संस्कृति कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसे हम जीवन और जीवन से जुड़ी दैनिक गतिविधियों से काटकर देख सकें। संस्कृति
मनुष्य जीवन के प्रत्येक क्रिया-कलाप से प्रतिबिंबित होती है। मनुष्य के पहनने-ओढ़ने, खाने-पीने, बोलने-लिखने, सोचने-समझने
इत्यादि में संस्कृति अभिव्यक्त होती है और इन्हीं से संस्कृति का निर्माण होता है। बेशक धर्म का प्रभाव महत्त्वपूर्ण होता
है परन्तु केवल धर्म संस्कृति का जन्मदाता नहीं। जो लोग शुद्ध ‘हिंदू’ या शुद्ध ‘इस्लामिक’ संस्कृति की बात करते हैं,
वास्तव में वे लोग संस्कृति का सांप्रदायीकरण कर रहे होते हैं बिल्कुल वैसे ही जैसे वे राजनीति का सांप्रदायीकरण करते
हैं। प्रत्येक जातीय समुदाय की अपनी एक लंबी सांस्कृतिक परपंरा होती है। उसी परंपरा से उसकी संस्कृति का विशिष्ट
स्वरूप झलकता है। एक समुदाय जब अपनी संस्कृति को विकसित कर रहा होता है, तो यह स्वाभाविक है कि वह
दूसरे जातीय समुदायों के संपर्क में आता है और इस प्रक्रिया में एक दूसरे पर अपने सांस्कृतिक प्रभाव छोड़ता है। इस
लेन-देन में कुछ पुराना छूट जाता है और कुछ नया ग्रहण किया जाता है।
बौद्ध धर्म कई देशों जैसे श्रीलंका, चीन, थाइलैंड, तिब्बत, कंबोडिया, वियतनाम, जापान इत्यादि में फैला, परन्तु
क्या हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि श्रीलंका की संस्कृति तिब्बत या जापान की संस्कृति के समान है बेशक इन
सबमें बौद्ध धर्म मौजूद है।
इसी तरह, इस्लाम जिस अरब में जन्मा था, वहां से यह इंडोनेशिया, मलेशिया, थाइलैंड, भारत, श्रीलंका, ईरान,
मध्य-एशिया, मिस्र, सूडान, मोरोक्को, तुर्की,.... कहां-कहां नहीं फैला, परन्तु देखने की बात यह है कि इन तमाम देशों
की संस्कृतियां एकदम भिन्न हैं, बेशक उनका धर्म एक है।
हमारे देश में, जहाँ इतनी जातियां, व भाषाएं व धर्म हैं, सभी संस्कृतियों की स्वायतत्ता को मानते हुए हमें परस्पर
संबंधता और निर्भरता को स्वीकार करना होगा।
भारतीय संस्कृति की विशेषताएं भारतीय संस्कृति की विशेषताएं भारतीय संस्कृति की विशेषताएं
एंथ्रोपोलिजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने भारत में 4258 समुदायों के सर्वेक्षण के आधार पर भारतीय समाज, संस्कृति
और परंपराओं के बारे में ‘‘भारत के लोग’’ शृंखला प्रकाशित की है जिसके प्रमुख निष्कर्ष इस प्रकार हैं--
-- हमारा समाज इस दुनिया का सबसे वैविध्यमय समाज है। हमारे देश में 4635 विभिन्न समुदाय हैं जिनकी अपनी-अपनी
आनुवंशिक विशेषताएं, भाषाएं, पहनावे, आराधना की विधियां, खानपान और रिश्तेदारी और शादी ब्याह की रीतियां हैं।
इन्हीं समुदायों की मौलिक जीवनशैली से हमारे राष्ट्रीय आम जनजीवन की मुख्यधारा बनी है।
-- भारत के लोगों की उत्पत्ति मुख्यतः निम्नलिखित नस्लों के मिलन से हुई हैः प्रोटो-आस्टेªलाइड, पैलियो-मेडिटरेनियन,
काकेशसाइड, नीग्रोइड और मंगोलीय। विभिन्न जातीयताएं मुख्यतः इस प्रकार हैं: आर्य, फारसी, यूनानी, हूण, अरब,
तुर्क, अफ्रीकी, मंगोली, यूरोपीय। ये सब एक दूसरे से इस तरह घुल मिल गई हैं कि किसी भी जातीयता का शुद्ध
रूप कहीं भी आज उपलब्ध नहीं है।
-- ऐसा पाया गया है कि विभिन्न समुदायों के बीच रंग रूप, कद काठी, और आनुवंशिक विशेषताओं का जितना
फर्क है, उससे कहीं ज्यादा फर्क एक ही समुदाय के लोगों के बीच देखने मंे आता है। एकरूपता जाति और धर्म के
आधार पर काम, क्षेत्रा विशेष में रहने वाले लोगों के बीच ज्यादा होती है। इस बात को वैज्ञानिक निष्कर्षों ने नकार
दिया है कि ऊँची जाति और निम्न जाति के अलग-अलग वंशक्रम हैं। मिसाल के तौर पर तमिल ब्राह्मणों की जातीय
विशेषता का उत्तर भारत के अथवा कश्मीरी पंडितों से कोई तालमेल नहीं है। करीब-करीब सभी जगह प्रदेश विशेष मंे
ब्राह्मणांे और निम्न जाति के लोगों के बीच गजब की समरूपता पाई जाती है। मुसलमान समुदाय की बड़ी आबादी में
ऐसे कोई विशेष गुण नहीं पाए जाते जिनके आधार पर उन्हें प्रवासी करार दिया जा सके। उनकी उत्पत्ति मुख्य रूप से
स्थानीय आबादी के बीच से हुई है।
-- जहाँ तक मान्यताओं का सवाल है, बहुत कम ऐसे समुदाय हैं जो अपने को आप्रवासी अथवा बाहर से आया
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नहीं मानते। हर समुदाय के लोग अपने पलायन या ‘हिजरत’ के दिनों को अपने लोकगीतों, इतिहास और सामूहिक स्मृति
में सुरक्षित रखते हैं। जो जहां निवास करता है उसने उस क्षेत्रा विशेष की स्थानीय परंपराओं के निर्वाह में अपना योगदान
दिया है और स्थानीय लोकाचार को स्वीकारा है। यहां तक कि आक्रमणकारी भी प्रवासी बन गए। अनेक हिंदू मतावलंबी
ऐसे हैं जो इस देश में उन लोगों से बहुत बाद में आए जो आज इस्लाम को मानते हैं। उदाहरणार्थ, केरल के मुसलमान
छठी सदी में भी पहले से मालाबार तट पर रहते आए हैं। ये सभी व्यापार और वाणिज्य से जुड़े लोग थे।
-- हमारी अनेकता और एकता का एक बड़ा माध्यम हमारी भाषा है। यहां करीब 325 भाषाएं और 25 लिपियां
प्रचलन में हैं। ये समय-समय पर विभिन्न भाषाई परिवारों, हिंद आर्य, तिब्बती बर्मी, हिंद यूरोपीय, द्रविड़ आस्त्रो एशियाई,
अंडमानी और हिंद-ईरानी से उपजी हैं। हमारे यहां के लगभग 65 फीसदी समुदाय द्विभाषी हैं और लगभग सभी आदिवासी
समुदाय के लोक त्रिभाषीय हैं। इस प्रकार नाना प्रकार की मातृभाषाएं हमारी स्थानीय संस्कृति और विविधिता को बनाए
रखने में महत्वपूर्ण औजार हैं। व्यापक पैमाने पर दो भाषाओं के इस्तेमाल की वजह से लोगों के बीच अच्छा संपर्क हो
पाया है और यह सामाजिक और सांस्कृतिक मेलजोल को बढ़ाता है।
-- भारत के लोगबाग आपस में अलग-थलग नहीं रहे। उनका अपने आसपास के प्राकृतिक और सामाजिक परिवेश
में घनिष्ठ रिश्ता रहा है और सदियों से वे आपसी जीवन और संघर्षों में एक दूसरे के साझीदार बनते रहे हैं। इसी ऐतिहासिक
पारस्परिकता और सामूहिक संघर्षों ने हमारी अनेकता और एकता दोनों के स्वरूप को बनाया है।
हिन्दुस्तान के संदर्भ में देखें तो एक बात साफ जाहिर होती है, कि मध्ययुगीन भक्ति आंदोलन से लेकर आजादी
हासिल करने तक के लम्बे दौर में--कुछ अपवादों को छोड़कर हमारे समाज से भाषा, जाति, धर्म, संप्रदाय आदि की
बहुस्तरीय विविधताओं के बीच जो व्यावहारिक जीवनगत् सामरस्य पाया था, उसे हम आजादी के बाद बहुत तेजी से
खोते रहे हैं। मध्ययुग में यह सामरस्य धार्मिक-सांस्कृतिक था, भारतीय नवजागरण के वैचारिक संघर्ष ने इसे बौद्धिक-वैचारिक
आयाम दिया और स्वाधीनता आंदोलन ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ राष्ट्रीय चेतना के बहुस्तरीय संघर्ष द्वारा, इसे
राष्ट्र की एकीकृत राजनीतिक मुख्यधारा में तब्दील किया। यह सामरस्य हमने लोक जीवन में एक लम्बे समय तक साथ
रहने के संस्कारों से अर्जित किया था, एक-दूसरे को काटते रक्त रंजित इतिहास के तथ्यों से नहीं, अपनी गंगा-जमुनी
परंपरा से लगातार सींचे गये सामूहिक अंतर्मन के अनुभव-साक्ष्यों में खोजा था। किसी लेखक ने ठीक लिखा है कि इस
लम्बे दौर में हम किसी तात्कालिक उद्देश्य की ऐतिहासिक अनिवार्यता या राजनीतिक मजबूरी की रस्सी से जबर्दस्ती
बांधे गये लकड़ियों के गठ्ठर की तरह एक नहीं थे बल्कि हाथ की पांच अंगुलियों की तरह एक थे--अविभाज्य और
एक-दूसरे पर अवलंबित।
पांचों अंगुलियां एक-दूसरे से बराबर सटी ही नहीं रहतीं, न एक-सी होती हैं पर एक को कुछ होता है तो सभी
उससे प्रभावित हो जाती हैं। सभी अलग-अलग हरकत कर सकती हैं और मिल कर भी हरकत कर सकती हैं। संगठित
प्रतिरोध के लिए मुट्ठी बन कर तन सकती हैं। संस्कृति के ऐसे ही विवेकपूर्ण सामाजिक सोच पर बल देते हुए, पण्डित
जवाहरलाल नेहरू ने ‘भारत एक खोज’ मंे लिखा है--‘‘हिन्दुस्तानी अवाम की जिन्दगी....नस्ली, मजहबी और भाषाई फ़र्क
या विविधता के बावजूद एक ही सांस्कृतिक आत्मा से सम्बद्ध है। उत्तर भारत की सारी आबादी जात-पात और मज़हब
मंे भिन्नता से उत्पन्न कुछ पाबंन्दियों के बावजूद--एक जैसे नैतिक मूल्यों और सामाजिक रस्म और रिवाज़ को मानती
है, एक भाषा बोलती है, अपने सामूहिक सर्जक श्रम, यातनाओं और एक बेहतर जिन्दगी के लिए अपने साझे सक्रिय
संघर्ष की लम्बी ऐतिहासिक प्रक्रिया मंे उसने जिस तहजीबी स्वभाव को पोषित किया है वह एक है, उनकी मेहनत और
मशक्कत ही उनकी संस्कृति और शक्ति का स्रोत है।’’
रोमिला थापर का कहना है कि अतीत मंे एक ऐसे एकरूप धार्मिक समुदाय की अवधारणा अनुपस्थित दिखाई देती
है जिसकी सहज पहचान एक हिन्दू के रूप में की जाए। उपनिवेशपूर्ण समाज उप-जातियांे और स्थानीय निष्ठाओं के
कारण इस क़दर विभाजित था कि वह बृहत धार्मिक निष्ठाओं के उभरने की इजाजत नहीं दे सकता था। कुछ विद्वान
यह मानते हैं कि उपनिवेश पूर्व काल में समुदायों के बीच सीमाओं की अस्पष्टता इसलिए थी क्योंकि आधुनिक समुदायों
की तरह परंपरागत समुदायों को वर्गीकृत नहीं किया गया था।
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दो प्रमुख चिंतन-परंपराएं दो प्रमुख चिंतन-परंपराएं दो प्रमुख चिंतन-परंपराएं
किसी भी देश के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन में कोई भी परंपरा एक-आयामी या इकहरी नहीं होती। किसी भी देशकाल
के समाज में दो चिंतन परंपराओं को मुख्य रूप से पहचाना जा सकता है-- एक रूढ़िवादी और दूसरी प्रगतिकामी। प्रगतिकामी
परंपरा समाज के अनिवार्य विकास के लिए संघर्षकारी रास्ता खोजती हुई निरंतर गतिशील होती है, परन्तु रूढ़िवादी,
समाज के पांवों की बेड़ियां बनकर परिवर्तन की संभावनाओं को अवरुद्ध करने का हर संभव प्रयास करती हैं। रूढ़िवादी
सोच से निर्मित संस्थाएं रूढ़िवादी परंपराओं को जीवित रखने के लिए जन-समूहों को संगठित करती हैं। रूढ़िवादी सोच
संकीर्णतावादी होती है और मंताधता पर पलती है। यह मतांधता, वह चाहे हिंदुओं में हो या मुसलमानों में, लोगों को
कट्टर बनाती है, सामाजिक सोच पर पहरे लगाती है और व्यवस्था में परिवर्तन की विरोधी होती है। वह मिथक गढ़ती
है जिससे समाज में अलगाव पैदा होता है। प्रगतिकामी शक्तियां प्रायः आलोचनात्मक होती हैं, समाज को उसकी बेड़ियों
से मुक्ति दिलाने के लिए संघर्षरत रहती हैं, और इसी कारण से उन पर अंधविश्वासी लोग, जो जनता को मूर्ख बनाकर
अपना उल्लू सीधा करते हैं, हमला करते हैं। दाभोलकर, कलबुर्गी या पानसरे की हत्या इसीलिए की गई क्योंकि वे समाज
में अंधविश्वासी, रूढ़िवादी परंपराओं के विरुद्ध जन-जन में जाकर प्रगतिकामी सोच के लिए प्रचार-प्रसार करते थे। ये
हत्याएं उन लोगों द्वारा की गईं जो समाज में धर्म और संस्कृति के उन रूढ़िवादी, जर्जर और अलगाववादी पक्षों का वर्चस्व
स्थापित करना चाहती हैं, जो हमें अपनी जंजीरों से प्रेम करना सिखाते हैं। ये प्रतिक्रियावादी ताकतें जनता के बीच कोई
ऐसा समावेशी विचार उछाल देती हैं जिनसे वे सामंती व पूंजीवादी शक्तियों के खिलाफ संगठित न होकर राष्ट्र, धर्म
और संस्कृति को लेकर एक उन्मादी भीड़ में बदल जाएं। ये ताकतें राज्य सत्ता में धर्म का पूरा दखल चाहती हैं।
भारतीय इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जो इस तथ्य के साक्षी हैं कि इस धरती पर जब भी राज्य
सत्ता और धर्म का अपवित्रा गठबन्धन हुआ है तब हजारों बेगुनाहों के खून के छींटे मानव संस्कृति के पन्नों पर पड़े
हैं। हिन्दू इतिहास में कम से कम तीन प्रमाण इस स्थिति की पुष्टि करते हैं। एक तो, षड्यंत्रा द्वारा अशोक के
कुल से मगध की गद्दी छीनकर ब्राह्मण राजकुल की स्थापना करने वाले शुंग सम्राट पुष्यमित्रा जिसने पाटलीपुत्रा और
जालन्धर के बीच के सारे बौद्ध विहार जला डाले थे और ग्रीकराज बौद्ध मिलिन्द की राजधानी स्यालकोट में घोषणा
की थी, ‘‘जो मुझे एक बौद्ध भिक्षु का सिर काट कर देगा उसे मैं सौ सोने की दीनार दूंगा।’’ दूसरा उदाहरण श्री हर्ष
से पहले के शैव राजा शशांक का है जिसने बौद्ध मठों और भिक्षुओं पर बड़े अत्याचार किये थे। शशांक ने संघ के अनेक
विहार अग्नि की लपटों को समर्पित कर दिए थे और बोधगया के बोधिवृक्ष को कटवाकर उसकी जड़ों में अंगार रखवा
दिए थे ताकि वह वृक्ष फिर पनप न सके। तीसरा उदाहरण उसी शती के पांड्य राजा नेडूरमान् का है जिसने शैवों के
इशारे पर दक्षिण में आठ हजार जैन साधुओं को जान से मार डाला था। लेकिन भारतीय जनमानस ने संगठित धर्म
द्वारा इन राजनीतिक हिंसाओं को आदर्श नहीं माना। ये तीनों--पुष्यमित्रा शुंग, शशांक और नेडूरमान--भारतीय इतिहास
के खलनायकों के रूप में ही विख्यात हुए।
ऐसी स्थिति में भारतीय जनता के एक बड़े हिस्से को संकीर्णता और स्मृति लोप से बचाकर उदार और सहिष्णु
सोच की एक समान्तर संस्कृति को विकसित करना आज के राजनीतिक, सामाजिक संदर्भ में बेहद जरूरी है। विवेकशील
तर्कशीलता और ऊंचे विचार ही इस दुनिया को एक बेहतर दुनिया बनाते हैं। इसलिए इतिहास के हर संकटग्रस्त दौर
में हमें अपनी चिंतन परम्परा के प्रगतिकामी और मानवीय पक्षों को आधुनिकता की नयी रोशनी में जांचते और परखते
रहना चाहिए।
रवींद्रनाथ टैगोर, जिन्हें अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि में तीन संस्कृतियों--हिंदू, मुस्लिम एवं ब्रिटिश, के सम्मिश्रण पर
गर्व था, ने हमेशा खुलेपन की परंपरा को समृद्ध बनाने पर जोर दिया। अकबर के राहे-अक्ल (तर्क की राह) की तरह
टैगोर ने एक अच्छे समाज की नींव के लिए विवेचना एवं तर्क के महत्व पर जोर दिया:
जहां मस्तिष्क बिना डर के सोच पाता है
और इंसान सर उठाकर चल पाता है
जहां ज्ञानार्जन पर कोई बंदिश नहीं है
जहां दुनिया छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटी नहीं है।......
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हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपने निबंध‘‘भारतीय सांस्कृतिक परंपरा और समाजवादी भविष्य’’ में लिखा थाः ‘‘भारतवर्ष
का सांस्कृतिक इतिहास बहुविचित्रा संस्कृतियों के एक होने की कहानी है। जहां तक इतिहास हमें पीछे ले जा सकता है,
वहाँ तक यह बात बहुत ही स्पष्ट दिखाई देती है। न जाने कितनी जातियाँ इस देश में आती रही हैं। कुछ दिनों तक स्थानीय
जनता से उनका कठोर संघर्ष होता है, ऐसा जान पड़ता है कि वह भयंकर संघर्ष कभी समाप्त नहीं होगा, परन्तु कुछ ही
दिनों में दोनों जातियों में संघर्ष समाप्त हो जाता है, वे एक-दूसरे से बहुत कुछ ले-देकर एक ही संस्कृति की अनुवर्त्तिनी
हो जाती हैं। डेल्टा भूमि में जिस प्रकार एक के बाद दूसरी परतें जमतीं रहती हैं और अंत में एक उर्वरा धरती का निर्माण
होता है, उसी प्रकार हमारे इतिहास में विभिन्न मानव-मंडलियों की संस्कृतियों की परतें जमती रही हैं और इस महान
भारतीय संस्कृति का निर्माण होता रहा है।’’
मुसलमान शासक और हिंदू संस्कृति
मुगलों के शासन के बारे में इस देश में इतना कुप्रचार किया गया है मानो उनके शासकों के हाथों में हमेशा तलवार
रही और वे सभी--बाबर, हुमायूं, अकबर इत्यादि हिंदू धर्म को नष्ट करने पर तुले थे। यहां ज़रा संक्षेप में जान लेना जरूरी
है कि इसमें सच कितना है।
बाबर भारत में 1526 ई. में आया और मात्रा 4 वर्ष बाद 1530 ई. में उसकी मृत्यु हो गई। उसने मृत्यु से पूर्व हुमायूं
के नाम एक पत्रा लिखा। बाबर किस चरित्रा का व्यक्ति था, उसका खुलासा इस पत्रा से हो जाता है। यह पत्रा आज भी
भोपाल के नवाब साहब के पुस्तकालय में सुरक्षित है। उसके कुछ अंश इस प्रकार हैं:
प्रिय पुत्रा हुमायूं
यह खुदा की महान कृपा है कि तुमको भारत जैसा देश शासन करने के लिए मिला है। यह देश नाना
धर्म और जातियों का है। इसलिए तुम किसी भी धर्मावलम्बी के धार्मिक स्थल को अपवित्रा मत करना। हिन्दू गायों
की पूजा करते हैं, और उसे माता कहते हैं। अतः गोवध बन्द करा देना और गोमांस से परहेज करना। राजा को चाहिए
कि प्रजा को पुत्रा का स्नेह दे, तभी प्रजा उसे पिता का आदर दे सकती है। शिया और सुन्नी के झगड़े में मत पड़ना
नहीं तो इस्लाम कमजोर हो जाएगा। ...इत्यादि।
हुमायूं ने पिता के उक्त आदेश का बखूबी पालन किया।
हुमायूं अपने पिता जैसा कुशल सेनापति नहीं था। सन् 1530 में उसने गद्दी हासिल की और सन् 1540 में शेरशाह
सूरी से पराजित हो गया।
हुमायूं के विषय में एक जनश्रुति है कि एक बार गुजरात के सुल्तान (जो कि मुसलमान था) ने मेवाड़ पर हमला बोल
दिया। महारानी पद्मावती मेवाड़ की शासिका थी। उसके सैनिकों ने दुर्दान्त आक्रामक का सामना बड़ी बहादुरी के साथ
किया। किन्तु संख्या छोटी और सीमित साधन होने के कारण सेना लड़खड़ाने लगी। महारानी ने अपने पुरोहित के द्वारा
हुमायूं के पास राखी के साथ एक पत्रा भेजा। उसमें लिखा था, ‘‘भैया! गुजरात के सुल्तान ने तुम्हारी बहन पर हमला बोल
दिया है, अब उसकी लाज तुम्हारे हाथ में है।’’
तुम्हारी बहन,
पद्मावती
हुमायूं के बाद उसके बेटे अकबर ने गद्दी संभाली। उसे इस देश की जनता ने ‘अकबर महान’ की उपाधि दी। कहा
जाता है कि उन्होंने दादू, मीराबाई और सिख गुरू अमर दास से भी भेंट की। इन विविध धर्मों और सम्प्रदायों के पण्डितों
और साधुओं की उन पर गहरी छाप भी पड़ी। फलतः उन्होंने निरामिष भोजन शुरू किया, पिंजरों से पक्षियों को छुड़वाया
और विशिष्ट दिनों पर पशु-वध की मनाही की। उनके मकान में अग्नि निरन्तर जलती रहती थी, वे सूर्य-स्त्रोत का नित्य
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जाप करते थे, सिर और दाढ़ी मुंड़ाते थे। तथापि उन्हें कोई एक धर्म पूरी तरह नहीं रुचता था। वे हर धर्म की अच्छी बातों
को ग्रहण करते और बुरी बातों को छोड़ने में विश्वास रखते थे। अतः उन्होंने सम्प्रदाय की दृष्टि से किसी धर्म को नहीं
अपनाया। उन्हें इस रूप में सम्प्रदाय निरपेक्ष कहा जा सकता है। निस्संदेह वे अपने समय के धर्मों की साम्प्रदायिक कटुता
और पक्षपातपूर्ण संकीर्णता से क्षुब्ध थे और चाहते थे कि सभी धर्म-वृक्षों के सुरभित सुमनों को चुन कर नैतिक और मानवीय
मूल्यों की महक फैलाने वाली मान्यताओं का गजरा गूँथा जाए, इस दृष्टि से उन्होंने कुछ मत और मूल्य निर्धारित किये
और कुछ आचारों पर भी जोर दिया। अपने विचारों के अनुरूप अकबर ने हिन्दुओं पर जजिया माफ किया, मांस-भक्षण पर
पाबंदी लगायी। मुसलमान बनाए गए हिन्दुओं को फिर से हिन्दू होने की स्वतंत्राता दी। राजकाज में उन्होंने हिन्दू-मुसलमान
में कोई भेद नहीं समझा और हिन्दुओं को काफी ऊँचे पद दिए। मानसिंह, बीरबल, टोडरमल आदि उनके साम्राज्य के
मेरुदण्ड थे। टोडरमल पक्के हिन्दू थे और बिना पूजा किए हुए भोजन नहीं करते थे। एक बार राजस्थान के किसी अभियान
में उनका मूर्तियों का पिटारा कहीं खो गया। उन्होंने भोजन छोड़ दिया और अकबर को उसकी खोज कराने में काफी सिरदर्दी
करनी पड़ी। उनकी मदद से 1585 के आसपास तारादत्त भट्ट ने काशी में विश्वनाथ मन्दिर को फिर से बनवाया और 1589
में द्रौपदी-कुण्ड की स्थापना की। उनके पुत्रा गोवर्धन ने काशी के कला केन्द्रों और विद्वत् समाज में बड़ा आदर पाया। अकबर
ने राजपूत राजाओं से भी गहरे सम्बन्ध स्थापित किए। अकबर हिन्दुओं के मनोभावों का कितना सम्मान करते थे इसका
परिचय इस बात से मिल जाता है कि अपनी माता के देहान्त पर उन्होंने चालीस दिन का शोक वक्त से बहुत पहले समाप्त
कर दरबार में दशहरा मनाने का आदेश दिया, क्योंकि यह त्यौहार बीच में आ गया था।
शाहजहाँ के राज्यकाल में मुल्ला महमूद जौनपुरी आदि के प्रभाव से फिर कट्टरता ने जोर पकड़ा। किन्तु इसी युग में
मियाँ मीर ने सार्वभौम मानववाद का संदेश दिया, शेख मुहिबुल्लाह अलाहाबादी (1587-1648 ई.) ने अद्वैतवाद का सहारा
लेकर यह घोषणा की कि धर्म हिन्दू और मुसलमानों में भेद करने की अनुमति नहीं देता और शेख सरमद ने मन्दिर और
मस्जिद, काबा और गिरिजा, सबको बेकार बताते हुए भगवान के सर्वव्यापी प्रेम रूप का निरूपण किया। स्वयं शाहजहां
के पुत्रा दाराशिकोह (1615-1659 ई.) ने हिन्दू और मुसलमानों के बीच की खाई को पाटने के लिए आध्यात्मिक एकता और
दार्शनिक समन्वय का सेतु रचने का प्रयास किया। उन्होंने सब धर्मों के ग्रंथ पढ़े और उनके आचार्यों से सम्बन्ध स्थापित
किया।
इस मेल-मिलाप के जमाने में साहित्य और विद्वत्ता ने काफी उन्नति की। अकबर के काल से ही धर्म-ग्रंथों के एक
भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद करने की प्रवृत्ति को बहुत प्रोत्साहन मिला। अबुल फज्ल ने बदायूनी, फ़ैजी, नकीब खाँ
और मुल्ला शीरी के महाभारत के फारसी अनुवाद की भूमिका में इस विषय में राज्य की नीति को स्पष्ट करते हुए लिखा
कि ‘‘जब मुसलमानों, हिन्दुओं और यहूदियों के धार्मिक मतभेद हद से ज्यादा बढ़ गये और वे एक-दूसरे के खण्डन में
औचित्य की सीमा का उल्लंघन करने लगे तो इनके मर्मज्ञों ने यह तय किया कि हर धर्म की पवित्रा पुस्तकें उसके विरोध्
िायों की भाषाओं में अनूदित की जाएँ। जिससे पुण्यात्मा सम्राट के आशीर्वाद से उनके मानने वाले आपसी झगड़ों और
मनमुटाव की ज्यादती से छुटकारा पाकर सत्य की खोज में लग जाएँ।’’
जिस दाराशिकोह के माध्यम से उपनिषदों का प्रचार-प्रसार विश्व भर में संभव हुआ, उसीका छोटा भाई औरंगजेब था।
यह बात सही है कि काशी का प्रसिद्ध विश्वनाथ मन्दिर को इसने ही ध्वस्त कराया था। किन्तु उसी के सामने महारानी
अहिल्या बाई के प्रयास से पुनः उसी स्थान पर दाएं-बाएं करके विश्वनाथ मंदिर बन भी गया। औरंगजेब अपनी राजसत्ता
का भक्त था। उसके विरुद्ध जिसने देखा उसे ही नष्ट किया। सबसे पहले अपने पिता को ही उसने कारागार में डाला।
फिर अपने तीन भाईयों--दारा, शुजा और मुराद का कत्ल किया। न उसने अपनी बेटी को बख्शा, न दामाद को, न बहन
को और न जीजा को। उसके जितने हिन्दू राजा दुश्मन थे उससे अधिक मुसलमान नवाब और सुल्तान। वह एकमात्रा
राजसत्ता का पुजारी था।
आखिरी मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर की 1857 के स्वतंत्राता संग्राम की अहम भूमिका का इससे अंदाज लगाया
जा सकता है कि जब वे नजरबंद थे तो अंग्रेजों ने नाश्ते पर उन्हें उनके दो बेटों के सर भेंट किए।
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साझी विरासत के कुछ अन्य उदाहरणः
1. अहमदाबाद के सुहागन-सूफी अपनी बेटियों को साड़ी, लाल सिंदूर से सजाते थे, बिल्कुल हिंदुओं की तरह।
2. गोस्वामी तुलसीदास जब पहली बार बनारस आए तो उन्हें यहां के पंडों ने पत्थर मारे और उनके साथ बदतमीजी
की। रामचरित मानस की भाषा संस्कृत न होकर अवधी को लेकर कुछ विवाद था। उस वक्त उन्हें कौन बचाने आया।
बनारस का मुगल गर्वनर रहीम खानखाना।
3. अवध के नवाब 13 दिनों तक होली खेला करते थे और उनके दरबार में बाकायदा रासलीला हुआ करती थी। अमीर
खुसरो ने होली पर सैकड़ों गीत लिखे हैं।
मोहे अपने ही रंग में रंग दे ख्वाजा जी,
मोहे सुहागन, रंग बसंती रंग दे...।
4. पिछले 800 वर्षों से सूफी बसंत पंचमी का त्यौहार मनाते रहे हैं, वहां सरस्वती वन्दना गाई जाती है। उत्तर भारत की
सूफी दरगाहों पर आज भी केसरिया रंग की चादरें चढ़ाई जाती हैं।
5. 1857 के स्वाधीनता संग्राम में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के जनरल पठान थे--गुलाम गौस खान और खुदाद खान जो
झांसी के किले के मुख्यद्वारों पर पहरा देते थे। वे भागे नहीं और लड़ते लड़ते 2 अप्रैल, 1857 को अपनी जान दी।
6. गुरु अर्जुन देव का सबसे पक्का दोस्त मियां मीर था। अमृतसर के स्वर्ण मंदिर की नींव मियां मीर ने रखी थी। मियां
मीर दारा शिकोह (शाहजहां का सबसे छोटा बेटा) का गुरु भी था। जायसी, अमीर खुसरो, दादू, बाबा फरीद, रहीम,
ये सभी मुसलमान सूफी थे और उनकी कई बंदिशें गुरु ग्रंथ साहब में हैं। दुनिया भर के लाखों गुरुद्वारों में गं्रथ साहब
रखा हुआ है और वहां के गं्रथी उन्हें रोज अपनी संगतों को सुनाते हैं।
7. बुल्ले शाह, पंजाब का सूफी कवि, का असली नाम था -माधवलाल हुसैन। वह अपने को न मुसलमान और न हिंदू
मानता था। पंजाबी में उसका मश्हूर गीत थाः-
मस्जिद ढा दे, मंदिर ढा दे, ढा दे जो कुछ ढैंदा,
पर किसी दा दिल ना ढांई, रब्ब दिलां विच रैंदा।
सांप्रदायिक सद्भाव की ताज़ा सच्ची कहानियां सांप्रदायिक सद्भाव की ताज़ा सच्ची कहानियां सांप्रदायिक सद्भाव की ताज़ा सच्ची कहानियां
पिछले कुछ वर्षों से इस देश में सांप्रदायिक विद्वेष फैलाने के प्रयासों में तेज़ी आई है। 1992 में बाबरी मस्जिद गिराने,
गुजरात में 2002 का नरसंहार, रामजन्मभूमि आंदोलन, गोरक्षा अभियान इत्यादि ने देश के माहौल में ज़हर भरने का काम
किया है। इससे भारत की छवि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी खराब हुई है। परन्तु भारत की जनता ने, तमाम उकसावों के
बावजूद, सांप्रदायिक सौहार्द की अपनी परंपरा को याद रखा है। फेसबुक व ब्लॉग्स पर ऐसी बहुत सी घटनाओं का ज़िक्र
मिलता है जिनसे पता चलता है कि मानवता अभी भी जिं़दा है।
अराफात बशीर ने 8 मई 2015 को लिखा है:--
‘‘अगस्त 2013 को डॉ. आशीष शर्मा की शादी डॉ. सोनिया शर्मा से होनी तय थी, दुल्हन के घर पर शादी की रस्म
होनी थी परन्तु किश्तवाड़ (जम्मू व कश्मीर) में एक हिंदू को गोली मार दी गई थी और एक मुसलमान को जिं़दा जला
दिया गया था। शहर में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच झगड़े भयंकर रूप ले रहे थे। सौ से अधिक वाहनों, दुकानों और
होटलों को आग के हवाले कर दिया गया था। किश्तवाड़ के शहीदी मोहल्ले में, जहां पर शादी होनी थी, केवल 6 हिंदू
परिवार थे, जबकि 300 मुस्लिम परिवार थे।
डॉ. आशीष शर्मा (दूल्हा) ने लिखा, ‘‘हम हवन करने में सफल हो गए थे। ‘तेलवाई’ की रस्म खत्म होने को थी कि
हमने पंडित को विवाह टालने के लिए अनुरोध किया। कहा जाता है कि ‘तेलवाई’ रस्म के बाद तो मौत भी विवाह टाल
नहीं सकती। परन्तु हमारे मुसलमान पड़ोसियों, जो कि कार्यक्रम में उपस्थित थे, ने कहा कि विवाह को स्थगित न किया
जाए। उन्होंने आश्वासन दिया कि वे बारात के साथ जाएंगे ताकि मुसलमान इलाकों से सुरक्षित निकला जा सके। तब
हमने बाकी रस्में कीं और मैंने अपने ससुराल वालों को सूचना भेजी कि वे बारात का स्वागत करने की तैयारी कर लें।’’
ख्7,
आशीष की बारात को हमले से बचाने के लिए 70 मुसलमान पड़ोसी बारात के साथ रहे।
अनिरुद्ध अनुपमा ने 7 मई, 2015 को फेस बुक पर लिखा, ‘‘त्रिची के पास श्रीरंगम नामक जगह पर कुछ वर्ष पहले
यह घटना घटी शुक्रवार के दिन एक बारात घर में हिंदू-शादी हो रही थी कि अचानक वहां आग लग गई। आग से
अफरा-तफरी मच गई। एक मुसलमान, जो पास में एक मस्जिद में नमाज पढ़ने जा रहा था, ने इस आग को देखा तो वे
मस्जिद में एकत्रा अन्य मुसलमानों को बुला लाये और आग पर काबू पाकर कई लोगों की जान बचाई।
मीडिया ने जब उससे पूछा कि नमाज़ अदा करने की बजाय उसने लोगों को सहायता करना क्यों चुना, तो उसका
जवाब था, ‘‘अगर मैं नमाज़ अदा करता तो मैं खुश होता, परन्तु लोगों की सहायता करके मैंने अल्लाह को खुश कर
दिया।’’
कर्नाटक में 1992 के सांप्रदायिक दंगों के बाद पुर्तागेरी नामक जगह पर हिंदुओं ने मिलकर मस्जिद का निर्माण किया।
पुणे में लगभग 20 मुसलमानों ने मिलकर मस्जिद के पास मंदिर बनवाया। जब आरती हो रही होती है तो मस्जिद में अज़ान
नहीं होती। और इसी तरह जब अज़ान होती है तो आरती बंद कर दी जाती है। हैदराबाद में 30 जगहें ऐसी हैं जहां मस्जिद
और मंदिर एक दूसरे से सटे हैं। ईद, दीवाली, होली सभी त्योहार हिंदुओं और मुसलमानों द्वारा इकट्ठे मनाए जाते हैं।
एक फेसबुक संदेश काफी दिलचस्प है। उसमें लिखा है कि हिंदू-मुस्लिम एकता एक दूसरे के घरों में खाना खाने या
लिबास पहनने से नहीं आएगी। वह तभी संभव है:
(1) जब अल्पसंख्यक हिंदू, मुस्लिम-बहुल इलाके में बिना किसी डर के शांतिपूर्ण ढंग से रह सकें, बहुसंख्यक मुसलमान
अल्पसंख्यक हिंदुओं के धार्मिक-विश्वासों, उनकी खाने-पीने की आदतों को इज्ज़त बख्शें।
(2) जब अल्संख्यक मुसलमान हिंदू-बहुल इलाके में बिना किसी डर के रहें और बहुसंख्यक हिंदू अल्पसंख्यक
मुसलमानों के धार्मिक विश्वासों और खान-पान की आदतों की इज्जत करें।
नेकी का सुनहरा उसूल
हज़रत ईसा का एक मशहूर उपदेश है--‘‘तुम दूसरे लोगों, से जो बरताव चाहते हो कि वह तुम्हारे साथ करें ठीक
उसी तरह का बरताव तुम दूसरों के साथ करो।’’ इसी को हज़रत ईसा का सुनहरा उसूल कहा जाता है। यह सुनहर
उसूल सब धर्मों की किताबांे में मिलता है। इसके दो पहलू हैं।
मुहम्मद साहब की एक मशूहर हदीस है--
‘‘सब के बढ़ कर ईमान यही है कि तुम जो चीज अपने लिए पसन्द करो वही सबके लिए पसन्द करो, और जिससे
तुम्हें तकलीफ होती हो उसे और सब के लिए भी तकलीफ की चीज़ मानो।’’
महर्षि व्यास ने जिसे ‘‘धर्मसर्वस्वम्’’ यानी ‘पूरा धर्म’ कहा है उसी को मुहम्मद साहब ने ‘‘अफ़जुलुल ईमान’’ यानी
‘सब से बढ़ कर ईमान’ बताया है।
भागवत पुराण में लिखा है--
‘‘यह धर्म कभी नहीं बदल सकता और अच्छे लोग हमेशा इस पर अमल करते हैं कि हमें दूसरे लोगों के दुख
में दुख और उनके सुख में सुख महसूस करना चाहिए।’’
महात्मा बुद्ध ने इसी उसूल को ‘समान आत्मता’ का नाम दिया है।
हितोपदेश में लिखा है--
‘‘आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पंडितः।’’
यानी--जो सब प्राणियों को अपनी ही तरह देखता है वही पंडित है।
बुद्ध धर्म की मशहूर किताब ‘धम्मपद’ मंे लिखा है कि--
‘‘तकलीफ से सब लोग बचना चाहते हैं, जिन्दगी सब को प्यारी है, उन सबकी तरह ही तू भी है। इसलिए अपने
से दूसरे का हाल समझ कर न किसी की जान ले और न किसी को नुक़सान पहुँचा।’’
इंजील में लिखा है--‘‘अपने पड़ौसी के साथ वैसा ही प्यार करो जैसा तुम अपने साथ करते हो।’’
ख्8,
पारसी धर्म की किताब ‘गाथा’ में लिखा है--‘‘जो बात सबके लिए और हर किसी के लिए अच्छी है वही मेरे लिये
अच्छी है। इसलिए जो मैं अपने लिए चाहूँ वही सबके लिए चाहूँ। यही सच्चा धर्म है।’’
धर्म का दूरूपयोग
हमारा संविधान कहता है कि भारत देश धर्मनिरपेक्ष है। अर्थात् चुनी गयी सरकार का कोई धर्म नहीं होगा। कानून
और न्याय-व्यवस्था सभी के साथ समान व्यवहार करेगी। नागरिकों को अपने धर्म के पालन और उसके तरीके से जीवन
जीने का अधिकार भी संविधान देता है। जिसमें यह भी निहित है कि हमें दूसरों के धर्म का भी सम्मान करना चाहिए।
हमारे देश में विविध धर्म हैं, स्वाभाविक ही उनके आराध्य, ग्रंथ, पूजा--पद्धतियां आदि-आदि भिन्न हैं। धर्माें के भीतर
के विभाजन भी है। भाषा, रंग, नस्ल की विविधता भी है। इस विविधता को लोकतंत्रा के धागे से जोड़ रखा गया है।
कई ताकतें हैं, जो उसे बार-बार तोड़ने की कोशिशें करती रही हैं।
धीरे-धीरे धर्म, जीवन-पद्धति न रह कर व्यवसाय बनते गये हैं। जिससे उनकी दृष्टि संकुचित होती गयी है। ऐसी
संकीर्णता, किसी भी धर्म की हो, समाज के लिए नुकसान देने वाली ही होती हैं। इस तरह की संकीर्णता ही ‘सांप्रदायिकता’
हैं। अंग्रेज़ों ने ‘फूट डालो, राज करो’ की नीति अपना कर राज किया था। जिससे सांप्रदायिक घृणा बढ़ी। धर्म के
आधार पर दो देश बनाने की मांग उठी। इसी से इस्लाम के आधार पर पाकिस्तान अस्तित्व में आया। भारत के नेताओं
ने अधिक संतुलित दृष्टि अपनाई। धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्रा को स्वीकार किया। स्वाभाविक ही यह, उन शक्तियों को रास
नहीं आता, जो धर्म के कट्टरपन में भरोसा करते हैं या दूसरे धर्मों की अपेक्षा अपने धर्म को श्रेष्ठ समझते हैं। ‘धर्म’
को ही ‘संस्कृति’ बताने की चालाकी करते हैं। अगर धर्म ही देश को जोड़े रखने का आधार होता तो 1971 में पाकिस्तान
दो टुकड़ों में क्यों बंटता? वह बंटवारा धर्म नहीं, भाषा के मुद्दे पर हुआ था।
सांप्रदायिकता, किसी भी धर्म की हो, बुरी होती है। वह चाहे अल्पसंख्यकों की हो या बहुसंख्यकों की। बहुसंख्यक
की सांप्रदायिकता के मामले में यह खतरा बना रहता है कि उससे पोषित राजनीतिक दल के राजसत्ता में आने के अवसर
अधिक होते हैं। संभव है कि ऐसे विचारों वाले दलों या लोगों के सरकार में आ जाने पर हमारे संविधान के मूल
आधार को तोड़ने-मरोड़ने के काम होने लगे। देश के भीतर इस समय ऐसा संकट सामने है। पुरातनवादी कट्टरपंथ
अपने नंगे रूप मंे है। जिसका स्वतंत्राता, समता और बंधुता के लोकतांत्रिक-मूल्यों में कोई भरोसा नहीं है। प्रगट तौर
पर अपने पिछड़ेपन के बावजूद उसका दावा रहता है कि वह सर्वश्रेष्ठ है। आज किसी भी क्षेत्रा में जो नयी खोजें या
आविष्कार हो रहे हैं, हमारे यहां हज़ारों वर्षों पहले ही ढूंढ़े-किये जा चुके हैं। ऐसा कट्टरपंथ सड़े-गले पुराने मूल्यों को
फिर से लागू करना चाहता है। वह आधुनिकतावादी जीवन-मूल्यों का विरोधी होता है।
अपनी बातें मनवाने के लिए वह दावा करता है कि वह ईश्वरी-इच्छा को पूरा करने की कोशिश में है। इसी के
चलते असंख्य अंधभक्त बिना कोई प्रश्न पूछे उसके साथ हो जाते हैं। इस तरह का उभार, आज अलग-अलग स्थानों
पर अलग-अलग धर्मों में दिखाई दे रहा है। इससे देश-दुनिया की उन्नति बाधित होती है। भिन्न धर्मावलंबियों में अलगाव
भी बढ़ता है।
भारत एक महत्वपूर्ण प्राचीन-सभ्यता का पालना रहा है। कोई पांच हजार सालों से ही बाहरी लोगों का यहां आना-जाना
लगा रहा है। कभी व्यापार तो कभी यहां राज करने के लिए अलग-अलग युगों में अलग-अलग देशांे-धर्मों के लोग यहां
आए। उनमें से कुछ यहीं बस गयें। कुछ लूटपाट लौट गये। इस तरह के आवागमन से यहां की संस्कृति बनती-संवरती
गयी। अलग-अलग धर्मों के प्रचारक यहां आए और आक्रामक भी। उनके साथ विविध दर्शन, दस्तकारी, कलाकारी के
नये रूपों और तत्वों और भाषाओं का मेल-जोल हुआ। इससे ही हमारी बहुत प्रसिद्ध समावेशी संस्कृति का निर्माण हुआ
है। आज यह बता पाना मुश्किल है कि कौनसा तत्व किस की देन है।
आज किंतु उस मिली-जुली संस्कृति के विविध रंगों में अलगाव पैदा करने की कोशिशें की जा रही हैं। उसे एक
रंगी बना देने के प्रयास हो रहे हैं। कोई एक विचार या जीवन-पद्धति ही श्रेष्ठ है और बाकी दोयम दर्जे की, यह कुप्रचार
ज़ोरो पर है। इसी से सांप्रदायिक तनाव पैदा होता है। अशांति जन्म लेती है। जो देश के विकास को रोकती है।
ख्9,
राष्ट्रभक्त और देशप्रेम के नाम पर आये दिन किसी न किसी विचारवान, प्रखर, प्रतिष्ठित, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक
व्यक्ति को अपमान या हमले का शिकार बनाया जाता है। पिछले तीन वर्षों में दाभोलकर, पानसरे और कलबुर्गी जैसे
तर्कवादियों, आंदोलनकारी-लेखकों की खुलेआम हत्याएं कर दी गयी हैं। ऐसी घटनाओं के विरोध मंे अनेक वैज्ञानिकों,
लेखकों, कलाकारों, फिल्मकारों, नाटककारों, इतिहासकारों आदि ने आवाज़ उठाई है। कुछ ने प्रतिष्ठित सम्मानों को लौटा
कर अपना विरोध दर्ज कराया है।
जन विज्ञान आंदोलन होने के कारण ये सारी स्थितियां हमारे लिए गंभीर चिंता का कारण है। हमारे आंदोलन की
मुख्य भूमिका ही है, विवेक और तर्क की स्थापना। समाज में व्याप्त अंधविश्वासों, रूढ़ियों अवैज्ञानिक विचारांे को नष्ट
कर लोगों को शिक्षा और वैज्ञानिक-सोच के द्वारा जागरूक बनाना हमारी प्राथमिकता रही है। इसके लिए उपयोग किया
है। जनविज्ञान आंदोलन ने समय-समय पर देशव्यापि जत्थे निकाले हैं। अभियान चलाए हैं। इसके लिए नाटकों, कविताअें,
फिल्मों, गीतों, पोस्टरों और चित्रों आदि का सार्थक प्रयोग किया गया है।
आज जो कुछ हो रहा है, उसे देख कर चुप नहीं बैठा जा सकता। जनविज्ञान आंदोलन के विविध संगठन अपने-अपने
क्षेत्रों में तो अलगावकारी कोशिशों को पूरा विरोध कर ही रहे हैं, देश के स्तर पर भी ऐसे प्रयास जारी है। हमें एकताबद्ध
होकर एक साथ देश और समाज केा तोड़ने वाली कारवाइयों का सामना करना है। हमारे ही आंदोलन ने यह नारा दिया
था, जिसे फिर से याद करने और जिसके लिए एकजुट होने की आवश्यकता है--
सब रंगों का समोवश,
हमारा देश, हमारा देश।
भारतीय संस्कृति में उर्दू का योगदान
गहरे तक जड़ जमाये यह धारणा बहुत आम है कि उर्दू केवल मुसलमानों की भाषा और और इसका निर्माण और
विकास मुस्लिम सामंतों-साम्राज्यवादियों के संरक्षण में हुआ तथा वह मुख्यरूप से सामंती-शासक वर्गाें, शहरी उच्च व मध्
यवर्ग की भाषा है तथा लोक जीवन तथा लोक संस्कृति से उसके रिश्ते व सरोकार अति सीमित या नहीं के बराबर
हैं।
उर्दू की उत्पत्ति मध्यकाल के एक खास दौर में ऐतिहासिक सामाजिक जरूरत के रूप में हुई, यह ज़रूरत थी विभिन्न
जातीय-क्षेत्राीय अपरिचित मानव समूहों के बीच परस्पर संवाद की ललक। श्री सैयद एहतिशाम हुसैन ने ‘‘उर्दू साहित्य
का इतिहास’’ में इस मेलजोल की बात को यूँ लिखा है: हिन्दुओं और मुसलमानों के हृदय में मेल-मोहब्बत के स्रोत
फूट पड़े, जिन्होंने कला और धर्म सबको लपेट में ले लिया और उनके भावों, विचारों और कल्पनाओं को एक दूसरे के
समीप कर दिया। जब आचार-विचार की सीमाएं इस प्रकार निकट आ गयी हों, तब तक ऐसी भाषा के जन्म लेने की
संभावनाएं दूर नहीं रह जाती जो मिले-जुले सामाजिक जीवन का चिह्न हों।’’
श्री सैयद एहतिशाम हुसैन ने उर्दू की उत्पत्ति का सम्बन्ध सूफियों के धर्म प्रचार से भी जोड़ा है। वास्तविकता यह
है कि उर्दू उन बहुत कम भाषाओं में विशिष्ट तथा विकास की दृष्टि से शायद अकेली ऐसी भाषा है, जिसके उद्भव
व निर्माण की आधार भूमि तैयार करने में विद्वानों, शास्त्रिायों, पूजा स्थलों, पुरोहितों, गढ़ों-मठों, राजदरबारों, प्रासादों तथा
संरक्षणवादी शक्तियों की भूमिका बहुत सीमित रही, सच पूछिये तो उसके निर्माण की प्रक्रिया मैदानों, बाजारों, मेलों,
मण्डियों, खानकाहों और भटियारखानों में आरंभ हुई, यह वहीं पली-बढ़ी और जवान हुई।
उर्दू ने स्थानीय लोक भाषाओं में बहुत आदान-प्रदान किया। लोक भाषाओं के वे सत्तर-अस्सी हजार शब्द जो उर्दू
के निर्माण व समृद्धि का साधन बने तथा वो हज़ारों-हज़ार तुर्की, अरबी, फारसी भाषाओं के शब्द जो सुदूर अदृश्य अंचलों
तक फैली विविधता भरी लोक जीवन व संस्कृति का अंश बने, आज भी स्वीकृत व सुरक्षित हैं।
फिराक गोरखपुरी ने लिखा है: ‘‘कितने अरबी-फारसी शब्द हमारी बोली में आ चुके हैं, इसका अनुमान इसी बात
से किया जा सकता है कि बच्चों के लिए जो संक्षिप्त शब्दाकोश ‘‘बाल शब्दसागर’’ के नाम से कई वर्ष हिन्दी के सुप्रसिद्ध
साहित्यकार एवं समालोचक बाबू श्याम सुन्दरदास ने प्रकाशित किया था, उसमें लगभग चार-पांच हज़ार अरबी, फारसी
ख्10,
शब्द सम्मिलित हैं।’’ (उर्दू भाषा और साहित्य) या लोकगीतों- लोक कहावतों में ये शब्द संयोजन इस्तेमाल करते हुए
कि--
खोजखबर, गाली गुफ्तार, गांठगिरह, रंग रूप, मरहमपट्टी, आबोदाना, धनदौलत, राजमहल, महल दो महले, पट्टेबाज,
राम रहमी, नोकझोंक, दंगाफसाद, बाल बच्चे, हलवापूरी, नमक हराम, पायजामा, पेशाब, कबूतर, फाख्ता, बुलबुल इत्यादि
बोलते हुए और हलवा सोहन, गुलाब जामुन, बालूशाही-गुलकंद, नमकपारे, जलेबी खाते हुए यह महसूस कर पाना अति
कठिन होता है कि बाहर से आये हुए शब्द, शब्द संयोजन, मुहावरे, वस्तुएं पदार्थ जीवन में कितने गहरे तक उतर चुके
हैं। जैसे हिन्द, हिन्दी, हिन्दुस्तान भारतीय शब्द नहीं हैं अब इसपे आसानी से कौन यक़ीन करेगा। सैद्धांतिक शिल्प में
विचार करें तो उर्दू से जुड़ी संस्कृति ने भारतीय लोक जीवन के बहुत बड़े खण्ड को बहुत गहरे तक प्रभावित किया
या यों कहें कि उर्दू प्रभाव के बिम्ब, जीवन के लगभग सभी पक्षों में देखने को मिल जाते हैं। यहां तक कि धार्मिक
विश्वास, अध्यात्मिक परंपरा तथा मनोरंजन व अभिव्यक्ति के साधनों में भी। उसने अभेदी दुर्गांे, गढ़ों-मठों, चौपालों और
देवालयों तक पहुँच बनायी। एक बड़े भूखण्ड के लोक जीवन में स्थायी तत्व की हैसियत प्राप्त कर चुके गुरुगं्रथ साहिब
तथा राम चरित मानस को भी उदाहरण के रूप में लिया जा सकता है।
उत्तरी भारत के किसी भी शहर में चले जाएं और आमजन की बातचीत में प्रयुक्त शब्दों पर गौर फरमायें:--
दुकानदार, सब्जीवाला, मकान मालिक, किरायेदार, कारीगर, मिस्त्राी, जमादार, बावर्ची, चपरासी, साहिब, शादी, बर्बादी,
बुखार, इलाज, दवा, दारू, कारोबार, दफ्तर, कचहरी, नाश्ता। मुस्लिम समाज से सम्बन्धित अगर किसी एक चीज ने
उर्दू को जिं़दा रखा है, वह है हिंदी सिनेमा। मुस्लिम समाज से संबंधित फिल्मों जैसे मुगले आज़म, निकाह, पाकीज़ा,
आलम आरा को छोड़ भी दें, फिर भी हिंदी फिल्मों के शीर्षकों में अधिकर उर्दू के लफ़्ज इस्तेमाल होते हैं: आवारा,
साहिब बीबी और गुलाम, फर्ज़, खामोशी, सफर, मुकद्दर का सिकंदर, नमक हराम, बावर्ची, शोले, अंदाज़ अपना अपना,
कयामत से कयामत तक, इश्क इश्क इश्क, वक़्त, बाज़ी, मासूम, दीवाना, आज की आवाज, दुश्मन, दिल से, मस्त,
हम तो मुहब्बत करेगा...इस लिस्ट में अनगिनत नाम जोड़े जा सकते हैं, यह बात छोटी सी है परंतु निष्कर्ष यह निकलता
है कि सरकारी भाषा, आल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन की भाषा या यूं कहें कि ‘राष्ट्रीय भाषा’ का हिंदी सिनेमा पर
कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा है। यह केवल फिल्मों के शीर्षक तक ही सीमित नहीं है। स्क्रीन प्ले, गीत इत्यादि उर्दू में
ही लिखे जाते हैं।
केवल इश्क और मुहब्बत नहीं, यह वह भाषा है जिसमें देश की आज़ादी के नगमें भी गाये जाते हैं:
कर चले हम फ़िदा जान-ओ-तन साथियो
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो।
लता मंगेशकर का मश्हूर गीत जसे सुनकर नेहरू रो पड़े थे:
ऐ मेरे वतन के लोगों
ज़रा आँख में भर लो पानी
जो शहीद हुए हैं उनकी
ज़रा याद करो कुर्बानी
वतन, शहीद, कुर्बानी, फिदा, जान-ओ-तन ऐसे शब्द हैं जिनका भावनात्मक वज़न किसी भी भाषा के समानार्थी
शब्द से ज़्यादा है।
यही वह भाषा है जिसमें हिंदी फिल्मों के हीरो-हीरोईन अपने प्यार का इज़हार करते हैं।
मेरे महबूब कयामत होगी
आज रूसवा तेरी गलियों में मुहब्बत होगी
(मि. एक्स इन बॉम्बे)
ख्11,
साहित्यिक हिंदी मंे वो बात नहीं आ पाती। जो बात दिल, खून और किस्मत में है, वह हृदय, रक्त और भाग्य
मंे नहीं।
ऐसे हज़ारों उदाहरण दिये जा सकते हैं परंतु सवाल यह है कि यह हुआ कैसे? हिंदी सिनेमा का इतिहास देखें
तो पता चलता है कि इसकी जड़ें 1870 के पारसी थियेटर में थीं और उस थियेटर की भाषा थी उर्दू।
यह अकारण ही नहीं था कि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जो हिंदी में वैकल्पिक थियेटर की योजना बना रहे थे, पारसी थियेटर
के बड़े आलोचक थे।
दूसरा कारण यह था कि ब्रिटिश राज मंे उत्तरी भारत में उर्दू प्रशासन की भाषा बनी। पहले यह फारसी थी। भारतीय
सेना, कानून और न्याय की यही भाषा थी। जब क्रिश्चियन मिशनरी उत्तरी भारत आये तो उन्होंने बाइबल का अनुवाद
सबसे पहले उर्दू में किया। हिंदी में बाइबल बहुत देर बाद आई।
उर्दू में बेशक कुछ कमियां रही हों परंतु इसमें कुछ ऐसे अरबी-फारसी शब्दों का संगम हुआ जो थियेटर, सिनेमा
के पात्रों को एक ताकत देते थे, उनकी आवाज़ में एक खास कशिश पैदा हो जाती थी। यह बात हिंदी में न हो सकी
जिसकी जड़ें संस्कृत में थी और वह जो आम जन की भाषा न थी।
प्रशासन की भाषा होने के कारण सरकारी कामकाज और आम जनता तक सरकारी निर्णय इसी भाषा मंे होने लगे।
इसलिए सिनेमा ने इसी भाषा को अपनाया।
हिंदी सिनेमा में सबसे लोकप्रिय सीन कोर्ट के होते हैं। इन कोर्ट सीनों के बल पर कई फिल्में हिट हुईं। कोर्ट में
जज पूरा अंग्रेज लगता है। वकील स्टार्च लगे कोट पहनते हैं, सारा वातावरण ऐसा लगता है मानो ब्रिटिश राज अब
भी चल रहा है परंतु जो भाषा फिल्म के कोर्ट-सीन में बोली जाती है वह उर्दू है। जो अंग्रेज़नुमा जज है उसे मीलार्ड
कहते हैं और यह मीलार्ड बार बार चिल्लाता है--आडर, आडर ;व्तकमतए व्तकमतद्ध । कोर्ट रूप में जो ड्रामा होता है, उसे
देखें, यहां उर्दू सर चढ़कर बोलती है--मुजरिम, सबूत, चश्मदीद गवाह, कत्ल, वकील, इंसाफ, मासूम, गुनाहगार, बयान--ये
शब्द गूंजते हैं और अंत मंे जज अपना निर्णय देता है--दफा नम्बर...ताज़ीरात-ए-हिंद के तहद....और फिर सज़ा, उम्रकैद
या सज़ा-ए-मौत। और अगर हीरो बेकसूर साबित हो तो उसे ‘बाइज्जत बरी’ किया जाता है।
इतिहास केवल पंडों-पुजारियों, उच्चवर्णों, संस्कृति के कब्जादारों, चमचमाते योद्धाओं और मंत्रियों, नौकरशाहों,
वित्तस्वामियों या डींग हांकने वालों की देन नहीं है बल्कि उसके सर्जक वे लोग हैं जो पशुओं की तरह श्रम
करते हैं, पिछड़े हुए हैं, निरक्षर और सामान्यजन हैं, जो उत्पादन में लगे हैं।
---डी.डी. कोसाम्बी
बंगाल के एक दुर्भिक्ष के दौरान विवेकानंद से कलकत्ता के धनाढ्य वर्ग के कुछ लोग मिले और उनसे गायों को बचाने
के लिए कुछ करने को कहा। स्वामीजी ने उनसे कहा कि चारों ओर हजारों लोग मरणासन्न हैं, इस वक्त उनको बचाने
की प्राथमिकता है, उनके लिए कुछ करिए, गायों की चिंता छोडिये। इस पर सेवाभावियों ने स्वामीजी से कहा, ‘‘आप
ऐसा कैसे कह सकते हैं, गाय तो हमारी माता है, उसे बचाना हमारा पहला धर्म बनता है।’’ इस पर विवेकानंद की
तल्ख टिप्पणी मशहूर है ---‘जैसी मां, वैसे ही उनके बेटे’! सौ साल बाद भी काफी ऐसे लोग हैं जिनकी प्राथमिकताएं
नहीं बदली हैं। -सुदीप बनर्जी -सुदीप बनर्जी -सुदीप बनर्जी
वाक्स -1
वाक्स -2
ख्12,
उ.प्र. में गणित ऐसे सिखाया जाता रहा है उ.प्र. में गणित ऐसे सिखाया जाता रहा है उ.प्र. में गणित ऐसे सिखाया जाता रहा है
(कुछ प्रश्नों के नमूने)
गणित ज्ञान, भाग-1
● उ. प्र. में लोकमान्य गंगाधर तिलक जन्म शताब्दी समारोह 8606 स्थानों पर, पं. जवाहरलाल नेहरू जन्म शताब्दी
समारोह 8915 स्थानों पर तथा डा. हेडगेवार जन्म शताब्दी समारोह 13,6,655 स्थानों पर सम्पन्न हुए। किस
महापुरुष के जन्म शताब्दी समारोह अधिक स्थानों पर हुए? (पृष्ठ 14)
● हरिद्वार कुम्भ मेले पर 40,255 साधू, 8625 प्रशासनिक व्यक्ति तथा 126870 श्रद्धालु एकत्रा हुए। कुल कितने व्यक्ति
मेले में थे? (पृष्ठ 22)
● बद्रीनाथ यात्रा के लिए एक यात्राी का टिकट 250 रु. है। मनोज के घर से जाने वाले 6 सदस्यों का कितना किराया
लगेगा? (पृष्ठ 152)
● रामायण की 110 चौपाई प्रतिदिन पढ़ने पर 12980 चौपाईयां कितने दिनों में पूरी-पूरी समाप्त हो जायेंगी।
(पृष्ठ 53)
● रामायण की पुस्तक में 1262 पृष्ठ, हैं। यदि रोहित की माताजी 12 दिन में रामायण का पाठ समाप्त करना चाहती
हैं तो कितने पृष्ठ, नित्य पढ़ने चाहिएं।(पृष्ठ 64)
● रणजीत की माता जी ने 21 किग्रा. चूरमे का प्रसाद बनाया। उन्होंने 1 किलो 100 ग्राम गणेश जी को तथा
5 किलो 555 ग्राम हनुमान जी को भोग लगाया। अब उनके पास गरीबों को बांटने के लिए कितना प्रसाद बचा?
(पृष्ठ 128)
● एकता बहिन की माता जी ने कृष्ण जन्माष्टमी पर 2 लीटर चरणामृत तैयार किया। उन्होंने 300 मि.ली. दूध 100
मि.ली. शहद तथा 150 मिली. दही उसमें मिलाया तो कितना गंगाजल उन्होंने उपयोग किया? (पृष्ठ 137)
● मां सरस्वती के चित्रा पर पर्दा लगाने में 2 मीटर 15 से.मी. कपड़ा लगता है। यदि इतने बड़े 8 चित्रों पर पर्दा
लगाना हो तो कितना कपड़ा बाजार से लाना चाहिए? (पृष्ठ 153)
● अशोक के मामाजी ने 2005 रु. शिशु मंदिर को, 309 रु. अनाथालय को, 75 रु. गौशाला को तथा 51 रु. मंदिर
को दान दिया तो उन्होंने कुल कितने रुपये दान दिये?(पृष्ठ 192)
● हनुमान जी के मंदिर के आंगन का फर्श बनवाना है यदि यह 9 मीटर-वर्गाकार है तथा 1 वर्ग मीटर फर्श में 7.
25 रु. लगते हैं तो कुल कितना खर्च होगा? (पृष्ठ 135)
यह स्पष्ट है कि इस तरह किसी एक विशिष्ट धर्म को ही बढ़ावा दिया गया है। शिशु मंदिरों में भी इसी तरह
की पाठ्य पुस्तकें पढ़ाई जाती हैं।
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