शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2018

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जब संविधान की धज्जियाँ उड़ती हैं, तब रात को जूते की टाप सुनाई देती है।

जब भारत की जनता गहरी नींद में सो रही थी, तब दिल्ली पुलिस के जवान अपने जूते की लेस बाँध रहे थे। बेख़बर जनता को होश ही नहीं रहा कि पुलिस के जवानों के जूते सीबीआई मुख्यालय के बाहर तैनात होते हुए शोर मचा रहे हैं। लोकतंत्र को कुचलने में जूतों का बहुत योगदान है। जब संविधान की धज्जियाँ उड़ती हैं, तब रात को जूते बाँधे जाते हैं। पुलिस के जवान सीबीआई दफ्तर को घेर लेते हैं। रात के पौने एक बज रहे होते हैं। वैसे अंग्रेज़ों में वह गुडमार्निंग कहने का होता है। हम रात को रात कहते हैं। मुल्क पर काली रात का साया गहरा गया है। तभी एक अफ़सर जो शायद जागा हुआ था, उस कुर्सी पर बैठने के लिए घर से निकलता है जिस कुर्सी पर बैठे आलोक वर्मा ने उसके ख़िलाफ़ CVC यानी केंद्रीय सतर्कता आयुक्त से गंभीर आरोपों में जाँच की अर्ज़ी दी है। CVC के वी चौधरी एम नागेश्वर राव को सीबीआई का नया चीफ़ बनाने का रास्ता साफ़ कर देते हैं। एम नागेश्वर राव अपने नंबर वन चीफ़ आलोक वर्मा को हटाने के आदेश देते हैं जिसे छुट्टी पर भेजना कहते हैं। आलोक अस्थाना जिनकी गिरफ़्तारी की अनुमति माँगी गई थी उन्हें भी हटा दिया जाता है। काली रात के बंद कमरे में बारह अफ़सरों को मुख्यालय से बाहर भेजने के आदेश पर दस्तखत होते हैं। नींद में सोई जनता करवट बदल लेती है। तख्ता पलट हो जाता है।

हम जिन आहटों की बात करते रहे हैं, वो सुनाई दें इसलिए जूतों ने वफ़ादारी निभाई है। अब आप पर है कि आप उन जूतों का इशारा समझ पाते हैं या नहीं। मदहोश जनता और ग़ुलाम मीडिया आँखें बंद कर लेती है। शहशांह का इंसाफ़ शहंशाह के लिए होता है। शहंशाह ने अपने लिए इंसाफ़ कर लिया।

दि वायर में स्वाति चतुर्वेदी ने लिखा है कि सीबीआई के इतिहास में कभी नहीं हुआ कि इंस्पेक्टर जनरल( IG) को चीफ़ बना दिया गया। स्वाति ने लिखा है कि वर्मा ने प्रधानमंत्री कार्यालय के क़रीबी यानी जिगरी राकेश अस्थाना के गिरफ़्तारी की अनुमति माँगी थी और वे रफाल डील मामले में जाँच की तरफ़ बढ़ने लगे थे। प्रशांत भूषण, यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी से मिल लेने की ख़बर से सरकार रातों को जागने लगी। दिन में प्रधानमंत्री के भाषणों का वक़्त होता है इसलिए ‘इंसाफ़’ का वक़्त रात का चुना गया। आधी रात के बाद जब जब सरकारें जागीं हैं तब तब ऐसा ही ‘ इंसाफ़’ हुआ है। जूतों की टाप सुनाई देती है।

जनवरी 2017 में आलोक वर्मा को एक कोलिजियम से दो साल के लिए सीबीआई का चीफ़ बनाया गया। आलोक वर्मा का कार्यकाल अगले साल फ़रवरी तक था। इस कोलिजियम में चीफ़ जस्टिस ऑफ़ इंडिया भी थे। जब आलोक वर्मा को हटाया गया तब कोई कोलेजीयम नहीं बना। चीफ़ जस्टिस आफ इंडिया तक को नहीं बताया गया। जब आलोक वर्मा को हटाकर एम नागेश्वर राव को चीफ़ बनाया गया तब इसके लिए कोई कोलिजियम नहीं बनाया गया। चीफ़ जस्टिस आफ इंडिया की कोई भूमिका ही नहीं रही। आलोक वर्मा ने प्रधानमंत्री के ‘इंसाफ़’ के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट से इंसाफ की अपील की है।

आप हिन्दी के पाठकों की हत्या अगर हिन्दी के अख़बारों और चैनलों ने नहीं की होती तो आपको पता होता कि अगस्त महीने में जब सीबीआई लंदन की अदालत में अपने दस्तावेज लेकर पहुँची कि इन गवाहों के बयान के आधार पर विजय माल्या को भारत ले जाना ज़रूरी है तब उन सात गवाहों के बयान पर दस्तखत ही नहीं थे। विजय माल्या 36 सूटकेस लेकर भागा था। स्वाति चतुर्वेदी ने दि वायर में इसे रिपोर्ट किया था।

विजय माल्या ने तभी तो कहा था कि भागने से पहले जेटली से मिला था। जेटली ने खंडन किया। राहुल गांधी ने दस्तावेज़ो के साथ आरोप लगाया कि जेटली की बेटी दामाद के लॉ फ़र्म को माल्या ने फ़ीस दी थी जो उसके भागने को विवाद के बाद लौटा दी गई। एक नैतिक सवाल उठाया गया था मगर तमाम अख़बारों ने इसे जनता तक पहुँचने से रोक दी। जब ख़बरों के पर क़तरे जाते हैं तब जनता के ही पर क़तरे जाते हैं। पाँव परिंदों के कटते हैं और ख़ून जनता का बहता है।

राकेश अस्थाना जो एक वीडियो में ख़ुद को सरदार पटेल के जैसा बता रहे हैं, 2016 में आर के दत्ता को हटाकर सीबीआई में लाए गए थे। इनके बारे में आलोक वर्ना ने सुप्रीम कोर्ट से अपनी फ़रियाद में कहा है कि यह आदमी अफ़सरों के बहुमत के फ़ैसले के ख़िलाफ़ जाकर काम करता है और केस को कमजोर करता है। आलोक वर्मा ने कहा है कि वह ऐसे केस की डिटेल दे सकते हैं।

सवाल उस सीवीसी से है, जिसके पास अस्थाना और राव की शिकायतें थीं। धीमी गति के समाचार की तरह काम करने से सवालों से बचने का मौक़ा मिल जाता है। सीवीसी अपने कर्तव्य के निर्वाहन में फ़ेल रही इसलिए सबसे पहले के वी चौधरी को बर्खास्त करना चाहिए था मगर चौधरी ने ‘चौधरी’ की लाज रख ली! जब अस्थाना मामले की शिकायत पहुँची तब सीवीसी ने क्या किया? जाँच शुरू की?

इंडियन एक्सप्रेस के सुशांत सिंह की ख़बर है। जब अस्थाना ने आलोक वर्मा की शिकायत की तो सीबीआई से दस्तावेज माँगे गए। सीबीआई ने कहा कि अस्थाना ने क्या शिकायत की वो तो बताइये मगर सीवीसी ने नहीं बताया। सीबीआई के ज्वाइंट डायरेक्टर ने नौ अक्तूबर को सीवीसी को पत्र लिखकर पूछा था।

इस मामले में वित्त मंत्री जेटली बयान दे रहे हैं। दो अफसरो ने एक दूसरे पर आरोप लगाए हैं। संस्था का मज़ाक़ उड़ने नहीं दिया जा सकता था। यह ज़रूरी था कि दोनों के आरोपों की जाँच के लिए एस आई टी बने और इन्हें अपने प्रभावों से दूर रखा जाए।

विनीत नारायण बनाम भारत सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि सीबीआई के निदेशक का कार्यकाल तय समय के लिए स्थायी होगा। अगर विशिष्ठ परिस्थिति में तबादला करना भी होगा तब चयन समिति से अनुमति लेनी होगी। क्या अनुमति ली गई ?

अस्थाना कोर्ट में हैं। आलोक वर्ना कोर्ट में हैं। एक डीएसपी जेल में है। और सरकार का आदमी सीबीआई के भीतर है।

इस मामले में इंसाफ़ हो चुका है। अब और इंसाफ की उम्मीद न करें। आइये हम सब न्यूज़ चैनल देखें। वहाँ सर्वे चल रहे हैं। बीजेपी की सनातन जीत की घोषणा हो रही है। चैनलों पर आपकी बेहोशी का इंजेक्शन फ्री में मिल रहा है। आइये हम सब संविधान के बनाए मंदिरों को ढहता छोड़ कर अयोध्या में राम मंदिर बनाने पर बहस करें। ओ मेरे भारत की महान जनता, जब संविधान के बनाए मंदिरों को तोड़ना ही था तो आज़ादी के लिए डेढ़ सौ साल का संघर्ष क्यों किया?

मंगलवार, 23 अक्टूबर 2018



हरयाणा सरकार का महाघोटाला 
किराये पर ली गयी कुल प्राईवेट बस संख्या -- 720 
औसत प्रति किलोमीटर भुगतान --40 /रूपये 
औसत तय किलोमीटर प्रतिदिन -- 450 
एक बस को भुगतान -- 450 x 40 = 18000 रूपये 
720 बसों को एक दिन का  भुगतान  ---720 x 18000 = 12960000 /रूपये 
एक  वर्ष में 720 बसों को भुगतान ---12960000 x 365 = 4730400000 / रूपये 
प्राइवेट बस की औसत आयु --- 10 वर्ष 
720  बसों को दस वर्ष में भुगतान ---4730400000 x 10 = 47304000000 /रूपये 
एक बस की कीमत ---- 1800000/ रूपये 
47304000000 divided by 1800000 =   26280  बसें 
 720 प्राइवेट बसों को सरकार 10 साल में जितना किराया भुगतान करेगी 
उतने रूपये में 26280 सरकारी बसें खरीदी जा सकती हैं 
अब जनता खुद अंदाजा लगा ले कि मुख्यमंत्री जी क्यों अपने पूंजीपति 
दोस्तों की प्राइवेट बसों को किराये पर लेकर रोडवेज में शामिल करना 
चाहते हैं 
दोस्तों अगर रोडवेज और भविष्य में रोजगार के अवसरों को बचाना है तो 
इसे पढ़ें , समझें और शेयर करें 
धन्यवाद 
साथी रमेश 

बुधवार, 18 जुलाई 2018

Promoting Scientific Temper

Promoting Scientific Temper and Observing ‘National Scientific Temper Day on 20th August



Respected Colleague, 

We are writing to you on behalf of the All India People’s Science Network (AIPSN) and Maharashtra Andhashraddha Nirmulan Samiti(MANS). AIPSN is a network of people’s science organizations working in various states of India for the promotion of scientific temper, scientific humanism, and the public understanding of science. MANS is an organized movement dedicated to fighting superstitions and promoting scientific temper in India, particularly in the state of Maharashtra, founded in 1989 by Shaheed Dr. Narendra Dabholkar.

We have initiated the observance of ‘National Scientific Temper Day on the 20th August every year, which commemorates the day Dr Narendra Dabholkar was martyred in 2013. We appeal to you to join in this endeavour.

We have also initiated the following concomitant statement, which has been endorsed by  Dr. Jayant Naralikar, Dr. Naresh Dadhich, Dr. Spenta Wadia, Dr. VidyanandNanjundiah, Dr. K. Subramaniyam and many other scientists and educationists:

“As citizens of India as well as part of the world community of the 21st Century, it is one of our fundamental and civilizational duties “to develop and promote the scientific temper, humanism and the spirit of inquiry and reform;” as per article 51 A(h) of our Constitution.
We believe that this task has not received the attention and commitment it deserves and calls for, and on the contrary, there is a very worrying and disturbing atmosphere being whipped in the opposite direction. There is therefore an urgent need to take it up with much vigour and enthusiasm in a systematic and sustained manner at all levels. The role of schools, colleges and the educational institutions is particularly important and critical in taking it forward. Promoting scientific temper is not only the work of scientists, but of all citizens in Indian democracy.
Dr. Narendra Dabholkar was one of the foremost proponents of scientific temper in recent times. Through his lectures and writings, he spread the message of scientific temper among all sections of society. It is therefore particularly appropriate that 20th August, the day on which he was martyred should be observed as ‘National Scientific Temper Day’ all over the country.
We the undersigned, endorse and support this move, and appeal to all informed and concerned people as well as all educational institutions, organizations to join in this collective national endeavour for observing ‘National Scientific Temper Day’, towards building an India of reason and humanity with well informed and rationally empowered citizens.”

We hope to observe National Scientific Temper Day on a broad and massive scale. This cannot happen without the widespread collective effort of many like-minded organizations, school managements, teachers and individuals.  We send this appeal to you to join this broad collective effort in view of the committed work that you/your organization is doing for the promotion of constitutional values.

We also request you to join this national movement for observing National Scientific Temper Day 0n Aug.20th and by sending a brief endorsement email with your details to gsaipsn@gmail.com and spread it to your colleagues.

With best wishes,

Dr. Sabyasachi Chatterjee                                                                                                                             Avinash Patil
President,                                                                                                                                                           Executive President
AIPSN.                                                                                                                                                                  MA

National Scientific Temper Day


National Scientific Temper Day
20 August 2018
All India People’s Science Network (AIPSN) Statement
Scientific  temper , is under unprecedented attack in India today. 
20th August is being observed as National Scientific Temper Day in honour of Dr.Narendra Dabholkar, champion of scientific temper, who was killed in an act of premeditated murder by right-wing  communal terrorist forces, on this day five years ago in 2013. The killing shocked the nation, but more rude shocks came when several similar murders were inflicted by the same forces over the next several years. Govind Pansare, who worked to support inter-caste marriages, lectured on the real legacy of Shivaji, and condemned the glorification of the assassin of Mahatma Gandhi, was killed in 2015. M.M.Kalburgi, a scholar who studied socio-religious reform movements of the 12th century in Karnataka and the related history of religious movements, was murdered in 2016. And Gauri Lankesh, fearless journalist and fierce critic of communal bigotry, was gunned down in 2017. Some of these murders were probably committed by the same extremist group. But the common thread definitely was the threat the extremist forces felt from these campaigners for reason and the scientific temper and against bigotry and intolerance.
These murders are extremist expressions of the intolerance openly displayed by some mainstream communal forces, including persons holding high political office, targeting sometimes with violence all those who question their bigotry, communal hate campaigns, and continuous dissemination of fake news, “alternative facts” and falsified histories, including in science.
An imaginary golden past of “Vedic science” is being propagated by these forces. Real and great achievements in science and technology, and rich traditions of rational thought,  emanating from the Indian sub-continent are being sidelined, while obviously fake achievements are being proclaimed by the top-level Central and State Ministers, Chief Ministers and political functionaries, substituting myth for history, such as that in ancient India, the Ganesh deity was the product of plastic surgery, that aviation and space technology, television and internet were from the time of the Mahabharata, that India had in vitro fertilization etc, and all this several thousands of years before any recorded history. Many other fantastic claims have been made by some state and central leaders, such as that the Vedas contained theories “better than” Einstein’s e=mc2!
In sharp contrast, real and important path-breaking contributions to science and technology in India emanating from many different strands of culture of the sub-continent, not just the Vedic-Brahmanic, such as the Jaina, Buddhist, Islamic, peasant, adivasi and from other working people are being ignored. Contributions of the artisan communities in India, who were actively involved in the development of crafts, technologies and productive forces, are also ignored, revealing persistent social blind-spots and prejudices.  Many other civilizations too have made important even seminal contributions. Understanding and highlighting the many real contributions from India to the universal body of S&T knowledge is tribute enough to India’s civilizational past, without having to invent any.
Scientists, eminent scholars and others from India and abroad, including Nobel Laureates, who express their disagreement with such views, have been attacked as anti-national, western-oriented, and “sons of Macaulay”. Pseudo-histories and anti-scientific views are being incorporated into school curricula and college/ university teaching. So-called “research” to “prove” pseudo-scientific claims in both the sciences and social sciences are being officially funded by government. Universities have become arenas of constant assault, often literally, on intellectual autonomy and critical thinking.
The aggressive anti-science and anti-rational atmosphere whipped up by obscurantist forces with official support has generated a climate of intimidation and even violence in an attempt to suppress a scientific outlook and critical thinking in our educational and intellectual institutions. Funding for scientific research is being cut, while social science research is being throttled.
Developmental programmes are being formulated without significant S&T and other research inputs. Mega projects like the Jaitapur Nuclear Power, the Bullet Train, Smart Cities etc., are being undertaken with no scientific inputs in the public domain. Development policies in industry and agriculture, in key infrastructure areas like energy, coal, oil and gas, power, transport and for basic needs like food, water and health are being driven by corporate interests with little concern for the poor or for the common citizen and without any public scientific debate. Environmental concerns are being systematically sidelined. This systematic devaluation of S&T and research, and the suffocation of critical thinking in educational institutions and in society at large, will severely hamper the future of the country, especially of its youth in this knowledge era.
We assert that promoting scientific temper, defending plurality, harmony and composite culture is a fundamental duty of all citizens, and especially of professional scientists and social scientists, as enjoined in the Directive Principles of our Constitution. The right and duty to question is basic, not only for science, but also for democracy.
It is essential that this onslaught on scientific temper, critical thinking and plurality, be vigorously resisted. Science has an important role to play today in defending democracy and the Indian Constitution. AIPSN appeals to all organizations, institutions and individuals committed to promoting scientific temper to come together for observing the National Scientific Temper Day, and working together in the days to come to defeat the ideology of communal hate politics and build an India of reason and humanity with well informed and empowered citizens.

                              


Towards observing National Scientific Temper Day on 20th August
1.      Subka Desh Hamara Desh (SDHD) phase-2 would be continued with a grand programme of National Scientific Temper Day (NSTD)campaign and simultaneous programme on 20th August with massive rallies at National, State and District HQs.
a.      Preparatory Works:
                                                              i.      National Plan for observing NSTD
1.      Resources preparation by the Centre and will be available on All India People’s Science Network (AIPSN) website and from other sources from July onwards
                                                            ii.      State Level Plan For observing NSTD :
1.      A state level core committee may be formed to use the resources available from the all India centre and collect other resources and make it suitable to the state campaign plan.
2.      A state level Workshop to be conducted with the resources provided  by the centre
b.      Activities proposed.. Aug 6th to 20th Hiroshima day to National Scientific Temper Day….. A fortnight period of Scientific Temper  Campaign
                                                              i.      Up to 20th Aug.
1.      School level programme with Science Experiments for method of science
2.      Miracle exposure and performing small skits and songs at the Villages / Grassroots
3.      Formation of Broad based committees/ use Global March for Science Platform
4.      Grassroots dialogues, District and State level Conventions on Attack on Science and Reason and Scientific institutions
5.      Online signature campaign
6.      Press Meet on 17th of August
                                                            ii.      On 20th Aug
1.      District, State and National  Capital Rallies with meetings
2.      Badge wearing by members of  the Platform
3.      Mass singing at schools: “Ask why’ song
4.      Distribution of leaflets with the appeal of leading scientists
5.      Signature campaign for Scientific Temper
6.      Any other innovative campaign

Access the details of programmes of campaign in AIPSN websites:  www.aipsn.net and www.aipsn.in, send mail to gsaipsn@gmail.com, or visit aipsn face book page 

Resources available soon at the AIPSN website www.aipsn.net or through member organizations
1.      Appeal of leading scientists to observe NSTD to prints as pamphlet to distribute to public available at  www.navnirmitilearning.org
2.      Appeal by AIPSN and MANS to various organizations to observe NSTD jointly or independently. This appeal will be available in www.aipsn.net  .
3.      AIPSN Statement on Scientific Temper will be available at www.aipsn.in website through which the scientists including Social Scientists, Educationalists, Cultural, Social and Educational activists.etc. can sign and take effort to get signatures.
4.      A PPT on what is scientific Temper, Why scientific Temper, scientific temper relevant to the contemporary world and the need of the hour
5.      Two important lectures of Dr.Dhabolkar,
6.      Constitutional part of 51 a (h)
7.      Palambur Declaration-1981 and its revisit
8.      Selected Lecture notes from famous book Angel, Devil and Science by Dr.P.M. Bhargava and Chandana Chakrobarthy
9.      Discussion on AIPSN Statement of Scientific temper-2018
10.  SD HD booklets/PPT specific to campaign: Science and Reason, S&T Challenges- two parts of Heritage of S&T and Development for whom
11.  18 science experiments for school to understand method of science
12.  Theme song for Mass singing by children: “Ask why”, in various languages
13.  Anti superstition bills of Maharashtra and Karnataka




गुरुवार, 31 मई 2018

संसदीय राजनीति और उसके नेता

Posted: 27 May 2018 11:42 PM PDT
दलित साथियों को स्पष्ट रहना चाहिए कि सुश्री मायावती संसदीय राजनीति कर रही हैं। संसदीय राजनीति में कोई भी नेता जनता का भला नहीं कर सकता है। फिर सुश्री मायावती तो अवसरवाद की राजनीति के लिए उद्भूत नेता हैं। न सुश्री मायावती, न मोदी, न कोई और नेता संसदीय राजनीति से अपनी कौम का कुछ भी भला नहीं कर सकता है। संसदीय राजनीति का गठजोड़ धर्म और पूँजीवाद से होता है इसलिए वह जनता को अज्ञानता में रखता है तथा आपस में बाँटता है। किसी भी संसदीय पार्टी को अपना समझना जनमत को अंधेरे में ढकेलना है। जनता की यह मानसिकता कि अमुक मेरी पार्टी है और इसके सत्ता में रहने से मेरा भला होगा-ही संसदीय पार्टियों और उसके नेताओं की जीत है जबकि सभी पार्टियां और सभी नेता अपनी जाति और अपना धर्म कहकर ख़ास जातियों को बेवकूफ़ बनाती हैं।

अधोलिखित प्रतिक्रिया मेरे उपर्युक्त वक्तव्य को लेकर है। इस प्रतिक्रिया से दलित वैचारिकी की अपरिपक्व शैली देखी जा सकती है। लेखक लिखता क्या है और पाठक समझता क्या है। मैंने जब संसदीय राजनीति की कमियों की तरफ इंगित किया तो मेरे बुद्धिजीवी दलित पाठक ने सर्वप्रथम एक प्रश्न किया जो मेरे लेख से सम्बंधित नहीं है। उसका प्रश्न उसकी मानसिकता के उस स्तर का है जहाँ वह संसदीय राजनीति के इतर और कुछ चिंतन नहीं कर सकता है अथवा अभी तक इससे आगे किसी और स्तर पर सोचा ही नहीं है। उसका प्रश्न है, "क्या आप लोग मताधिकार का प्रयोग नहीं करते हैं?" अब इसका क्या जवाब दिया जाय। क्या यह कह दिया जाय कि हां, मैं वोट में विश्वास नहीं रखता हूँ। वैसे भी यह बात सही है कि भारत जैसे देश में जहाँ बूथ कैपचरिंग होती रही है, अब मशीन में ही फ्रॉड कर लिया जाता है, और जनता को जाति और धर्म में गुमराह करके वोट डलवाया जाता है, माफिया अपने आतंक से मानसिक रूप से प्रताड़ित करके वोट ले लेता है, ऐसे में वोट का क्या वैल्यू है? आगे मेरे पाठक ने आरोप लगाया, "ऐसा विश्लेषण जनता को गुमराह करने वाला होता है।" विमर्श को गुमराह कहना अनुचित है। वैसे मैंने संसदीय राजनीति के नेताओं के कमजोरियों की चर्चा की है, न कि किसी खास नेता व खास पार्टी की बुराई की है। ये हैं दलित बुद्धिजीवी। इसीलिए मैं दलित बुद्धिजीवियों को शैशवावस्था का प्राणी कहता हूँ। ये न डॉ. आम्बेडकर को पढ़ते हैं, न डॉ. आम्बेडकर को समझते हैं। इनको "जय भीम" कहने की लत लग गई है। ये दलित खोल से निकलना नहीं चाहते हैं। जब कोई दलित यह कहता है, "लोकतांत्रिक देश में सामाजिक क्रांति के साथ राजनीतिक समझ और उसकी सही दिशा आवश्यक है।" तो इसका सीधा अर्थ यह होता है कि हम संसदीय लोकतंत्र में विश्वास करते हैं और 'समाजिक क्रांति' की अपेक्षा करते हैं जो संविधान के विपरीत अपराध है। दूसरी बात यह भी कि हम यह भी मानते हैं कि लोकतंत्र ने अभी भी 'राजनीतिक समझ' और 'राजनितिक दिशा' सुनिश्चित नहीं किया है। यह सही है, "भारत मे संवैधानिक अधिकार राजनीतिक रास्तों से ही बने हैं और बचाये जा सकते है।" लेकिन, किसी भी चिंतक को यह बात भली भांति समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र में बहुमत दल किसी भी संवैधानिक अधिकार को बदल सकता है ऐसा अधिकार संविधान किसी भी बहुमत दल की राजनैतिक पार्टी को उपलब्ध कराता है। अभी तक भारतीय संविधान में 99 संसोधन किए जा चुके हैं, वह इसी संविधान और उसकी प्रणाली का ही गुण-अवगुण है। यह भी सही है कि कोई दूसरी पार्टी अस्तित्व में आए तो वह नए कानून बना सकता है जो लोकहित में हो, लेकिन उसकी गारंटी उसके पदच्युत होते ही ख़त्म हो जाती है। इसलिए संसदीय लोकतंत्र में अधिकार बचाने की गारंटी भी अक्षुण नहीं है। कभी-कभी दलित चिंतक इतना स्वार्थी हो जाता है कि वह भी सदियों के संताप की तरह निर्णय ले लेता है और किसी आदर्श की अवहेलना करने लगता है। उसे उच्च नीति-नैतिकता और अदर्श ब्राह्मणों के प्रतिक्रिया में अच्छा ही नहीं लगता है। वह अपने चिंतन में इस तरह मुखरित हो उठता है, "मुझे समझ में नहीं आता है कि आज आदर्शवाद का चोला वो ओढ़ते है जो सदियों से पीड़ित रहे हैं और इतिहास गवाह है कि जो आज पीड़ित है इनके पूर्वजों के आदर्शवाद के कारण ही धन, धान्य और राज चला गया। फिर से उसी आदर्शवाद की तरफ ले जाकर उन्हें हजारो सालों के दल दल मे धकेलने का प्रयास चाहे-अनचाहे न किया जाय तो बेहतर होगा।" दलित ब्राह्मणों के दुराचारी वर्चस्व के कारण इतना पीड़ित है कि वह इनके प्रति बिल्कुल सहिष्णु नहीं होना चाहता है। वह बदला लेना चाहता है। दलित अपने वर्चस्व की स्थिति में खुद ही ब्राह्मण बनना चाहता है और ब्राह्मणों को सदियों तक शूद्र बनाकर प्रताड़ित करना चाहता है, छूत-विचार करना चाहता है। वह भूल जाता है कि ब्राह्मणों ने दलितों के साथ अमानवीयता का व्यवहार जरूर किया था लेकिन अमानवीयता के विरुद्ध मानवीयता ही धर्म है जो धारण करने योग्य होता है। डॉ. आम्बेडकर ने बौद्ध धर्म अपना कर महान मानवता का पाठ पढ़ाया था। वे एक व्यक्ति एक मूल्य का सिद्धांत लागू करना चाहते थे। वे लोकतंत्र चाहते थे। वे समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व चाहते थे। वे निजी संपत्ति का उन्मूलन चाहते थे। यह सब एक बड़ा आदर्श है। बिना आदर्शवादी हुए हम ऐसा समाज नहीं निर्मत कर सकेंगे।

इस विश्लेषण से आम लोगों में तर्क की क्षमता पैदा होती है और वे अपने मन की इक्षित बातें इस फ्रंट पर आसानी से रख लेते हैं तथा जनमानस में भी चर्चा करते हैं जिससे राजनीति का यथार्थ और नेताओं के निहितार्थ स्पष्ट होने लगते हैं। मेरे वक्तव्य सिर्फ थीसिस हैं। जनता के पास उसकी एंटी थीसिस मौजूद है जो कालान्तर में सिन्थिसिस बन जाती है। इसलिए किसी भी मतान्तर से डरने की जरूरत नहीं है।

सिर्फ़ एक दलित की फ़ालतू दौलत दिखाने से जातिवाद की कुंठा प्रकट होती है जबकि आवश्यकता है इस तरह के हर पार्टियों के प्रत्येक नेताओं के इनकम के स्रोत को उजागर किया जाय। कांग्रेस के पंडित सुखराम देश के पहले उदाहरण बने। आज सभी नेताओं का लक्ष्य धन-दौलत इकठ्ठा करना है। जाति और धर्म की बात बेईमानी है। वर्तमान राजनीति का चरित्र ही ऐसा है कि कोई भी नेता दुश्चरित्र है। जब हम किसी जाति के नेता पर हमलावर होते हैं तो हम अपनी जाति की कुंठा दिखाते हैं। इस तरह के अप्रोच हमें जातिवादी नफ़रत से निकलने में मदद नहीं करते हैं बल्कि एक दूसरी तरह से हम जातिवाद के शिकार हो जाते हैं। जब भी हम उदहारण दें जातिवाद की झलक न हो। नहीं तो हम पर भी वही तोहमत लग जाएगी। जब हम दूसरों को रास्ता दिखाते हैं तो उससे पूर्व मेरे अंदर से वह गलतियां ख़त्म होनी चाहिए।

जब कोई अतिवादी यह कहता है, "दलित भले ही मायावती संसदीय राजनीति कर रही है लेकिन जिस समाज के लिए कर रही हैं उनमें दृढ़ता और आत्मविश्वास की बृद्धि होती है।" तो वह स्वयं को जातिवाद के फ्रेम में रहकर चिंतन करता है। लेकिन, यदि बाबा साहब के विचारों की पूर्ति पर ध्यान दिया जाता रहे तो आंबेडकरवाद का विजय हो जाएगा और ब्राह्मणवाद की हार निश्चित हो जाती। इससे कितनों का मनोबल ऊंचा होगा? आप को पता होना चाहिए कि अभी भी 27 करोड़ दलित निरक्षर और भूमिहीन हैं। उनके लिए क्या हो रहा है और कौन कर रहा है? जब हम दलितों से इस तरह का संवाद बनाते हैं तो वह सरकार की तरफ से अपने मित्र शक्तियों पर हमलावर हो जाता है। यहाँ भी दलित तर्क शक्ति की जरूरत नज़र आती है। वह कहता है, "यह कहना कि कुछ नहीं हो रहा बेमानी होगी। जिस गाँव से हम तालुक रखते थे, वहाँ पहले सड़क नही थी, स्कूल नहीं था। आज पक्की सड़क है, स्कूल है। आज 27 करोड़ दलित निरक्षर है तो कारण सिर्फ आप हम और वह तमाम लोग हैं जो आगे तो बढ़ गए पर उनकी तरफ मुड़ कर नहीं देखते। गाँव से शहर आकर मकान बनवा लिया। अपने बच्चों को पढ़ा लिया। बस, यही मानसिकता निरक्षरता तो देखता है पर वह निरक्षर क्यों है इसके मूल मे नहीं जाती। अगर हमारे बच्चे साक्षर
हो रहे हैं तो वह निरक्षर न रहें इसके लिए आपका और हमारा योगदान क्या रहा?" जब हम संसदीय राजनीति के असफलता की चर्चा कर रहे हैं तो दलित चिंतक व्यक्तिगत कर्तव्यों पर क्यों आकर टिक जाता है? क्या यह दलित बुद्धिजीविता की कमी के कारण ऐसा सोचता है या तर्क परंपरा में अपनी हेठी समझ कर कुछ भी तर्क देना शुरू कर देता है क्योंकि दलित निरक्षरता का कारण संवैधानिक मसौदा ही है जो दलितों का बौद्धिक वर्ग सोचता ही नहीं है। दलितों का बौद्धिक वर्ग सिर्फ अपने आरक्षण के लिए सतर्क और आंदोलित रहता है।

बहुत से दलित कहते है कि सुश्री मायावती की वजह से दलितों में दृढ़ता और आत्मविश्वास पैदा हुआ है। कोई शक नहीं कि आप और मेरे जैसे दलितों में दृढ़ता और आत्मविश्वास पैदा हुआ है लेकिन 27 करोड़ दलितों में सुश्री की वजह से आत्म विश्वास क्यों नहीं पैदा हुआ? क्या सुश्री मायावती को उनके लिए नहीं कुछ करना चाहिए? मेरा तो बस यह सवाल है कि संसदीय राजनीति में मायावती हो या कोई और सभी अपनी जातियों का बेहतरीन शोषण करते हैं। उनके लिए कोई भी संवैधानिक रास्ता सुनिश्चित करने की तकलीफ़ नहीं उठाते हैं।

दलित विमर्श में हमारे साथी हमलावर होकर पूछते हैं, "आप 27 करोड़ को छोड़ दीजये आप अपने गाँव जाईयेगा केवल अपने नाते रिश्तेदारों को देखियेगा कितने लोग आप की तरह शहर मे मकान बनाने मे सक्षम है, कितने मेदान्ता के कई चक्कर लगाने मे सक्षम है, और अगर नहीं है तो आपका क्या योगदान है कि वह भी सक्षम बनें।" मैं तो आप की इसी बात को उठा रहा हूँ। इसका जवाब हमें ढूढना है इसलिए अनेक राजनीतिक सवालों से टकराना है एवं तर्क पद्धति को विकसित करना है। लेकिन हमारे कई मित्र सवालों के हल खोजने के बजाय मुझसे या मेरे जैसों से भिड़ने की ठान लेते हैं। वहां सोचिए जहाँ से भला होना है। भला तभी किया जा सकता है जब हम उनके लिए क्रांतिकारी सिद्धांत सुनिश्चित कर एक क्रांतिकारी संगठन को विकसित करे। वह संगठन अपने कार्यकर्ताओं के साथ आंदोलन खड़ा कर सरकार को मजबूर कर दे कि शोषित-पीड़ितों के लिए हर आवश्यक भौतिक और नैतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कार्य संपादित करे।

दलित साथियों का एक सवाल हमेशा तीर-कमान की तरह तैयार रहता है कि बाबा साहब ने क्यों कहा था कि हम को पढ़े-लिखे लोगों ने धोखा दिया, क्योंकि दलित जातियाँ उनकी बात नहीं मान रही थीं और मनमानी कर रही थीं। आज भी दलित जातियाँ बाबा साहब की बात "जातिप्रथा उन्मूलन", "राजकीय समाजवाद", "एक व्यक्ति एक मूल्य", "लोकतंत्र", "आर्य कौन हैं", "पृथक निर्वाचन", "पूना पैक्ट" "संपत्ति का समानीकरण" "समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व" को उनके अनुसार नहीं मानती हैं। अपने-अपने तरह से राजनीति में उलझी हैं। दलित जातियाँ नाम बाबा साहब का जरूर लेती हैं, ब्राह्मणवाद का विरोध जरूर करती हैं लेकिन बाबा साहब की एक भी बात नहीं मानती हैं और न ब्राह्मणवाद के यथार्थ में विरोध ही करती हैं बल्कि दलित जातियाँ स्वयं ही अपने जाति का प्रमाण-पत्र बनवाकर ब्राह्मणवाद को मजबूत करती हैं। कहाँ है जातिवाद का विरोध?

भारत में हर व्यक्ति अपनी ही जाति का भला करने में लगा हुआ है और उसके नेता की राजनीतिक मजबूरी है कि वह जाति के नाते अपनी जाति का भला नहीं कर पाता है। सुश्री मायावती ने अपने ही गुरु रहे मान्यवर कांशीराम साहब के बहुजन के सिद्धांत को सर्वजन वैचारिकी में तब्दील कर दिया तथा स्वीपर को दी जाने वाली नौकरियों को सर्वजन को दे दिया। एससी/एसटी 89 का कानून 2007 में कमजोर कर सर्वजन को मुक्त कर दिया। फिर भी जानता ने अपनी जड़ मजबूत करने के लिए 2007 का चुनाव सुश्री मायावती के पक्ष में जिताया। जनता विमर्श करने का ऑप्शन खुला रखती है लेकिन अपनी ही रेड़ मारने वाले के पक्ष में वोट देती है जिससे उसकी जड़ कमजोर न होने पाए।

कभी-कभी कुछ पूर्वग्राह्युक्त साथी अच्छी बात के साथ असंतुलित बात भी कहते हैं। एक ऐसे ही साथी का मानना है, "जब कोई ये कहता है कि मैं अमुक जाति का नेता हूँ, तब ऐसा लगता है कि वह उस जाति विशेष का सामन्त है और वह जिसका नेता बन रहा है, वह जनता उसका गुलाम।" यह बात बहुत ही खूबसूरत है, बहुत ही तर्क संगत है। किंतु जब वह इसे स्पष्ट करने के लिए उदाहरण प्रस्तुत करता है तो उसके अंदर छिपी जातीय संस्कृति का अवशेष दिखाई पड़ने लगता है, जैसे की उसी व्यक्ति के उक्ति से यह बात समझा जा सकता है, " मायावती विकृत मानसिकता से ग्रस्त हैं। इनसे किसी का भी भला नहीं हो सकता है।" सवाल ये है कि अन्य नेता दूध के धुले हैं? जब आप नेताओं की कृतियों की बात कर रहे हैं तो मोदी और योगी को भला कैसे साबित कर सकते है जबकि वे भी इसी संसदीय राजनीति के सिपहसालार हैं? क्या बात है पांडेय जी, आप मोदी और योगी को बहुत आदर सहित उच्चारण कर रहे हैं? यही तो जाति के प्रति मोह है जब आप कहते हैं, " भला मोदी-योगी जी से भी नहीं हो सकता है।" उनके कार्यों को नकारते हुए भी उनके नाम में "जी" शब्द जोड़कर इज्जत बक्सते हैं। किसी भी व्यक्ति व नेता को इज्जत देना बुरी बात नहीं है लेकिन उसी देश, काल, परिस्थिति, पार्टी और राजनीति के किसी दलित को "विकृत" कहें और सवर्ण को "जी" कहकर संबोधित करें तो यह अनजाने ही सही सवर्णीय मानसिकता को प्रदर्शित करता है। संसदीय राजनीति की आलोचना करने वाला निश्चित ही पूँजीवाद विरोधी समाजवादी क्रान्ति का कायल होगा। वह संसदीय राजनीति के नेताओं को सामान रूप से गन्दा मानता है किंतु मनुष्य होने के नाते किसी भी तरह के अपशब्द से बचता है। आप ने लिखा है, "ये संक्रमण काल है।" निश्चित ये संक्रमण काल नहीं है। यह मरणासन्न पूँजीवाद का साम्राज्यवादी काल है। इस काल में अधिकतम मुनाफा कमाना पूँजीपति का उद्देश्य होता है। आप की अगली बात जरूर सत्य है कि, "इस समय कोई नेता नहीं दिख रहा है जो सामान्य जन के हित में कार्य करे।" एक बात और, इस समय सभी नेता अपनी जातियों को बेवकूफ बनाने के लिए पीएचडी करते हैं तथा अन्य कार्यकर्ताओं को भी अपनी जातियों को बेवकूफ बनाने की जुगत ढूढ़ने में लगाए रखते हैं। जनता जाति और धर्म के नशे में धुत उनकी बात मान लेती है। सुश्री मायावती की मानसिकता बिलकुल भी विकृत नहीं है, वह बहुत अच्छी तरह से सोच समझ कर अपने वर्ग के हितों की रक्षा करती है। कोई विकृत मानसिकता का व्यकि ऐसा नहीं कर सकता है।

यह पोलिमिक और वैविध्यपूर्ण और लाभदाई हो जाती है जब कोई साथी यह कहता है कि जाति और धर्म से जुडी बहसें संसाधन के स्वामित्व से जुड़े सवालों और बहसों से जनता का ध्यान डायवर्ट करती हैं जिसका सीधा फायदा पूँजीवादी व्यवस्था को होता है। आम जनता की समस्याएं वैसी की वैसी ही बनी रहती हैं। सवाल सिर्फ जाति के सम्मान और धार्मिक आस्था का नहीं है बल्कि रोटी, रोजगार और लोकतंत्र का है। परंतु दलित साथी हमेशा डॉ. आम्बेडकर, सुश्री मायावती, मा. कांशीराम, ब्राह्मणवाद, जातिवाद, बसपा और बामसेफ के इर्द-गिर्द ही रहता है। दलितों का मानना है कि यदि संसद पर कब्ज़ा कर लिया जाय तो दलितों की मुक्ति संभव है। ऐसा ही एक साथी का उद्धरण है, "Capture this temple of power for your emancipation." -Dr. B R Ambedkar। उनका वक्तव्य आगे भी है, "ये temple शब्द संसद के लिए ही आया है । स्पष्ट है राजनीति संसदीय ही होगी। पर, पता नही आप कौन सी दुनिया में रहते हैं। लोकतांत्रिक देश है तो संसद तो होगी ही।
वैसे आपने नोट किया होगा कि आप जैसे ही बहन जी के बारे में कोई बकवास लिखते हैं आपके सवर्ण मित्र तुरंत आपकी तारीफ़ शुरू कर देते हैं। बहन जी को मानसिक विकृत तक लिख देते हैं। आपसे पूछना चाहता हूँ जब भी वह शासन चलाती हैं तो आपको मानसिक विकृत लगती हैं क्या? उनके शासन काल में कहीं कोई दंगे की ख़बर ढूंढे नही मिलती, कोई भी व्यक्ति गलत कार्य करे तुरंत कार्यवाही होती है चाहे वो उनकी पार्टी का ही क्यों न हो। अपने ही लोगों को न बक्सना ये शायद आप लोगों की नज़र में मानसिक विकृति होगी। सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय की बात मानसिक विकृत ही कर सकता है। सलाम आपके लेख को और उन लोगों को भी जिन्होंने आपके लेख में अपने comments के द्वारा चार चांद लगा दिए । डॉ. आम्बेडकर ने "राज्य और अल्पसंख्यक" में लिखा है,

"In parliamentary politics, the majority party is able to change very good views and paragraphs, and this is also a failure of parliamentary politics." उसका हिंदी अनुवाद, "संसदीय राजनीति में बहुमत दल बहुत अच्छे मतों-अनुच्छेदों को बदल सकने का समर्थ रखता है, और यही संसदीय राजनीति का फैल्लुअर भी है।"-डॉ. आम्बेडकर। बहुत सुंदर दिखने वाला यह मंदिर कितने समय तक हमारे हाथों में रह सकता है? क्या उसे हाथों में रखने के लिए हम तानाशाही की तरफ बढ़ेंगे? निष्चित नहीं। फिर क्या करेंगे, कौन सा विकल्प खोजेंगे? डॉ. आम्बेडकर ने "State and minorities" में Vallume-l में पेज न.371 से संविधान का ड्राफ्ट लिखा है जिसे नेहरू और राजेंद्र प्रसाद की कंपनी ने माना ही नहीं-में वास्तविक संविधान का मसौदा लिखा है, को पढ़कर हम अपनी भावनात्मक गलतियों को शुद्ध कर सकते हैं और दलित समाज को वास्तविक परिवर्तन के लिए गाइड कर सकते हैं। सवाल है किसी अन्य साथी की बातों को गहराई से महसूस करने की और यह मानने की कि वह कहीं आप के बराबर अथवा आप से अधिक पढ़ता-लिखता व चिंतन करता है। संविधान सभा का गठन 11.5 उच्च सवर्णों, राजे-रजवाड़ों के वोट से हुआ है। आम जनता का कोई योगदान नहीं था। यह संविधान औपनिवेशिक सत्ता का प्रतिफल है। डॉ. आम्बेडकर साहब की संविधान सभा की स्पीच सुनिए या पढ़िए, आप की ग़लतफ़हमी दूर हो जाएगी। आप की नफ़रत दूर हो जाएगी। डॉ. आम्बेडकर साहब के संविधान का स्वरूप संसदीय नहीं, राजकीय समाजवाद का था लेकिन धूर्तों ने उनके ड्राफ्ट को स्वीकार न करके दलित जातियों को गुमराह कर दिया। संसदीय राजनीति में जीवन-यापन करना एक बात है और संसदीय राजनीति की खामियों को बताना दूसरी बात है। अन्य जातियों की तरह दलितों के अधिकार साथियों को संसदीय राजनीति अच्छी लगती है क्योंकि वह मानता है कि इस देश का संविधान दलितों के मशीहा डॉ. आम्बेडकर ने लिखा है। अब डॉ. आम्बेडकर ने लिखा है तो वह आलोच्य कैसे हो सकता है, वह गलत कैसे हो सकता है। वह संविधान को त्रुटिहीन मानता है। संविधान और संसदीय व्यवस्था दलितों के लिए पूज्य है। जब मैं या कोई अन्य संसदीय व्यवस्था पर चोट करते हैं तो अन्य भारतीय से अधिक दलित तिलमिला उठता है। दलित न डॉ. आम्बेडकर को पढ़ता है, न संविधान को पढ़ता है और न संसदीय व्यवस्था का मतलब ही समझता है। ये सभी चीजें उसके लिए आस्था का विषय हो गई हैं। आस्था में मनुष्य तर्क नहीं करता है। सुश्री मायावती प्रो दलित कहता है कि मैं मायावती के बारे में बकवास लिखता हूँ। अंधश्रद्धा का वह व्यक्ति यह नहीं समझ पाता है कि मायावती एक उदाहरण हैं, बातें तो इस व्यवस्था के सभी नेताओं की हो रही हैं। ये सही बात है कि जातिवादी मानसिकता से ग्रस्त सवर्ण किसी दलित लेखक के दलित नेताओं पर हमलावर होने से बहुत खुश होते हैं वो इसलिए जब हम अपनी ही जाति के लोगों पर वार करते हैं तो तमाशा देखने वाले और सीटी बजाने वाले ज्यादा मिल जाते हैं।
लेख पर कमेंट्स देखने से पता चलता है कि ये सभी जाति की मानसिकता से ग्रस्त हैं, पर सुश्री मायावती का नाम ले लेने से सभी सवर्ण मानसिकता के साथी भी लेख से सहमत जता रहे हैं । लेकिन, आप यह क्यों भूल जाते हैं कि जो काम सवर्ण कर रहा है वही कार्य करने के लिए आप मुझसे भी अपेक्षा करते हैं। आप भी चाहते हैं कि हम दलितों का ही पक्ष लें जैसे ब्राह्मण ब्राह्मणों का पक्ष लेता है। फिर यही तो जातिवाद है, यही तो जातिप्रथा है। कहाँ है यह आंबेडकरवाद, कहाँ चला गया बुद्ध का दर्शन जिसे आप अप्प दीपो भव कहते हैं, कहाँ गया वैज्ञानिक सत्य जिसे आप वैज्ञानिक कहते हैं, कहाँ गया मानव-मानव का प्रेम जिसे आप मानवतावादी कहते हैं? फिर हम भी भविष्य के बाफले रूप में ब्राह्मण ही तो हैं। वह अन्यायी था हम अन्यायी होना चाहते हैं।

मेरा टिप्पणी उन दलितों के बारे में है जो जातिवादी दृष्टिकोण से काम लेते हैं और मुझे या मेरे जैसे कटु आलोचकों को दलित विरोधी करार देते हैं जबकि हमें एक क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए कार्य करने की जरूरत है। हमें ब्राह्मणवादी झाँसे में आकर अपनी जाति को मजबूत नहीं करना है बल्कि जाति की कमजोर कड़ी को सर्वप्रथम तोडना प्रारंभ करना है।

मुझे आशा और विश्वास है कि आप जातिवादी मानसिकता का विरोध करेंगे। आप जैसे तर्कशील और साहसी व्यक्ति से ही क्रान्ति की उम्मीद है। शेष, न आम्बेडकर को पढ़ते हैं और न उनके सपनों को पूरा करने का उनमें कोई सकल्प ही है। कभी मायावती, तो कभी मेश्राम और कभी भीम आर्मी के चंद्रशेषर उनकी समझ होते हैं। लोग तर्क से नहीं भावना से काम लेते हैं। भावना करुणा का आधार जरूर है लेकिन विज्ञान तर्क की जान है, पद्धति है। बिना विज्ञान व तर्क के करुणा कोरी बकवास सिद्ध होगी। बिल्कुल सही है, बाबा साहब की पुस्तकें आप के घर में होनी चाहिए और उससे भी बड़ी जिम्मेदारी यह है कि आप उन पुस्तकों को पूर्ण रूप से पढ़ डालें। यदि आप ने ऐसा कर लिया है तो आप दलित समाज के बहुत अच्छे प्रवर्तक हैं।

जब भी हम उदहारण दें जातिवाद की झलक न हो। नहीं तो हम पर भी वही तोहमत लग जाएगी। जब हम दूसरों को रास्ता दिखाते हैं तो उससे पूर्व मेरे अंदर से वह गलतियां ख़त्म होनी चाहिए।

सिर्फ़ एक दलित की फ़ालतू दौलत दिखाने से जातिवाद की कुंठा प्रकट होती है जबकि आवश्यकता है इस तरह के हर पार्टियों के प्रत्येक नेताओं के इनकम के स्रोत को उजागर किया जाय। कांग्रेस के पंडित सुखराम देश के पहले उदाहरण बने। आज सभी नेताओं का लक्ष्य धन-दौलत इकठ्ठा करना है। जाति और धर्म की बात बेईमानी है। वर्तमान राजनीति का चरित्र ही ऐसा है कि कोई भी नेता दुश्चरित्र है। जब हम किसी जाति के नेता पर हमलावर होते हैं तो हम अपनी जाति की कुंठा दिखाते हैं। इस तरह के अप्रोच हमें जातिवादी नफ़रत से निकलने में मदद नहीं करते हैं बल्कि एक दूसरी तरह से हम जातिवाद के शिकार हो जाते हैं।

शोषित जनता को व्यवस्था परिवर्तन के लिए एक सक्रिय प्रतिपक्ष बनने के लिए संघर्ष करना चाहिए और जिसके लिए एक जूझारू सतंत्र जन संगठन और क्रन्तिकारी कार्यक्रम तैयार करने की जरूरत है .संसदीय दल या उनके द्वारा बनाये संगठनों से यह काम नहीं हो सकता . शहीद ए आज़म भगत सिंह द्वारा लिखित 'नवजवान सभा की घोषणा पत्र '1926 और ' हिन्दोस्तानी समाजवादी प्रजातान्त्रिक संगठन ISRO की घोषणापत्र '1928 और डॉ अम्बेडकर द्वारा लिखित 'RPI के संविधान की प्रस्तावना' ,1952 में ऐसी विचार स्पष्ट रूप लिखी हुयी है जिसको मौजूदा दौर के परिप्रेक्ष में देखना होगा. इसके अलावा कई ऐतिहासिक दस्ताबेज है जैसे 'India Mortgaged' (T Nagi Reddy) , जयप्रकाश नारायण की 'सम्पूर्ण क्रांति ' आदि।

"वर्तमान क्रांतिकारी कार्यक्रम का मसौदा" क्या हो जिसमें दलित डॉ. आम्बेडकर सहित समाहित हों-लिखना उचित होगा। वैसे मैंने भगत सिंह को भी पढ़ा है और कई तरह से विमर्श को प्रस्तुत भी कर चुका हूँ लेकिन दलित है जो डॉ. आम्बेडकर को तो रटता है किन्तु उनकी वाली नहीं करता है। दलित मायावती को नेत्री तो मानता है किंतु उनसे डॉ. आम्बेडकर के सपनों पर तर्क नहीं करता है। अज़ीब है दलित।

जो भी जातिवादी हैं चाहे दलित हों या सवर्ण उन्हें मेरे विचार अच्छे नहीं लगते हैं। दोनों अतिवादी तरह से मेरा विरोध करने पर उतारू हो जाते हैं। ऐसे लोग न डॉक्टर आम्बेडकर को पढ़ते हैं न मार्क्स को ही लेकिन विद्वान एक नंबर के बनते हैं।

सभी नेता ऐसा ही करते हैं। सुश्री मायावती कोई अलग से नहीं हैं। अलग व्यक्तित्व व समझ हमारी होनी चाहिए क्योंकि क्रान्ति की जरूरत हमारी है, वर्गीय एकता की जरूरत हमको है इसलिए हमें जाति, धर्म, संप्रदाय की खेमेबाजी छोड़कर श्रमिक वर्ग को एक होकर पूँजीवाद व जातिवाद के विरुद्ध लड़ना होगा तथा एक नए समाजवादी संविधान को दृढ़ता पूर्वक लागू करना होगा। इस तरह करने से क्या दलित क्या ब्राह्मण, सभी जातिवादी लोग हमारे विरुद्ध खड़े होकर अनजाने ही पूँजीपतियों का साथ देने लगेंगे क्योंकि ये जनता है और जनता अभी जाति और धर्म के चिंतन से ऊपर नहीं उठ पाई है। यदि हम भी जातिवाद से अपने को मुक्त नहीं कर पाए हैं तो हमें भी अपने चिंतन और संस्कृति को डी-कास्ट कर लेना चाहिए।

बहन जी गलत हैं लेकिन मोदी भी संसदीय राजनीति के धुरंधर खिलाड़ी हैं वे दूध के धुले नहीं हैं। संसदीय राजनीति का कोई भी नेता दूध का धुला नहीं है। जनता की आवाज किसी विशेष पार्टी और नेता के विरुद्ध नहीं, पूरी व्यवस्था के विरुद्ध होना चाहिए। यदि ऐसा नहीं है तो हम किसी न किसी जाति व जातिवादी पार्टी के पक्ष में हैं।

दलितों की आवाज़ क्या है, जातिप्रथा उन्मूलन अथवा जाति का ध्रुवीकरण कर सत्ता हासिल करना? यदि दलितों की आवाज़ जातिप्रथा उन्मूलन है तो उसकी आवाज़ कोई नहीं सुनता है और यदि, उसकी आवाज़ सत्ता पर कब्ज़ा करना है तो सुश्री मायावती से बेहतर कोई नहीं सुनता है।

दलित असहमतियाँ मुझे अच्छी लग रही हैं। इससे मैं पुनरचिन्तन करने के लिए बाध्य होऊँगा। मार्क्स ने कहा था, "बहुत सारे दार्शनिकों ने दुनिया की विभिन्न तरह से व्याख्या की है किंतु, सवाल यह है कि दुनिया को बदला कैसे जाय?" यह सवाल आज तक और अभी भी यक्ष प्रश्न की तरह जिन्दा है। डॉ. आम्बेडकर के "The annihilation of caste" के अनुसार जातिप्रथा उन्मूलन किया जाना है। डॉ. आम्बेडकर ने जाति उत्पत्ति की बहुत ही ऐतिहासिक और वैज्ञानिक व्याख्या करते हुए हमें हमारे इतिहास से अवगत करा दिया है। अब जरूरत शेष है जातिप्रथा की दीवार में वैज्ञानिक तौर-तरीकों से कील ठोंकने की। लेकिन, दुर्भाग्य यह है कि दलित अपने विरोधाभास में जीवित हो उठा है। जैसे उदाहरण के रूप में, जो किसी भी तरह इलीट वर्ग में चले गए उन्हें अब सम्मान चाहिए, इसलिए ब्राह्मणवाद को दोषी मानते हुए ब्राह्मणवाद के जनक पर आक्रामक रहते हैं और शूद-चमार-भंगी कहलवाने से गुरेज करते हैं। ठीक है, मुझे सम्मान का हक़ है। किंतु, वहीं दूसरी ठौर पर दलित जातियाँ शूद-चमार-भंगी बने रहकर वोट की राजनीति भी करना चाहती हैं। एक तरफ जाति उन्हें काटती है और ब्राह्मणों पर जातिप्रथा के प्रवर्तक के रूप में उन्हें जिम्मेदार भी ठहराते हैं दूसरी तरफ जाति प्रमाण-पत्र बनवाकर स्वयं को चमार, कोरी, धोबी, पासी, धानुक और भंगी साबित भी करते रहते हैं। दलित सवाल यह है कि पहले वह सुनिश्चित कर ले कि वह अपनी जाति पर गर्व करेगा अथवा जातिप्रथा को ख़त्म करने का संघर्ष करते हुए इस अपमान जनक संस्कृति को नेस्तनाबूत करेगा। यदि दलित जाति पर गर्व करता है तो फिर ब्राह्मणों पर भी गर्व करना होगा क्योंकि उसी ने तो हमें इस वर्ण-व्यवस्था में गर्व करने लायक स्थान दिया है। और, यदि नेस्तनाबूत करना है तो यह सवाल मार्क्स का भी था और हमारे प्रिय अन्यतम विद्वान बाबा साहब डॉ. भीम राव आम्बेडकर का भी था, जो किया जाना शेष है।

कुछ साथियों की आदत होती है कि एक अच्छे खासे क्रांतिकारी को भी जाति के दायरे में खड़ा करके उसकी मिट्टी पलीद करने लगते है। सच यह होता है कि ऐसे साथी वैचारिक रूप से चाहते तो अच्छा हैं लेकिन बौद्धिक और सांस्कृतिक रूप से जाति के चिंतन से खुद को बाहर नहीं निकाल पाए हैं। जाने-अनजाने उनमें जातीय अहम् बना हुआ है। जो व्यक्ति अपने को डी-कास्ट नहीं कर पाया है, उससे संबंधित जाति को गाली देने से, वह बौखला उठता है क्योंकि अभी वह अपने को उस जाति का मानता है, चाहे वह चमार हो अथवा ब्राह्मण।

दलितों के अंदर जातिप्रथा-उन्मूलन को विमर्श में उतारना अति आवश्यक है क्योंकि यह दलित ही है जो क्रांतिकारी वर्ग होते हुए भी आरएसएस जैसी विचारधारा में फंसा हुआ है। यह वह वर्ग है जो ब्राह्मणों पर आरोप लगाएगा लेकिन अपनी ही जाति से चिपका रहेगा। खुद ही कम्युनिस्ट नहीं हो पाता है। वेद-पुराण, रामायण और महाभारत पढ़ता है लेकिन मार्क्स का द्वंद्वात्मक भौतिकवाद नहीं पढ़ता है। क्यों? क्योंकि दलितों को ब्राह्मणवाद से अधिक मार्क्सवाद से डर लगता है। आखिर क्यों? इसलिए कि इसके मस्तिष्क में एक बात आरएसएस ने घुसेड़ दी है कि बाबा साहब मार्क्सवाद नहीं चाहते थे, मार्क्सवाद आंबेडकरवाद विरोधी है। दलित अपना स्वयं का विवेक नहीं लगाता है क्योंकि पढ़ने से डरता है। 1 प्रतिशत दलित भी डॉ. आम्बेडकर की पुस्तकों को नहीं पढ़ा है। कैसे समझेगा? रिसर्च करके देख लीजिए, एक शहर में दस दलितों के घर में डॉ. आम्बेडकर वांगमय निकल जाए तो कहिए। और, यह भी रिसर्च कर लीजिए कि शहर में एक व्यक्ति से अधिक किसी दलित ने बाबा साहब का वांगमय कंप्लीट पढ़ा हो। यहाँ तक कि "जातिप्रथा उन्मूलन" को भी लोग गलती से नहीं पढ़ते हैं। क्या करेंगे।

दलित विद्वान ब्राह्मणों पर आरोप लगाता है कि ब्राह्मण भले प्रगतिशीलता की बात करे, वह भले ही कम्युनिस्ट क्यों न हो, लेकिन वह अपने जाति को नहीं छोड़ता है। सबसे पहले वह हिंदू रहता है, फिर ब्राह्मण होता है तथा बाद में और अंत में, वह प्रगतिशील व कम्युनिस्ट कहलाता है। यह सवाल भारत में सवर्णों पर ही नहीं, सर! अवर्णों पर भी लागू है। हम दलित जब भी सोचते हैं स्वयं को दलित मानकर ही सोचते-लिखते व प्रतिक्रिया देते हैं। हमने स्वयं को डी-कास्ट कहाँ किया है? अन्य जातियों के सापेक्ष छोड़िए, दलितों के मध्य भी हमारा स्वयं का कोरी, चमार, धोबी, पासी, मुसहर की समझ और ऐंठ बना हुआ है। हम प्रथम भी दलित होते हैं और अंततः भी दलित ही बने रहते हैं। हम दलितों के अंदर तो प्रगतिशीलता छू भी नहीं जा रही है। हम ब्राह्मणों को रोज गरियाते हैं लेकिन ब्राह्मणवाद से खुद ही नहीं निकलते हैं और न बाबा साहेब डॉ. आम्बेडकर के "जातिप्रथा उन्मूलन" के निमित्त कार्य ही करते हैं। हमारी एक मानसिकता है कि ब्राह्मण अपनी जाति नहीं त्याग रहा है। अरे दलित मित्रों! हमने भी तो अभी तक अपनी जाति नहीं त्यागी। आखिर क्या कारण है? जबकि दलित जाति तो भारत की सबसे निकृष्ट और घिनौनी जाति मानी जाती है जिस पर हम-आप गौरवान्वित होने लगे हैं और चमारों, कोरियों तथा पासियों का गौरवशाली इतिहास लिखने व पढ़ने लगे हैं। फिर, हम-दलितों ने अभी तक कोई ऐसा विकल्प तैयार किया क्या कि कोई व्यक्ति अपनी जाति त्यागने के बाद कहाँ और कैसे रहे, उसकी संस्कृति और जीवन पद्धति क्या होगी? खुद दलित जातियाँ ऐसे किसी विकल्प के तहत उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए क्या किसी ऐसे अर्थात "जातिविहीन-ब्राह्मणवाद विहीन जीवन पद्धति संघ" में रह रही हैं, जहाँ से दलित बड़े फ़क्र के साथ कह सके कि सुनो ब्राह्मणों! देखो ब्राह्मणों! मैंने ब्राह्मणवाद को लात मार दिया है, मैंने जातिवाद छोड़ दिया है, मैंने तुम्हारे द्वारा बनाई जाति-व्यवस्था की अपनी भी जाति छोड़ दी है।

मेरा काम है अपने विचार लोगों के मध्य रखना, मैंने लिख दिया। अब उन लोगों का काम है उस पर विमर्श करना। वे अपनी मान्यताओं और शिक्षा के स्तर के अनुसार बात रखते हैं। उनकी बातों से अन्य लोग एक्टिव होते हैं। यही उपलब्धि है। अनेक लोग हैं अनेक मत हैं। ईमानदार लोग धीरे-धीरे सत्य तक पहुँच ही जाते हैं। चालाक लोग अपनी ऐंठ में न बात समझ पाते हैं न कुछ कर ही पाते हैं। वे हमेशा धतुआ बने रहने के फ़िराक में रहते हैं। वे हमेशा दूसरों को कमतर समझते हैं। वे हमेशा अपने को ही बेहतर समझते रहते हैं। क्या किया जाय।

आप ने बात सही समझा है। लोगों को मेरे कहे पर यकीन न हो कोई बात नहीं, लेकिन उसकी पुष्टि के लिए आप बाबा साहब के पास तो जाइए, उनकी लिखी पुस्तकें तो पढ़िए और सत्यापित करिए मेरी बात। लेकिन, मेरी बात भी गलत कहेंगे और बाबा साहब की बात जानने की जहमत भी नहीं उठाएंगे।

अरे, कई बार तो ऐसा भी होता है कि साथी लोग सुश्री मायावती जी की तो तरफदारी करते हैं लेकिन सुश्री मायावती जी की सर्वजन वाली बात भी नहीं मानते हैं। जब मायावती जी को ब्राह्मणों से परहेज़ नहीं है तो आप क्यों करैले को और तीता करते हैं।

एक ब्राह्मण साथी ने लिखा है, "जब हम तुम्हें नीच समझते थे तब तुम मेरा सम्मान करते थे और आशा करते थे कि मैं तुमसे प्यार से बोलूँ किन्तु अब जब मैं तुम्हें गले लगाना चाहता हूँ, भेदभाव को छोड़ना चाहता हूँ तो तुम आग मूतना शुरू कर दिए हो और नफ़रत का बीज बो रहे हो। संख्याबल में मुझसे बहुत अधिक होने के बाद भी इतिहास में तुम मुझसे हार गए और मेरे गुलाम बन गए। तुमने अपनी औकात देख ली है। हमने साजिश करके तुम्हारे विरुद्ध न जाने कितनी किताबें लिख डाली और तुम एक किताब नहीं लिख पाए, तुमने अपनी विद्वता भी देख ली है। इसलिए, सहिष्णुता और सामंजस्य बरतों, नहीं तो दुबारा लतियाये गए और गुलाम बनाए गए तो हमारे दरवाजे के सामने निरीह बैठे-बैठे तोते की तरह बस "जय भीम-जय भीम" रटते रहोगे।"

वैसे मुझे इस संबंध में यह कहना है, हम विकास के उस चरण में पहुँच गए हैं कि हमें दुबारा गुलाम बनाना नामुमकिन है। मानसिक विकास का स्तर हमें मरने-मिटने को तैयार कर देगा। हाँ, उसकी यह बात सही है कि हमें रणकौशल अपना कर समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व प्राप्त करने की लड़ाई लड़नी चाहिए। ब्राह्मणवाद एक नफ़रत और ऊँच-नीच की संस्कृति है। हमें उसे न मानकर उसको कमजोर कर देना चाहिए लेकिन उसके समर्थकों के आस्था को जातीय आधार पर चोट नहीं पहुंचानी चाहिए। हमें ब्राह्मण-सवर्ण विरोध नहीं करना चाहिए जिस तरह हम मुस्लिम-इस्लाम विरोध नहीं करते हैं अथवा इस्लाम हिंदू रीति-रिवाज़ों का विरोध उनके मध्य में कहीं नहीं करता है न हिन्दू इस्लाम के मध्य कोई विरोध पैदा करते हैं। वे उनकी नहीं मानते तो वे उनकी नहीं मानते हैं। यह विरोध का नहीं अपनी श्रेष्ठता का मामला है लेकिन दलित है जो यह कहता फिरता है कि ब्राह्मण हमें नीच समझता है। अरे ब्राह्मण के नीच समझने को आप सही क्यों मान लेते हैं, क्यों उसकी बातों से प्रभावित हो जाते हैं? वह तो इस्लाम को भी नीच मानता है तो वह कहाँ अपनी फिलॉसफी बदल लेता है। वह अपने घर में नीच मानता है मानता रहे। मैं उसकी बात नहीं मानता। उससे क्यों अपेक्षा करते हैं कि वह अपने घर मुझे खिलाए-पिलाए, अपने रजाई-गद्दा में सुलाए, अपनी चारपाई पर बैठाए? वो हमें कुर्सी देता है हम उसे कुर्सी दें। वह हमें नीच समझता है, हम भी उसे नीच समझें। किन्तु, जो सवर्ण हमारे साथ ऐसा व्यवहार नहीं करते हैं हम उनसे नफ़रत क्यों करें, उनमें नफ़रत क्यों बोएं? समता पहले विचारों में ही आएगी फिर व्यवहारिक रूप से जातियों के स्तर पर समता लाई जा सकती है परंतु वैमनस्य पैदा करके हम जाति की मानसिकता एवं संस्कृति नहीं ख़त्म कर सकते हैं। प्रगतिशील सवर्णों को साथ लेकर काम करना बुरा नहीं है।

गैर दलित साथी के उस वक्तव्य से हमें अपना मूल्यांकन करना चाहिए। सर्वजन के रूप में हम एक तरफ सुश्री मायावती का पक्ष लेते हैं लेकिन दूसरी तरफ सांस्कृतिक, बौद्धिक और व्यवहारिक तौर पर उन्हीं के दर्शन का विरोध करते हैं। ऐसा क्यों? एक तरफ हम "जय भीम" कहते हुए नहीं थकते तथा बाबा साहब के ग्रेट अनुयायी बनते हैं लेकिन दूसरी तरफ बाबा की मूल विचारधारा समझते ही नहीं, उनकी लिखी पुस्तकें नहीं पढ़ते, यहाँ तक कि बहुत सारे स्तर पर हम बाबा साहब के विरोध में खड़े मिलते हैं। ऐसा क्यों?

आप समझ सकते हैं कि बाबा साहब की मूल विचारधारा न समझने से और वैसा समाज न बनाने से हम सामाजिक विकास में पुनः सदियों-सदियों के लिए पिछड़ जाएंगे।

दलित साथियों को इस विषय पर बहुत गम्भीरता से चिंतन करना पड़ेगा कि वह "जय भीम" रटता हुआ भी बाबा साहब की लिखी बातों को क्यों नहीं मान रहा है? वह सुश्री मायावती के सर्वजन के आधार पर वोट देता हुआ समाज में सर्वजन के सिद्धांत पर क्यों कार्य नहीं करता है? दलितों में अपने मनीषियों का ऑरिजिनल विचार क्यों नहीं फैलता है क्यों अन्य बातों पर अमल करता हुआ गुमराह रहता है? दलित व्यवहारिक तौर पर सवर्णों से चिपका रहता है, जी हुजूरी करता है लेकिन पीठ पीछे उसके विरुद्ध जहर उगला है जबकि होना तह चाहिए कि व्यवहारिक स्तर पर दलितों को सवर्णों का विरोध करना चाहिए किन्तु सैद्धांतिक स्तर पर एक रहने के लिए कन्विंस करने की कोशिश करना चाहिए। इस तरह असत्य का व्यवहारिक विरोध भी होगा तथा सैद्धांतिक स्तर पर एक करने का विमर्श भी चलेगा।

संसदीय राजनीति के अलावा कौन सा रास्ता है?

रविवार, 27 मई 2018

आधुनिक राष्ट्र का उदभव

आधुनिक राष्ट्र का उदभव - नागरिक राष्ट्रवाद बनाम रक्तिय और नस्लीय
राष्ट्रवाद
               ‘राष्ट्र’ की आधुनिक परिभाषा अठारहवीं  सदी के यूरोप में उभरी । इससे पहले वहां पर राजाओं और शासकों का राज्य था । उनकी रियासतों की अपनी सीमायें थी , लेकिन कोई भी एक देश नहीं था । उदाहरण के तौर पर देखें तो आस्ट्रो -हंगेरियन साम्राज्य, तुर्क साम्राज्य मध्य यूरोप के लगभग आधे हिस्से में था , ब्रिटिश साम्राज्य इंग्लैंड के बाहर की दुनिया केे एक बडे़ हिस्से में फैला था । फ्रेंच और जर्मन ,जो बार- बार यूरोप में एक दूसरे से युद्ध लड़ रहे थे, यहां पर एक राष्ट्र की कोई अवधारणा नहीं थी । प्रत्येंक समाज अपनी सीमाओं और विभिन्न धार्मिक समूहों के रुप में आपस में संघर्ष कर रहे थे जैसे- कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट आपस में एक दूसरे का विरोध कर रहे थे । दोनों ने पूर्वी रुढ़िवादी चर्च का विरोध किया । राष्ट्रों की अवधारणा , अठारहवीं सदी में परिभाषित की गई । कार्ल मार्क्स ने इसे पूजीवाद के तहत बाजार की आर्थिक सीमा कहा । यह आधुनिक राष्ट्र -राज्य का आधार बना।
 राष्ट्र -राज्यों के निर्माण की प्रक्रिया में पहचान हेतु एक सार्वजानिक सांस्कृतिक मापदंड बनाये गए ा इसमें सबसे अधिक भाषा को पहचान मिली | यह राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया का सबसे पहला भाग था |  भाषाओँ ,जिसके द्वारा हम यूरोप में सबसे अधिक देशों की पहचान आज करते हैं जैसे अंग्रेजी।, फ्रेंच ,इतालवी, डच ,जर्मन , पुर्तगाली , स्पेनिश आदि |  अपनी पहचान को बनाये रखने के लिए इन देशों का संघर्ष का एक लम्बा इतिहास है |   भाषाओँ की एक से अधिक संख्या की वजह से प्रमुख भाषा की पहचान के लिए विवाद हुए |  जैसे स्पेन में केटलोनिआ (बार्सिलोना के आसपास ) में लोगों का तर्क है कि कैटलन भाषा स्पेनिश भाषा से अलग है , फिर भी केटलिन भाषा को स्पेनिश के रूप में वर्गीकृत किया गया है |  इस प्रकार राष्ट्र के निर्माण की प्रक्रिया साधारण नहीं है कि अचानक , एक राष्ट्र का रूप ले ले | एक राष्ट्र के उभार में  बड़े सांस्कृतिक आदान - प्रदान का योगदान है | साथ ही अक्सर , हिंसक संघर्ष की भी हिस्सेदारी होती है |  राष्ट्र के निर्माण की प्रक्रिया में पूंजीवाद बाजार की स्थापना के साथ साथ एक भाषा को भी राष्ट्रीय पहचान के रूप में स्थापित होते देखा गया है |
           लेकिन क्या एक राष्ट्र और राष्ट्रवाद की परिभाषा को एक दो अलग अलग तरीकों से समझा जा सकता है |  दोनों परिभाषाओं में क्षेत्र या देश को एक भौगोलिक सीमा से परिभाषित किया गया है , जिसमें एक सीमाओं पर केंद्रित है जबकि दूसरी जनता को केंद्रित करती है |  नागरिक राष्ट्रवाद के विचा को फ़्रांसिसी क्रांति से प्रेरणा मिलती है |  जिसके अनुसार वे सभी लोग , जो देश की सीमा के भीतर रहते हैं फ़्रांस के पूर्ण नागरिक हैं |  इसलिए सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समान रूप में देखा गया और इसलिए " स्वतंत्रता , समानता,और भाईचारे" का नारा दिया गया | फ़्रांसिसी क्रांति ने न केवल सत्तारूढ़ अभिजात वर्ग को उखाड़  फैंका  है , बल्कि फ़्रांस में रहने वाले , सभी लोगों को पूर्ण नागरिकता का अधिकार दिया है जिसमें यहूदी भी शामिल थे |

जिन लोगों ने इस धारणा को आगे बढ़ाया या उससे प्रभावित थे, जो जर्मनी के अतीत और उनके पूर्वजों से आकर्षित थे उन्होंने नस्लीय शुद्धता की बात पर जोर दिया। यह एक काल्पनिक अतीत पर आधारित था , जैसा कि हम जानते हैं कि दुनिया में कोई भी देश नहीं है जहां पर सिर्फ एक ही तरह के लोगों  की आबादी  निवास करती हो । आबादी का आवागमन अलग अलग जगहों पर चलता रहता है । शुद्ध जर्मन राष्ट्र की यह अवधारणा सिर्फ एक मिथक है कि एक राष्ट्र उसके मूल निवासी की नस्लीय विशेताओं के साथ एक विशेष नस्ल की पहचान पर आधारित है। यह अपवर्ज नात्मक राष्ट्रवाद कुछ मनमाने ढंग की विशेषता पर आधारित है, जबकि सभी दूसरों को छोड़कर लोगों में से एक नस्ल में शामिल है ।
    यूरोपीय इतिहास के अंतिम तीन सौ साल में राष्ट्र की इन दो विवादास्पद विचारों का एक प्रतिबिम्ब बनाया गया है। इस तरह के समरूप रक्त और नस्लीय राष्ट्र को बनाने के प्रयास को आगे बढ़ाया गया। उदाहरण के लिए , डेनमार्क और नार्वे  से कैथोलिक और फ़्रांस से प्रोटेस्टेंट को बाहर किया गया । यूरोप में सैंकड़ों साल तक समरूप रक्त और नस्लीय राष्ट्रों के निर्माण के लिए युद्ध होते रहे । युद्ध , नरसंहार , जातीय सफाई और अल्पसंख्यक जनता के निर्वासन का खूनी इतिहास यूरोपीय राष्ट्रवाद के साथ जुड़ा है।
       रक्त और नस्लीय राष्ट्र की अवधारणा ने जर्मनी में फासीवाद को जन्म दिया । जिनके भी पूर्वज जर्मनी में निवास नहीं करते थे वे शुद्ध जर्मन नहीं माने जाते थे। और उनके लिए जर्मनी में कोई स्थान नहीं था । यह हिटलर की बुनियादी समझ थी । इस आधार पर जर्मनी में यहूदियों और जिप्सी को मारा गया । इस प्रकार जर्मनी में फासीवाद का उदय हुआ और द्वीतीय विश्व युद्ध के एक ख़राब प्रभाव के साथ समापन हुआ ।
      हिटलर और जर्मनी में अन्य फासिस्टों के प्रस्तावित राष्ट्रवाद का यह रूप पौराणिक अतीत में अपने मूल में नहीं था । समरूप रक्त और नस्लीय राष्ट्रवाद के विपरीत दूसरी परिभाषा का निर्माण सैकड़ों - हजारों सालों से लोगों के बीच बातचीत के माध्यम से निर्मित हुआ है । साझा संस्कृति का उद्भव , सांझी ( या कई भाषाओं के देशों में ) भाषा और एक राष्ट्र के रूप में एक साझा उद्देश्य से प्रेरित राष्ट्रवाद का परिणाम है । यूरोपीय राष्ट्रों के उद्भव में बातचीत एवम खूनी संघर्ष के एक साथ हुए थे ।