मित्रो ओर नागरिको,
आज चारों तरफ बुराई का बोलबाला नजर आता है । इन्सानी मूल्य और इन्सानियत की भावनाएं , उनसे जुड़े विचार और काम जैसे बिखरे हुए हैं। पूरा समाज गहरे संकट में है। हमारा देश भी इस चौतरफा संकट में घिरा हुआ है। हम जानते हैं कि हमारा देश असंख्य लोगों की कुर्बानियों से आजाद हुआ। आजादी की लड़ाई में उभरे न्याय, समानता व स्वतन्त्रता के मूल्यों के आधार पर हमने अपना संविधान अपनाया। संविधान में ‘नागरिक समाज’ बनाने का लक्ष्य रखा गया और देश के आत्मनिर्भर विकास को मुख्य काम समझा गया।
आजादी के संघर्षों के दौरान चले समाज सुधार आन्दोलनों ने जात गोत , लिंग , सम्प्रदाय और इलाके पर आधारित संकीर्ण पहचानों को एक हद तक तोड़ा। राष्ट्रीय आन्दोलन में विविधता की पहचान भी हुई, साथ ही , सभी तबकों की एकजुटता से जागरुकता व आत्मविश्वास का माहौल बना।
आज स्थिति उल्ट चुकी है। हमारे राष्ट्रीय लक्ष्य, लोगों की इच्छाएं , आकांक्षाएं और उन की क्षमताएं जैसे रौंद दी गई हैं। आत्मनिर्भरता का लक्ष्य छोड़ कर विकसित देशों की और अमरीका की आर्थिक सांस्कृृतिक गुलामी स्वीकारी जा रही है। हमारी खेती , रोजगार, उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, खाद्यान्न,पर्यावरण, जमीन ,जंगल सब संकट में हैं। विदेशी कम्पनियों की लूट बढ़ती जा रही है। हमारा पूरा देश और समाज लाचारी महसूस कर रहा है। हम आत्महीनता के दौर से गुजर रहे हैं। समाज के तमाम तबके अभाव, दुख, निराशा ,असुरक्षा, और हिंसा के बढ़ते चक्के के नीचे पिस रहे हैं। खाना, दवा, शिक्षा,सुरक्षा और सहयोग की कमी है। तनाव और असुरक्षा ने सामाजिक माहौल बिगाड़ दिया है। बड़े पैमाने पर हत्याएं,आत्महत्याएं,और लूटपाट हो रही हैं। लाचारी और आत्महीनता के घेरे को तोड़ने की कोशिशें भी खूब हो रही हैं।
इन हालात में सभी तबके अपने अपने ढंग से इन्सानियत को बचाने की कोशिश में नगे हैं। लेकिन इनसे व्यापक फिजा बदल नहीं रही है। इस कोशिश को एक व्यापक समाज सुधार आन्दोलन और नवजागरण का स्वरुप देना बहुत जरुरी हो गया है। हमने ऐसे आन्दोलन की जरुरत सन 1983 में जनवादी सांस्कृृतिक मंच के माध्यम से हरियाणा में की थी। इस आन्दोलन में आजादी के बाद की गई अपनी भूलों को समझ कर आगे बढ़ने की दिशा बनाने की आवश्यकता है। अपना आत्मविश्वास और पहलकदमी फिर से पा सकें। गहरे संकट के इस दौर को पलटने के लिए हमें अपने सामाजिक जीवन की बुराईयों से लड़ना ही पड़ेगा।
हमारे सामाजिक जीवन में जात पात , अंधविश्वास , पर्दाप्रथा, महिलाओं पर बढ़ते अत्याचार,भ्रूण हत्या, यौन उत्पीड़न और दहेज हत्या आदि समस्याएं बड़े पैमाने पर मौजूद हैं। हरियाणा में शिक्षित लोगों में व्यक्तिवादी सोच हावी है और सामाजिक सरोकार कमजोर हो रहे हैं। गांवों की सामूहिकता में भी खाप , जात तथा गोत्र का बोलबाला बढ़ा है। क्या करें?
1 हमें जात गोत , लिंग , सम्प्रदाय और इलाके के भेदभाव को छोड़कर इनके बीच समानता पर आधारित मानवीय भावना को फिर से स्थापित करना होगा।
2 युवा तबके यानि युवा लड़के लड़कियों को समाज सुधार के रचनात्मक काम में लगाना होगा।
3 दलित ,अल्पसंख्यक , महिलाएं, युवा और सभी शहरी देहाती वंचित तबकों के साथ शिक्षित मध्यवर्ग, अध्यापकों,कर्मचारियों, बुद्धिजीवियों, संस्कृतकर्मियों, मजदूरों और किसानों को इसमें अपनी भूमिका निभानी होगी।
4 हरियाणा ज्ञान विज्ञान समिति पिछले कई सालों से इस व्यापक नवजागरण आन्दोलन के लिए प्रयास रत है।
उम्मीद है आप भी इसमें अपना सक्रिय योगदान किसी न किसी तरीके से देंगे।
रणबीर सिंह दहिया
9812139001
आज चारों तरफ बुराई का बोलबाला नजर आता है । इन्सानी मूल्य और इन्सानियत की भावनाएं , उनसे जुड़े विचार और काम जैसे बिखरे हुए हैं। पूरा समाज गहरे संकट में है। हमारा देश भी इस चौतरफा संकट में घिरा हुआ है। हम जानते हैं कि हमारा देश असंख्य लोगों की कुर्बानियों से आजाद हुआ। आजादी की लड़ाई में उभरे न्याय, समानता व स्वतन्त्रता के मूल्यों के आधार पर हमने अपना संविधान अपनाया। संविधान में ‘नागरिक समाज’ बनाने का लक्ष्य रखा गया और देश के आत्मनिर्भर विकास को मुख्य काम समझा गया।
आजादी के संघर्षों के दौरान चले समाज सुधार आन्दोलनों ने जात गोत , लिंग , सम्प्रदाय और इलाके पर आधारित संकीर्ण पहचानों को एक हद तक तोड़ा। राष्ट्रीय आन्दोलन में विविधता की पहचान भी हुई, साथ ही , सभी तबकों की एकजुटता से जागरुकता व आत्मविश्वास का माहौल बना।
आज स्थिति उल्ट चुकी है। हमारे राष्ट्रीय लक्ष्य, लोगों की इच्छाएं , आकांक्षाएं और उन की क्षमताएं जैसे रौंद दी गई हैं। आत्मनिर्भरता का लक्ष्य छोड़ कर विकसित देशों की और अमरीका की आर्थिक सांस्कृृतिक गुलामी स्वीकारी जा रही है। हमारी खेती , रोजगार, उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, खाद्यान्न,पर्यावरण, जमीन ,जंगल सब संकट में हैं। विदेशी कम्पनियों की लूट बढ़ती जा रही है। हमारा पूरा देश और समाज लाचारी महसूस कर रहा है। हम आत्महीनता के दौर से गुजर रहे हैं। समाज के तमाम तबके अभाव, दुख, निराशा ,असुरक्षा, और हिंसा के बढ़ते चक्के के नीचे पिस रहे हैं। खाना, दवा, शिक्षा,सुरक्षा और सहयोग की कमी है। तनाव और असुरक्षा ने सामाजिक माहौल बिगाड़ दिया है। बड़े पैमाने पर हत्याएं,आत्महत्याएं,और लूटपाट हो रही हैं। लाचारी और आत्महीनता के घेरे को तोड़ने की कोशिशें भी खूब हो रही हैं।
इन हालात में सभी तबके अपने अपने ढंग से इन्सानियत को बचाने की कोशिश में नगे हैं। लेकिन इनसे व्यापक फिजा बदल नहीं रही है। इस कोशिश को एक व्यापक समाज सुधार आन्दोलन और नवजागरण का स्वरुप देना बहुत जरुरी हो गया है। हमने ऐसे आन्दोलन की जरुरत सन 1983 में जनवादी सांस्कृृतिक मंच के माध्यम से हरियाणा में की थी। इस आन्दोलन में आजादी के बाद की गई अपनी भूलों को समझ कर आगे बढ़ने की दिशा बनाने की आवश्यकता है। अपना आत्मविश्वास और पहलकदमी फिर से पा सकें। गहरे संकट के इस दौर को पलटने के लिए हमें अपने सामाजिक जीवन की बुराईयों से लड़ना ही पड़ेगा।
हमारे सामाजिक जीवन में जात पात , अंधविश्वास , पर्दाप्रथा, महिलाओं पर बढ़ते अत्याचार,भ्रूण हत्या, यौन उत्पीड़न और दहेज हत्या आदि समस्याएं बड़े पैमाने पर मौजूद हैं। हरियाणा में शिक्षित लोगों में व्यक्तिवादी सोच हावी है और सामाजिक सरोकार कमजोर हो रहे हैं। गांवों की सामूहिकता में भी खाप , जात तथा गोत्र का बोलबाला बढ़ा है। क्या करें?
1 हमें जात गोत , लिंग , सम्प्रदाय और इलाके के भेदभाव को छोड़कर इनके बीच समानता पर आधारित मानवीय भावना को फिर से स्थापित करना होगा।
2 युवा तबके यानि युवा लड़के लड़कियों को समाज सुधार के रचनात्मक काम में लगाना होगा।
3 दलित ,अल्पसंख्यक , महिलाएं, युवा और सभी शहरी देहाती वंचित तबकों के साथ शिक्षित मध्यवर्ग, अध्यापकों,कर्मचारियों, बुद्धिजीवियों, संस्कृतकर्मियों, मजदूरों और किसानों को इसमें अपनी भूमिका निभानी होगी।
4 हरियाणा ज्ञान विज्ञान समिति पिछले कई सालों से इस व्यापक नवजागरण आन्दोलन के लिए प्रयास रत है।
उम्मीद है आप भी इसमें अपना सक्रिय योगदान किसी न किसी तरीके से देंगे।
रणबीर सिंह दहिया
9812139001
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