रविवार, 1 जून 2025

आंकड़े

हरियाणा में जल संकट
*दूध दही किसानी और खेलकूद के लिए मशहूर हरियाणा में जल संकट गहराता जा रहा है 
*यहां के कुल 7287 गांव में से 3041 गांव पानी की कमी से जूझ रहे हैं 
*40% गांव संकट में है
* 1948 तो ऐसे गांव है जो गंभीर संकट झेल रहे हैं ..रेड जॉन भूजल गिर रहा है *84% गांव में भूजल स्तर  तेजी से पाताल की ओर जा रहा है
 *1304 गांव ग्रीन जोन में है 


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हरियाणा की 3 साल की कैंसर रिपोर्ट 2020-2022 के बारे में जानकारी देते हुए उन्होंने बताया कि 2020 में 29,219, 2021 में 30,015 और 2022 में 30,851 नए कैंसर के मामले सामने आए। इसी प्रकार, 2020 में 16,109, 2021 में 16,543 और 2022 में 16,997 लोगों की कैंसर से मृत्यु हुई।29 Mar 2025

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 *हरियाणा कैंसर की घाटी*
 *कैंसर से रोजाना 43 मौतें*
 *83 नए मरीज रोजाना कैंसर के*
 *2024 में 30475 कैंसर के नए मरीज*
 *कुल 915 कैंसर बिस्तर*
 *1 लाख जनसंख्या पर 100 से अधिक कैंसर के केस*
 *हरियाणा कैंसर के मरीजों के हिसाब से देश में तीसरे स्थान पर*
 *सिरसा जिले  के सादेवाला गांव में सबसे ज्यादा कैंसर के मरीज*
 *संक्राम गांव   नूह जिले का सबसे ज्यादा मरीज*

****/
15 से 49 साल की सभी महिलाओं में अनिमिया  (%)
NFHS..5
शहरी 57.4
ग्रामीण 61.9
कुल मिलाकर 60.4
NFHS..40
कुल मिलाकर 62.7
****
 Women age 20 to 24 years married before age 18 years percentage
Urban rural total
 9.9 13.7 12.5
, non pregnant women age 15 to  49 years who are anaemic  less than 12 gram percentage
Urban rural total nfhs5 nfhs4
 57.562.1 60.6 63.1

pregnant women age 15 to  49 years who are anaemic less than 11gm hb
64.6,57.2,56.5,55.0

All women age 15 to  49 years who are anaemic 
57.4,61.8,60.462.7

All women age 15 to  19 years who are anaemic 
Nfhs5220..21 nfhs 4,2015 -16
59.3,63.5,62.3,62.7





किलोई से 67 साल में 1000 राष्ट्रीय व 180 अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी निकल चुके ।
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https://rthresources.in/conversations-on-health-policy/safe-affordable-and-made-in-india-can-we-deliver/

Increasing reports of poor quality of medicines manufactured in India, whether as exports or for domestic consumption, are a matter of great concern. But this crisis should not become an excuse for strengthening corporate monopoly and excessive centralization.  In this conversation, we discuss the why and how of designing a regulatory regime in India, that can guarantee quality medicines without any compromise to affordability or public health, not only for India, but for the entire third world.


लोकसभा चुनाव सीरीज का पार्ट 18 
चंद्र प्रजापति  लेखक
01. सबसे अमीर 0.1  फीसदी लोगों के पास कुल संपत्ति का 70% हिस्सा है 
चंद्र प्रजापति  लेखक
02. नीचे के 50 फीसदी लोगों के पास केवल 6.4 फ़ीसदी संपत्ति है 
चंद्र प्रजापति  लेखक
03. दो सालों में 64 अरबपति पैदा हुए 
चंद्र प्रजापति  लेखक
04. देश के 100 खराबपति के पास 5412 लाख करोड रुपए हैं 
चंद्र प्रजापति  लेखक
05. नीचे की 70 करोड़ जनता की संपत्ति केवल 21 खरबपतियों के बराबर है 
चंद्र प्रजापति  लेखक
06. 60 फीसदी जनता की आमदनी 2 डॉलर प्रति दिन है 
चंद्र प्रजापति  लेखक
07. नीचे की 30 फीसदी जनता की आमदनी एक डॉलर प्रतिदिन है 
चंद्र प्रजापति  लेखक
08. नीचे की 50 फीसदी जनता, जीएसटी का 64 प्रतिशत हिस्सा देती है 
चंद्र प्रजापति  लेखक
09. ऊपर के 10 फीसदी अमीर, केवल तीन फीसदी हिसा देते हैं 
चंद्र प्रजापति  लेखक
10. मुकेश अंबानी की 7.63 लाख करोड़ की संपत्ति है और रोजाना 163 करोड कमाते हैं
चंद्र प्रजापति  लेखक
11. अडानी के पास 6.54 लाख करोड़ की संपत्ति है, रोजाना 1600 करोड कमाते हैं

***//
एक राष्ट्र एक चुनाव तानाशाही पूर्ण केंद्रीय करण को बढ़ावा देगा.
2022 तक अनुसूचित जातियों में बेरोजगारी की दर 8.4% थी और अनुसूचित जातियों के 84% लोग अनौपचारिक रोजगार में थे।
2021 और 2022 के बीच अनुसूचित जातियों एससी के खिलाफ अपराधों में 13% की वृद्धि हुई है उत्तर प्रदेश 26% मामलों के साथ सबसे आगे है.

 *हरियाणा कैंसर की घाटी*
 *कैंसर से रोजाना 43 मौतें*
 *83 नए मरीज रोजाना कैंसर के*
 *2024 में 30475 कैंसर के नए मरीज*
 *कुल 915 कैंसर बिस्तर*
 *1 लाख जनसंख्या पर 100 से अधिक कैंसर के केस*
 *हरियाणा कैंसर के मरीजों के हिसाब से देश में तीसरे स्थान पर*
 *सिरसा जिले  के सादेवाला गांव में सबसे ज्यादा कैंसर के मरीज*
 *संक्राम गांव   नूह जिले का सबसे ज्यादा मरीज*
 *एक बिस्तर 33 कैंसर के मरीजों के लिए*
 *वर्ष 1966 में हरियाणा के गठन के बाद से केवल 87 महिलाएँ विधानसभा के लिये चुनी गई हैं।*

*राज्य में कभी भी कोई महिला मुख्यमंत्री नहीं रही।*

बुधवार, 28 मई 2025

कुलभूषण आर्य

आदरणीय डॉ साहब  नमस्ते 
आपका लेख हरियाणा का सामाजिक सांस्कृतिक परिदृश्य पढ़ा। आपने इस लेख में काफी डिटर्मिननेंट्स कवर किए हैं। इनसे संबंधित आंकड़े प्रस्तुत किए हैं। इस दृष्टि से यह लेख काफी अच्छा बन पड़ा है।
मैं दो-तीन कॉर्नर से इस पर अपनी टिप्पणी करना चाहता हूं। कई मुद्दों पर आपने लिखा है ऐसा क्यों हुआ? यह एक गंभीर सवाल है और अलग से एक गंभीर बहस की मांग करता है। इससे एक अर्थ तो यह निकलता है कि ऐसे मुद्दों पर और अध्ययन चाहिए। यानी कई और परचे लिखे जाने अभी बाकी है । यह सही भी है। इस अर्थ में यह परचा (सामाजिक सांस्कृतिक परिदृश्य) और बड़ा बनेगा । यह बनना भी चाहिए।
  यद्यपि हरियाणा कोई बड़ा प्रदेश नहीं है, फिर भी भिन्नताओं का अंतर बहुत ज्यादा है ( आपने स्वीकारा है)। नए गुरुग्राम और लोहारू में जमीन आसमान का अंतर है।
पंचकूला और मेवात में बहुत कम समानता है। इसी तरह डबवाली और नारनौल आदि और भी उदाहरण हैं। इसके चलते हरियाणा की एक औसत तस्वीर बनाना काफी मुश्किल काम है। आंकड़ों को आधार बनाकर परिदृश्य पढ़ना एक और चुनौती है। एक तो ये आंकड़े बहुत जल्दी बदल जाते हैं, दूसरा आंकड़ों के स्रोत अलग-अलग आंकड़े प्रस्तुत करते हैं। तीसरे बेजान आंकड़े कभी भी जीवंत तस्वीर नहीं गढ़ सकते । लेकिन अध्ययन के लिए यह जरूरी भी होते हैं।
    कुछ और रुझान भी देखें हरियाणा में भीख मांग कर खाने वाले अपेक्षाकृत कम मिलेंगे। (अभी आंकड़े नहीं है) अधिकतर भिखारियों  की संख्या या तो मठों के आसपास या पर्यटन स्थलों पर मिलती है।
इस प्रदेश में यह पर्यटन उद्योग भी एक कमजोर पक्ष रहा है। दूसरे इतने धाम या मठ (बेड़ ) यहां नहीं पनपे हैं।(हालांकि मंदिर छोटे कहें संख्या कम नहीं)। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि हरियाणा, पंजाब का एक भाग अलग हुआ है। प्राय ऐसा कहा जाता है कि सिख भीख नहीं मांगते। सिख परम्परा मनुवाद के विद्रोह स्वरूप भी बनी है। इन्होंने अपनी भाषा लिपि (गुरुमुखी) इसीलिए अलग बनाई है ताकि संस्कृत के उच्चारणों (कर्मकांडो) से काफी हद तक बचा जा सके। यह कोई छोटी बात नहीं है। हरियाणा को इसका फायदा भी मिला है।
इस प्रदेश में रूढ़िवाद की जड़ें अपेक्षाकृत ढीली हैं।एक पक्ष वृद्धाश्रमों  का भी लिखा जाना चाहिए। इस समय पूरे देश में सरकारी वृद्धाश्रमों की संख्या 700 से ऊपर है।।केरल में सर्वाधिक 124 हैं तथा हरियाणा में केवल एक है।चेरिटेबल संस्थाएं तो अनेक मिल जाएंगी।वृद्धों का गरिमापूर्ण बुढ़ापा गुजरना अब इस प्रदेश में मुश्किल होता जा रहा है।युवाओं के स्वतंत्र जीवन जीने की भावना कुछ ज्यादा पनप रही है।
    हरियाणा में कामगारों व कारीगरों की स्थिति बड़ी दयनीय हो गई है। पुराने समय की हवेलियां (वास्तुकला) व उनकी लकड़ी की कारीगरी तथा छत के निकट नीचे रंगीन कलाकृतियां -- कहीं बची हुई मिल जाएंगी।उनमें जो हाथ का हुनर होता था  आज ऐसे कारीगर सीमित हो गए हैं। ऐसे काम फुर्सत के दिहाड़ी पर ही हो सकते हैं।इनके कद्रदान पुराने सेठ भी आज नहीं रहे।पत्थर पर संगतरासी व लकड़ी पर खुदाई आज शायद ही मिले। इसी प्रकार तांबे - पीतल के  देग - टोकनी - सागर आज शायद ही मिलें। इस प्रकार ठठेरे अधिकतर रेडीमेड  आइटमों पर आकर रुक गए हैं। मिट्टी का काम (कुम्हार)  pottery आज दम तोड़ रहा है। मिट्टी के खुदाने ही नहीं रहे। अधिकांश मिट्टी  highways/ byepas में लग जाती है।कुम्हार का चाक जो कभी शगुन में पूजा जाता था  आज कोने में टोकन का रखा राज्य है।हरियाणा में आज कौन पैर का नाप देकर चमड़े का  जूता - जूती बनवाता है?  कंपनियों के ' use and thro' जूते हैं। वो चर्मकर्मी भी नहीं रहे। गली बाजारों के चौराहों पर बैठ कर जूतों की मुरम्मत  करने वाले आज कहां दिखाई देते हैं । ऐसे कारीगरों की बुरी हालत है। बड़े व्यवसाय करने की उनकी हैसियत नहीं । लोहार आदि का भी आज यही हाल  है। Theory of alienation में पहले तो  इस प्रकार के कामगार अपने उत्पाद से अलग होते थे। काम के बोझ के कारण  ( या व्यस्त)अपने समुदाय के अलगाव महसूस करते थे। अब तो वे  शक्तिहीन, लाचार व पूरी तरह , दया आधारित  meaningless जीवन जीने को मजबूर हैं। कुछ  जातियों (कामगारों ) में आरक्षण के कारण इक्का दुक्का कोई नौकरी पा भी गया तो अहम भाव से वह अपने समुदाय में elite मानने लग गया। यह एक नए प्रकार का alienation है।
      ।हाल ही के कुछ वर्षों में हरियाणा के युवाओं में कावड़ लाने की प्रवृति बढ़ी है।मोटे रूप में देखा गया है कि इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि उनकी आस्थाएं मजबूत हुई हों। ऐसे अधिकतर युवाओं के पास न कोई काम है , न कोई सार्थक एजेंडा। बड़ा  एजेंडा यहीं तक सिमटा होता है कि लगभग पंद्रह दिन की पिकनिक व मुफ्त के लंगर बस। इसी तरह हरियाणा में रात्री जागरणों का प्रचलन भी बढ़ा है।इनकी प्रकृति अधिकतर व्यवसायिक होती है। इसी तरह धार्मिक शोभा यात्राएं भी कुछ ज्यादा बढ़ी है। कुछ नए प्रकार के उत्सवों का भी प्रवेश हुआ है।
    गणेश पूजा में छठ पूजा आदि इस क्षेत्र के नहीं थे फिर भी इनका पर्सनल इधर बढ़ गया है मुझे नहीं लगता कि हमारे यहां के 30 गूगल आदि दूसरे प्रदेशों में गए हो एक कारण तो समझ में आता है यहां के शहरों में हर तीसरे चौथे घर में झाड़ू पोछा करने वाली बिहारन या यूपी से हैं इसी तरह इन प्रदेशों की माइग्रेंट लेवल इधर बढ़ गई है शहर के लेबर चौक के चौराहे पर बड़ी तादाद मिली थी मिलेगी उनके साथ उनकी पत्नियों भी कंस्ट्रक्शन के कामों पर जा रहे हैं। जिस तरह दिल्ली जैसे शहरों में जेजे कॉलोनी जोगी झोपड़ी में आज हरियाणा के अधिकांश शहरों में आउटसाइड में यह यूपी बिहार आदि के आए मजदूर बड़ी संख्या में बहुत ही कठिन हालातो में रह रहे हैं कुछ छोटे स्तर के रोजगार के काम जैसे फल सब्जियों की रेडी पानी पुरी के कौन से जून तकनीकी कब कर खरीदने वाले कबाड़ खरीदने वाले नल पानी विसर्जन आदि के छोटे-छोटे काम यहां हरियाणा वशी काम ही कर रहे हैं 
हरियाणा प्रदेश मोहनजोदड़ो व हड़प्पा की सभ्यता का इलाका रहा है । राखी गढीं मिताथल आदि में कुछ पूरातत्व साक्ष्य मिले हैं । परंतु इस दिशा में जितने शोध होने चाहिए थे वे हुए नहीं । दूसरी और कुरुक्षेत्र और करनाल आदि में महाभारत( इतिहास) के नाम पर बहुत कुछ manupulated लेबल लगाए जा रहे हैं ।  यह हरियाणा की ऐतिहासिक व सांस्कृतिक धरोहर को विकृत करने की कोशिश हैं ।
   सॉन्ग व रागनियां  इस क्षेत्र की folk संस्कृति रही हैं। लेकिन सॉन्ग कला लगभग विलुप्त होने के कगार पर है। रागिनियो का  चरित्र आज भोंडी सकल अख्तियार कर चुका है । इस क्षेत्र में लड़कियों का प्रवेश एक नयापन है। साक्षरता आंदोलन के प्रयासों में इस दिशा में कुछ मूल्य स्थापित करने की कोशिश हुई थी । वह तर्ज की दृष्टि से तो आज भी आकर्षण का केंद्र है लेकिन vontent की दृष्टि से ज्यादा नहीं लुभा रहा। इन पर उतनी सीटियां नहीं बजती जितनी भौंडी रागनियां के कंपीटीशन में बजती हैं। इससे यहां के जनमानस के  चरित्र व पसंद का अंदाजा लगाया जा सकता है।हफ्तों भर रातों को घूमने वाली भजन मंडलियां आज बीते युग की बात लगती हैं। हरियाणा का फिल्म उद्योग अभी नया है। हरियाणवी में बहुत कम फिल्में ही सामने आई हैं। एक चंद्रावल फिल्म ही ऐसी फिल्म रही है जिसने एक खास मुकाम हासिल किया था।
     खेलों की संस्कृति में यहां (कुश्ती-कब्बडी) आदि का बोलबाला रहा है।यहां के गबरू जवान सेहत की दृष्टि से तो श्रेष्ठ रहे, परंतु  कोचिंग (तकनीक) के मामलों में अभी हाल ही मैं कुछ  हासिल कर पाए हैं। ओलंपिक में हरियाणा का दबदबा  विशेषकर (कबड्डी) में साफ दिखता है। मास्टर  चन्दगी राम व कपिल देव की उपलब्धियां भी कम नहीं रही। कपिलदेव ने सर्वप्रथम  क्रिकेट जैसे खेल में  बंबई के वर्चस्व को न केवल तोड़ा अपितु विश्वकप प(हली बार)  भी  जिताया।हॉकी में भी यहां का प्रदर्शन सराहनीय रहा है।
इस प्रदेश  के अधिकांश खिलाड़ी  (ख्यातिप्राप्त) अवसरवाद की राजनीति का शिकार बने हैं।
   रीति रिवाजों ,खानपान,पहनावे आदि में बड़े परिवर्तन  आए हैं। पींग कहीं कहीं ही देखने को मिलती है। बारातियों का रुपया गिलास  आज की पीढ़ी जानती नहीं।कोथली की सुहालियाँ तो कब की गायब हो गई।धोती कुर्ता , कमरी खंडका बहुत कम देखने को मिलते हैं। खीर चूरमा , बाजरे की खिचड़ी आज की पसंद की खुराक नहीं रही। चना बाजरा कम हो गया है।चावल का प्रचलन बढ़ गया है। आज भातीयों  का खांड कसार भी कहां है। आज यहां के लोग सत् पीना भूल गए हैं।
   पहले हरियाणा में उद्योग बहुत ज्यादा तो नहीं थे। परंतु इधर उधर बिखरे हुए थे।आज उद्योग क्षेत्र कुछ स्थानों पर concentrate हो गए हैं। नया गुरुग्राम व फरीदाबाद  आज हरियाणा का हिस्सा लगते ही नहीं। अधिकांश उद्योग GT Road की बेल्ट पर आ गए हैं।  जहां तक बिजली पानी का सवाल है, दक्षिण हरियाणा इस मामले में पिछड़ा हुआ  है। अंबाला करनाल आदि की तरफ की लड़कियां दक्षिण हरियाणा में कम ब्याही जा रही हैं।यह एक अलग प्रकार का socialA alienation है।
      एक दो बातें और हैं जिन पर मैं अभी ठीक ठीक कह नहीं सकता । पिछले  दिनों हरियाणा में जाट आरक्षण आंदोलन ने  हरियाणा के सामाजिक ताने बाने  को एक dent दिया। प्रतिक्रियावादी ताकतों ने इसे Encash कर लिया। यह सामाजिक अविश्वास एक नया phenomenon है। इसके संज्ञान की जरूरत है। (For damage control)
     दूसरी बातवाई कि पिछले लगभग चालीस वर्षों से  ज्ञान विज्ञान आंदोलन हरियाणा में बड़ी ताकत लगा कर एक नवजागरण की दिशा में अग्रसर है। उत्तर भारत (विशेषकर हिंदी भाषी) में यह एक उदाहरण है। इसके क्या social impactsw हैं, अभी अध्ययन होना बाकी है।।डॉ साहब विशेष आग्रह यदि हो सके तो आप अपने प्रभाव के विश्वविद्यालयों के किसी Guide profesdor के तहत किसी शोधार्थी का topic for PHD बनवा सकें । इससे यह काम डॉक्यूमेंट भी हो जाएगा।
वेद प्रिय

        



वेद प्रिय

आदरणीय डॉ साहब  नमस्ते 
आपका लेख हरियाणा का सामाजिक सांस्कृतिक परिदृश्य पढ़ा। आपने इस लेख में काफी डिटर्मिननेंट्स कवर किए हैं। इनसे संबंधित आंकड़े प्रस्तुत किए हैं। इस दृष्टि से यह लेख काफी अच्छा बन पड़ा है।
मैं दो-तीन कॉर्नर से इस पर अपनी टिप्पणी करना चाहता हूं। कई मुद्दों पर आपने लिखा है ऐसा क्यों हुआ? यह एक गंभीर सवाल है और अलग से एक गंभीर बहस की मांग करता है। इससे एक अर्थ तो यह निकलता है कि ऐसे मुद्दों पर और अध्ययन चाहिए। यानी कई और परचे लिखे जाने अभी बाकी है । यह सही भी है। इस अर्थ में यह परचा (सामाजिक सांस्कृतिक परिदृश्य) और बड़ा बनेगा । यह बनना भी चाहिए।
  यद्यपि हरियाणा कोई बड़ा प्रदेश नहीं है, फिर भी भिन्नताओं का अंतर बहुत ज्यादा है ( आपने स्वीकारा है)। नए गुरुग्राम और लोहारू में जमीन आसमान का अंतर है।
पंचकूला और मेवात में बहुत कम समानता है। इसी तरह डबवाली और नारनौल आदि और भी उदाहरण हैं। इसके चलते हरियाणा की एक औसत तस्वीर बनाना काफी मुश्किल काम है। आंकड़ों को आधार बनाकर परिदृश्य पढ़ना एक और चुनौती है। एक तो ये आंकड़े बहुत जल्दी बदल जाते हैं, दूसरा आंकड़ों के स्रोत अलग-अलग आंकड़े प्रस्तुत करते हैं। तीसरे बेजान आंकड़े कभी भी जीवंत तस्वीर नहीं गढ़ सकते । लेकिन अध्ययन के लिए यह जरूरी भी होते हैं।
    कुछ और रुझान भी देखें हरियाणा में भीख मांग कर खाने वाले अपेक्षाकृत कम मिलेंगे। (अभी आंकड़े नहीं है) अधिकतर भिखारियों  की संख्या या तो मठों के आसपास या पर्यटन स्थलों पर मिलती है।
इस प्रदेश में यह पर्यटन उद्योग भी एक कमजोर पक्ष रहा है। दूसरे इतने धाम या मठ (बेड़ ) यहां नहीं पनपे हैं।(हालांकि मंदिर छोटे कहें संख्या कम नहीं)। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि हरियाणा, पंजाब का एक भाग अलग हुआ है। प्राय ऐसा कहा जाता है कि सिख भीख नहीं मांगते। सिख परम्परा मनुवाद के विद्रोह स्वरूप भी बनी है। इन्होंने अपनी भाषा लिपि (गुरुमुखी) इसीलिए अलग बनाई है ताकि संस्कृत के उच्चारणों (कर्मकांडो) से काफी हद तक बचा जा सके। यह कोई छोटी बात नहीं है। हरियाणा को इसका फायदा भी मिला है।
इस प्रदेश में रूढ़िवाद की जड़ें अपेक्षाकृत ढीली हैं।एक पक्ष वृद्धाश्रमों  का भी लिखा जाना चाहिए। इस समय पूरे देश में सरकारी वृद्धाश्रमों की संख्या 700 से ऊपर है।।केरल में सर्वाधिक 124 हैं तथा हरियाणा में केवल एक है।चेरिटेबल संस्थाएं तो अनेक मिल जाएंगी।वृद्धों का गरिमापूर्ण बुढ़ापा गुजरना अब इस प्रदेश में मुश्किल होता जा रहा है।युवाओं के स्वतंत्र जीवन जीने की भावना कुछ ज्यादा पनप रही है।
    हरियाणा में कामगारों व कारीगरों की स्थिति बड़ी दयनीय हो गई है। पुराने समय की हवेलियां (वास्तुकला) व उनकी लकड़ी की कारीगरी तथा छत के निकट नीचे रंगीन कलाकृतियां -- कहीं बची हुई मिल जाएंगी।उनमें जो हाथ का हुनर होता था  आज ऐसे कारीगर सीमित हो गए हैं। ऐसे काम फुर्सत के दिहाड़ी पर ही हो सकते हैं।इनके कद्रदान पुराने सेठ भी आज नहीं रहे।पत्थर पर संगतरासी व लकड़ी पर खुदाई आज शायद ही मिले। इसी प्रकार तांबे - पीतल के  देग - टोकनी - सागर आज शायद ही मिलें। इस प्रकार ठठेरे अधिकतर रेडीमेड  आइटमों पर आकर रुक गए हैं। मिट्टी का काम (कुम्हार)  pottery आज दम तोड़ रहा है। मिट्टी के खुदाने ही नहीं रहे। अधिकांश मिट्टी  highways/ byepas में लग जाती है।कुम्हार का चाक जो कभी शगुन में पूजा जाता था  आज कोने में टोकन का रखा राज्य है।हरियाणा में आज कौन पैर का नाप देकर चमड़े का  जूता - जूती बनवाता है?  कंपनियों के ' use and thro' जूते हैं। वो चर्मकर्मी भी नहीं रहे। गली बाजारों के चौराहों पर बैठ कर जूतों की मुरम्मत  करने वाले आज कहां दिखाई देते हैं । ऐसे कारीगरों की बुरी हालत है। बड़े व्यवसाय करने की उनकी हैसियत नहीं । लोहार आदि का भी आज यही हाल  है। Theory of alienation में पहले तो  इस प्रकार के कामगार अपने उत्पाद से अलग होते थे। काम के बोझ के कारण  ( या व्यस्त)अपने समुदाय के अलगाव महसूस करते थे। अब तो वे  शक्तिहीन, लाचार व पूरी तरह , दया आधारित  meaningless जीवन जीने को मजबूर हैं। कुछ  जातियों (कामगारों ) में आरक्षण के कारण इक्का दुक्का कोई नौकरी पा भी गया तो अहम भाव से वह अपने समुदाय में elite मानने लग गया। यह एक नए प्रकार का alienation है।
      ।हाल ही के कुछ वर्षों में हरियाणा के युवाओं में कावड़ लाने की प्रवृति बढ़ी है।मोटे रूप में देखा गया है कि इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि उनकी आस्थाएं मजबूत हुई हों। ऐसे अधिकतर युवाओं के पास न कोई काम है , न कोई सार्थक एजेंडा। बड़ा  एजेंडा यहीं तक सिमटा होता है कि लगभग पंद्रह दिन की पिकनिक व मुफ्त के लंगर बस। इसी तरह हरियाणा में रात्री जागरणों का प्रचलन भी बढ़ा है।इनकी प्रकृति अधिकतर व्यवसायिक होती है। इसी तरह धार्मिक शोभा यात्राएं भी कुछ ज्यादा बढ़ी है। कुछ नए प्रकार के उत्सवों का भी प्रवेश हुआ है।
    गणेश पूजा में छठ पूजा आदि इस क्षेत्र के नहीं थे फिर भी इनका पर्सनल इधर बढ़ गया है मुझे नहीं लगता कि हमारे यहां के 30 गूगल आदि दूसरे प्रदेशों में गए हो एक कारण तो समझ में आता है यहां के शहरों में हर तीसरे चौथे घर में झाड़ू पोछा करने वाली बिहारन या यूपी से हैं इसी तरह इन प्रदेशों की माइग्रेंट लेवल इधर बढ़ गई है शहर के लेबर चौक के चौराहे पर बड़ी तादाद मिली थी मिलेगी उनके साथ उनकी पत्नियों भी कंस्ट्रक्शन के कामों पर जा रहे हैं। जिस तरह दिल्ली जैसे शहरों में जेजे कॉलोनी जोगी झोपड़ी में आज हरियाणा के अधिकांश शहरों में आउटसाइड में यह यूपी बिहार आदि के आए मजदूर बड़ी संख्या में बहुत ही कठिन हालातो में रह रहे हैं कुछ छोटे स्तर के रोजगार के काम जैसे फल सब्जियों की रेडी पानी पुरी के कौन से जून तकनीकी कब कर खरीदने वाले कबाड़ खरीदने वाले नल पानी विसर्जन आदि के छोटे-छोटे काम यहां हरियाणा वशी काम ही कर रहे हैं 
हरियाणा प्रदेश मोहनजोदड़ो व हड़प्पा की सभ्यता का इलाका रहा है । राखी गढीं मिताथल आदि में कुछ पूरातत्व साक्ष्य मिले हैं । परंतु इस दिशा में जितने शोध होने चाहिए थे वे हुए नहीं । दूसरी और कुरुक्षेत्र और करनाल आदि में महाभारत( इतिहास) के नाम पर बहुत कुछ manupulated लेबल लगाए जा रहे हैं ।  यह हरियाणा की ऐतिहासिक व सांस्कृतिक धरोहर को विकृत करने की कोशिश हैं ।
   सॉन्ग व रागनियां  इस क्षेत्र की folk संस्कृति रही हैं। लेकिन सॉन्ग कला लगभग विलुप्त होने के कगार पर है। रागिनियो का  चरित्र आज भोंडी सकल अख्तियार कर चुका है । इस क्षेत्र में लड़कियों का प्रवेश एक नयापन है। साक्षरता आंदोलन के प्रयासों में इस दिशा में कुछ मूल्य स्थापित करने की कोशिश हुई थी । वह तर्ज की दृष्टि से तो आज भी आकर्षण का केंद्र है लेकिन vontent की दृष्टि से ज्यादा नहीं लुभा रहा। इन पर उतनी सीटियां नहीं बजती जितनी भौंडी रागनियां के कंपीटीशन में बजती हैं। इससे यहां के जनमानस के  चरित्र व पसंद का अंदाजा लगाया जा सकता है।हफ्तों भर रातों को घूमने वाली भजन मंडलियां आज बीते युग की बात लगती हैं। हरियाणा का फिल्म उद्योग अभी नया है। हरियाणवी में बहुत कम फिल्में ही सामने आई हैं। एक चंद्रावल फिल्म ही ऐसी फिल्म रही है जिसने एक खास मुकाम हासिल किया था।
     खेलों की संस्कृति में यहां (कुश्ती-कब्बडी) आदि का बोलबाला रहा है।यहां के गबरू जवान सेहत की दृष्टि से तो श्रेष्ठ रहे, परंतु  कोचिंग (तकनीक) के मामलों में अभी हाल ही मैं कुछ  हासिल कर पाए हैं। ओलंपिक में हरियाणा का दबदबा  विशेषकर (कबड्डी) में साफ दिखता है। मास्टर  चन्दगी राम व कपिल देव की उपलब्धियां भी कम नहीं रही। कपिलदेव ने सर्वप्रथम  क्रिकेट जैसे खेल में  बंबई के वर्चस्व को न केवल तोड़ा अपितु विश्वकप प(हली बार)  भी  जिताया।हॉकी में भी यहां का प्रदर्शन सराहनीय रहा है।
इस प्रदेश  के अधिकांश खिलाड़ी  (ख्यातिप्राप्त) अवसरवाद की राजनीति का शिकार बने हैं।
   रीति रिवाजों ,खानपान,पहनावे आदि में बड़े परिवर्तन  आए हैं। पींग कहीं कहीं ही देखने को मिलती है। बारातियों का रुपया गिलास  आज की पीढ़ी जानती नहीं।कोथली की सुहालियाँ तो कब की गायब हो गई।धोती कुर्ता , कमरी खंडका बहुत कम देखने को मिलते हैं। खीर चूरमा , बाजरे की खिचड़ी आज की पसंद की खुराक नहीं रही। चना बाजरा कम हो गया है।चावल का प्रचलन बढ़ गया है। आज भातीयों  का खांड कसार भी कहां है। आज यहां के लोग सत् पीना भूल गए हैं।
   पहले हरियाणा में उद्योग बहुत ज्यादा तो नहीं थे। परंतु इधर उधर बिखरे हुए थे।आज उद्योग क्षेत्र कुछ स्थानों पर concentrate हो गए हैं। नया गुरुग्राम व फरीदाबाद  आज हरियाणा का हिस्सा लगते ही नहीं। अधिकांश उद्योग GT Road की बेल्ट पर आ गए हैं।  जहां तक बिजली पानी का सवाल है, दक्षिण हरियाणा इस मामले में पिछड़ा हुआ  है। अंबाला करनाल आदि की तरफ की लड़कियां दक्षिण हरियाणा में कम ब्याही जा रही हैं।यह एक अलग प्रकार का socialA alienation है।
      एक दो बातें और हैं जिन पर मैं अभी ठीक ठीक कह नहीं सकता । पिछले  दिनों हरियाणा में जाट आरक्षण आंदोलन ने  हरियाणा के सामाजिक ताने बाने  को एक dent दिया। प्रतिक्रियावादी ताकतों ने इसे Encash कर लिया। यह सामाजिक अविश्वास एक नया phenomenon है। इसके संज्ञान की जरूरत है। (For damage control)
     दूसरी बातवाई कि पिछले लगभग चालीस वर्षों से  ज्ञान विज्ञान आंदोलन हरियाणा में बड़ी ताकत लगा कर एक नवजागरण की दिशा में अग्रसर है। उत्तर भारत (विशेषकर हिंदी भाषी) में यह एक उदाहरण है। इसके क्या social impactsw हैं, अभी अध्ययन होना बाकी है।।डॉ साहब विशेष आग्रह यदि हो सके तो आप अपने प्रभाव के विश्वविद्यालयों के किसी Guide profesdor के तहत किसी शोधार्थी का topic for PHD बनवा सकें । इससे यह काम डॉक्यूमेंट भी हो जाएगा।
वेद प्रिय

        



बुधवार, 18 दिसंबर 2024

नपुंसकता

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पंजाब-हरियाणा के युवाओं में बढ़ने लगी नपुंसकता, वृद्धों की सैक्स में बढ़ी दिलचस्पी

punjabkesari.in Monday, Sep 05, 2022 - 09:51 AM (IST)



  

 

जालंधर(नरेन्द्र मोहन): पंजाब, हरियाणा के युवाओं में नपुंसकता तेजी से फैल रही है। 20 वर्ष तक के किशोरों में भी नपुंसकता के लक्षण पाए गए हैं जबकि जवानी की उम्र 40 वर्ष तक 40 प्रतिशत पुरुष नपुंसकता में चले जाते हैं। सैक्सवर्धक दवाओं का कारोबार भी तेजी से बढ़ा है और गली-गली में सैक्स रोग माहिरों की दुकानें खुल गई हैं। 


विश्व सैक्स स्वास्थ्य दिवस पर पी.जी.आई. द्वारा जारी अनौपचारिक आंकड़ों में उपरोक्त तथ्य बताए गए हैं। यूरोलॉजी विभाग, पी.जी.आई. के प्रोफैसर डा. संतोष कुमार का कहना था कि इंटरनैट अब सैक्स रोगों और कमजोरी का बड़ा कारण बनता जा रहा है, अलबत्ता 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों में अब सैक्स के प्रति रुचि और उपचार करवाने के मामले बढऩे लगे हैं।डा. संतोष कुमार ने बताया कि लोग इस बात को लेकर भ्रमित हैं कि मैडीकल साइंस में सैक्सोलॉजिस्ट पेशेवर से वे अपनी समस्या का निदान प्राप्त कर सकते हैं, परन्तु तथ्य यह है कि इस तरह का कोई प्रोफैशन देश में मान्य नहीं है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सैक्सोलॉजिस्ट या अपनी दुकानें चला रहे नीम-हकीमों के चक्कर में न पड़कर, मर्द रोगी को अपना इलाज यूरोलॉजिस्ट जबकि महिला रोगी को गाइनोकोलॉजिस्ट से परामर्श लेकर शुरू करना चाहिए। ये दोनों डॉक्टर प्रोफैशन वैश्विक स्तर पर चिकित्सा की दृष्टि से मान्य हैं और उन्हीं की रिपोर्ट और उपचार प्रणाली से ही मरीज का उपचार संभव है।


सैक्स रोगों को लेकर 28 फीसदी महिलाएं अपने पार्टनर से अलग हो जाती हैं

उन्होंने बताया कि मरीज 3 प्रकार के सैक्सुअल रोगों से गुजरता है जिनमें सैक्सुअल डाईफंक्शन, सैक्सुअली ट्रांसमिटिड डिजीस (एस.टी.डी.) और रिप्रोडक्टिव हैल्थ मामले शामिल होते हैं। आंकड़ों की मानें तो भारत विश्व की नपुंसकता की राजधानी बनता जा रहा है।  एक शोध के अनुसार 35 फीसदी मर्द 40 वर्ष की उम्र से पहले, जबकि 20 फीसदी उम्र के किसी भी पड़ाव में किसी न किसी सैक्सुअल प्रॉब्लम का सामना करते हैं परन्तु हैरत की बात यह है कि 42 फीसदी मर्द डॉक्टरों द्वारा लिखित दवाइयों को छोड़ किसी अन्य सस्ते उपचार का विकल्प तलाशते हैं जोकि निकट भविष्य में उनके लिए घातक सिद्ध होता है। नपुंसकता के प्रति भ्रमित 75 फीसदी मर्द और 66 फीसदी महिलाएं अपनी उम्र को इसका बड़ा कारण मानती हैं। आंकड़े चौंकाने वाले तब बन जाते हैं जब जोड़े इस रोग को लेकर अलग हो जाते हैं। 28 फीसदी महिलाएं इसके चलते अपने पार्टनर से अलग हो जाती हैं। उन्होंने यह भी बताया कि पी.जी.आई., चंडीगढ़ में पंजाब, हरियाणा से प्रतिवर्ष करीब 50,000 मरीज सैक्स रोगों को लेकर उनके पास विभाग में आते हैं। ऐसे में 20 वर्ष तक के युवाओं में 8 प्रतिशत नपुंसकता पाई गई है, 30 वर्ष तक के युवाओं में यह दर 12 प्रतिशत है, 40 वर्ष तक के युवाओं में यह दर 40 प्रतिशत है, 50 वर्ष तक के लोगों में 48 प्रतिशत, 60 वर्ष तक के लोगों में 57 प्रतिशत और 70 वर्ष तक के लोगों में यह दर 67 प्रतिशत है।



ऐश्वर्यपूर्ण लाइफस्टाइल, ध्रूमपान, उम्र, मोटापा और तनाव नपुंसकता के मुख्य कारण

उन्होंने कहा कि पुरुषों में सैक्स हार्मोन 80 वर्ष तक बने रहते हैं। डा. संतोष कुमार के अनुसार 60 वर्ष से अधिक की आयु के लोग सैक्स के प्रति रुचि रखने लगे हैं और ऐसे मरीज उनके पास लगातार आने लगे हैं, जबकि एक 74 वर्ष के पुरुष ने भी चंद रोज पहले सफल सैक्स के लिए पेनाइल इम्प्लांट सर्जरी भी करवाई है और करीब 5 लोग और भी हैं, जिनकी आयु 70 वर्ष के आस-पास है, जो इस सर्जरी के लिए तैयार हैं।नपुंसकता के मुख्य कारण ऐश्वर्यपूर्ण लाइफस्टाइल, ध्रूमपान, उम्र, मोटापा, अत्यधिक दवाइयों का सेवन और तनाव शामिल हैं। अत्यधिक पोर्न वैबसाइट देखना और हस्तमैथून करने से होने वाले दुष्प्रभावों के प्रति चेताते हुए डॉ. संतोष ने सलाह दी कि युवा अपने आपको इससे हट कर सामाजिक गतिविधियों के साथ-साथ खेल और एडवैंचर से अपना नाता जोड़ें।

रविवार, 15 दिसंबर 2024

आज के हरियाणा की चुनौतियां

 आज के हरियाणा की चुनौतियां

हरयाणा प्रदेश  ने 1966 में अपना अलग प्रदेश के रूप में सफ़र शुरू किया और आज 2023 तक पहुंचा है ।  इस बीच बहुत परिवर्तन हुए हैं ।  इनका सही सही आकलन ही हमें आगे की सही दिशा दे सकता है । इसके बनने के वक्त पिछड़ी खेती बाड़ी का दौर था । 

         उसके बाद हरित क्रांति का दौर आया । हरित क्रांति का दौर अपने आप नहीं आ गया । यहाँ के किसान और मजदूर की मेहनत रंग ले कर आई  जिसने सड़कों का जाल बिछाया , बिजली गावों -गावों तक पहुंचाई । नहरी पानी की सिचाई का भी विस्तार हुआ । इस सब का सही सही आकलन शायद ही हुआ हो । मगर एक बात जरूर देखी जा सकती है कि इस के आधार पर ही हरित क्रांति दौर आ पाया । 

नए बीज, नए उपकरण , नयी खाद , नए तौर तरीकों को यहाँ के किसान मजदूर ने अंगीकार किया और हरयाणा के कुछ हिस्सों में हरित क्रांति ने उन क्षेत्रों की खेती की पैदावार को बढ़ाया । 

        वहीँ आहिस्ता आहिस्ता इसके दुष्प्रभाव भी सामने आने लगे । जमीन की उपजाऊ शक्ति कम होती चली गई । कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल ने अपने कुप्रभाव मनुष्यों , पशुओं व् जमीन के अंदर दिखाए हैं जो चिंतनीय स्तर तक जा पहुंचे हैं ।  

       हरित क्रांति से एक धनाढय़ वर्ग पैदा हुआ, जिसने अपने अपने इलाके में अपनी दबंगता व् स्टेटस का इस्तेमाल करते हुए यहाँ के राजनैतिक , आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में अपना प्रभुत्व जमाया है । इस सब में हमारी पिछड़ी सोच और अंध विश्वासों के चलते एक अधखबडे़ इंसान का विकास हुआ है जो कुछ बातों में प्रगतिशील है और बहुत सी बातों में रूढ़िवादी है । जात पात और गोत नात अभी भी वंचित तबकों के बेहतर जीवन के लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं।  इस इंसान के व्यक्तित्व का प्रभाव हर क्षेत्र में देखा जा सकता है। चाहे शिक्षा का क्षेत्र हो, चाहे स्वास्थ्य का क्षेत्र हो, चाहे खेती बाड़ी का क्षेत्र हो , चाहे उद्योग का क्षेत्र हो , चाहे सामाजिक क्षेत्र हो । 

      हमारे समाज में कृषि में हरित क्रांति के साथ-साथ जो औद्योगिक प्रगति हुई है, उसका लाभ तो शिक्षित मध्य वर्ग को मिला है। इसके चलते हरियाणा की आबादी के एक बड़े हिस्से की आर्थिक स्थिति मज़बूत हुई है लेकिन सामाजिक-सांस्कृतिक पिछड़ापन बड़े पैमाने पर व्याप्त है। हरियाणा में अर्ध-सामंती मूल्यों पर आधारित जातीय वर्चस्व, पितृसत्ता और पुरुष प्रधानता की मान्यता है; और सामाजिक सम्बन्धों का आधार यही मान्यता है। इसके चलते महिलाओं और दलित-पिछड़ी जातियों का उत्पीड़न आम घटनाक्रम है। इसी के साथ नवधनाढ्य वर्ग में सत्ता की भूख, जोड़-तोड़ के साथ निजी तरक्की का रुझान और आत्मकेंद्रित सोच हावी है। आज़ादी के आंदोलन में पैदा हुए आदर्शवाद की कमज़ोर उपस्थिति आदि के चलते अवसरवादी, भाई-भतीजावाद पर आधारित एवं भ्रष्टाचार से लिप्त राजनीति का बोलबाला है।

    इस अधखबड़े व्यक्तित्व को भरे पूरे मानवीय इंसान में कैसे बदला जाये यह अहम् मुद्दा है जो कि महज राजनैतिक ही नहीं बल्कि सामाजिक भी है। और एक  नवजागरण आंदोलन की मांग करता है । यह हरियाणा के पूरे समाज की जरूरत भी है और जिम्मेदारी भी बनती है कि सामंती और पुरुषवादी पिछड़ी सोच के खिलाफ समाज सुधार आंदोलन चलाया जाए।

   जल संकट से जूझ रहे हरियाणा में भूजल की स्थिति गंभीर है। हरियाणा जल संसाधन प्राधिकरण द्वारा पूरे प्रदेश से जुटाए आंकड़ों के मुताबिक अब 1948 गांव रेड जोन में आ चुके हैं। चिंता की बात यह कि 84 प्रतिशत गांवों में भूजल स्तर तेजी से पाताल की ओर जा रहा है। प्रदेश के कुल 7287 गांवों में से केवल 1304 गांव ग्रीन जोन में हैं, जबकि

6150 गांवों में भूजल तेजी से नीचे जा रहा है।

3041 गांव कमी पानी की

40% संकट में

1948 गम्भीर संकट में 

         शिक्षा के क्षेत्र में जहाँ एक और एजुकेशन हब बनाने के दावे किये जा रहे हैं और नए नए विश्विदालयों का खोलना एक अचीवमैंट  के रूप में पेश किया जा रहा है । 14473 सरकारी स्कूल और 10394 प्राइवेट स्कूल  2021 में मंत्री महोदय ने हरयाणा विधान सभा में एक सवाल के जवाब में बताए। 137 संस्कृति सीनियर सेकेंडरी स्कूल भी इन्ही का हिस्सा बताए थे।

    

          वहीँ दूसरी और सरकारी स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता कई तरह से प्रभावित हुई है । शिक्षा की प्राइवेट दुकानों में भी शिक्षा की गुणवत्ता का तो प्रश्न ही नहीं बल्कि शिक्षा को व्यापार बना दिया गया है। चाहे वह स्कूली शिक्षा हो , चाहे वह उच्च शिक्षा हो , चाहे वह विष्वविद्यालयों की शिक्षा हो या ट्रेनिंग संस्थाओं की शिक्षा हो , हरेक क्षेत्र में व्यापारीकरण और पैसे के दम पर डिग्रीयों का कारोबार बढ़ा है, बढ़ता ही जा रहा है ।  दलाल संस्कृति ने इस क्षेत्र में दलाल माफियायों की बाढ़ सी लादी है । सेमेस्टर सिस्टम ने भी शिक्षा के स्तर को बढ़ाया तो बिलकुल भी नहीं हाँ घटाया बेशक हो । आगे सर्वे करने के विषय हो सकती हैं ये सब बातें।

       स्कूल बचेंगे तो शिक्षक बचेंगे। शिक्षक बचेंगे तो शिक्षा बचेगी। शिक्षा बचेगी तो देश बचेगा। अन्यथा कुछ नहीं बचेगा क्योंकि निजीकरण से शिक्षा का व्यवसायीकरण होगा। व्यवसायीकरण में शिक्षक और छात्र के बीच गुरु-शिष्य का रिश्ता कम लाभ-हानि का रिश्ता अधिक बनेगा। लाभ-हानि में पूंजीवादी लोग एक शिक्षक का नहीं, बल्कि एक ऐसे नौकर का चुनाव करेंगे, जो पूंजी को सलाम ठोकेगा। इस व्यवस्था में शिक्षक अपना ज्ञान बेचेगा, छात्र शिक्षा खरीदेगा बाक़ी गरीब, दलित, आदिवासी, असहाय, मजदूर इत्यादि से अच्छी शिक्षा कोसों दूर चली जायेगी । बेहतर है, शिक्षा का संरक्षण करें। हमें एकसमान, सरकारी, निःशुल्क, क्वालिटी एजुकेशन की दरकार है। इसी के लिए सरकार है। बेहतर राष्ट्र की कल्पना करते हैं, शिक्षकों का सम्मान करते हैं तो फिर पहले सुगम शिक्षा की बात जरूर कीजिए।

इंस्टीच्युट खोल दिए गए , कई कई सौ करोड़ की इमारतें खड़ी करके मगर उनकी फैकल्टी उनकी कार्य प्रणाली की किसी को कोई चिंता नहीं है । 

        # हरियाणा के 538 सरकारी स्कूलों में लड़कियों के लिए कोई टॉयलेट नहीं हैं

# 131 सरकारी स्कूलों में पीने के पानी की फैसिलिटी भी नहीं है।

# 236 सरकारी स्कूलों में इलेक्ट्रिसिटी कनेक्शन भी नहीं हैं।

# 8240 और क्लास रूम की जरूरत है इसके अलावा 5630 और दूसरे कमरे चाहिए जैसे साइंस लैब आदि के लिए सरकारी स्कूलों में।

# 321 सरकारी स्कूल की बाउंड्री वाल भी नहीं हैं।

# इस सबके लिए हरयाणा सरकार को कुल 1,784.03 करोड़ रुपये की जरूरत होगी।

# विडंबना है कि वित्त वर्ष 2023-24 के लिए सिर्फ 424.22 करोड़ का बजट है।

पंजाब हरियाणा हाई कोर्ट के सामने डॉक्टर अनशाज सिंह डायरेक्टर सेकेंडरी एजुकेशन डिपार्टमेंट हरियाणा ने यह सब आंकड़े रखे।

        विश्वविदयालयों के उपकुलपतियों की नियुक्तियों में यू जी सी की गाइड लाइन्स की धजियां उड़ाई जाती रही हैं । सबके लिए एक समान स्कूल की अनदेखी की जाती रही है जबकि यह सम्भव है । 150 के लगभग स्कूलों को बंद करने या मर्ज करने की खबरें भी आ रही हैं ।

          स्वास्थ्य के क्षेत्र में प्राइवेट सैक्टर की दखलंदाजी बढ़ी है । एम्पैनलमेंट  का कारोबार खूब चल रहा है । सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं जैसे तैसे स्टाफ की कमी , डाक्टरों की कमी ,कहीं कुछ और कमियों के चलते , घिसट रही हैं । गरीब जन की सेहत के लिए सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के माधयम से इलाज के रास्ते बंद होते जा रहे हैं या यूं कहें कि बंद किये जा रहे हैं । जितनी भी स्वास्थ्य सेवा की योजनाएं गरीबों के लिए हैं उनमें एक्जीक्यूसन की भारी कमियां हैं और योजना में भी कई कमियां हैं । प्राइवेट नर्सिंग होम के लिए केंद्र में पारित एक्ट भी हरयाणा में लागू नहीं किया है । इसलिए प्राइवेट  नर्सिंग होम्ज की लूट दिनोदिन आमनवीय रूप अख्तियार करते हुए बढ़ती जा रही है । 

      सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में कर्मचारियों की भारी कमी देखने को मिलती है। ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाएं अप्रैल 2021 को जनसंख्या 18197826 के अनुसार कमी इस प्रकार है:-- उप स्वास्थ्य केंद्र...942 

पीएचसी...74 

सीएचसी..32 

चिकित्सा अधिकारी 

पीएचसी..721 

विशेषज्ञ सीएचसी..879 

नर्सेस पीएचसी/सीएचसी..378 

रेडियोग्राफर सीएचसी..113 

फार्मासिस्ट पीएचसी/सीएचसी..503 

लैब टेक्निशियन पीएचसी/सीएचसी..508

       सरकारी हॉस्पिटलज में सी टी स्कैन की महीनों लम्बी तारीखें दी जाती है । मुख्य मंत्री मुफ्ती इलाज योजना सैद्धांतिक तोर पर बहुत ठीक योजना होते हुए भी इसकी एक्जीक्यूसन बहुत ढीली ढाली चल रही है । इसके लिए मॉनिटरिंग कमेटीज का प्रावधान नहीं रखा गया है । खून की कमी NFHS 4 के मुकाबले NFHS 5 में गर्भवती महिलाओं में बढ़ी है । इसी प्रकार मालन्यूट्रिसन भी बच्चों में बढ़ा है । गरीब के लिए मुफ्त इलाज भी महंगा होता जा रहा है ।

         आज के हरयाणा की कुछ चुनौतियों में से एक बड़ा मसला सामाजिक न्याय  का मसला है । सामाजिक न्याय के सवाल तीव्र रूप से सामने आ रहे हैं । महिलाएं न घर में , न कर्म स्थल पर , न गली कूचों में , न बाजारों में सुरक्षित हैं । लॉ एंड ऑर्डर को स्थापित करने का काम काफी कमजोर होता जा रहा है । भ्रष्ट अफसर , भ्रष्ट पुलिस और भ्रष्ट नेता की तिकड़ी का उभार तेजी हो रहा है । 

     हरियाणा का दुलीना कांड हमें याद है । अक्तूबर 2002 में ठीक दशहरे के दिन पांच दलितों को जिंदा जला दिया गया था। आरोप था गौकशी का। पांच जनों की मौत पर संघ और आर्य समाज हत्यारों के साथ खड़ा था। पिछले महीने 23 सितंबर को  विहिप के केंद्रीय मंत्री डॉ. सुरेंद्र कुमार जैन ने गौकशी को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर चेतावनी दी कि दुलीना कांड की पुनरावृत्ति हो सकती है। 2012 में दलित लड़कियों के साथ रेप की अनेक वारदातों के समय दलितों में तूफान मचा तो मुख्य पार्टियां  चौधरियों के नाराज होने के डर से उत्पीड़ितों के बजाय आरोपियों के पक्ष में तर्क तलाशते घूम रहे थे। मिर्चपुर, भगाना, डाबडा, दुलीना हर कहीं तो मुख्यधारा की पार्टियां, आर्य समाज, आरएसएस कोई भी आरोपियों के खिलाफ खड़े नहीं हुए। अब विभाजन कारी ताकतें और भी भयानक रूप से लोगों को जात पात और धर्म के नाम पर बांटने का घिनोना काम कर रही हैं ।

        सकारातमक अजेंडा न होने के कारण आज युवा वर्ग का एक हिस्सा नशे , फ्री सेक्स और अपराधीकरण की गिरफत में आता जा रहा है । दलित उत्पीड़न के , महिला उत्पीड़न के  केसिज बढे हैं पिछले कुछ वर्षों में । लम्पटपन बढ़ रहा है । 

       असंगठित क्षेत्र का विस्तार होता जा रहा है जिसमें मजदूर की हालत चाहे वह महिला है , पुरुष है , प्रवासी मजदूर है और उसकी जिंदगी बहुत ही मुस्किल हालातों की तरफ धकेली जा रही है । महंगाई का असर इन तबको के इलावा माध्यम वर्ग को भी प्रेषण किये हुए है । 


        एक तरफ शाइनिंग हरयाणा है जिसका गुणगान हर जगह और बहुत से इससे लाभान्वित तबकों द्वारा किया जाता है । मगर यह सच है कि यह तबका बहुत छोटा होते हुए भी प्रभावशाली है । 

     दूसरी तरफ सफरिंग हरयाणा हैं जिसका बहुत बार कोई भी व्यक्ति गम्भीरता से जिकर तक नहीं करता । इस तबके को हासिये पर धकेला जा रहा है । इसकी जद  में गरीब किसान , मजदूर , वंचित तबके, महिलाएं , नौजवान लड़के लड़की , प्रवाशी मजदूर , माइग्रेटेड पापुलेशन , असंगठित क्षेत्र के कर्मचारी खासकर महिला हैं । यानि हरयाणा का बड़ा हिस्सा इसमें शामिल है ।

     संक्षिप्त में कहें तो

ये बढ़ गई बेरोजगारी, करजे चढ़ते जा रहे भारी, हुई दुखी गरीब जनता सारी,हमारे बालक  बिना दवाई मर रहे हैं, पढ़ाई महँगी से महँगी होती जा रही है।

नाबराबरी ने वंचित तबकों को साँस चढ़ा दिये हैं , कारपोरेट के अत्याचारों की हदें पार हो रही हैं , मीडिया ने वर्तमान सरकार के प्रचारी का रूप धार गया है। , 

जात पात मैं बाँटी है जनता, विरोध किया तो काटी है जनता।

किसान की श्यामत आ गई है, महिला की इज्जत तार तार की जा रही है, चोरी जारी बढ़ती ही जा रही है।

झूठे जुमले रोजाना देते हैं,मगर खबर हमारी कभी नहीं लेते हैं। ये सब देख देख जन की तबियत  खारी होंती जा रही है, क्योंकि शासक हुआ बहुत  भ्रष्टाचारी है।

जनता हिम्मत नहीं  हारी है उसका संघर्ष जारी है । 'लड़े हैं जीते हैं , लड़ेंगे -जीतैंगे' भरतू और भरतारी। 

         नैशनल कैपिटल रीजन स्कीम के तहत हरयाणा का ताना बाना काफी बदल रहा है और और भी बदलेगा । फोरलेन , टोल प्लाजा , फलाई ओवर , सेज़ के तहत उपजाऊ जमीनों के अधि गरहण के चलते खेती योग्य जमीन कम से कमतर होती जा रही है । जी डी  पी  में एग्रीकल्चर का योगदान काफी कम हुआ है । नए हरयाणा का सवरूप क्या होगा ? बिखरते गांव  इस पर कोई चर्चा नहीं है । औद्योगिकीकरण के दिशा क्या होगी कोई चर्चा नहीं। नौकरी पैदा करने वाली या नौकरी खत्म करने वाली ? वातावरण का क्षरण रोकने के बारे क्या किया जायेगा ? 

          जेंडर फ्रैंडली , एको फ्रैंडली , और सामाजिक न्याय प्रेमी विकास का नक्शा क्या होगा ? ये कुछ मुद्दे हैं जिन पर हरयाणा के प्रबुद्ध नागरिकों को सोच विचार करना चाहिए और फिर एक जनता का चुनाव अजेंडा बना कर सभी राजनैतिक पार्टीयों के सामने पेश करके उनकी इस अजेंडे पर अपनी पोजीसन रखने को  कहा  जाना चाहिए । इस सबके लिए जनता का जनपक्षीय राजनीती के लिए लामबंद होना बहुत जरूरी है ।

हरियाणा नंबर वन -मजदूर किसान बिना , इन सबके सम्मान बिना  इनके चेहरे पर मुस्कान बिना - कैसे हो सकता है?

रणबीर सिंह दहिया

रविवार, 16 अक्टूबर 2022

कोरोना ने अमीर बढ़ाये

 

कोरोना में हर 30 घंटे में बना एक नया अरबपति, लाखों लोग 33 घंटे में हुए गरीब; पढ़ें ऑक्सफैम की ये रिपोर्ट

कोरोना में करोड़ों लोगों की नौकरी चली गई और लाखों लोगों को अत्यधिक गरीबी का सामना करना पड़ा। ऑक्सफैम के नए शोध के मुताबिक कोरोना के दौरान हर 30 घंटे में एक नया अरबपति बना है। वहीं हर 33 घंटे में लगभग 10 लाख लोग गरीब हुए हैं।

नई दिल्ली, पीटीआइ। विश्व आर्थिक मंच की वार्षिक बैठक 2022 के लिए दुनिया भर के अमीर और पावरफुल लोग दावोस में इकट्ठा हो रहे हैं। ऑक्सफैम इंटरनेशनल ने सोमवार को कहा कि कोविड-19 महामारी के दौरान हर 30 घंटे में एक नया अरबपति उभरकर सामने आया है, जबकि हर 33 घंटे में लगभग 10 लाख लोग गरीबी रेखा से नीचे चले गए।

दावोस में 'प्रोफिटिंग फ्रॉम पेन' टाइटल से एक रिपोर्ट जारी करते हुए अधिकार समूह ने आगे कहा कि आवश्यक वस्तुओं की लागत पिछले दशकों की तुलना में तेजी से बढ़ी हैं। खाद्य और ऊर्जा क्षेत्रों में अरबपति हर दो दिन में एक अरब अमरीकी डॉलर तक खुद को बढ़ा रहे हैं। डब्ल्यूईएफ (वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम) खुद को पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के लिए एक इंटरनेशनल ऑर्गनाइजेशन के रूप में प्रदर्शित करता है और वह दो साल के बाद दावोस में अपनी वार्षिक बैठक की मेजबानी कर रहा है।

दावोस पहुंच रहे दुनिया भर के अरबपति

ऑक्सफैम इंटरनेशनल के कार्यकारी निदेशक गैब्रिएला बुचर ने कहा कि कोविड के समय में बिजनेस में हुए अविश्वसनीय उछाल का जश्न मनाने के लिए अरबपति दावोस पहुंच रहे हैं। महामारी के कारण खाद्य और ऊर्जा की कीमतों में भारी उछाल हुआ है, जो कुछ अमीर लोगों के लिए वरदान साबित हुआ है। हालांकि, कोविड के कारण लाखों लोग गरीबी का सामना कर रहे हैं। लाखों लोग ऐसे हैं, जो इस महंगाई को झेलते हुए सिर्फ जीवित रहने का प्रयास कर रहे हैं।

हर 30 घंटे में बन रहा एक नया अरबपति

रिपोर्ट से पता चला है कि महामारी के दौरान हर 573 लोग नए अरबपति बने हैं। मतलब कि हर 30 घंटे में एक नया अरबपति बना है। वहीं, ऑक्सफैम इंटरनेशनल ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि इस साल हर 33 घंटे में एक मिलियन (10 लाख) लोगों की दर से 263 मिलियन और लोग गरीबी रेखा के नीचे चले जाएंगे।

कोविड में अरबपतियों की संपत्ति में बढ़ोतरी

कोविड-19 के पहले 24 महीनों में अरबपतियों की संपत्ति में पिछले 23 वर्षों की तुलना में अधिक वृद्धि हुई है। दुनिया के अरबपतियों की कुल संपत्ति अब वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद के 13.9 प्रतिशत के बराबर है।

यह देखते हुए कि महामारी एक स्वास्थ्य संकट के रूप में सामने आ सकती है. लेकिन, यह अब एक आर्थिक समस्या बन गई है, ऑक्सफैम ने कहा कि भारत में सबसे धनी 10 प्रतिशत लोगों के पास राष्ट्रीय संपत्ति का 45 प्रतिशत हिस्सा है. जबकि निचले 50 प्रतिशत के हिस्से के पास जनसंख्या मात्र 6 प्रतिशत हिस्सा है.

सर्वेक्षण में आगे कहा गया है कि स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा पर अपर्याप्त सरकारी खर्च स्वास्थ्य और शिक्षा के निजीकरण में वृद्धि के साथ-साथ चला गया है, इस प्रकार एक पूर्ण और सुरक्षित COVID-19 रिकवरी आम लोगों की पहुंच से बाहर हो गई है.



AIPSN 2nd. Meeting

 



2nd Meeting of AIPSN-HERD: Date: 13-10-2022, Time: 6.30PM

Dr.A.I. Khan chaired the meeting

Agenda Proposed: 1) Last meeting Decisions and implementation 2) Last EC meeting Decision on Education Assemblies 3) Future Proposal 4) New Proposal for Position papers 5) AIPSN-Self Reliance Symposium 6) Any other matter

Agenda Discussed:

Agenda 1&4 : Last meeting decisions and  Implementation: Desk Convenor

• Four position papers NTA and CUET, Pressor of Practice , Multidisciplinary Institutions and MOOC were prepared. All the four papers have been prepared by Dr.Salim Shah, Dr.Dinesh Abrol, Dr. Shyamal Chkrobarthy and Ali Imam khan respectively  and circulated within desk and EC. Our thanks to all the four experts. 

• Requested the respective Desk Convenors  to prepare the remaining position papers. The following have accepted to prepare position: Dr.Parthiba Basu on Agriculture,  Dr.Raghunadan on Vocational education and Lawyers Aditya Chatterjee and Roshni Sinha on legal education.We have to find out persons for Skill Devt, Eng. and Tech. There is a proposal to request Dr.Sundararaman for writing on Medical Education. The topic on Teacher Education will be prepared by Dr.A.I.Khan. Putting in website and sending for translation to states would be done after webinars as per EC decisions.

Decisions: To have webinars on  two position papers  in one webinar each. The webinars will be held after Diwali. We can involve JFME and AIFUCTO and state Hr.Edn. groups as participants in addition to PSM representatives.. After finalisation of the  position papers will be uploaded  on google drive to be accessed by members. Dr.Prajval is requested to do. The dates of webinar will be finalised and confirmed in due course of time.


Agenda 2 &3: AIPSN EC decisions on NEP resistant movement: Gen.Sec.,AIPSN, Asha reported the Educational Assemblies from panchayat  level to  national level on the implementation of NEP-2020. She asked the members to go through the resource material for education assembly. Following which Convenor Rajamanickam listed out the campaign proposed on Higher education in the EC. 




Decisions: 

Implementation needs the following: Need a state level nodal person for this assemblies. Make students Assemblies serious by putting alternatives. Possible with JFME and other platform. An integrated  campaign literature is needed which may be translated by state PSMs .One dialogue paper is needed to have dialogue with students. Target audience may be fixed-The dialogue paper may be prepared for target audience like UG students, PG students and Research students.Three notes of dialogue -4-6 pages of each note- by Oct. 30th. Issues on Deemed university and Private University may also be placed for discussion.


Agenda 5: Self Reliance Symposium: Dr.Dinesh  Abrol reported about the one session on topics of Higher Education and Research related to self reliance. Decided to use these papers for our campaign.


Concluding Remarks: Finally Dr.A.I.Khan Chairperson, concluded the meeting by saying that the resource and dialogue materials would be  simple and easily transacted Professional associations may be associated at state level and district level for holding a convention. 


Members Present:

• Dr.Salim Shah 2) Prof.Shyamal Chakraborthy 3)Dr.A.I.Khan 4)Dr.Ratheesh Krishnan5)Dr. Promod  Gauri 6)Dr.Dinesh Abrol7)Dr.Prajval 8)Asha Mishra (Gen.Sec.) and 9) P.Rajamanickam, (Convenor) attended the meeting