सते फते नफे
सविता कविता और
संतोष चर्चा घर आ जाते
हैं और बात
चीत करने लगते
हैं । हर
इतवार को ये
सब और और लोग भी
महिला पुरुष बूढ़े जवान
चर्चा घर में
आते हैं और
मण्डलिया बना बना कर बैठ
जाते हैं और
अपने अपने हिसाब
से चर्चा करते
हैं । महिलाओं की
दो अलग अलग
टोलियां बनती हैं
। तीन
चार पुरुषों की टोलियां बनती हैं और 30 से
40 के
बीच के महिला
पुरुष दोनों की मिली
जुली मंडली सते और
सविता आदि की
है । नौजवान लड़के फुटबाल खेलते
हैं और लडकियां हॉकी
खेलती हैं ।
इस गॉव
की चर्चा जहाँ
भी होती है तो
लोग कहते हैं
कि ऐसा
कैसे हो सकता
है ? सविता कहती
है कि मैं अपने
मामाँ के
यहाँ गयी तो
मेरी माँम्मी ने धमकाया और
बोली -- क्यूँ नाक
कटावै सै म्हारी
? सारे गाम मैं
चर्चा सै चर्चा
घर के थारे
ग्रूप की । और
भी तो सैं
जो न्यारे न्यारे
बैठ कै चर्चा करैं सैं ।
थाम इसे के
आंडी पाके गाम मैं
अक कठ्ठे बैठ
कै किलकि
मारो । फेर
तूने क्या
जवाब दिया -- फते ने
पूछा । मैंने
तो यही कहा
की हम अपने
परिवार में इकठ्ठे
बैठते हैं । दफतरों
में इकठ्ठे बैठ
कर काम करते
हैं । चर्चा घर
में इकठ्ठा बैठ
कर बातचीत करने
में क्या बुराई
है । कविता -- तो मामी
मान गयी ? सविता कुछ
देर सोचती रही
और फिर बोली
-- निरुत्तर तो हो
गयी मगर कन्विंस
नहीं हुई । फते ने
कहा -- क्यूँ बिना बात
की बात
पै गहटा तार रे
सो । कई
बर चर्चा होली
इस बात पर
। संतोष बोली
-- आर्य समाज नै
भी तो महिला
शिक्षा पर तो
खूब जोर लाया
था फेर कोएजुकेशन का तो
विरोध ही करया था
। हरयाणा मैं
और कोई समाज
सुधार आंदोलन हुया
ए कोन्या तो लोग
तो उसे हिसाब
तैं देखेँगे म्हारे
चर्चा घर
नै । नफे बोल्या
-- हमनै जितनी बातां पर
चर्चा करके गाम
तहिं अपनी राय
दी उनमां तैं
अस्सी प्रतिशत पूरे
गाम नै भी
मानी सैं ना ।
धाना खोदन की
बात , ट्यूबवेलों का
पानी टेस्ट करावन
की बात ।
कविता बोली यो
चर्चा घर म्हारे बिना पूरा हो सकै था के। सन्तोष बोली बेरा ना हरयाणे आल्यां कै के होरया सै कदे सुल्टी सोचदे ऐ कोण्या । कै तो सोचक्ैं ऐ कोण्या अर जै सोचैंगे भी तो उल्टी ऐ सोचैंगे। एक बर की बात सै-
जाडयां के दिन थे । म्हारला चौधरी बगड़ मैं खाट घालें लौटरया था । धौरै ए भैंस बंधरी थी अर ना बैठी बैठी जुगालै थी। चौधरी नै देख्या अक भैंस के सींग जमा गोल सैं। फेर सोच्ची अक इसके सींग मैं जै पां दे दयू ंतो के बणै? के बणैगी यो तो इसनै बेरा था । ठहरग्या । थोड़ी सी वार मैं फेर कुलकुली सी उठी अर पां एक बर सरकाया सींग कान्ही पर फेर रुकग्या। न्यों ए करदें सोचदें आधा घन्टा होग्या उसनै अर आखिर मैं पां दे ए दिया भैंस के सींग मैं। बस के था भैंस खड़ी होगी अर म्हारला चौधरी भी उल्टा लटकग्या अर रोल्ला मचादिया। भीतर तैं मेरा ज्येठ लिकड़ कै आया हम आगे। भाज कै आरी ल्याये अर भैंस का सींग काट कै चौधरी का पां काढया। मेरा ज्येठ बोल्या- बाबू या के सोच्ची तनै। वो बोल्या- इस सोच्चण की तै इसी तिसी होरी थी। बाकी सारे कसूते हंसे। सते बोल्या-इतनै हम विवेक तैं ढंग तैं सोचना शुरु नहीं करांगे तो न्योंए भैंस के सींग मैं पां फंसान्दे रहवांगे अर सैक्स रेसो मैं अर बाकी घणी ए चीजां मैं न्यूंए पाछे नै जान्दे रहवांगे। सविता बोली जिस दिन या बात समझ आज्यागी उस दिन हरयाणा की शक्ल बदलज्यागी। म्हारे चर्चा घर के चर्चा मण्डल नै इन दकियानूसी बातां का मुकाबला करना ए पड़ैगा।
रणबीर सिंह दहिया
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