना। ऐसा राजनैतिक उलटफेर जिसकी उम्मीद तमाम राजनैतिक विश्लेषकों को भी नहीं थी। 2004 में भाजपा नेतृत्व वाले राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार की अप्रत्याशित हार के बाद के वक्त से नितांत विपरीत 2014 में एक नया राजनैतिक माहौल हमारे सामने है। 2004 अगर अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व वाली भाजपा और उसके पैतृक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की हार और देश के अंदर वामपंथी पार्टियों के नए उभार का पल था वहीं ठीक एक दशक बाद 2014, दक्षिणपंथी राजनीति के नए उभार और उस राजनीति के मूल वैचारिक विरोधी साम्यवादी वामपंथी धर्मनिरपेक्ष दलों की जबरदस्त हार का गवाह बना। 2004 में 138 सीटों पर सिमट गई भारतीय जनता पार्टी आज 31 प्रतिशत मत के सहारे लोकसभा की 282 सीटों पर काबिज है, वहीं लेफ्ट फ्रंट (भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी सहित अन्य छोटे वामपंथी दलों का
गठबंधन) 2004 के 61 सीटों पर जीत के अपने रिकार्ड से गिरकर महज 12 सीटों पर सिमट गई। 2004 में मिले 8.02 प्रतिशत मतों की तुलना में मत प्रतिशत भी घटकर लगभग आधा हो गया है।
    2014 में अपने संसदीय प्रदर्शन के सबसे निचले स्तर पर पहुँचना, दरअसल 2011 में पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों में मिली हार और उसके पहले 2009 के लोकसभा चुनाव में शुरू हुई पराजय की कड़ी में था। 2009 में वामपंथी दलों का लोकसभा में संयुक्त प्रतिनिधित्व घटकर महज 24 सीटों पर रह गया था। पिछले आम चुनाव से इस वक्त तक वामपंथी पार्टियों को एक बड़ा झटका और लग चुका है। 2016 में कांग्रेस से गठबंधन के बावजूद वामपंथी पार्टियाँ पश्चिम बंगाल की सत्ता पर वापिस काबिज नहीं हो सकीं।
    बीते एक दशक के इसी संसदीय परिदृश्य की बुनियाद पर आज वामपंथ के अस्तित्व पर, उसकी उपयोगिता और भविष्य को लेकर बहस तेज हो गई है। भाजपा और संघ परिवार बात भले कांग्रेस मुक्त भारत बनाने की करते हों, उनका सर्वाधिक जोर वामपंथ को बदनाम करने और वामपंथी पार्टियों के बचे हुए मजबूत राज्यों केरल और त्रिपुरा में सेंध लगाने पर है। केरल की कम्युनिस्ट सरकार के खिलाफ किस तरह का अभियान चल रहा है यह छुपा नहीं है। त्रिपुरा में इसी फरवरी में विधानसभा के चुनाव हैं और कोई शक नहीं कि उत्तर पूर्व के इस छोटे से राज्य से वामपंथी सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए भाजपा-आरएसएस अपनी पूरी ताकत झोंक देंगे। बंगाल में जहाँ कम्युनिस्ट पार्टियाँ मुख्य विपक्षी दल हैं, वहाँ भी भारतीय जनता पार्टी लगातार अपनी जड़ें जमाने की कोशिश में है।
    ऐसे में सवाल यह है कि भारत में वामपंथ की हकीकत क्या है। कोई संदेह नहीं कि वामपंथी दलों की ताकत कम हुई है और उनका जनाधार सिकुड़ा है। तो क्या इससे यह मान लिया जाए कि यह गिरावट अब रुकने वाली नहीं, या फिर बदलाव संभव है। या फिर यह मान लिया जाए कि भारत के आर्थिक-सामाजिक पटल पर वे क्रांतिकारी बदलाव हो गए हैं कि प्रगतिशील, मेहनतकश अवाम की रोजी रोटी, दलित-पिछड़ां, धार्मिक अल्पसंख्यकों और महिलाओं के उत्पीड़न और उनके अधिकारों की बात बेमानी हो गई है और इसलिए इन तमाम वर्गों के लिए संघर्ष करने और यथा संभव उनके जीवन में बदलाव लाने वाली वामपंथी पार्टियों की राजनीति का अब कोई औचित्य नहीं बचा है।
    इन तमाम सवालों का जवाब यह है कि मुक्त बाजार व्यवस्था, बेलगाम पूँजीवाद और अब संकीर्ण हिंदुत्व के बढ़ते खतरे के दौर में वामपंथी विचारों-संघर्षों की और भी ज्यादा जरूरत है। भूमंडलीकरण और वैश्विक पूँजीवाद के 25 साल के बाद हिंदुस्तान के समाज में अमीर-गरीब की खाई और ज्यादा गहरी हो गई है। शाइनिंग इंडिया का सपना बिखर चुका है। देश के महज 1 फीसदी लोग देश की 73 फीसदी सम्पत्ति के मालिक बन बैठे हैं। 2016 में संसाधनों पर कब्जे का यह औसत महज 58 फीसदी था। इक्कीसवीं सदी के मौजूदा भारत में अमीरों की संपत्ति 13 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ी है। एक सामान्य वर्कर की वेतन वृद्धि की तुलना में यह 6 गुना ज्यादा है। आक्सफेम इंडिया की ताजा रपट के मुताबिक भारतीय अरबपतियों की दौलत पिछले एक साल में 4.89 लाख करोड़ रुपए बढ़ गई। यही नहीं प्राकृतिक संसाधनों की अंधाधुध लूट ने देश के तमाम राज्यों में लाखों-लाख लोगों को विस्थापित किया है। इनमें सबसे बड़ी संख्या दलितों, आदिवासियों और दूसरे आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े समुदाय के लोगों की है। कृषि अर्थव्यवस्था चौपट है। किसानों की आत्महत्याओं का सिलसिला जारी है, चाहे वह गुजरात हो या तमिलनाडु या फिर उत्तर प्रदेश। विशेष आर्थिक क्षेत्र की नीति की आड़ में लाखों हेक्टेयर उपजाऊ जमीन कारपोरेट और निजी हाथों में दे दी गई है। अपने वादे के विपरीत केंद्र सरकार युवाओं को रोजगार
उपलब्ध नहीं करा पा रही है। यही नहीं राजनैतिक और सामजिक स्तर पर धार्मिक अल्पसंख्यकों, दलितों-पिछड़ों और महिलाओं के अधिकारों, स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों पर हमले बढ़े हैं। चाहे हैदराबाद की उसमानिया यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या का मामला हो या गुजरात के ऊना में मरी हुई गायों का चमड़ा उतार रहे दलितों की पिटाई की घटना हो या फिर हाल ही में महाराष्ट्र की भीमा कोरेगाँव में जुटे दलितों पर हमले की घटना हो हिंदुओं के नाम पर राजनीति करने वालों की सरकार में ही दलितों-पिछड़ों का उत्पीड़न बढ़ा है। उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद स्थित दादरी में गाय का मीट खाने के तथाकथित आरोप में मो. अखलाक की हत्या, राजस्थान में मुस्लिम व्यक्ति की गौ तस्करी के आरोप में हत्या सहित उत्तर प्रदेश जैसे बड़ी अल्पसंख्यक आबादी वाले राज्य में बूचड़खानों पर प्रतिबंध, गौ रक्षा के नाम पर अभियान के चलते जो आर्थिक मार पड़ी है उसका सबसे बड़ा शिकार मुस्लिम समाज ही हुआ है। देश के अंदर अल्पसंख्यक समुदायों में भय और आशंका का माहौल है।
    आर्थिक स्तर पर मोदी सरकार के नोटबंदी के फैसले और अब खुदरा रिटेल में 100 फीसदी विदेशी निवेश को हरी झंडी दे देने, एअर इंडिया सहित कई अन्य सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के विनिवेश का रास्ता साफ कर देने और बड़े पैमाने पर चुनिंदा निजी उद्योग समूहों को बढ़ावा देने, उन पर सार्वजनिक पब्लिक सेक्टर का बकाया लाखों लाख करोड़ रुपए माफ कर देना भी ऐसे निर्णय हैं जो वर्किग क्लास-नौकरीपेशा वर्ग के हितों के सरासर खिलाफ हैं। आसमान छूती महँगाई, पेट्रोल और डीजल के बेतहाशा बढ़ते दामों ने आम हिंदुस्तानी का जीना मुहाल कर दिया है। जीएसटी और गलत आर्थिक नीतियों के खिलाफ पनप रहे गुस्से की झलक हाल ही में संपन्न हुए गुजरात विधानसभा चुनाव में देखने को मिली। भाजपा चुनाव जीत भले ही गई हो लेकिन उसे जनता के भारी असंतोष का सामना करना पड़ा। जाहिर है इन मौजूदा आर्थिक-सामाजिक-राजनैतिक हालातों से लड़ना है और कोई बेहतर रास्ते का निर्माण करना है तो वह वाम जनवादी राजनीति और विचारों से होकर ही निकलेगा। यानी देश की मौजूदा परिस्थितियाँ एक वैकल्पिक राजनीति को मजबूत करने के लिए सर्वथा उपयुक्त हैं। तो फिर सवाल यह है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास करने वाली देश की कम्युनिस्ट पार्टियाँ आखिर अपनी राजनीति का विस्तार क्यों नहीं कर पा रही हैं। वे बढ़ते जन असंतोष को क्यों एकजुट कर एक व्यापक राजनैतिक विस्तार को अंजाम नहीं दे पा रही हैं।
    परिस्थितियों को अपने पक्ष में तब्दील न कर पाने की इस नाकामी के कारणों के बारे में बहुत लिखा जा चुका है। कम्युनिस्ट पार्टियों से बाहर वाम राजनीति के हमदर्द, उसे चाहने वाले कई बातों का जिक्र करते हैं। मसलन हिंदी पट्टी के राज्यों में पार्टी का विस्तार न हो पाना, आर्थिक आधार पर सर्वहारा की राजनैतिक लामबंदी की कोशिशें लेकिन सर्वहारा के जातिगत समीकरणों का विश्लेषण न कर पाने और उस जातिगत चेतना को आंदोलन में समाहित न कर पाने की विफलता। दोनों बड़ी कम्युनिस्ट पार्टियों सीपीआईएम और सीपीआई का क्रांतिकारी राजनैतिक एजेंडे से विमुख होकर सिर्फ लोकतांत्रिक सत्ता प्राप्ति खासकर व्यापक जनाधार वाले राज्यों मसलन पश्चिम बंगाल, केरल, त्रिपुरा में सत्ता प्राप्ति के एजेंडे तक सीमित हो जाना। आर्थिक सवालों पर एक व्यापक जनांदोलन न खड़ा कर पाना और ट्रेड यूनियनों से लेकर किसान सभाओं तक पकड़ का
धीरे-धीरे कमजोर होना। सिकुड़े जनाधार की एक बड़ी वजह उन तमाम राजनैतिक गठजोड़ों को भी बताया जाता है जो बीते 2 दशकों के दौरान वामपंथी दलों ने बनाए, तैयार किए, कभी भाजपा-कांग्रेस के खिलाफ आर्थिक नीतियों के सवाल पर एक व्यापक तीसरे मोर्चे के रूप में तो कभी भाजपा-आरएसएस के खिलाफ एक विकल्प के तौर पर। नतीजतन ऐसे तमाम राजनैतिक गठबंधन बने जिन्हें एक बड़े वर्ग ने मौका परस्ती माना या फिर वामपंथी दलों के वैचारिक पैनापन और सिद्धांतों की कमजोरी के रूप में देखा। उत्तर प्रदेश-बिहार जैसे हिंदी पट्टी और मंडल-कमंडल की राजनीति के गढ़ बने राज्यों में जो कम्युनिस्ट पार्टियाँ 80 के दशक तक एक व्यापक सामाजिक और संसदीय आधार रखती थीं वे जातिगत राजनैतिक उभार को शायद सही ढंग से समझ नहीं पाईं और नव उभार वाले जाति आधारित राजनैतिक दलों मसलन जनता दल, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी की तरफ तेजी से खिसके अपने ग्रास रूट काडर को रोक नहीं पाईं। ऐसे तमाम राजनैतिक दलों से समय-समय पर हुए चुनावी गठजोड़ों की वजह से काडर का पलायन और तेज हुआ और लेफ्ट इन राज्यों पर पूरी तरह हाशिए पर सिमट गया। पश्चिम बंगाल में 35 वर्षों के रिकार्ड शासन के बाद 2011 में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस से मिली हार ने वामपंथी पार्टियों को एक बड़ा झटका पहुँचाया। लेकिन बंगाल की जनता के बीच सिकुड़ते जनाधार की शुरुआत तो लगभग एक दशक पहले ही हो चुकी थी। यह बात अलग है कि बंगाल की चुनावी गणित को मैनेज करने में महारत हासिल कर चुके वामपंथी दल विधानसभा के चुनाव जीतते रहे। 21वीं सदी के शुरुआती दशक में पहले ज्योति बसु और फिर
बुधदेब भट्टाचार्य के नेतृत्व में वाम मोर्चे की सरकारों पर दो तरफा दबाव था। एक तरफ वाम की मूल विचारधारा से खुद को मजबूती से संबद्ध रखने की चुनौती थी तो दूसरी तरफ वैश्विक और राष्ट्रीय परिदृश्य पर बदलते समीकरणों के तहत नए उद्योगों को राज्य में लाने, रोजगार के नए अवसर सृजित करने और राज्य के विकास में निजी पूँजी को आकर्षित करने की। राजनैतिक रूप से लेफ्ट इन दो विपरीत धुरों के बीच एक सटीक सामांजस्य विकसित नहीं कर पाया। इस विफलता की परिणति सिंगूर और नंदीग्राम जैसी घटनाओं के रूप में हुई। यह देश के वामपंथी इतिहास के वे पल थे जिन्होंने पूरे लेफ्ट पर सवालिया निशान खड़े कर दिए और बंगाल के अंदर उसकी लोकप्रियता को जबर्दस्त धक्का पहुँचाया।

    राष्ट्रीय राजनीति के स्तर पर बात करें और उस बातचीत को अगर बीते चौथाई सदी यानी 1990 के बाद के दायरे में सीमित रखें तो वामपंथी पार्टियों के दो निर्णयों को लेकर सबसे ज्यादा बहस हुई है। पार्टियों के अंदर भी और बाहर भी। दोनों ही निर्णयों को बाद में ऐतिहासिक भूल भी बताया गया और कहा गया कि उन फैसलों के चलते वामपंथी दलों ने अपने समक्ष मौजूद स्वर्णिम मौकों को गवां दिया। 1996 में संयुक्त मोर्चे की सरकार में शामिल न होने और पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु को प्रधानमंत्री न बनने देने का सीपीएम का फैसला और दूसरा अमरीका के साथ परमाणु करार के मसले पर संयुक्त प्रगतिशील
गठबंधन( यूपीए) सरकार से लेफ्ट फ्रंट का अलग हो जाना। 1996 के उस दौर के तथा अब खुद सीपीएम के कई बड़े नेता यह मान चुके हैं कि पार्टी की केंद्रीय कमेटी के अंदर तत्कालीन पार्टी महासचिव हरिकिशन सिंह सुरजीत और खुद ज्योति बसु पार्टी के सरकार में शामिल होने और प्रधानमंत्री का पद लेने के पक्ष में थे, लेकिन बहुमत सदस्य इसके खिलाफ थे। सुरजीत और बसु का मत था कि कुल 53 सांसदों वाला लेफ्ट फ्रन्ट (जिसमें सीपीएम के 32 सांसद थे) अपने कम संख्या बल के बावजूद, सरकार की तमाम अस्थिरता के बाद भी कम समय में ही सही अपने कार्यक्रमों, नीतियों के जरिए राष्ट्रीय स्तर पर एक व्यापक संदेश देने की स्थिति में होगा। वामपंथी पार्टियाँ  आर्थिक-सामाजिक स्तर पर एक व्यापक विकल्प देने की स्थिति में होंगी और इसका लेफ्ट के काडर और जनता के बीच एक दूरगामी सकारात्मक परिणाम होगा। हालाँकि दूसरे पक्ष का मत था कि इस निर्णय से लेफ्ट की विश्वसनीयता क्रेडिबिलिटी पर नकारात्मक असर पड़ेगा। पार्टी के अंदर उस वक्त बहुमत से लिए गए निर्णय के विपरीत लेफ्ट से सहानुभूति रखने वाले लोगों और पार्टी काडर का बड़ा हिस्सा आज भी इसे एक स्वर्णिम अवसर गवां देने के रूप में ही देखता है।
    इस ऐतिहासिक भूल के लगभग एक दशक बाद वर्ष 2004 में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की अप्रत्याशित हार ने वामपंथी पार्टियों को एक बार फिर केंद्रीय सत्ता के केंद्र में ला दिया। 61 सांसदों के साथ लेफ्ट फ्रंट ने न खुद अब तक के अपने संसदीय इतिहास का
सर्वाधिक आँकड़ा हासिल किया वह कांग्रेस के नेतृत्व वाली ही सही गैर भाजपा सरकार के निर्माण की धुरी बनने की स्थिति में थी। एक बार फिर वह अवसर था कि वामपंथी पार्टियाँ सरकार में शामिल हों या फिर उसे बाहर से ही समर्थन दें। लेफ्ट फ्रंट के छोटे घटक दल जिनमें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी भी शामिल थी, सरकार में सीधे हिस्सेदारी की पक्षधर थी लेकिन सबसे बड़े घटक दल यानी सीपीआईएम इसके विरोध में था। अंततः न्यूनतम साझा कार्यक्रम के तहत कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए की सरकार बनी और लेफ्ट फ्रंट ने उसे बाहर से समर्थन दिया। 2004 से लेकर 2007 तक का वह दौर था जब लेफ्ट के दबाव में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार चाहते हुए भी तमाम जनविरोधी आर्थिक नीतियों को लागू करने से बचती रही। सूचना के अधिकार, न्यूनतम मजदूरी दिलाने वाले महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कानून (मनरेगा) सहित कई ऐसी योजनाएँ लागू की गईं जिन्होंने गरीबों, पिछड़ों को राहत दी। सार्वजनिक उपक्रमों के विनिवेश पर लगाम लगी और राष्ट्रीय राजनीति के स्तर पर संकीर्ण-सांप्रदायिक राजनैतिक दलों की ताकत कमजोर हुई, लेकिन 2007 में अमरीका के साथ परमाणु संधि के सवाल पर कांग्रेस और लेफ्ट के बीच मतभेद बढ़ते गए और आखिरकार 2008 में लेफ्ट फ्रंट ने सरकार से समर्थन वापसी का ऐलान कर दिया। समर्थन वापसी के बाद किस तरह मनमोहन सिंह की सरकार ने संसद में विश्वासमत हासिल किया इसका जिक्र यहाँ करने का कोई औचित्य नहीं है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का क्या लाभ और हानि लेफ्ट के संदर्भ में हुई, उस पर विचार करना जरूरी है। लेफ्ट का स्पष्ट मत था कि अमरीका के साथ यह करार देश के राष्ट्रीय हितों, उसकी संप्रभुता और उसकी तकनीकी क्षमताओं के विस्तार की संभावनाओं में बाधक है, पर लेफ्ट अपनी इस पोजीशन को जनमानस में ले जाने में सफल नहीं रहा। दूसरी तरफ कांग्रेस और यूपीए के अन्य घटक दल इस करार को बहुत ही चालाकी से विकास की नई अपार संभावनाओं और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में भारत के सशक्त होने के प्रमाण के तौर पर प्रोजेक्ट करने में कामयाब रहे। राजनैतिक रूप से एक नुकसान यह भी हुआ कि तथाकथित सेक्युलर दल यानी कांग्रेस व यूपीए के अन्य घटक दलों के खिलाफ लेफ्ट संसद में भारतीय जनता पार्टी के साथ खड़ा दिखाई दिया। बड़े पैमाने पर समाज के अंदर अल्पसंख्यकों और भाजपा के खिलाफ रहने वाले दलित-पिछड़े समाज में इसका नकारात्मक संदेश गया।    इसके तत्काल बाद 2009 के लोकसभा चुनाव में लेफ्ट को हुए नुकसान की एक बड़ी वजह 2007-08 के यह घटनाक्रम रहे। हालाँकि इसी दौरान पश्चिम बंगाल के अंदर गलत नीतियों के चलते लेफ्ट के खिलाफ बढ़ता गुस्सा भी इस नुकसान का एक बड़ा कारण रहा।
    2004 में लेफ्ट फ्रंट ने बंगाल की 42 में से 35 सीटों पर जीत हासिल की थी वहीं 2009 में यह आँकड़ा घट कर महज 15 सीटों का रह गया। यूपीए 1 से बाहर होने के बाद 2009 में लेफ्ट को अपने दुर्ग बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गठबंधन का सामना करना पड़ा था। अगर लेफ्ट ने यूपीए 1 की सरकार से समर्थन वापस न लिया होता तो बहुत संभावना थी कि उसे अपने खिलाफ अधिकतम संभावनाओं वाले राज्य में इस गठबंधन का सामना न करना पड़ता। राष्ट्रीय राजनीति के स्तर पर लिए गए एक फैसले ने न सिर्फ लेफ्ट को संसद में कमजोर किया बल्कि पश्चिम बंगाल के अंदर उसके आधार को बुरी तरह सिकोड़ दिया। लेफ्ट पार्टियाँ अब तक बंगाल के अंदर हुए उस उलटफेर से उबर नहीं पाई हैं।
    लेफ्ट के दबाव से विमुख मनमोहन सिंह के ही नेतृत्व वाली दूसरी सरकार जिसे यूपीए 2 के नाम से जाना जाता है, ने बड़े पैमाने पर जन विरोधी आर्थिक नीतियों को अपनाया और लागू किया। घटक दलों को भ्रष्टाचार की खुली छूट मिली, नतीजतन 2009 से लेकर 2014 तक का अगला पाँच साल देश के अंदर बड़े पैमाने पर जनअसंतोष के उभार का गवाह बना। अरविंद केजरीवाल और अन्ना हजारे के नेतृत्व वाले इंडिया अगेंस्ट करप्शन के रूप में इस असंतोष को सबसे बड़ी पहचान मिली। लेकिन लेफ्ट एक बार फिर से इस उभार को सही ढंग से समझ पाने में असफल रहा। भ्रष्टाचार और खराब गवर्नेंस के खिलाफ उपजे गुस्से को भुनाने में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी बेहद कामयाब रही। इस सफलता का खैर एक पक्ष यह भी था कि देश का पूँजीपति तबका पूरी तरह भाजपा और मोदी के पक्ष में लामबंद हो गया। इसकी वजह यह थी कि वह आर्थिक सुधारों के नाम पर नए स्तर के फैसलों, विनिवेश के नए अवसरों और पूँजीवाद के विस्तार की नई संभावनाओं के लिए ब्रांड मोदी और उनके विकास के मॉडल को तवज्जो देने लगा था।
    यानी संभावनाओं का एक और खास मौका लेफ्ट के हाथ से निकल चुका था। सवाल है कि जनता के एक वर्ग का गुस्सा, जिसे लेफ्ट आम तौर पर मध्यम वर्ग के गुस्से में परिभाषित कर देता है वह क्यों आप जैसे राजनैतिक दल के साथ केंद्रित हो गया, जिसके पास न तो दूरगामी राजनीति और न देश के संदर्भ में कोई ठोस आर्थिक-राजनैतिक-सामाजिक एजेंडा था। लेफ्ट पार्टियों के लिए यह जरूरी है कि वह आम आदमी पार्टी के राजनैतिक चढ़ाव के कारणों, उसकी सफलता के कारणों का बारीकी से अध्ययन करें।
    बहरहाल 2014 के पहले जनता के व्यापक असंतोष को अपनी राजनीति से न जोड़ पाने के परिणाम अब सामने हैं। जैसा इस लेख में ऊपर जिक्र किया गया कि लेफ्ट अपने संसदीय प्रदर्शन के अब तक के सबसे निचले आंकड़े पर सिमट गया है। राष्ट्रीय राजनीति पर काबिज होने के बाद पिछले तीन सालों में भाजपा देश के कई राज्यों में विस्तार कर चुकी है और उत्तर प्रदेश जैसे राजनैतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण राज्य में पूर्ण बहुमत की सरकार बना चुकी है। जाहिर है ऐसे में आरएसएस व अन्य हिंदुत्ववादी संगठनों को व्यापक बल मिला है। केंद्रीय मंत्री खुद देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप पर सवाल उठाने लगे हैं, भारत को हिंदू राज्य बनाए जाने की बात होने लगी है और हिंदुत्व के एजेण्डे पर आधारित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सीधे-सीधे सरकार के कामकाज को मानीटर कर रहा है, उसे निर्धारित कर रहा है।
    देश में तेजी से बदली आर्थिक-राजनैतिक-सामाजिक परिस्थितियों का जिक्र इस लेख की शुरुआत में ही कर चुका हूँ। जाहिर है कि देश के पैमाने पर जन असंतोष तेजी से बढ़ रहा है लेकिन भाजपा-आरएसएस इस माहौल को हिंदुत्व और संकीर्ण राष्ट्रवाद के घातक तालमेल के सहारे मजबूत न होने देने की लगातार कोशिश में है। लेफ्ट पर जबर्दस्त वैचारिक हमले के पीछे बड़ी वजह यही है कि भाजपा, आरएसएस यह जानता है कि उनकी वैचारिक-आर्थिक राजनीति का सबसे तार्किक और वैचारिक विरोध कोई कर सकता है तो वह वामपंथी पार्टियाँ ही हैं। अब सवाल यह है कि क्या लेफ्ट अपनी पुरानी कार्यशैली, तथाकथित गलतियों, जन असंतोष को अपनी राजनीति से न जोड़ पाने की कमजोरी से बाहर निकल पाएगा। क्या वह समाज में खड़े होते तमाम दूसरे प्रगतिशील आंदोलनों, दलित चेतना के उभार, देश के अंदर युवाओं के नए बहुमत और उनके समक्ष चुनौतियों से निपटने के लिए किसी बेहतर क्रांतिकारी-आकर्षक एजेंडे के साथ आगे आ सकता है। जेएनयू के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष और आल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन के नेता कन्हैया कुमार के शब्दों में कहें तो क्या लेफ्ट नीली सदरी पर लाल गुलाब की कल्पना को साकार कर सकता है, यानी लेफ्ट अपने प्रगतिशील जनवादी एजेंडे को सामाजिक न्याय की लड़ाई से जोड़ सकता है। लोकसभा चुनाव के बाद 2015 में जब सीपीआई और सीपीएम अपनी-अपनी पार्टी कांग्रेस में गईं तो उम्मीद थी कि वह अपनी पराजय, नई राजनैतिक परिस्थितियों के परिपेक्ष में एक बेहतर निष्कर्ष के साथ सामने आएँगी और लेफ्ट को विस्तार की एक नई गति मिलेगी। हालाँकि ऐसा ज्यादा कुछ होता दिखा नहीं। राष्ट्रीय स्तर पर वाम एकता को मजबूत करने के लिए, भाजपा-संघ के खिलाफ संघर्ष को तेज करने के लिए किसी तीसरे मोर्चे या गठबंधन से हटकर वाम मोर्चे की ताकत को बढ़ाने की लाइन जरूर अपनाई गई।  जबकि अगले आम चुनाव में महज डेढ़ साल का वक्त बाकी है वामपंथी पार्टी एक बार फिर भाजपा-आरएसएस को रोकने के लिए कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों से गठबंधन के सवाल पर मंथन कर रही है। सीपीआईएम की हाल ही में हुई केंद्रीय कमेटी की बैठक में पार्टी के अंदर गठबंधन के सवाल पर स्पष्ट फाड़ दिखी। बहरहाल अब एक बार फिर से दोनों ही पार्टियाँ बहुत जल्द अप्रैल के महीने में अपनी राष्ट्रीय कांग्रेस में जाने वाली हैं। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी केरल के कोलम में तो माकपा हैदराबाद में पार्टी कांग्रेस करेगी। उम्मीद की जानी चाहिए कि दोनों प्रमुख दल अपने इन सर्वोच्च आयोजनों में देश की मौजूदा परिस्थितियों के सटीक आकलन के साथ ही साथ लेफ्ट को और प्रासंगिक बनाने, उसका जनाधार और साथ ही साथ संसदीय विस्तार बढ़ाने के बारे में कोई ठोस, व्यावहारिक और आकर्षक रणनीति का निर्धारण कर सकेंगे। और हाँ यह कहने में कोई गुरेज नहीं कि यह बहुत ही नाजुक दौर है देश के लिए भी और देश में वामपंथ के लिए भी। परिस्थितियाँ चाहे जितनी भी माकूल क्यों न हों उनका लाभ सही नीतियों, एक क्रांतिकारी एजेंडे और दूरगामी राजनैतिक विजन के जरिए ही हासिल किया जा सकता है, और यह करने की जिम्मेदारी खुद कम्युनिस्ट पार्टियों पर है।

-पी. मिश्रा 
वरिष्ठ पत्रकार
लोकसंघर्ष पत्रिका मार्च 2018 विशेषांक में प्रकाशित 

विघटनकारी गतिविधि : धार्मिक उन्माद


Posted: 31 Mar 2018 11:54 PM PDT
‘‘साम्प्रदायिकता को सीधे सामने आने में लाज लगती है, इसलिए वह राष्ट्रवाद का चोला ओढ़कर आती है।’’             -प्रेमचंद

    ‘‘यदि हिन्दू राज बनता है तो इस बात में कोई सन्देह नहीं कि यह देश के लिए सबसे बड़ी विपत्ति होगी। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि हिन्दू क्या कहते हैं, लेकिन हिन्दूवाद स्वतंत्रता, समानता व भाईचारे के लिए बहुत बड़ा खतरा हैं। इस तरह से यह लोकतंत्र का विरोधी है। हिन्दू राज को किसी भी कीमत पर रोका जाना चाहिए।’’       -डॉ.भीमराव अम्बेडकर
    प्रेमचन्द और डॉ. भीमराव अम्बेडकर की उपरोक्त बातें इस समय हमारे देश में चरितार्थ हो रही हैं। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अपने राजनैतिक संगठन भाजपा के माध्यम से 2014 में केन्द्रीय सत्ता पर कब्जेदारी करके ‘‘राष्ट्रवाद’’ ‘‘धार्मिक उन्माद’’ व ‘‘हिन्दू राष्ट्र’’ के नाम पर समाज व देश में कलह व विघटनकारी गतिविधि को बढ़ावा दे रहा है। उसने उत्तर-प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य में एक मठ के महंत को सत्ता सौंप कर अपने फॉसीवादी मंशा को जाहिर कर दिया है। गुजरात में 2000 से ऊपर मुस्लिमों के नरसंहार के मामले में संदेह के दायरे में आए नरेन्द्र मोदी का प्रधानमंत्री बनना और हमेशा मुस्लिम विरोधी उग्र-विचार रखने वाले और हिन्दू युवा वाहिनी जैसी निजी गुण्डा वाहिनी के संचालक योगी आदित्यनाथ का उत्तर-प्रदेश का मुख्य मंत्री बनना भारतीय ‘‘संवैधानिक लोकतंत्र’’ के फासीवाद में नग्न रूपान्तरण का परिचायक है।

                                                                 फासीवाद 

    जब इटली में मुसोलिनी और जर्मनी में हिटलर की सत्ता आई थी तो विश्व फॉसीवाद के सबसे चरम रूप का साक्षी बना था। उस समय विश्व मानवता के सामने  इतिहास के सबसे संकटकारी युद्ध का खतरा मंडराने लगा था। तब फॉसीवाद के खिलाफ मोर्चे बनाए गए थे। इस प्रकार अब तक फॉसीवाद की जो समझ बनी है उसके अनुसार ’’फासीवाद वित्तीय पूँजी के सबसे ज्यादा प्रतिक्रियावादी, सबसे ज्यादा अंधराष्ट्रवादी और सबसे ज्यादा साम्राज्यवादी तत्वों का खुला आतंककारी शासन होता है।’’
    ’फासीवाद‘ और ‘पूँजीवादी जनवाद’ वित्तीय पूँजी द्वारा शासन के दो रूप हैं। जब पूँजीवादी राज्य के विस्तार करने का कुछ हद तक संभावना रहती है तब वह शासन के थोड़ा उदारवादी रूप पूँजीवादी जनवाद का इस्तेमाल करता है। परंतु जब वित्तीय संकट गहरा जाता है और इसके फलस्वरूप जनता भी आन्दोलन के लिए आगे आने लगती है, तब वह नग्न आतंकी रूप फासीवाद का इस्तेमाल करता है क्योकि मजदूर वर्ग और जनवादी अधिकार आंदोलनों को कुचलने के लिए उदार पूँजीवादी-जनवादी शासन अपर्याप्त हो जाता है।
    फासीवाद जिस भी देश में आएगा उस देश की अपनी विशिष्टता को लिए होगा। परंतु उसका सामान्य चरित्र ‘‘उग्र-अंधराष्ट्रवादी’’ और ‘‘धार्मिक अल्पसंख्यक वर्ग’’ अथवा ‘‘भाषाई, आदिम समुदाय अथवा भारत जैसे देश में उत्पीड़ित जातियों’’ जैसे तबकों के खिलाफ उन्माद फैलाने का रहता है।

                                                                          पृष्ठभूमि

    प्रथम विश्व युद्ध के बाद सोवियत संघ में समाजवादी मजदूर क्रान्ति की सफलता के बाद और जर्मनी में क्रान्ति की असफलता के चलते वार्सा संधि से उपजी विश्व परिस्थिति ने फासीवाद के माहौल को तैयार किया था। विश्व में आर्थिक असमानता 1913 में अपने चरम पर पहुँच चुका था। इटली, जर्मनी, जापान में बढ़ रहे वित्त पूँजी को रियायत देने से ब्रिटिश, अमरीकी, फ्रांसीसी साम्राज्यवादियों ने इन्कार कर दिया था। नतीजतन ‘‘उग्र राष्ट्रवाद’’ की भावना भड़काकर मुसोलिनी और हिटलर के नेतृत्व में फासीवाद का दानव उत्पन्न हुआ। इसने विश्व के ऊपर मानव इतिहास के सबसे प्रलंयकारी युद्ध को थोप दिया था। इसने दमन के बर्बर रूपों को भी मात दिया और जर्मनी में यहूदियों की 60 लाख आबादी को गैस चैम्बरों में मार दिया था। इस युद्ध में लोगों ने अपने ही जैसे 5 करोड़ लोगों की हत्या कर दी थी। अमरीका ने नागासाकी-हिरोशिमा में परमाणु बम का पहली बार परीक्षण करके दो लाख लोगों को मिनटों में जला दिया था और अपने दादागीरी को दुनिया में स्थापित किया था। स्टालिन के नेतृत्व में सोवियत संघ की जनता ने अपने दो करोड़ लोगों की आहुति देकर दुनिया को इस दानव से मुक्ति दिलाई थी। उस समय विश्व भर में फासीवाद के खिलाफ कम्युनिस्टों-समाजवादियों-जनवाद पसंद लोगों और राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों के बीच साझा मोर्चा बना था जो सफल हुआ था।
    उसके बाद विश्व भर में सोवियत समाजवादी संघ के विकास पथ पर बढ़ते कदम ने विश्व पूँजीवादी-साम्राज्यवाद के सामने गंभीर चुनौती पेश किया था और शक्ति-संतुलन को जनता के पक्ष में मोड़ दिया था। इसी समय सोवियत संघ के खुलेआम समर्थन, कमजोर होते औपनिवेशिक शक्तियों और गुलाम देशों में मजदूर व मुक्ति आंदोलनों की मजबूती ने भी अमरीकी नीत पूँजीवादी-साम्राज्यवाद के समक्ष चुनौती पेश किया था और वर्ग-शक्ति संतुलन को जनता के पक्ष में रखा था। इसी दौर में यूरोप व जापान की विश्वयुद्ध में हुई तबाही ने भी उनके समक्ष पुनर्निर्माण का कार्यभार रखा था। इन तीनों कारकों ने मिलकर उस समय समाजवाद व ‘जनकल्याणकारी’ राज्य का विकल्प खड़ा किया। नतीजतन 1960 तक विश्व में आर्थिक असमानता कम होता रहा। परंतु 1960 के बाद विश्व में पुनः वित्तीय संकट आने लगा। सोवियत रूस सामाजिक साम्राज्यवाद में पतित होने लगा था। समाजवादी खेमे ने चीन के नेतृत्व में 70 के दशक के मध्य तक संघर्ष किया था। वियतनाम ने अमरीका को परास्त करके उसके साम्राज्यवाद को तगड़ा झटका दिया था। 1973 में डालर का स्वर्ण मानक से अलग होना संकटों के दौर का चरम था। उसके बाद विश्व पूँजीवाद संकटों के चक्र में फँसता गया। राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन अभी भी चुनौती थे। परंतु समाजवादी खेमे के खात्मे के बाद ये कमजोर होते गए थे और 1990 तक आते-आते विश्व भर में वर्ग शक्ति संतुलन जनता के पक्ष में कमजोर हो गया था। ऐसी स्थिति में विश्व व्यवस्था ने जन-विरोधी, मजदूर-विरोधी, किसान-विरोधी, राष्ट्र मुक्ति-विरोधी नीतियों को ‘‘उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण’’ के नारे के साथ आम जनता व उत्पीड़ित राष्ट्रों पर थोप दिया था। परंतु इसके बाद भी वित्त पूँजी का संकट और विश्वभर में आर्थिक असमानता बढ़ता ही गया और 2008 में अमरीका में ‘सब प्राइम’ संकट के नाम से प्रस्फुटित आर्थिक संकट ने 1929 के संकट की गहनता से भी भयावह रूप ले लिया। इस संकट ने विश्व व्यापी वित्तीय संकट को जन्म दिया है। वैश्विक स्तर पर आर्थिक असमानता पुनः 1913 के स्तर पर आ गया है। दुनिया भर की 71 प्रतिशत आबादी के पास दुनिया की संपदा का मात्र 3 प्रतिशत हिस्सा है। जबकि दुनिया की आधी संपत्ति पर ऊपरी 1 प्रतिशत लोगां का कब्जा है।                                                                                                                    

 हमारे देश की परिस्थिति


    भारतीय पूँजीपति वर्ग अपने जन्म से ही साम्राज्यवाद पर निर्भर रहा है। साम्राज्यवाद की छींक से इसे बुखार आने लगता है। इसलिए समाजवाद के छलावे के नाम पर भारत के सामंतों, बड़े पूँजीपतियों और साम्राज्यवादियों के हित में खड़ी व्यवस्था ने लगातार जनता के श्रम, संपदा को उनके हितों में लगाया है। साम्राज्यवादियों व देशी बड़े पूँजीपतियों (अंबानी, अडानी, टाटा, बिड़ला जैसों) की बढ़ती पिपासु वित्तीय पंँजी की हवस के लिए निजीकरण, उदारीकरण, वैश्वीकरण के नाम पर नई आर्थिक नीति को लागू किया गया। वित्त पूँजी की हवस को ही शांत करने हेतु ‘नोटबंदी’ और ‘जीएसटी’ जैसा कदम उठाया गया ताकि पूँजी का और ज्यादा एकत्रीकरण दैत्याकार कंपनियों के हाथ में हो सके। इन कदमों ने संकट को घटाने की जगह और बढ़ा दिया है। देश में आर्थिक असमानता भयंकर रूप से बढ़ता जा रहा है। नवम्बर, 2016 में भारत दुनिया के सबसे ज्यादा असमानता वाले देशों में रूस के बाद दूसरे स्थान पर था। आबादी के सबसे धनी 1 प्रतिशत लोगों के पास देश की 58.4 प्रतिशत संपत्ति है। मात्र 57 सबसे धनी लोगों के पास आधी आबादी के बराबर संपत्ति है। इस आर्थिक गैरबराबरी, वित्तीय संकट, वित्तीय घरानों और साम्राज्यवादी देशों की पूँजी कब्जेदारी की भूख ने वर्तमान में वैश्विक व घरेलू फासीवाद के लिए उर्वर जमीन तैयार किया है। इसी पृष्ठभूमि में अमरीका में फासीवादी ट्रम्प का सत्ता में आना, आधुनिक क्रान्ति के प्रथम देश फ्रांस में ली-पेन का उभार सहित सभी पूँजीवादी व साम्राज्यवादी देशों में अंध राष्ट्रवाद का उभार आया है।

                 हमारे देश में फासीवाद की विशिष्टता उसका आधार और उसके हमले के निशाने
 
    2014 से हमारा देश जिस फासीवाद के गिरफ्त में आया है उसका विशिष्ट चरित्र है वर्ण-वर्चस्व वाली ब्राह्मणवादी हिन्दुत्व विचारधारा। जिसका बीज लगभग एक शताब्दी पहले हिन्दू महासभा व राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के रूप में हेडगेवार व सावरकर जैसे लोगों द्वारा बोया गया था। इस विचारधारा में जाति-घृणा आधारित श्रेणीक्रम और धर्म श्रेष्ठता दोनों समाए हुए हैं। सामान्य तौर पर हमारे देश के शासक वर्ग में दलाल प्रवृत्ति वाले बड़े पूँजीपति और सामंती तत्व शामिल हैं। इनके द्वारा ही फासीवादी शासन को लागू किया जाता है। ये दोनों वर्ग मनुवादी दण्ड विधान में विश्वास करने वाले ब्राह्मणवादी जाति व्यवस्था के सवर्ण जातियों से प्रधानतः आते हैं। अतः भारतीय फासीवाद दलाल प्रवृत्ति के बड़े पूँजीपति व सामंती वर्गों के उग्र प्रतिक्रियावादी एवं अन्ध राष्ट्रवादी उच्च जातीय हिन्दू तत्वों की तानाशाही है। इसी कारण हमारे देश के अम्बानी, अडानी, बिरला, अग्रवाल जैसे बड़े पूँजीपतियों ने अपने संसाधनों से प्रतिक्रियावादी मनुवादी हिन्दुत्व के प्रतीक बन चुके मोदी के पक्ष में मीडिया को एकजुट किया है। इसलिए भारतीय फासीवाद को मनुवादी हिन्दुत्व फासीवाद कहना ज्यादा उचित होगा। परंतु हम भारत के इतिहास को 1947 से ही देखें तो पाते हैं कि हमारे देश में कभी मुकम्मल जनवाद आ ही नहीं पाया। 1947 में सत्ता हस्तान्तरण के द्वारा सत्ता में आयी कांग्रेस पार्टी हमेशा से वर्णवर्चस्ववादी तत्वों के प्रभाव में रही। वह हमेशा उदार हिन्दुत्व की पोषक रही। इसमें मालवीय जैसे कट्टर मनुवादी हिन्दुत्व समर्थक लोग भी शामिल थे जिन्होंने हिन्दू महासभा की सदस्यता भी ले रखी थी। इससे भिन्न हो भी नहीं सकता था क्योंकि जिस वर्ग का प्रतिनिधित्व कांग्रेस करती थी उसका निर्माण उच्चवर्गीय जातियों से ही हुआ था। जे.डी. बिरला का उदाहरण हमारे सामने है। जिनकी प्रशंसा आरएसएस के बी.एस. मुंजे (जो मार्च, 1931 में मुसोलिनी से मिलने इटली भी गए थे।) किया करते थे क्योंकि वे हिन्दुत्व संगठनों से रिश्ता रखते थे। धर्मनिरपेक्षता व समाजवाद के खोल में पं0 जवाहरलाल नेहरू का चरित्र भी साफ था। उन्होंने तेलंगाना में न केवल क्रान्तिकारी किसान आन्दोलन को कुचलने में पटेल का साथ दिया था, बल्कि उसी समय हैदराबाद और जम्मू में भी सुरक्षा बलों द्वारा मुसलमानों का संहार भी उन्हीं की सरकार की नाक के नीचे हुआ। भारतीय राज्य शुरू से ही कश्मीर, पूर्वात्तर एवं क्रान्तिकारी आन्दोलन के लिए फासीवादी आतंक का सहारा लेता रहा है। कांग्रेस पार्टी की भूमिका आरएसएस को केन्द्रीय सत्ता तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण रही है। चाहे गांधी की हत्या के बाद हिन्दुत्ववादी शक्तियों पर रोक लगाने का मामला रहा हो, चाहे बाबरी मस्जिद में राम की मूर्ति स्थापना (1949), बाबरी मस्जिद का ताला खोलना (1986) व बाबरी मस्जिद का विध्वंस (1992) रहा हो सबमें कांग्रेस की भूमिका हिन्दुत्ववादी शक्तियों के प्रति बढ़ावा देने का ही रहा था। मुस्लिमों के खिलाफ साम्प्रदायिक दंगों में सुरक्षा बलों के हमले, दलित जातियों के ऊपर सामंती निजी सेनाओं के हमले (रणवीर सेना, सन लाइट सेना इत्यादि), आदिवासियों पर सुरक्षा बलों एवं सलवा जुडूम, सेण्ड्रा इत्यादि का हमला या नईमुद्दीन गिरोहां जैसों के हमले के मामले में भी कांग्रेस के हाथ हमेशा खून से रंगे रहे हैं। 1975 में इन्दिरा गांधी द्वारा आपातकाल लगाकर विपक्ष क्रान्तिकारी व जनान्दोलनों पर दमन और मौलिक अधिकारों का निलम्बन करना फासीवाद से कम नहीं था। भारतीय समाज का ग्रामीण हिस्सा 1947 के बाद भी मनुवादी विधान वाले जाति व्यवस्था से ही संचालित होता रहा था। डॉ. भीमराव अम्बेडकर के प्रयास के बावजूद कांग्रेस व नेहरू ने हिन्दूकोड बिल पास नहीं होने दिया जो भारत में एक समान नागरिक संहिता के लिए पृष्ठभूमि तैयार करता। इसलिए ग्रामीण क्षेत्रों, दलित/दमित जातियों, महिलाओं, आदिम जातियों, कश्मीर, पूर्वोत्तर राज्यों तथा मजदूर-किसानों के क्रान्तिकारी संघर्षों के दमन के मामले में भारतीय राज्य 1947 के बाद से ही फासीवादी बना हुआ है। शहरी आबादी, बुद्धिजीवी तबकों इत्यादि के लिए सीमित मात्रा में मिले जनवादी अधिकारों को भी विविध सरकारें मीसा, टाडा, पोटा अफ्स्पा, यूएपीए तथा जन सुरक्षा अधिनियम जैसे फासीवादी कानूनों के माध्यम से छीनती व प्रतिबंधित करती रही हैं। इनमें संसदीय वाम पार्टियों तथा मध्यमार्गी पार्टियों की सरकारें भी शामिल रहीं हैं। संसदीय कम्युनिस्ट पार्टियों ने अपनी समझौतापरस्त नीतियों के कारण हिन्दुत्व फासीवादियों के लिए जमीन उर्वर किया है। इस पृष्ठभूमि में भारतीय शासकों की सबसे वफादार राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की पार्टी भाजपा मोदी के नेतृत्व में सत्ता में आई है। यह संकटग्रस्त बड़े पूँजीपतियों व भू-स्वामियों की तीव्र गति से सेवा आम जनता की आजीविका को छीनते हुए कर रही है और जनता  का ध्यान बँटाने के लिए  ‘‘उग्र राष्ट्रवाद’’ ‘‘हिन्दू राष्ट्र’’ ‘‘गौ रक्षा’’ वन्देमातरम्’’ ‘‘राष्ट्रगीत’’ ‘‘मुस्लिम-विरोध’’ इत्यादि के रूप में जहरीले विचारों का सहारा ले रही है। 2014 में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने और 2017 में योगी की ताजपोशी ने अल्पसंख्यकों विशेषकर मुसलमानों में असुरक्षा की भावना को बढ़ा दिया है। गोरक्षा के नाम पर व गोमांस के नाम पर अखलाक, पहलू खाँ, जुनैद और हाल ही में अलवर में एक और मुस्लिम की हत्या इस स्थिति को बताने के लिए पर्याप्त है कि फासीवादी हिन्दुत्व गैंगों को केन्द्र व राज्य सरकारों द्वारा अलिखित सहमति दे दी गई है कि वे किसी भी मुस्लिम को गोमांस, गोरक्षा के नाम पर मार सकते हैं। उत्तर-प्रदेश में योगी ने आते ही जिस प्रकार अवैध बूचड़खानों के नाम पर गुण्डों को हिंसा करने की छूट दे दी उससे न केवल मुसलमानों पर हमले बढ़े बल्कि पशुधन के रूप में आम किसानों का पशु व्यापार बुरी तरह प्रभावित हुआ है। भारतीय इतिहास में एक समय स्वयं गोमांस भक्षण करने वाले, आज लोगों के खाने के मौलिक अधिकार पर हमले कर रहे हैं। इससे सभी अल्पसंख्यक तबकों विशेषकर मुस्लिमों का विश्वास भारतीय राज्य से उठ रहा है। उन्हें भारतीय सुरक्षा के लिए खतरे के रूप में संघी एजेन्सियाँ पेश कर रही हैं और पूरे देश में मुस्लिम युवाओं को ‘‘आतंकवाद’’ के नाम पर जेलों में डाला जा रहा है अथवा फर्जी इन्काउन्टर में मार दिया जा रहा है। इस प्रकार लगभग 20 करोड़ आबादी को संदेह के दायरे में लाकर देश के माहौल को विषैला कर दिया गया है।
    मुस्लिमों के बाद हिन्दुत्व फासीवादियों के निशाने पर दलित/दमित जातियाँ हैं। मद्रास में अम्बेडकर-पेरियार स्टडी सर्किल पर रोक, हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय में अम्बेडकर छात्रसंघ के छात्रों को निलंबित कर रोहित वेमुला जैसे मेधावी व संवेदनशील छात्र को आत्महत्या के लिए बाध्य करना, गुजरात के ऊना में गौहत्या के नाम पर दलितों पर हमला, सहारनपुर में दलित बस्ती पर राजपूत परिवारों द्वारा हमला और  अभी हाल में बलिया के श्रीनगर गाँव में अद्भुत बाबा के स्थान पर दलित नौजवानों के चढ़ने-बैठने के कारण पूरे दलित बस्ती पर तलवार, लाठी, बैटों से हमला इत्यादि तो मात्र कुछ घटनाएँ हैं जो प्रकाश में आ पाती हैं। दलित लड़कों द्वारा सवर्ण/उच्च वर्गीय लड़कियों से प्रेम के कारण कई दलित परिवारों/लड़कों की ‘‘ऑनर किलिंग’’ तो पहले से भी होती रही हैं। उत्तर-प्रदेश में एक महंत की ताजपोशी होते ही उसका राजपूत गौरव जाग गया और मीडिया द्वारा पूरे देश को बताया जाने लगा था कि वे राजपूत जाति के हैं। इससे यह समझना मुश्किल नहीं है कि संघियों के हिन्दू राष्ट्र के क्या मायने हैं। मोदी के संविधान व अम्बेडकर की दुहाई के बावजूद मोहन भागवत का संविधान को भारतीय संस्कृति के अनुकूल बनाने की बात करने के गंभीर निहितार्थ हैं। इनकी नजर में भारतीय संस्कृति के मायने जाति-भेद के
आधार पर सत्ता व गाँवों के संचालन से ही है। जहाँ एकलव्य से अँगूठा माँगा जाएगा और शम्बूक की हत्या की जाएगी। मोदी-योगी के नेतृत्व में संघी शासन के दमन से दलित समुदाय उद्वेलित है।

-राजेश
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लोकसंघर्ष पत्रिका मार्च 2018 विशेषांक में प्रकाशित