रविवार, 16 नवंबर 2014
शनिवार, 15 नवंबर 2014
मुखौटे ही मुखौटे
मुश्किल हो गयी चेहरों की पहचान
समझते रहो इंसान निकलते शैतान
मुखौटे पहना दिए हैं हम सबको यारो
पूंजीवाद ने संभाली पूरी आज कमान
एक दूजे से आगे निकलूँ लगी है हौड
कुचल के पैरों के नीचे मैं जीतूँ दौड़
हंसमुख चेहरा दीखता मन है मैला
मारो काटो हाथ ना आओ ये निचौड़
भाई भाई आज बैरी हो गया है कहते
इंसानियत का चेहरा खो गया कहते
पैसा और पैसा सब नैतिकता बेच के
बाजारवाद गरीब को दबो गया कहते
कई कमरे की कोठी आज बनाई देखो
मियां बीबी और नहीं आवा जाई देखो
बेटा फ़्रांस में अटका बेटी यु के में बैठी
विडिओ कांफ्रेंसिंग से दिल बहलाई देखो
और बढ़ेगी बेचैनी और मायूसी
और बढ़ेगी बेचैनी और मायूसी
बेचैनी जनता की बढ़ती जा रही
बेचैनी जनता की बढ़ती जा रही
समझौता संघर्ष करती आ रही
डायलैक्टिस इसी को कहते हैं
आज बेचैनी दुनिया पर छा रही
डेमोक्रेसी ने आगे कदम बढाया है
जनता ने कुछ अधिकार पाया है
कितना ही भ्रष्टाचार बढ़ गया हो
इसके खिलाफ विरोध जताया है
उठती बैठती जीवण बिता रही है
कई बार घन घोर अँधेरा हटाया है
लूट के हथियार बदल लिए जाते
जनता ने एकता हथियार बनाया है
दो पाले खींचते जा रहे आज यारो
अपने किस पाले का झंडा उठाया है
न्यूट्रल जो कहते अपने को उन्होंने
जाने अनजाने शोषित का ही साथ
हमेशा इस पालेबन्दी में निभाया है
सदस्यता लें
संदेश (Atom)