गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

नारी मुक्ति

नारी मुक्ति

भूमिका
हमारा भारत सबका भारत अभियान हेतु महिला मुद्दों पर दो पुस्तिकाओं का प्रकाशन किया जा रहा है. यह इस कड़ी की पहली पुस्तक है जिसमे नारी मुक्ति के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और दृ
ष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है. आशा है कि पुस्तिका अभियान के दौरान काम आएगीइसी उम्मीद में शुभकामानों के साथ
वीना गुप्ता
परिचय
महिलाओं पर हिंसा और उनके साथ भेद भाव तो मानव इतिहास में आदिम काल को छोड़कर लगातार होता आया है. लेकिन 1990 के दशक से स्त्रियों पर बर्बर, जघन्य जानलेवा हमलों में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है. तेजाब फेंकने, बलात्कार, हत्या, अपहरण, दूसरे धर्म या जाति में विवाह के कारण परिवार द्वारा हत्या, पंचायतों के स्त्री विरोधी फरमान, साम्प्रदायिक और जाति आधारित हिंसा में महिलाओं और बच्चियों पर हमले, शादी के नाम पर औरतों का व्यापार, संगठित सेक्स रैकेट, समेत सभी अपराधों में कई गुना बढ़ोतरी हुई है. महिला हिंसा के मामलों मै संख्यात्मक बढ़ोतरी ही नहीं बल्कि हिंसा की विभीषता और बर्बरता में भी वृद्धि हुई है. जब भी कोई महिला हिंसा की बड़ी वारदात होती है चारों और से कानून व्यवस्था पर सवाल उठाने लगते हैं, कड़े कानून बनाने ,चप्पे-चप्पे पर पुलिस तैनात करने के प्रस्ताव आने लगते हैं, महिलाओं की ड्रेस, शिक्षा , घर से अकेले निकलने पर सवाल खड़े होने लगते हैं. महिलाओं को ही हिंसा के लिए जिम्मेदार बताना, या महिलाओं पर बढ़ रही हिंसा को कानून - व्यवस्था से जोड़ना समस्या का अति सरलीकरण है. गंभीर विचार का विषय यह है कि 90 के दशक से, जब से उदारीकरण,निजीकरण,और वैश्वीकरण की आर्थिक नीतियां देश में लागू की गयी है, तभी से गरीबी व् बेरोजगारी बढी है. यही नहीं मानव तस्करी, मानव अंग तस्करी,वैश्यावृत्ति,जुआ घर या केसीनो,और ड्रग्स जैसे समाज विरोधी कारोबार में बहुत वृद्धि हुई है. संगठित क्षेत्र में रोजगार की जगह संविदा, ठेका , और मानदेय आधारित रोजगार, जिसमे ना रोजगार की सुरक्षा है ना ही कोई सामाजिक सुरक्षा ने बहुत बड़ी आबादी को जोखिम में डाल दिया है . इसी अरसे में समाज में जातीय, साम्प्रदायिक और महिला हिंसा में भी बेतहाशा वृद्धि हुई है।महिलाओं पर लगातार बढती हिंसा, घटता लिंग अनुपात हमारी सामजिक-आर्थिक -राजनीतिक ढाँचे में अन्तर्निहित अंतर्विरोधों के साथ-साथ सामंती-पूंजीवादी-साम्राज्यवादी नीतियों के प्रभाव का
परिणाम है.

स्त्रियों पर बढ़ती हिंसा और स्त्री हिंसा मुक्त समाज की स्थापना की संभावना के वर्तमान हालात का विश्लेषण करने से पहले यह भी जरूरी है कि हम मानव समाज के विकास की पृष्ठ भूमि में परिवार,विवाह, स्त्री - पुरुष सम्बन्ध, इसके इतिहास और महिलाओं की बदलती स्थिति के बारे में संक्षिप्त सा लेकिन गहराई से जायजा लें.
प्रारंभिक समाज में लिंगभेद आपने मानव समाज के विकास की कहानी जरूर पढी और समझी होगी। में आपकी याद दहानी के लिए एक बार फिर इसे दोहरा रही हूँ. विकास क्रम में जब मानव जीवन अस्तित्व में आया उन दिनों मानव समूह में रहता था, कंद-मूल-फल और शिकार द्वारा जानवरों का मांस ही उसका मुख्य आहार था. पत्थर के हथियार थे और अकेले शिकार करना आसान ना था, इसीलिये मानव समूह में रहता था. यह मानव समाज के विकास का सबसे आरंभिक दौर था, जिसे आदिम काल जाता है. इस वक्त समाज में स्त्री - पुरुष के आधार पर या अन्य किसी भी प्रकार का ऊंच- नीच का किसी भी प्रकार का कोई भेद- भाव ना था. स्त्री-पुरुषों से बना यह कबीला सामूहिक रूप से शिकार करता था और शिकार से प्राप्त भोजन का सामूहिक उपयोग भी करता था. उन दिनों स्त्री पुरुष दोनों मिलकर शिकार करते थे, काम का बंटवारा था भी तो इतना ही कि बीमार व् बूढ़े कंद -मूल-फल इकट्ठे करने चले जाते थे . शिकार की तरह आदिम खेती व् कंद -मूल-फल संग्रह को मान्यता प्राप्त थी और किसी भी काम को छोटा नहीं समझा जाता था. स्त्री को पूरी तरह स्वतंत्रता और समानता प्राप्त थी. सामूहिक यौन संबंधों के कारण पिता की जानकारी संभव ना थी, अतः संतान को माँ के नाम से जाना जाता था. कबीले में उत्तराधिकार का अधिकार भी माँ के रूप में स्त्री को ही प्राप्त था. आज भी देश के बहुत से हिस्सों में आदिवासी समाजों में मातृ प्रधान कबीलों का अस्तित्व है. प्रकृति के साथ संघर्ष करते हुए मानव को नये-नये अनुभव हुए,और उत्पादन के औजारों में भी बदलाव आया. धनुष - वाण और धातु के प्रयोग ने समाज की संरचना बदलने में बड़ी भूमिका निभायी. पशुपालन ने तो समाज में बहुत बड़ा बदलाव ला दिया.पशुपालन अब जीविका का एक अन्य प्रमुख साधन बन गया. धीरेधीरे खेती शुरू हुई और पशुपालन उत्पादन का स्रोत बना. अब कबीले घुमक्कड़ी के स्थान पर एक ही स्थान पर वास करने लगे. कबीलों के बीच युद्धों में विजयी कबीले हारे हुए कबीले के पशु, शस्त्र और स्त्री-पुरुषों कब्जा कर लेते थे. पशु जीते हुए कबीले की अतिरिक्त संपत्ति में शामिल हो जाते थे,और दास खेती और अन्य उत्पादन के कामों में लग जाते थे. अब ज्यादा अतिरिक्त संपत्ति इकट्ठा होने लगी. अब धातु के बने अस्त्र-शास्त्रों से शिकार भी आसान हुआ और कबीलों के पास अब इतना उत्पादन होने लगा कि उनकी जरूरत पूरी होने के बाद भी बच जाता था. इस अतिरिक्त उत्पादन ने विशालकाय
कबीलों को तोड़ कर कुटुंब या युग्म परिवार को जन्म दिया. कुटुंब के स्त्री पुरुषों के बीच युग्म में यौन सम्बन्ध होने लगे. स्त्री और पुरुष युग्म के बीच ये सम्बन्ध स्थायी और कठोर नहीं थेस्त्री पुरुष एक दूसरे को छोड़कर आसानी से अलग हो सकते थे. सामाजिक उत्पादन में स्त्री - पुरुष का बराबर का योगदान था. इसीलिये स्त्री आर्थिक रूप से सुरक्षित व् सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित थी. युग्म विवाह टूटने पर शिकार के हथियार पुरुषों की संपत्ति तो खेती के अन्न और घरेलु चीजों पर स्त्री का अधिकार बना रहता था.

उत्पादन में पुरुषों की भूमिका बढ़ने लगी. अतिरिक्त संपत्ति की हिफाजत के लिए स्त्रियों का प्रयोग किया जाने लगा. उत्तराधिकार के नियम स्त्री वंशावली पर आधारित थे, पुरुषों को यह मंजूर ना था. अब उत्तराधिकार के नियम बदले गए, स्त्री के स्थान पर पुरुष को अब मुखिया माना जाने लगा. आगे उत्तराधिकार परिवार की स्त्री के स्थान पर पुरुष को दिया जाने लगापुरुष यह भी सुनिश्चित करना चाहता था कि उत्तराधिकार में संपत्ति उसी के अपने पुत्र को मिले, इसके लिए एकनिष्ठ विवाह शुरू हुए. स्त्री को घर में कैद कर दिया गया. स्त्री अपनी
प्रजनन क्षमता के कारण संतान को जन्म देती है,इसलिए वह स्वयं में एक संसाधन है, इसलिए स्त्री की यौनिकता पर नियंत्रण जरूरी था. पुरुष ने स्त्री के अपने ही पुत्र को संपत्ति का उत्तराधिकारी बनाने के लिए स्त्री को घर में कैद कर दिया. मातृवंशीय परिवार के स्थान पर पितृसत्तात्मक परिवार की स्थापना ने स्त्री को सामजिक श्रम में भागीदारी से वंचित कर दियाबराबरी, न्याय, समानता के मूल्य स्त्री के लिए बेमानी हो गए. सामाजिक श्रम से ही नहीं संपत्ति से भी वंचित होकर स्त्री मात्र एक शरीर, शिशु को जन्म देने वाले संसाधन में बदल गई, जिसका नियंत्रण पूरी तरह पुरुष के हाथ में आ गया, यही पितृसत्ता की शुरुआत थी.

पितृसत्ता का उदय

पितृसत्ता एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था है, जिसके अन्तर्गत सत्ता प्राथमिक रूप से पुरुषों के नियंत्रण में रहती है, सामजिक विशेषाधिकारों, नैतिकता, संस्कृति, राजनीती में आर्थिक क्षेत्रों में वर्चस्व पुरुष का ही होता है. परिवार के अंदर परिवार का वरिष्ठतम पुरुष सदस्य मुखिया होता है और बच्चों, महिलाओं समेत सभी पर नियंत्रण करता है। विभिन्न समाजों, धर्मों,संस्कृतियों,समुदायों में और इतिहास के भिन्न- भिन्न कालों में पितृसत्ता का रूप बदलता रहा हैपरंतु हर जगह और हर काल में इसके प्रमुख गुण हैं-राजसत्ता में महिलाओं की नगण्य या प्रतीकात्मक भागीदारी, स्त्रियों का मुख्य व् प्राथमिक कार्य घर की देखभाल और बच्चों का पालन-पोषण,घर के अंदर और घर के बाहर दोनों जगह समाज के अन्य तबकों के मुकाबले
महिलाएं हिंसा की शिकार ज्यादा, स्त्रियों को सामान काम का समान वेतन या मजदूरी नहीं ,मीडिया में महिलाओं की विकृत व् नकारात्मक छवि का प्रस्तुतीकरण, लिंग- भेद, व् स्त्री की यौनिकता का नकारात्मक प्रस्तुतीकरण, सांस्कृतिक व्यवहार, प्रथाओं,धार्मिक परम्पराओं में महिला विरोधी या महिलाओं की समानता,व् स्वतंत्रता विरोधी धारणाओं की बहुलता आदिपितृसत्ता ने स्त्रियों को सामाजिक उत्पादन,संपत्ति में अधिकार, और सामजिक प्रतिष्ठा से वंचित कर दिया था. अब शासक वर्ग के सामने चुनौती थी कि स्त्रियाँ अपनी इस हार को और पितृसत्ता की आधीनता को आसानी से स्वीकार कर लें. अतः पितृसत्ता को स्थापित करने के लिए परम्परा, संस्कार, नैतिकता, कर्तव्य, लोकाचार, धर्म संस्कृति के नाम पर वातावरण निर्मित किया गया, जिसमे महिलाओं को पुरुष के आधीन रहना ही था. लेखकों, कवियों, चित्रकारों, नाटककारों, धार्मिक संस्थाओं, धर्मगुरुओं,राजनीतिक नेताओं सभी ने मिलकर इस बातावरण को तैयार करने में मदद की. यहीं से जेंडर विभेद शुरू हुआ और पुरुषत्व और स्त्रीत्व की अवधारणा को गढ़ा गया. पितृसत्ता के मूल्यों को स्थापित करने के लिए आदर्श पुरुष और आदर्श स्त्री की एक काल्पनिक छवि गढ़ी गयी, जिसमे दोनों के लिए अलग अलग मापदंड तै किये गये. स्त्रियों के लिए आत्म- निग्रह,त्याग, सतीत्व,दया, सेवा, कर्तव्य,जैसे गुणों का महिमामंडन किया गया. धर्म,संस्कृति,परम्पराओं के नाम पर स्त्री विरोधी मान्यताओं को इस तरह प्रचारित किया गया कि स्त्री को अपनी शत्रु परिस्थितियों के साथ अनुकूलन करना पड़ा. नैतिकता का दोहरा मापदंड सामने था-स्त्री को तलाक का हक ना था और पुरुष कई शादियां कर सकता था, पुरुष के विवाहेतर सम्बन्ध भी स्वीकार्य थे जबकि विधवा, यहाँ तक कि ७-८ साल की बाल विधवा का पुनर्विवाह निषेध था, उसका सांसारिक सुखों को त्यागकर वंचित जीवन बिताना था. लेकिन पति पत्नी के मरते ही दूसरा विवाह कर सकता था. सती - साध्वी स्त्री का ऐसा पाखण्ड रचा कि जो स्त्री इसमें जरा भी फिट ना थी, उसे ष्वैश्या ष् ष्बदचलन ष् जैसे विशेषणों से नवाजा गया. सती साध्वी स्त्री की पहचान का ऐसा आदर्श सामने रखकर, कि दूसरे पुरुष की परछाई भी उसपर ना पड़े, स्त्री को घर के अंदर भी परदे में कैद कर दिया. यह कैद मात्र पुरुषों से दूर रखने,या स्त्री की हिफाजत के लिए नहीं थी, बल्कि यह तो स्त्री को सामाजिक,राजनीतिकऔर आर्थिक क्षेत्र में चल रही प्रक्रियाओं, घटनाओं से दूर रखना था. घर में पति की मृत्यु होने पर स्त्री को ना कारोबार के बारे में पता होता था, यहाँ तक की उन्हें यह भी नहीं पता होता था की उनके परिवार के पास कितनी संपत्ति या जमीन है. ये सब बातें पुरुषों को ही पता थीं, अतःपिता की मृत्यु के वक्त यदि पुत्र काम आयु का हुआ तो घर के पुरुष देखभाल करते थे. इसीलिये विधवा होने से बड़ा अभिशाप कोई ना थास्त्री को घर में सीमित करने के लिये आभूषण,साज- श्रृंगार, महंगे वस्त्र को उसकी जरूरत बताकर प्रचारित किया गया. इन्ही सब चीजों ने स्त्री को भी घर की सजावट के सामान में बदल दिया. इन चीजों के चयन का भी अधिकार स्त्री को नहीं था. उसे तो आभूषण, साज- श्रृंगार, और वस्त्र भी अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को प्रदर्शित करने के लिए पहनने थेवह चाहे भी तो सादगी से नहीं रह सकती थी. स्त्री की भूमिका बच्चे पैदा करने, उन्हें पालने और एक शोपीस में सीमित हो गयी जिसके विचारों,सोच,और नजरिये का कोई महत्व ना था.
धर्म ने पुनर्जन्म और भाग्य की अवधारणाएं लाकर स्त्री की पराधीनता को स्थाई बनाने की दिशा में और कदम बढ़ाया . विवाह एक संजोग है, अब जो भी हो निभाना तो पड़ेगा ही , ये बाते अक्सर स्त्रियों को समझायी जाती हैं. दुखद पक्ष तो यह है कि स्त्री ने अपनी पराधीनता को स्वीकार कर लिया बल्कि इसमें गौरव और आनंद का भी अनुभव करने लगी. यही से लिंग भेद यानी जेंडर भेद शुरू हुआ , स्त्रीत्व और पुरुषत्व की अवधारणा ने स्त्री और पुरुष को दो ऐसे व्यक्तित्व में बाँट दिया गया, जिन्होंने दोनों के बीच के प्राकृतिक सम्बन्ध को असंभव बना दिया, जिसका खामियाजा स्त्रियों को ही नहीं पुरुषों को भी भुगतना पड़ापितृसत्ता शासक वर्ग विचारधारा थी जिसे उन्होंने शासितों पर थोपा, और कुछ हद तक उत्पीड़ितों ने भी शासकों के विचारो को श्रेष्ठतर मान कर मानकर बिना किसी विश्लेषण के आँख मूंद कर इन मूल्यों का अनुकरण किया. शासक वर्ग पितृसत्ता को सामजिक नियंत्रण के एक औजार के रूप में प्रयोग करता है . इसलिए पितृसत्ता के पूंजीवादी ,साम्राज्यवादी, जातिवादी , साम्प्रदायिक ताकतों के साथ अंतर्संबंधों की जटिलता को भी समझना होगा.

लिंग भेद जेंडर विभेद
 सेक्स एक जैविक पहचान है जो शिशु के लिंग के बारे में बताता है,और जेंडर वे गुण धर्म हैं जो समाज स्त्री व् पुरुष पर आरोपित करता है. अंग्रेजी में ये दोनों शब्द अलग-अलग संदर्भो में प्रयोग किये जाते हैं. यहाँ हमने सेक्स के लिए लिंग और जेंडर के लिए लिंगभेद शब्दों प्रयोग किया है. लिंग या सेक्स के द्वारा शिशु के नर, मादा, या उभयलिंगी होने व् उसके शरीर की विशेषताओं के बारे में जानकारी मिलती है. जेंडर या लिंग भेद जन्म के तुरंत बाद शिशु के साथ सामजिक,आर्थिक और राजनीतिक व्यबहार में बदलाव को दर्शाता है. पितृसत्ता
और शासक वर्ग द्वारा प्रत्येक लिंग के लिए निर्धारित की गयी भूमिकाओं और इन भूमिकाओं के अनुसार गढी गयी छवियों में शिशु को ढालने लिए समाज कमर कस कर तैयार हो जाता हैशिशु के विकास में आर्थिक संसाधन भी उसके लिंग के अनुसार खर्च किये जाते हैं,राजसत्ता भी ऐसी नीतियां बनाती है जो लिंग के आधार पर भेदभाव की मानसिकता को प्रदर्शित करता है लिंग या सेक्स एक प्राकृतिक चीज है जबकि लिंग भेद या जेंडर सामाजिक प्रक्रियाओं की देन, स्त्रीत्व और पुरुषत्व की अवधारणा के रूप में सामने आती ह ैलिंग भेद की शुरुआत दास समाज में ही शुरू हो गयी थी. भारत में दास प्रथा ज्यादा लंबे समय तक नहीं रही क्योंकि मनुस्मृति ने समाज का जो निर्मम विभेदीकरण किया, उसने सामंती समाज में भी और पूंजीवादी समाज में भी प्रतिक्रियावादी ताकतों के साथ गठजोड़ करके अपने अस्तित्व को मजबूती से बनाये रखा है.

शिशु से स्त्री व् पुरुष बनाने तक का सफर

शिशु के गर्भ में आते ही उसके लिंग के अनुमान को लेकर घर में उत्सुकता भरी हलचल शुरू जाती है. बहुत से पुरुष बेटा होने को अपने पुरुषत्व की जीत के तौर पर देखते हैं. शायद उन्हें पता ही नहीं कि लिंग निर्धारण में पुरुष की ही भूमिका है, स्त्री की नहीं. घर की प्रौढ़ और बूढ़ी औरतें गर्भवती से पूछेंगी कि उसे कैसा महसूस हो रहा है , और लक्षण पूछ कर अनुमान लगाएंगी कि बेटा होगा या बेटी. दाई, नर्स, जान पहचान वाले, रिश्तेदार,मोहल्लेदार, पड़ोसी सभी अनुमान लगाएंगे और कई तो दावा भी कर देंगे कि बेटा होगा. यही नहीं बेटा
होने पर कौन क्या उपहार लेगा ये भी सब जता देते है. बेटी होने का कोई दावा नहीं करता, यदि अनुमान हुआ भी कि बेटी होगी तो चुप रह जाते हैं, कोई बोलता नही है. यदि गर्भवती के पहले से बेटी है, तो पहचान वाले तो छोड़िये अस्पताल में घूम रहे अजनबी भी बेटा होने की दुआ करेंगे। कैसे तैयार होती है यह मानसिकता जो बेटी की पैदाइश को भाग्य का लिखा मानकर स्वीकार करती है, और बेटे की पैदाइश को ईश्वर का तोहफा. यदि परिवार को बेटा होने की उम्मीद है तो गर्भवती की खिलाई-पिलाई पर ध्यान दिया जाएगा, डॉक्टर को दिखाया जाएगा और थोड़ा बहुत आराम का भी ख्याल रखा जाएगा. यदि पहले से एक या दो बेटियां है तो गर्भवती की देखभाल, पोषण, और चेक अप में अनियमितता रहती है. इस पुरे बातावरण में सबसे ज्यादा तनाव में गर्भवती रहती है, भविष्य की अनिश्चितता और चिंता उसे हर वक्त घेरे रहती है . शिशु के जन्म लेने पर उसके लिंग के अनुसार , अर्थात वह नर है, मादा है, या उभयलिंगी (ट्रांसजेंडर ) है, ही सामाजिक व्यवहार किया जाता है. यदि बेटा हुआ है तो जोर शोर से घोषणा होगी, मिठाई बांटी जाएगी, नाना के घर से भी उपहार आएंगे, अपने घर से भी उपहार बांटे जाएंगे, मेहमान आएंगे दावते होंगी,बहुत सी ऐसी रस्मे निभाई जाएंगी जो बेटी के होने में नहीं निभाई जातीं. समाज भी खुशी और हक से दावत और मिठाई मांगेगा. बच्चे की माँ की भी कद्र बढ़ जाएगी. बेटी के होने पर कोई खास चहल-पहल नहीं दिखाई देगी, वह भी अगर दूसरी संतान भी बेटी है तो मातमपुर्सी का माहौल दिखाई देगा. हमारे समाज की यह बहुत बड़ी विडम्बना है कि हम जीवन के यथार्थ, उसकी सच्चाई को देखना ही नहीं चाहते, बल्कि हम जो सोचते है वही देखना चाहते है. जीवन के प्रति यही अवैज्ञानिकता हमारे कष्टों और दुखों का सबसे बड़ा कारण है. यदि शिशु उभयलिंगी ट्रांसजेंडर हुआ तो परिवार के दुखों का पार नहीं, किसी को कानों खबर ना होगी , रातों रात बच्चे को घर से दूर ट्रांसजेंडर समुदाय में भेज देंगे, और फिर कभी उस तरफ पलट कर भी नहीं देखेंगे. लिंगभेद की मानसिकता ने हमारे समाज को किस कदर क्रूर, अमानवीय,डरपोक और कठोर बना दिया है कि अपने ही रक्त बीज से जन्मी संतान की जान लेने, या उसे अनजानी जगह पर छोड़ने पर भी हमारी संवेदनाओं, भावनाओं और विचारों में हलचल तक नहीं होती. कहाँ जाता है उसवक्त माँ बनाने का गौरव और पिता बनने का सुख दुनिया की सबसे बड़ी खुशी है , क्या ये भावनाएं ट्रांसजेंडर बच्चों के लिए नहीं हो सकती. इस प्राकृतिक कारण में उन बच्चों का क्या दोष,और माता पिता का भी क्या दोष है? एक और ओर भेद-भाव जो हमारे समाज में बहुत गहराई से व्याप्त है, और इस बुराई के दुष्प्रभावों पर पर्याप्त फोकस नहीं दिया गया है, वह है त्वचा का रंग, और शारीरिक बनावट से जुडी पूर्वधारणाएं. समाज में गोरे रंग के प्रति एक वहशियाना जूनून है. लड़के का रंग यदि गहरा है तो सोचते हैं की गोरी दुल्हन ले आएंगे, वहीँ अगर लड़की का रंग गहरा है तो पूरा परिवार चिंता में पड़ जाता है कि दहेज की मात्रा बढ़ जाएगी . १५ दिन की बच्ची के रंग, उसके नयन नक्श पर हर व्यक्ति आसानी से बिना यह सोचे कि उसके विकास, या व्यक्तित्व पर क्या प्रभाव पड़ेगा अपनी टिप्पड़ी कर जाता है. दरअसल गोरा रंग, ऊंचा माथा, बड़ी आँखे, ऊंची नाक, पतले होंठ की शारीरिक सुन्दरता की अवधारणा आर्यों का स्थानीय निवासियों को कमतर बताने और अपना प्रभुत्व स्थापित करने का शासक वर्ग द्वारा किया गया आपराधिक षड्यंत्र है. सौन्दर्य के प्रतिमान को सुद्रढ़ करने में भारत के शासक वर्ग और यूरोपियन साम्राज्यवादियों के विचार, मिल गए. इस मिलन को बाजारवाद ने उपरोक्त प्रतिमानों के आधार पर तैयार गुड़िया के माध्यम से घर घर तक पंहुचा दिया.

बच्चों के लिए खिलौने लाये जाते है, बच्चे के लिए मोटर गाड़ी, बन्दूक,गेंद, बल्ला, और नयी-नयी तरह के खिलौने, पर बच्ची के लिए वही गुड़िया, चौका - चूल्हा और बर्तन। गुड़िया का भी दुल्हन रूप सबसे ज्यादा प्रचलित है. एक तरफ तो ये घरों में खेले जाने वाले खेल लड़कियों को घर के अंदर सीमित करके बाहर की दुनिया के अनुभव से वंचित करते हैं, दूसरी तरफ उसे दिमागी तौर पर से घरेलू भूमिका के लिए तैयार करते हैं. बच्चे अपने घर वालों की भूमिका का अनुकरण करते हैं. बेटी माँ का अनुकरण करती है, प्रोत्साहन मिलता है
लेकिन लड़कों को माँ का अनुकरण नहीं करने दिया जाता. दोनों को ही अच्छी तरह से समझाया जाता है कि लड़कियों के काम क्या हैं और लड़कों के काम क्या हैं. लड़कों को घर का काम करने से बल पूर्वक रोका जाता है. उत्तर भारत में तो लड़कों को तो गाने - बजाने व् नृत्य से भी रोका जाता हैबच्चे की देखभाल में सारा घर लग जाता है. उसकी छोटी बहन तक को ताकीद की जाती है कि भाई का ख्याल करे, जैसे- खाना खिलाना, सफाई करना, मुंह पोछना, खेलते समय गिरे ना का ख्याल करना, रोये बिलकुल ना, हर वह ख्वाहिश जो भी परिवार के बस में है, पूरी करने की कोशिश की जाती है. बच्चे को विशेष तौर पर खेल भी खिलाया जाता है, कोशिश रहती है कि बच्चा स्वयं ना करे. बच्चे के अंदर शारीरिक श्रम के प्रति यह नकारात्मक नजरिया आगे के उसके उसके जीवन और समाज पर बुरा असर डालता है. बच्ची को ये सब विशेष सुविधायें उपलब्ध नहीं होतीबच्चे जब स्कूल जाना शुरू करते हैं, बच्चे को तैयार करने, उसका बस्ता तैयार करने ,बस्ता उठा कर स्कुल तक ले जाने काम घर का कोई न कोई सदस्य करता है, कुछ आधुनिक परिवारों में बच्ची के लिए भी यह काम परिवार के लोग करते तो है पर साथ-साथ ये चर्चा भी चलती है कि लड़कियों को काम की आदत बचपन से ही डालनी चाहिए, काम स्वयं ही करना चाहिए. गांव में तो बहन ना सिर्फ स्वयं तैयार होती है बल्कि अपने भाई बहनों को भी तैयार करके
स्कुल ले जाती है. स्कूल में अध्यापकों द्वारा,सीनियर विद्यार्थियों द्वारा, सहपाठियों द्वारा रंग, लिंग,जाति,धर्म के
आधार भेद भाव होता है, लेकिन सबसे ज्यादा भेद भाव तो अध्यापकों की यह मानसिकता करती है कि, लड़कियों के बस की पढाई लिखाई नहीं है, और पढ़ भी गयी तो घर में रोटी ही बनानी है कौन सी नौकरी करनी है. लड़कियों के से ड्राप आउट का यह बहुत बड़ा कारण हैकिसी तरह कक्षा 5 पास भी कर ली तो स्कूल गांव से बहुत दूर होगा, सभी लड़कियों का वहां तक जाना संभव नहीं है. इसी तरह इण्टर कॉलेज, डिग्री कॉलेज,तकनीकी शिक्षा संस्थानों तक इन लड़कियों की पहुच घटती जाती है. खराब रास्ते, सार्वजनिक ट्रांसपोर्ट का अभाव, पितृसत्तात्मक वर्चस्ववादी सोच से ग्रस्त छेड़ छाड व् असुरक्षा का माहौल लड़कियों को शिक्षा से दूर करके उन्हें रोजगार के अवसरों से भी वंचित कर देता हैकिशोरावस्था आते आते लड़कों को शारीरिक रूप से मजबूत बनाने के लिए ,पहलवानी, कुश्ती एवं अन्य बाहर खेले जाने वाले खेलों के लिए सुविधाएं जुटायीं जाती हैं, इसी हिसाब से इनकी डाइट का ख्याल रखा जाता है. कम संसाधन हों,तब भी घर के जरूरी खर्च कम करके भी इन सुविधाओं का खयाल रखा जाएगा. सुविधाओं के साथ इस बात ध्यान रखा जाता है कि लड़का खुश
रहे, उदास ना रहे. इसी उम्र में लड़कियों को घर का काम , खाना बनाना, सिलाई, कढ़ाई, अचार चटनी बनाने, गाना, बजाना व् नृत्य सीखने के लिए प्रेरित किया जाता हैमेरा यह आशय नहीं है की ये सभी काम एक साथ सिखाये जाते हैं, लेकिन पढ़ाई के साथ इन सभी में से कुछ ना कुछ कामों को सिखाने पर जोर रहता है. जोर से ना बोलने, बड़ों के सामने मुंह ना खोलने, मर्दों से बहस ना करने की सीख दी जाती है. सुंदर दिखने, दुबली पतली दिखने, रंग गोरा रखने, बाल लंबे और काले रखने का निर्देश दिया जाता है. इतने सारे दवाबों के साथ माहवारी शुरू होने का तनाव और कमजोरी के बावजूद लड़कियों के स्वास्थ्य व् पोषण पर ध्यान नहीं दिया जाता और नतीजा यह निकलता है कि अधिकाँश लड़कियां एनीमिया और कुपोषण की शिकार बन जाती है.

कानून द्वारा बाल विवाह अर्थात 18 वर्ष से कम उम्र में लड़की की शादी पर पाबंदी के बावजूद लगभग ४० प्रतिशत लड़कियों का बाल विवाह होता है. विवाह भी एक सामाजिक व्यापार है जहाँ दोनों पक्षों की आर्थिक व् सामाजिक स्थिति का मेल देखा जाता है, फिर ये तै होता है कि शादी में वधु पक्ष वर पक्ष को कितना आभूषण, पैसा व् अन्य सामान और किन किन रस्मों के वकत देगा. हकीकत यह है कि दहेज स्त्री का सबसे बड़ा अपमान है. कामकाजी स्त्रियों, नौकरी स्त्रियों से भी पुरुष तब शादी को राजी नहीं होता, जब तक मन माफिक दहेज ना मिले. शादी की सारी रस्मे विशेषकर हिन्दू समाज में पुरुष वर्चस्व व् वर्णाश्रम व्यवस्था को स्थापितं करने वाली हैं. अतः विवाह विधी का भी लोकतंत्रीकरण बेहद जरूरी है. शादी के बाद लिंगभेद के बातावरण में तैयार पुरुष और स्त्री आपसी सहयोगी नहीं बल्कि पितृसत्ता के अन्तर्गत श्रेणीगत ढाँचे का हिस्सा बन जाते हैं, जहाँ पुरुष और स्त्री दोनों से परंपरागत भूमिकाओं की अपेक्षा की जाती है. पहले से ही शारीरिक रूप से कमजोर स्त्री बच्चों को जन्म देती है, बच्चे भी कमजोर पैदा होते हैं , सैकड़ों औरतों की तो एनीमिया और कुपोषण के कारन बच्चे पैदा करने में ही जान चली जाती है.स्त्री अपने पति , जो उसका मालिक भी है, की रक्षा, स्वास्थ्य, दीर्घायु, के साथ बेटे , जो उसका बुढापे का सहारा है के लिए भी उपवास रखती है.उसके बच्चे भी कम ओ बेश उसी प्रक्रिया से जिसका ऊपर जिक्र किया है बड़े होने लगते हैंउपरोक्त विवरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि शिशु जन्म लेता है, उसका लिंग और नर, मादा या उभयलिंगी कुछ भी हो सकता है. समाज व्यवस्था स्त्री, पुरुष या किन्नर की विशेषताएं उस पर आरोपित करके यथा स्थिति को बनाये रखने का प्रयास करती है. अतरू वर्तमान सामाजिक व्यवहार, और अर्थ व्यवस्था को बदलने सिर्फ पितृसत्ता से ही संघर्ष नहीं बल्कि
सामाजिक न्याय, लोकतंत्र,और सामान अधिकार के लिए चल रहे संघर्ष में शामिल होने और इन प्रयासों को तेज करने की आवश्यकता हैस्त्री समानता की भावना निष्क्रिय भागीदारी से नहीं, ना ही घर में बैठकर और ना ही कानून या पुलिस से आएगी. यह तब होगी जब स्त्री-पुरुष साथ-साथ-संघर्ष करेंगे. साझा संघर्ष में आपस में बहस- मुबाहिसे होंगे, कभी-कभी होंगे,हो सकता है कभी कटुता भी आ जाये तो कभी निकटता भी हो सकती है. यही वैचारिक संघर्ष शॉसकों के वर्चस्व के आधार स्तम्भ पितृसत्ता, राजसत्ता और पूंजी के राज को ध्वस्त करने के लिए चल रहे आन्दोलनों को मजबूत करेगा. साझा आंदोलन के अन्य घटकों को भी समझना चाहिए कि सशक्त आंदोलन की परिस्थितियां तभी बनेंगी जब महिलाओं की सक्रीय,सजग, और सक्षम भागीदारी आंदोलन में होगी और स्त्री चेतन में नारी मुक्ति के साथ मानव मुक्ति का लक्ष्य सामने होगा. स्त्री पराधीनता की शुरुआत व्यक्तिगत संपत्ति और समाज में वर्ग विभाजन के साथ शुरू हुई,और यह व्यक्तिगत संपत्ति के खात्मे और वर्ग विहीन समाज स्थापना के साथ ही खतम
होगीबार-बार पूछे जाने वाले कुछ सवाल और उनके जवाब- ( पृश्न संख्या १-४ तक की अधिकाँश सामग्री आज के पृश्न श्रृंखला में प्रकाशित वन्दना चक्रवती के साक्षात्कार से साभार ली गयी है.)

प्रश्न - प्राचीन भारत या वैदिक युग हमारा स्वर्ण काल था, उस वक्त समाज में स्त्रियों का बड़ा आदर था, उनकी पूजा की जाती थी. हमारी प्राचीन संस्कृति में स्त्रियों को बड़ा उच्च स्थान प्राप्त था.
 उत्तर -अतीत को महिमामंडित करने और स्त्री पुरुष संबंधों को आदर्शीकृत करने का यह प्रयास सच्चाई पर नहीं, कल्पना पर आधारित है. इस कल्पना पर बल उन्नीसवीं शताब्दी के समाज सुधारको ने स्त्री शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए प्राचीन काल की गार्गी और मैत्रेयी जैसी स्त्रियों के उदाहरण देकर दिया था कि देखो,हमारे यहाँ भी स्त्रियां कितनी विद्वान होती थीं, पुरुषों से शास्त्रार्थ करती थीं. यह उदाहरण उस युग में पितृसत्ता की मजबूती को भी स्पष्ट करता है. गार्गी और याज्ञवल्क्य के बीच शास्त्रार्थ की कथा बड़ी दिलचस्प है.एक बार राजा जनक ने अश्वमेघ यज्ञ के अवसर पर शास्त्रार्थ का आयोजन किया और सर्व श्रेष्ठ विद्याएं को स्वर्ण मुद्राओं के साथ १००० गायों का पुरूस्कार देने की घोषणा की. याज्ञवल्क्य ने घमंड से कहा कि यहाँ में ही सबसे बड़ा विद्वान हूँ , और यह कह कर गांव को लेकर चल दिए. लेकिन उसे ६ विद्वानों ने चुनौती दी, जिनमे ५ पुरुष और १ स्त्री थी.पाँचों विद्वान याज्ञवल्क्य से हार गए, तब गार्गी की बारी आयी. इससे एक तो यह पता चलता है कि उस वक्त पुरुषों की तुलना में स्त्रियाँ बहुत कम शिक्षित थीं, दूसरा यह है कि स्त्रियों को हीन दृष्टी से देखा जाता था, इसीलिये गार्गी की बारी सबसे आखिर में आयी. खैर गार्गी और याज्ञवल्क्य के बीच शास्त्रार्थ होने लगा. याज्ञवल्क्य गार्गी के प्रश्नों से परेशान हो गए, पहले तो उसने गार्गी को यह कहकर डांटा कि वह ,प्रश्न बहुत पूछती है. फिर क्रोध में आकर कहा कि अगर तूने कोई कोई और प्रश्न पूछा तो तेरा सिर कट जायेगा। अब आप ही बताईये, जब भरी सभा में कोई पुरुष किसी स्त्री को , और वह भी साधारण स्त्री नहीं विदुषी स्त्री को ऐसी धमकी देता है तो इससे क्या पता चलता है ? उस जमाने में भी अगर कोई स्त्री सवाल करती थी, या कोई तार्किक बात करती थी तो उसे बलपूर्वक चुप करा दिया जाता था. किसी को भी बोलने ना देना, उसके विरुद्ध सबसे बड़ी हिंसा है क्योंकि जब धमकी से काम चल जाता है तो फिर वास्तविक हिंसा की कोई जरूरत ही नहीं पड़ती। यह अप्रत्यक्ष हिंसा ही व्यक्ति को सत्ता का समर्थक बनाती है, चाहे वह राज सत्ता हो, धर्म की सत्ता हो या पुरुष सत्ता .
प्रश्न - आदिम काल में मातृसत्तात्मक समाज था. आज भी कई आदिवासी समाजों मातृसत्तात्मक समाज है , स्त्री हिंसा आधुनिक समाज की देन है?
 उत्तर - आदिम समाज में कबीले को माँ के नाम से पहचाना जाता था. स्त्री ही समूह की मुखिया थी. मातृसत्ता जैसी कोई चीज नहीं है. कुछ स्थानों या समाजों में आज भी पिता की जगह माँ परिवार की मुखिया होती है वंश पिता के नाम से नहीं माता के नाम से चलता हैलेकिन इसे पितृसत्ता के ठीक विपरीत व्यवस्था समझना ठीक नहीं है. पितृ सत्ता में जिस तरह स्त्री शरीर, उसके श्रम, उसके स्त्रीत्व पर पुरुष का नियंत्रण होता है , उसी तरह पुरुष के श्रम , उसके शरीर पर स्त्री का नियंत्रण कभी भी कहीं भी नहीं रहा. आज भी कुछ समाजों में वंश मान के नाम से चलता है लेकिन इसके लिए सही शब्द उंजतपंतबील या मातृसत्ता नहीं बल्कि उंजतपसपदल मातृवंशीयता है. स्त्री हिंसा से ही चली आ रही है. ऊपर दिए उदाहरण में आपने देखा याज्ञवल्क्य गार्गी को बोलने नहीं देते. यह तो बहुत बड़ी जिनसे है जहाँ शारीरिक हिंसा के बिना ही काम हो जाता है। जैसा हम कहें वह ठीक, और पीड़ित स्त्री बिना प्रतिरोध के उसे मान ले. शुरू के दौर को छोड़ दे तो समाज के विकास के हर दौर में हिंसा और भेदभाव उसके रूप बदल जाते हैं.
प्रश्न - कहा जाता है कि स्त्री और पुरुष के बीच पृकृति ने ही ऐसा श्रम विभाजन कर रखा है कि स्त्री घर में रहकर बच्चे पाले पुरुष घर से बाहर जाकर काम करे और कमा कर लाये ?
उत्तर -  यह सच है कि स्त्री पुरुष में जैविक भिन्नता एक प्राकृतिक भिन्नता है. पृकृति में ऐसा कुछ नहीं है जो स्त्री को पुरुष के आधीन करने या घरेलु काम करने की बाध्यता पैदा करेसेक्स एक प्राकृतिक चीज है और जेंडर की अवधारणा समाज ने गढ़ी है. आरंभिक मानव समाजों या आदिम समाज में कहीं भी स्त्री पर पुरुष का नियंत्रण नहीं पाया जाता. दरअसल, पुरुष को स्त्री से श्रेष्ठ बताने के लिए यह कहा जाता है कि वह शुरू से घर के लिए रोटी कमाने वाला या इतमंक ूपददमत रहा है. दलील यह दी जाती है कि आरंभिक समाज में पुरुष शिकार करने जाते थे और स्त्रियाँ घर और बच्चों को सम्हालती थीं. लेकिन इतिहास बताता है कि शिकार और आहार संग्रह का काम एक साथ होता था. पुरुष शिकार करने के लिए जाते थे, और स्त्रियाँ आहार - संग्रह के लिए जाती थीं. भोजन में शिकार करके लाये मांस का हिस्सा कम होता था और स्त्रियों द्वारा संग्रह किये गए कंद - मूल - फल का ज्यादा. आदिवासी समाजों में आज भी हैं कि स्त्रियों पर पुरुषों का वैसा नियंत्रण नहीं होता जैसा सामंती या उत्पादन से जुड़े समाजों में होता है. इससे स्पष्ट है की जेंडर अवधारणा, और पितृसत्ता का विकास ना तो प्राकृतिक है और ना ही सदा से ऐसा चला आ रहा है, बल्कि ये बाद में आने वाली चीजे हैं.

प्रश्न - वर्गीय, जातीय,और साम्प्रदायिक हिंसा में प्रत्यक्ष हिंसा भी दिखायी देती है ,और दूसरी तरफ से भी संगठित विरोध भी दिखायी दे ही जाता है, पर महिला हिंसा के मामले में प्रत्यक्ष हिंसा या विरोध कम ही होता है
उत्तर- जाति , वर्ग और संप्रदाय की हिंसा को स्त्री के लिए समझना आसान है. पर अपने ही घर, जाति , संप्रदाय और वर्ग में अपनी स्थिति को समझना मुश्किल हो जाता है. पुरुष होने के नाते अन्याय करने वाला मेरा ही भाई, बेटा , या पति है , ऐसे में भावनाएं आड़े आ जाती हैं. यही नहीं भावनाओं के साथ रिश्ते, रिवाज , परम्परायें , परिवार, बच्चों की सुरक्षा, आदि की चिंता भी प्रतिरोध को कुंद करने और परिस्थितियों से अनुकूलन करने की ओर ले जाती हैइस तरह वे पुरुषों द्वारा किये अत्याचारों में सहभागी हो जाती हैं,यही कारण है कि पितृ सत्ता का विरोध एक सीमा से आगे नहीं जा पाता . इसके बिना पितृसत्ता चल ही नहीं सकती। लेकिन इस व्यवस्था के विरोध में महिलाएं समय-समय पर आवाज उठाती रही हैं.
प्रश्न - स्त्री वाद, स्त्री मुक्ति ,न्याय, समानता के लिए स्त्री संघर्ष की बातें पश्चिम की अवधारणा है, पश्चिम की नकल करने वाली आधुनिकता की शिकार महिलाएं इसका प्रचार कर रही हैं. हमारे देश की परम्पराओं और संस्कृति में ऐसे विचारों की कोई जगह नहीं है ?
उत्तर - स्त्री मुक्ति आंदोलन के महत्त्व को कम करने के लिए पितृसत्ता के समर्थक इस तरह का दुष्प्रचार करते हैं. स्त्रियों का स्वयं के अस्तित्व का अहसास करना , इसे बनाये रखने के लिए संघर्ष करना, सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर स्त्री विरोधी सवालों पर प्रश्न चिन्ह लगाना, और इन प्रश्नों पर अपने सवाल खड़े करना समाज में पुराने समय से ही चला आ रहा है. बुद्ध ने अपना संघ बनाया उसमे शुरू में स्त्रियों आने की अनुमति नहीं थी, लेकिन बाद में स्त्रियों के संघ में आने की इच्छा के आगे उन्हें झुकना पड़ा और संघ में आने की अनुमति देनी
पडी. बौद्ध साहित्य में कुछ रचनाएं मिलती हैं जिन्हें थेरी गाथा कहते हैं. वृद्धा बौद्ध भिक्षुणियों को थेरी कहा जाता था. थेरी गाथा में इन वृद्धा बौद्ध भिक्षुणियोंने सामजिक बंधनों से मुक्ति पुरुष समानता के गीत, उनके आध्यात्मिक अनुभव जीवन की संक्षिप्त कहानियाँ हैं. ये गाथाएं स्त्रियों के अपने बारे में लेखन अपने लेखन के सबसे पुराने प्रमाण हैं. 18वीं शताब्दी में पितृसत्ता की आलोचना मुखर हो जाती है. पंडिता रमाबाई, ताराबाई शिंदे ने पितृसत्ता की तीखी आलोचना की।

इसके बाद तो स्त्री मुक्ति आंदोलन की बहुत सी धाराएं देखने को मिलती हैं. कुल मिला कर बात यह है कि पितृसत्ता की आलोचना, इसके साथ संघर्ष प्राचीन समय से ही हमारे समाज का हिस्सा रहा है. इस तरह समझ सकते हैं कि पितृसत्ता स्त्री को पुरुष के आधीन रखने की व्यवस्था है और स्त्री मुक्ति इस जकड़न से छूटने की छटपटाहट। स्त्री वाद, स्त्री मुक्ति ,न्याय, समानता के लिए स्त्री संघर्ष की बातें हमारे समाज में प्रारम्भिक दौर से ही रही हैं. ये हमारी संस्कृति और इतिहास का हिस्सा है.
 प्रश्न - स्त्री के जीवन की पूर्णता मातृत्व में निहित है, यही जीवन का सच्चा सुख और उद्देश्य है. जो स्त्री इस सुख से वंचित है, उसका जीवन निरर्थक है
उत्तर - सृजन का आनंद संसार में सबसे ज्यादा है. सृजन की पीड़ा और आनंद का वर्णन बहुत से कवि और लेखकों ने किया है. स्त्री स्वयं सृजनकर्ता है, वह स्वयं नए जीवन का सृजन करती है, सृजन की पीड़ा से गुजराती है, इसीलिये अपने द्वारा सृजित जीवन की भलाई की कामना जिंदगी भर करती है. सृजन की इस पीड़ा और आनंद का अनुभव हमें कार्यों से भी मिलता है. सृजन के अनुभव को सिर्फ मातृत्व में सीमित करके स्त्री को समाज के अन्य दायित्वों करना पितृसत्ता और राजसत्ता का षडयंत्र है. दूसरी बात यह है कि नए जीवन का अकेले नहीं करती, पुरुष भी है. अतः यदि मातृत्व इतना महत्वपूर्ण है तो पितृत्व या पिता बनना भी उतना ही आनंददायक,गौरवपूर्ण और महत्वपूर्ण होना चाहिए . यदि मान भी लें कि मातृत्व महत्वपूर्ण है तो बेटी या उभयलिंगी संतान का गौरव क्यों नहीं मनाया जाता. समाज में मातृत्व का इतना बड़ा हौव्वा खड़ा किया जाता है कि जो स्त्री किसी कारन से माँ नहीं बन पाती, वह अपने जीवन को अभिशप्त मानती है. ये तो चिकित्सा विज्ञानं की तरक्की ने बता दिया कि शिशु के लिंग निर्धारण में स्त्री की भूमिका नहीं है, और संतान ना पैदा होने का कारण पुरुष भी हो सकता है, और स्त्री की जान बची. वरना समाज इन कारणों के लिए स्त्री को ही दोषी ठहराता था. माँ बनाना स्त्री का प्राकृतिक गुण है,और मातृत्व का महिमामंडन पितृसत्ता का छल.
प्रश्न - ऐसा माना जाता है कि स्त्री प्रेम, त्याग, तपस्या, बलिदान,की प्रतिमूर्ति है, वे भावुक होती हैं, तार्किक और कठोर निर्णय नहीं ले सकती अतरू वे घर से बाहर काम करने के योग्य नहीं हैं
उत्तर- शिशु जन्म लेने के बाद अपने परिवेश, घर, परिवार और समाज के बीच सीखते हुए बड़ा होता है. बच्ची की परवरिश इस तरह की होती है वह घर के अंदर, और ज्यादा से ज्यादा शिक्षण संस्थान तक सीमित रहती है. उसके साथ की अन्य लड़कियों का भी अनुभव जगत ऐसी की तरह बहुत सीमित होता है. जबकि लडके बचपन से खेल, कूद,दौड़ना भागना, कूदना , गिरना में बिंदास भागीदारी करते हैं. लड़कियों विभिन्न सामाजिक वर्जनाओं के कारण चीजों से रोका जाता है जो इंसान में जबरदस्त आत्मविश्वास पैदा करती हैं. लड़कों का ऐसे
भी लड़कों से मिलना जुलना रहता है जो कभी-कभी शराब पी लेते हों, असलाह चलाना जानते हों, असलाह रखते भी हों, लड़ाई-झगड़ा करते हों, हो सकता है एकाध बार हवालात में भी रह आया हो, या फिर जो पढाई में अच्छे हो, उनके पास अच्छी अतिरिक्त किताबें हों, घर में कोई मदद करने वाला हो, आगे लिए अच्छे संस्थानों के बारे में जानता हो ...आदि ...आदि

इन सब का साथ लड़कों के अनुभव जगत को विस्तार देता है. लड़कियों को यह मौका नहीं मिलता. स्त्रियों को मजबूत नहीं बनने दिया जाता क्यों कि अबोधता, अज्ञानता, भावुकता लड़कियों का गुण माना जाता है. इस कारण कुछ हद तक स्त्रियों में भावुकता का पुट ज्यादा हो जाता है पर यह कोई कमजोरी नहीं है. दूसरी और पुरुषों में भी भावुकता होती है पर पितृसत्तात्मक समाज इसे अभिव्यक्त नहीं करने देता. स्त्रियां संबंधों को भी बहुत महत्त्व देती हैंइतिहास गवाह है कि स्त्रियां ना सिर्फ शासक रही हैं बल्कि आज वे शासन- प्रशासन के वरिष्ठ पदों पर भी हैं. जिन स्त्रियों को भी व्यापक अर्थों में सीखने का अवसर मिला, उन्होंने स्वयं को कहीं पीछे नहीं रहने दिया. यह भ्रम कि स्त्रियां कठोर निर्णय नहीं ले सकती, अब टूट रहा है लेकिन यथास्थिति वादी ताकतें मजबूती इस भ्रम को खिलाफ प्रयोग कर रही हैं.

सोमवार, 6 फ़रवरी 2017



आधा कार्य काल बीत 
गया,कहाँ हैंअच्छे दिन  
सामाजिक न्याय के 
लिए एकजुट हों । 
नोटबंदी से भारतीय 
कृषि की नसबंदी ॥ 
त्रिपुरा में किसान आत्महत्या 
की एक भी घटना नहीं हुई । 




कई झटके खा चुके हैं आओ । 
गणतांत्रिक मूल्यों को बचाओ ।



 

मंगलवार, 24 जनवरी 2017

67 saal

67 साल की उम्र और पीरा गढी  से रोहतक रोडवेज़ की बस में शाम 6. 45 पर चढ़ना  और सफर करना अपने आप में एक मजमून है ।  अच्छी बात यह है कि एक नौजवान ने बुजुर्ग मान कर मुझे बैठने को सीट दी । एक महिला  को एक दूसरे नौजवान ने बैठने को सीट दी।  बाकि भीड़ का चाला पाटग्या ।  हिम्मत है सवारियों की के पां टेकण की जगह नहीं फेर हँसते बोलते सफर रोहतक ताहिं का तय कर लिया । 
Understanding Nationalism
When one of the earliest martyrs of India’s freedom struggle,
Khudiram Bose, embraced the hangman’s noose, his countrymen bid
him farewell and sang ‘Hansi Hansi Porbo Phansi, Dekhbe Mor
Deshbashi’ (my countrymen will watch me as I go to the gallows with
a smile on my face). Bhagat Singh’s call of ‘Inquilab Zindabad’ inspired
a whole generation to resist British rule in India. They rose up as one
against the inhumanity heaped on Indians by the then mightiest imperial
power, with Bhagat Singh’s words ringing in their ears: ‘The sanctity of
Law can be maintained only so long as it is the expression of the will
of the people’. The youth of India joined the struggle against British
Colonialism remembering Chandrashekhar Azad’s immortal words:
‘If yet your blood does not rage, then it is water that flows in your
veins. For what is the flush of youth, if it is not of service to the
motherland’. When young Indian ratings in service in the British Navy
turned the guns on their ships towards the Bombay harbour, workers
across India downed their tools in solidarity. Our struggle for freedom
united the entire country, chasing a dream that had to become a reality.
In the words of the poet-revolutionary Ashfaqullah Khan ‘There is no
dream, and if there is, there is only one to see you my children struggling
for the same and for which I am expected to be finished’.