रविवार, 14 अगस्त 2016

Mahila Purush

सते फते नफे सविता कविता और संतोष चर्चा  घर  जाते हैं और बात चीत करने लगते हैं हर इतवार को ये सब और  और लोग  भी महिला पुरुष  बूढ़े जवान चर्चा घर में आते हैं  और  मण्डलिया बना  बना कर  बैठ जाते हैं और अपने अपने हिसाब से चर्चा करते हैं   महिलाओं  की दो अलग अलग टोलियां  बनती  हैं   तीन चार पुरुषों की  टोलियां  बनती  हैं  और  30 से 40  के बीच के महिला पुरुष  दोनों  की  मिली जुली मंडली सते  और सविता  आदि  की है नौजवान  लड़के  फुटबाल  खेलते हैं और लडकियां  हॉकी खेलती हैं इस  गॉव की चर्चा जहाँ भी होती है तो लोग कहते हैं कि  ऐसा कैसे हो सकता है ? सविता कहती है कि  मैं अपने मामाँ  के यहाँ गयी तो मेरी माँम्मी  ने धमकाया  और बोली -- क्यूँ  नाक कटावै  सै  म्हारी ? सारे गाम मैं चर्चा सै  चर्चा घर के थारे ग्रूप की     और भी तो सैं जो न्यारे न्यारे बैठ कै  चर्चा करैं  सैं थाम इसे के आंडी पाके  गाम मैं अक  कठ्ठे  बैठ कै  किलकि मारो फेर तूने  क्या जवाब दिया -- फते  ने पूछा मैंने तो यही कहा की हम अपने परिवार में इकठ्ठे बैठते हैं   दफतरों में इकठ्ठे बैठ कर काम करते हैं    चर्चा  घर में इकठ्ठा बैठ कर बातचीत करने में क्या बुराई है   कविता -- तो मामी मान गयी ? सविता  कुछ देर सोचती रही और फिर बोली -- निरुत्तर तो हो गयी मगर कन्विंस नहीं हुई   फते  ने कहा -- क्यूँ बिना बात की  बात पै गहटा  तार रे सो कई बर चर्चा होली इस बात पर संतोष बोली -- आर्य समाज नै भी तो महिला शिक्षा पर तो खूब  जोर लाया था फेर कोएजुकेशन का तो विरोध ही करया  था हरयाणा मैं और कोई समाज सुधार आंदोलन हुया कोन्या  तो लोग तो उसे हिसाब तैं देखेँगे म्हारे चर्चा  घर नै   नफे बोल्या -- हमनै जितनी बातां पर चर्चा करके गाम तहिं अपनी राय दी उनमां तैं अस्सी प्रतिशत पूरे गाम नै भी मानी सैं ना धाना खोदन की बात , ट्यूबवेलों का पानी टेस्ट करावन की बात कविता बोली यो चर्चा घर म्हारे  बिना पूरा हो सकै था के। सन्तोष बोली बेरा ना  हरयाणे आल्यां कै के होरया सै कदे सुल्टी सोचदे कोण्या कै तो सोचक्ैं कोण्या अर जै सोचैंगे भी तो उल्टी सोचैंगे। एक बर की बात सै-
जाडयां के दिन थे म्हारला चौधरी बगड़ मैं खाट घालें लौटरया था धौरै भैंस बंधरी थी अर ना बैठी बैठी जुगालै थी। चौधरी नै देख्या अक भैंस के सींग जमा गोल सैं। फेर सोच्ची अक इसके सींग मैं जै पां दे दयू ंतो के बणै? के बणैगी यो तो इसनै बेरा था ठहरग्या थोड़ी सी वार मैं फेर कुलकुली सी उठी अर पां एक बर सरकाया सींग कान्ही पर फेर रुकग्या। न्यों करदें सोचदें आधा घन्टा होग्या उसनै अर आखिर मैं पां दे दिया भैंस के सींग मैं। बस के था भैंस खड़ी होगी अर म्हारला चौधरी भी उल्टा लटकग्या अर रोल्ला मचादिया। भीतर तैं मेरा ज्येठ लिकड़ कै आया हम आगे। भाज कै आरी ल्याये अर भैंस का सींग काट कै चौधरी का पां काढया। मेरा ज्येठ बोल्या- बाबू या के सोच्ची तनै। वो बोल्या- इस सोच्चण की तै इसी तिसी होरी थी। बाकी सारे कसूते हंसे। सते बोल्या-इतनै हम विवेक तैं ढंग तैं सोचना शुरु नहीं करांगे तो न्योंए भैंस के सींग मैं पां फंसान्दे रहवांगे अर सैक्स रेसो मैं अर बाकी घणी चीजां मैं न्यूंए पाछे नै जान्दे रहवांगे। सविता बोली जिस दिन या बात समझ आज्यागी उस दिन हरयाणा की शक्ल बदलज्यागी। म्हारे चर्चा घर के चर्चा मण्डल नै इन दकियानूसी बातां का मुकाबला करना पड़ैगा।

रणबीर सिंह दहिया

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