सोमवार, 25 अगस्त 2014

दिल्ली के सिर पै बसै हरयाणा


खुद्दारी हरयाणा स्टाईल 
           बाई 
जाट कवि --कर्नल  मेहर सिंह दहिया,  शौर्य चक्र 
दिल्ली के सिर पै बसै हरयाणा 
आप बोवै ,आप खा , बेरा जी मनै ना दे दाणा 
1 जगह म्हारी घणी खास सै ,बड़यां की मेहनत और और प्रयास सै, बैरी का आड़ै हुया नाश सै,ना चाल्या इसतैं कोए धिंगताणा 
 दिल्ली के सिर पै बसै हरयाणा । 
2 .महारी  धरती का कोए तोल नहीं सै, दरया दिली का कोए मोल नहीं सै, हिस्साब मैं कोए रोल नहीं सै जाण्या सदा ले कै लोटाना 
दिल्ली के सिर पै बसै हरयाणा 
3 .मेहमान का मान बड़ा सै ,बण हनुमान यू सदा लड़ै सै 

  गैर के रफड़े मैँ जरूर पड़ै सै , मोल भले  कुछ  पड़ै चुकाना 
       दिल्ली के सिर पै बसै हरयाणा 
4 . तोल  पिछाण कै यो हाथ हाथ मिलावै ,दुश्मन नै यू धूल चटावै 
बोद्दे कै सदा साहरा लावै बोल इसके पै कति मत जाणा 
दिल्ली के सिर पै बसै हरयाणा
5 . के दिखै सै सादा भोला , पहले टकरे मैं पादे रोला ,
तर्क मैं इसनै हर कोए झिकोला ,आवै खूब बातां मैं बतलाना  
दिल्ली के सिर पै बसै हरयाणा 
6 . बिना वजह मत इसनै छेड़िए,करया हमला जाऊँ भेडीए 
छुडा पेंडा तुरत नमेड़िए , वरना महंगा पड़ै इसतैं भिड़ जाणा 
     दिल्ली के सिर पै बसै हरयाणा
7 . हर माणस मैं पावै कविताई ,शिक्षा बेशक यहाँ देर से आई 
अनपढ़ भी करै अगवाही ,देख पंचों का ज्ञान पुराणा 
दिल्ली के सिर पै बसै हरयाणा 
8 . दिल्ली की हमनै मरोड़ काढ़ दी, जी चाहा जब टाड्ड दी 
पकड़ नाड़ सही झाड़ दी ,नहीं होण दें मां माम निमाणा 
दिल्ली के सिर पै बसै हरयाणा 
9 . कर्नल मेहर सिंह की बात सही सै  , समझनिया नै खूब लहि सै 
वफादार  इस बरगा कोई नहीं सै पर मुंह इसको कति नहीं लाना 
दिल्ली के सिर पै बसै हरयाणा 

                 
                  
9.KARNAL MEHAR SINGH KI BAAT SAHI SYE, SAMJHANIYA NE KHOOB LAHI SE, WAFADAR IS BARGA KOI NAHI SE,     PAR MOOH ISKO KATI NAHI LANA.
              DILLI KE SIR PE BASHA HARAYANA
20 AUG2014

बुधवार, 20 अगस्त 2014

VIVEK

विवेक
सूरज साहमी कोहरा टिकै ना अज्ञान विवेक मयी वाणी कै।
अज्ञानता छिन्न-भिन्न होण लगै हो पैदा चिन्तन नया प्राणी कै।।
ढोंग अर अन्ध विश्वास पै टिक्या चिन्तन फेर बचै कोण्या
यज्ञ हवन वेद शास्त्र फेर पत्थर पूजा प्रपंच रचै कोण्या
पुरोहित की मिथ्या बात का दुनिया मैं तहलका मचै कोण्या
मन्द बुद्धि लालची माणस कै विवेकमय दया पचै कोण्या
शिक्षित अनपढ़ धनी निर्धन बीच मैं आवैं फेर कहाणी कै।।
आत्मा परमात्मा सब गौण होज्यां सामाजिक दृष्टि छाज्या फेर
समानता एक आधार बणै औरत सम्मान पूरा पाज्या फेर
मानवता पूरी निखर कै आवै दुनिया कै जीसा आज्या फेर
कार्य कारणता नै समझकै माणस कैसे गच्चा खाज्या फेर
माणस माणस का दुख समझै ना गुलाम बणै राजाराणी कै।।
संवेदनशील समाज होवै ईश्वर केंद्र मैं रहवै नहीं
मानव केन्द्रित संस्कृति हो पराधीनता कोए सहवै नहीं
स्वतंत्रता बढ़ै व्यक्ति की परजीवी कोए कहवै नहीं
खत्म  हों युद्ध के हथियार माणस आपस मैं फहवै नहीं
विवेक न्याय करूणा समानता खरोंच मारैं सोच पुराणी कै।।
अदृश्य सत्ता का कोढ़ आड़ै फेर कति ना टोहया पावै
सोच बिचार के तरीके बदलैं जन चेतना बढ़ती जावै
मनुष्य खुद का सृष्टा बणै कुदरत गैल मेल बिठावै
कर्म बिना बेकार आदमी जो परजीवी का जीवन बितावै
रणबीर बरोने आला ना लावै हाथ चीज बिराणी कै।।

विज्ञान की अच्छाई भूल कै

विज्ञान की अच्छाई भूल कै
विज्ञान की अच्छाई भूल कै इसनै बैरी बतावण लागे।।
माणस की करतूतां नै हम इसकै सिर लावण लागे।।
कलयुग पापी बता बता कवियां नै शोर मचाया
कल का नाम कहैं पुरजा युग माने बख्त बताया
बढ़ी चेतना इन्सानां की जब जरुरत पै आया
इस कुदरत तैं खोज खोज पुरजे का खेल रचाया
आप बनाया आप चलाया अपने आप उडावण लागे।।
कुदरत के सब जीवों मैं इन्सान पवित्र पाया
जीवन की वस्तु सारी खुद आप खोज कै ल्याया
ऐसे यन्त्र तैयार बणा लिए अजब कमाल दिखाया
करकै खोज पृथ्वी की आसमान ढूंढ़ना चाहया
बणा बणा कै पुरजे पै सारा काम करावण लागे।।
कलयुग इतना छाज्या इसका कोए अन्त ना पाया
फेर मुनाफे नै इस कलयुग पै अपना जोर जमाया
सब कुछ कर लिया कब्जे मैं ऐसा महाघोर मचाया
इस पापी की करनी नै दुख मैं यो संसार फंसाया
विज्ञान तैं बम बणा बणा कै नरक बणावण लागे।।
हरिचन्द कहै कलयुग जैसी ओर समों ना आणी
सब प्रजा ने समझाद्यां चाहे याणी हो चाहे स्याणी
साइंस असली राही चालै हमनै होगी अलख जगाणी
फेर ना रहै कोए भूखा नहीं सै या झूठी बाणी
न्यों पाप खत्म होज्यागा हम साच बतावण लागे।।