बुधवार, 11 अप्रैल 2018

विज्ञान के लिए मार्च-2018
भाइयों और बहनों
वर्ष 2017 में विज्ञान, वैज्ञानिकों तथा विज्ञान की संस्थाओं पर होने वाले हमलों के खिलाफ दुनियाभर में ‘विज्ञान के लिये मार्च’ आयोजित किये गये। अनेक देशों में लगभग 600 केन्द्रों पर यह आयोजन किया गया। विज्ञान पर हमलों का एक नमूना यह सामने आया कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ‘जलवायु परिवर्तन’ की बात को ढकोसला कहा और इस शब्द को ही बैन कर दिया। विज्ञान एवं पर्यावरण के संस्थानों तथा शोध एजेंसियों को दी जाने वाली वित्तीय सहायता में भी कटौती कर दी। इसी तरह की कटौतियां अन्य देशों की सरकारों ने भी की।                विज्ञान-विरोधी इस मुहिम के खिलाफ किये गये ‘ग्लोबल मार्च’ को दुनियाभर में जबरदस्त समर्थन मिला।
        भारत में भी विज्ञान और वैज्ञानिक संस्थाओं पर किये जा रहे हमलों के खिलाफ 9 अगस्त 2017 को देशभर में ‘विज्ञान के लिये मार्च’ निकाले गये। विज्ञान पर होने वाले ये हमले आज भी जारी हैं। इसलिये 14 अप्रैल, 2018 को अनेक देशों में एक बार फिर ‘विज्ञान के लिये मार्च’ आयोजित किये जायेंगे। भारत में अखिल भारतीय जन-विज्ञान नेटवर्क भी इस आयोजन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। पूरे देश में निकलने वाले इन मार्चों में जन-विज्ञान नेटवर्क से जुड़ी तमाम संस्थायें भाग ले रही हैं। दुनियाभर में होने वाले इस मार्च की तिथि 14 अप्रैल भारत में विशेश महत्व रखती है। यह दिन संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर की जयंती का दिन है। अतः हम आह्वान करते हैं कि कार्यस्थलों पर हर प्रकार के भेदभाव के विरुद्ध लड़ें। विशेषकर जाति व लिंग आधारित भेदभाव के विरुद्ध। रोहित वेमूला दोबारा उच्चाइयों तक पहुंचने के अपने सपनों से वंचित न रहे। कुछ वर्षों से हमारे देश में विज्ञान-विरोधी माहौल बनाया जा रहा है। वर्तमान भारत सरकार के मंत्री ‘डार्विन’ की खोजों को ही झुठलाने वाले बयान दे रहे हैं; देश में तर्क और विवके की बजाय रूढिवाद और अंधविश्वास बढ़ाया जा रहा है। तर्कशील वैज्ञानिकों पर हमले हो रहे हैं। राजनीतिज्ञ धु्रवीकरण के लिये मिथकों को इतिहास बनाकर पेश किया जा रहा है। इस तरह की कोशिशों के कारण हमारे देश की अनेक वैज्ञानिक उपलब्धियां इतिहास में ही खो जायेंगी और समाज में मिथकों की मान्यता बढ़ेगी। ज्ञान-विज्ञान की सांझी विरासत और तकनीक कला तथा संस्कृति के विकास में मेहनतकश तबकों के सक्रिय योगदान को भी नकारा जा रहा है।
स्कूली पाठ्य पुस्तकों का पुनर्लेखन किया जा रहा है। झूठे दावों को वैज्ञानिक सिद्ध करने के लिये खोजों का नाम देकर सरकारी अनुदान दिये जा रहे हैं। उच्च-स्तर की सरकारी शोध संस्थाओं के अन्तर्गत ये प्रयास हो रहे हैं। जो वैज्ञानिक, इतिहासकार व बुद्धिजीवी इन झूठे दावों पर सवाल खड़े करते हैं उन्हें यूरोपियन या देशद्रोही कह दिया जाता है।
इन रूढ़िवादी व अतिवादी ताकतों ने सरकारी सहायता से विज्ञान विरोधी व विवेक विरोधी वातावरण बना दिया है। परिणामस्वरूप एक हिंसक वातावरण तैयार हुआ है जिससे नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पनसारे, एम.एम. कलबुर्गी व गौरी लंकेष जैसे तर्कशील, स्वतंत्र चिंतक व कार्यकर्ताओं की हत्याएं हुई हैं। यह सब न केवल संवैधानिक दायित्वों/विश्वविद्यालयों व समूचे समाज में आलोचनात्मक सोच को दबाने का प्रयास है। इन सबसे तात्कालिक दुनिया में भारत की उपलब्धियां भी नीचे गई हैं।
नवउदारवादी नीतियों का प्रभाव
जब से नवउदारवादी आर्थिक नीति का बदलाव शुरू हुआ है तब से भारत में विज्ञान व तकनीक के क्षेत्र में प्रयोग व शोध पर बजट की सहायता में कमी का रुझान है। 2018 के ताजा बजट में भी यही रुझान जारी है। विज्ञान व तकनीक के क्षेत्र में जी.डी.पी. दर का यह लगभग 0.8 प्रतिशत है। पिछले दशक से इसमें ठहराव है। चीन का यह आंकड़ा 2 प्रतिशत से अधिक है जो कि लगभग दुगुना है।
सरकार द्वारा अनुदान प्राप्त शोध व विकास की संस्थाओं को आज देश में मजबूर किया जा रहा कि ये निजी उद्योगों तथा विदेशी एजेंसियों से अपने संसाधन बढ़ाएं। 40 प्रयोगशालाओं के नेटवर्क वैज्ञानिक एवं औद्योगिक शोध परिषद (ब्ैप्त्) को तथाकथित देहरादून घोषणा को मानने को बाध्य किया जा रहा है, जिसके अन्तर्गंत 50 प्रतिशत बजट सरकारी अनुदान की बजाय मार्केट से कमाने की बात है।
इसी प्रकार की नवउदारवादी नीतियां स्कूली शिक्षा में दिखाई दे रही हैं। प्राथमिक व सैकण्डरी शिक्षा से सरकार हाथ खींच रही हैं तथा निजी स्कूलों को बढ़ावा दे रही हैं। इससे बेहतर शिक्षा केवल अमीरों या विशिष्टों के लिए रिजर्व होने का रास्ता साफ हो जाता है।
विज्ञान व तकनीकी संस्थाओं तथा उच्च शिक्षा संस्थानों की स्वायतता धीरे-धीरे खत्म की जा रही है। वैज्ञानिकों पर राजनीतिक दबाव बनाया जाता है कि वे रूढ़ीवादी सोच वाली संस्थाओं के लोगों को निदेशक था उपकुलपति जैसे पदों पर नियुक्त करवाने में मदद करें। ऐसे लोगों की शैक्षणिक योग्यतायें भी संदिग्ध होती हैं। विश्वविद्यालय के प्रांगणों में आपातकाल जैसा वातावरण है, शैक्षणिक एवं बौद्धिक स्वतंत्रताएं पूरी तरह नियन्त्रण में हैं। स्वतंत्र चिंतन, सामाजिक मुद्दों पर विचार रखने व विभिन्न सांस्कृतिक विविधताओं को एक विशेष प्रकार के बहुसंख्यकवादी दृष्टिकोण द्वारा दबाया जा रहा है।
हमारी जरूरत
दरअसल भारत को अपने विकास के लिये विज्ञान व तकनीकी शोध पर ज्यादा खर्च करने की जरूरत है। साथ ही ज्ञान व कौशल के क्षेत्र में मानव संसाधन के विकास को बढ़ावा देने के लिए भी ज्यादा खर्च करने की जरूरत है। आज भारत काफी पीछे है जिससे अन्य देशों के साथ-साथ चलना काफी मुश्किल रहेगा। विज्ञान व तकनीक के क्षेत्र में ऐसी उन्नति तब तक असम्भव है जब तक रूढ़िवाद व अंधविश्वास से न लड़ें, चाहे इनकी जड़ें धार्मिक या परम्परागत संस्कृति में हों। भारतीय समाज में विद्यालयों में तथा उच्च शिक्षा में आलोचनात्मक सोच के बिना यह असम्भव है। 2018 का ‘विज्ञान मार्च’ इन्हीं मांगों के लिए खड़ा है और इन्हें पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है। ज्ञान-विज्ञान के इस युग में तकनीकी विकास व नवाचार ही आर्थिक उन्नति, सामाजिक उन्नति व आत्मनिर्भर विकास के रास्ते में पर चलने में सहायक होंगे।
अखिल भारतीय जन विज्ञान नेटवर्क ने यह निर्णय लिया है कि हम उन सभी संस्थाओं को साथ लें जो देश के विभिन्न गांव/शहरों में इस वैश्विक विज्ञान मार्च में शामिल होना चाहते हैं। नेटवर्क यह भी अपील करता है कि वैज्ञानिक समुदाय, प्रगतिशील संस्थाएं व सभी तार्किक सोच वाले व्यक्ति 14 अप्रैल, 2018 की रैलियों में भाग लें।
मांगें
सरकारी संस्थाओं का प्रयोग कर रूढ़िवादी मूल्यों का प्रचार रोकें तथा विज्ञान व तर्क पर हमले बंद हों
नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पनसारे, एम.एम. कलबुर्गी व गौरी लंकेश के हत्यारों को पकड़ें
शिक्षा पर जी.डी.पी. का 6 प्रतिशत तक खर्च बढ़ाएं।
विज्ञान के शोध एवं विकास पर जी.डी.पी. का 3 प्रतिशत तक खर्च बढ़ाएं।
हरियाणा में ज्ञान-विज्ञान आंदोलन आपसे अनुरोध करता है कि दुनियाभर में उठ रहे जन-आंदोलनों के साथ एकजुटता दर्शायें। इसके लिये 14 अप्रैल को अधिक से अधिक जिलों पर ‘विरोध मार्च’ के आयोजन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लें।

-ः निवेदक:-
हरियाणा विज्ञान मंच, हरियाणा ज्ञान-विज्ञान समिति, जतन नाट्य केंद्र और भारत ज्ञान-विज्ञान समिति

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें