गुरुवार, 31 मई 2018

संसदीय राजनीति और उसके नेता

Posted: 27 May 2018 11:42 PM PDT
दलित साथियों को स्पष्ट रहना चाहिए कि सुश्री मायावती संसदीय राजनीति कर रही हैं। संसदीय राजनीति में कोई भी नेता जनता का भला नहीं कर सकता है। फिर सुश्री मायावती तो अवसरवाद की राजनीति के लिए उद्भूत नेता हैं। न सुश्री मायावती, न मोदी, न कोई और नेता संसदीय राजनीति से अपनी कौम का कुछ भी भला नहीं कर सकता है। संसदीय राजनीति का गठजोड़ धर्म और पूँजीवाद से होता है इसलिए वह जनता को अज्ञानता में रखता है तथा आपस में बाँटता है। किसी भी संसदीय पार्टी को अपना समझना जनमत को अंधेरे में ढकेलना है। जनता की यह मानसिकता कि अमुक मेरी पार्टी है और इसके सत्ता में रहने से मेरा भला होगा-ही संसदीय पार्टियों और उसके नेताओं की जीत है जबकि सभी पार्टियां और सभी नेता अपनी जाति और अपना धर्म कहकर ख़ास जातियों को बेवकूफ़ बनाती हैं।

अधोलिखित प्रतिक्रिया मेरे उपर्युक्त वक्तव्य को लेकर है। इस प्रतिक्रिया से दलित वैचारिकी की अपरिपक्व शैली देखी जा सकती है। लेखक लिखता क्या है और पाठक समझता क्या है। मैंने जब संसदीय राजनीति की कमियों की तरफ इंगित किया तो मेरे बुद्धिजीवी दलित पाठक ने सर्वप्रथम एक प्रश्न किया जो मेरे लेख से सम्बंधित नहीं है। उसका प्रश्न उसकी मानसिकता के उस स्तर का है जहाँ वह संसदीय राजनीति के इतर और कुछ चिंतन नहीं कर सकता है अथवा अभी तक इससे आगे किसी और स्तर पर सोचा ही नहीं है। उसका प्रश्न है, "क्या आप लोग मताधिकार का प्रयोग नहीं करते हैं?" अब इसका क्या जवाब दिया जाय। क्या यह कह दिया जाय कि हां, मैं वोट में विश्वास नहीं रखता हूँ। वैसे भी यह बात सही है कि भारत जैसे देश में जहाँ बूथ कैपचरिंग होती रही है, अब मशीन में ही फ्रॉड कर लिया जाता है, और जनता को जाति और धर्म में गुमराह करके वोट डलवाया जाता है, माफिया अपने आतंक से मानसिक रूप से प्रताड़ित करके वोट ले लेता है, ऐसे में वोट का क्या वैल्यू है? आगे मेरे पाठक ने आरोप लगाया, "ऐसा विश्लेषण जनता को गुमराह करने वाला होता है।" विमर्श को गुमराह कहना अनुचित है। वैसे मैंने संसदीय राजनीति के नेताओं के कमजोरियों की चर्चा की है, न कि किसी खास नेता व खास पार्टी की बुराई की है। ये हैं दलित बुद्धिजीवी। इसीलिए मैं दलित बुद्धिजीवियों को शैशवावस्था का प्राणी कहता हूँ। ये न डॉ. आम्बेडकर को पढ़ते हैं, न डॉ. आम्बेडकर को समझते हैं। इनको "जय भीम" कहने की लत लग गई है। ये दलित खोल से निकलना नहीं चाहते हैं। जब कोई दलित यह कहता है, "लोकतांत्रिक देश में सामाजिक क्रांति के साथ राजनीतिक समझ और उसकी सही दिशा आवश्यक है।" तो इसका सीधा अर्थ यह होता है कि हम संसदीय लोकतंत्र में विश्वास करते हैं और 'समाजिक क्रांति' की अपेक्षा करते हैं जो संविधान के विपरीत अपराध है। दूसरी बात यह भी कि हम यह भी मानते हैं कि लोकतंत्र ने अभी भी 'राजनीतिक समझ' और 'राजनितिक दिशा' सुनिश्चित नहीं किया है। यह सही है, "भारत मे संवैधानिक अधिकार राजनीतिक रास्तों से ही बने हैं और बचाये जा सकते है।" लेकिन, किसी भी चिंतक को यह बात भली भांति समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र में बहुमत दल किसी भी संवैधानिक अधिकार को बदल सकता है ऐसा अधिकार संविधान किसी भी बहुमत दल की राजनैतिक पार्टी को उपलब्ध कराता है। अभी तक भारतीय संविधान में 99 संसोधन किए जा चुके हैं, वह इसी संविधान और उसकी प्रणाली का ही गुण-अवगुण है। यह भी सही है कि कोई दूसरी पार्टी अस्तित्व में आए तो वह नए कानून बना सकता है जो लोकहित में हो, लेकिन उसकी गारंटी उसके पदच्युत होते ही ख़त्म हो जाती है। इसलिए संसदीय लोकतंत्र में अधिकार बचाने की गारंटी भी अक्षुण नहीं है। कभी-कभी दलित चिंतक इतना स्वार्थी हो जाता है कि वह भी सदियों के संताप की तरह निर्णय ले लेता है और किसी आदर्श की अवहेलना करने लगता है। उसे उच्च नीति-नैतिकता और अदर्श ब्राह्मणों के प्रतिक्रिया में अच्छा ही नहीं लगता है। वह अपने चिंतन में इस तरह मुखरित हो उठता है, "मुझे समझ में नहीं आता है कि आज आदर्शवाद का चोला वो ओढ़ते है जो सदियों से पीड़ित रहे हैं और इतिहास गवाह है कि जो आज पीड़ित है इनके पूर्वजों के आदर्शवाद के कारण ही धन, धान्य और राज चला गया। फिर से उसी आदर्शवाद की तरफ ले जाकर उन्हें हजारो सालों के दल दल मे धकेलने का प्रयास चाहे-अनचाहे न किया जाय तो बेहतर होगा।" दलित ब्राह्मणों के दुराचारी वर्चस्व के कारण इतना पीड़ित है कि वह इनके प्रति बिल्कुल सहिष्णु नहीं होना चाहता है। वह बदला लेना चाहता है। दलित अपने वर्चस्व की स्थिति में खुद ही ब्राह्मण बनना चाहता है और ब्राह्मणों को सदियों तक शूद्र बनाकर प्रताड़ित करना चाहता है, छूत-विचार करना चाहता है। वह भूल जाता है कि ब्राह्मणों ने दलितों के साथ अमानवीयता का व्यवहार जरूर किया था लेकिन अमानवीयता के विरुद्ध मानवीयता ही धर्म है जो धारण करने योग्य होता है। डॉ. आम्बेडकर ने बौद्ध धर्म अपना कर महान मानवता का पाठ पढ़ाया था। वे एक व्यक्ति एक मूल्य का सिद्धांत लागू करना चाहते थे। वे लोकतंत्र चाहते थे। वे समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व चाहते थे। वे निजी संपत्ति का उन्मूलन चाहते थे। यह सब एक बड़ा आदर्श है। बिना आदर्शवादी हुए हम ऐसा समाज नहीं निर्मत कर सकेंगे।

इस विश्लेषण से आम लोगों में तर्क की क्षमता पैदा होती है और वे अपने मन की इक्षित बातें इस फ्रंट पर आसानी से रख लेते हैं तथा जनमानस में भी चर्चा करते हैं जिससे राजनीति का यथार्थ और नेताओं के निहितार्थ स्पष्ट होने लगते हैं। मेरे वक्तव्य सिर्फ थीसिस हैं। जनता के पास उसकी एंटी थीसिस मौजूद है जो कालान्तर में सिन्थिसिस बन जाती है। इसलिए किसी भी मतान्तर से डरने की जरूरत नहीं है।

सिर्फ़ एक दलित की फ़ालतू दौलत दिखाने से जातिवाद की कुंठा प्रकट होती है जबकि आवश्यकता है इस तरह के हर पार्टियों के प्रत्येक नेताओं के इनकम के स्रोत को उजागर किया जाय। कांग्रेस के पंडित सुखराम देश के पहले उदाहरण बने। आज सभी नेताओं का लक्ष्य धन-दौलत इकठ्ठा करना है। जाति और धर्म की बात बेईमानी है। वर्तमान राजनीति का चरित्र ही ऐसा है कि कोई भी नेता दुश्चरित्र है। जब हम किसी जाति के नेता पर हमलावर होते हैं तो हम अपनी जाति की कुंठा दिखाते हैं। इस तरह के अप्रोच हमें जातिवादी नफ़रत से निकलने में मदद नहीं करते हैं बल्कि एक दूसरी तरह से हम जातिवाद के शिकार हो जाते हैं। जब भी हम उदहारण दें जातिवाद की झलक न हो। नहीं तो हम पर भी वही तोहमत लग जाएगी। जब हम दूसरों को रास्ता दिखाते हैं तो उससे पूर्व मेरे अंदर से वह गलतियां ख़त्म होनी चाहिए।

जब कोई अतिवादी यह कहता है, "दलित भले ही मायावती संसदीय राजनीति कर रही है लेकिन जिस समाज के लिए कर रही हैं उनमें दृढ़ता और आत्मविश्वास की बृद्धि होती है।" तो वह स्वयं को जातिवाद के फ्रेम में रहकर चिंतन करता है। लेकिन, यदि बाबा साहब के विचारों की पूर्ति पर ध्यान दिया जाता रहे तो आंबेडकरवाद का विजय हो जाएगा और ब्राह्मणवाद की हार निश्चित हो जाती। इससे कितनों का मनोबल ऊंचा होगा? आप को पता होना चाहिए कि अभी भी 27 करोड़ दलित निरक्षर और भूमिहीन हैं। उनके लिए क्या हो रहा है और कौन कर रहा है? जब हम दलितों से इस तरह का संवाद बनाते हैं तो वह सरकार की तरफ से अपने मित्र शक्तियों पर हमलावर हो जाता है। यहाँ भी दलित तर्क शक्ति की जरूरत नज़र आती है। वह कहता है, "यह कहना कि कुछ नहीं हो रहा बेमानी होगी। जिस गाँव से हम तालुक रखते थे, वहाँ पहले सड़क नही थी, स्कूल नहीं था। आज पक्की सड़क है, स्कूल है। आज 27 करोड़ दलित निरक्षर है तो कारण सिर्फ आप हम और वह तमाम लोग हैं जो आगे तो बढ़ गए पर उनकी तरफ मुड़ कर नहीं देखते। गाँव से शहर आकर मकान बनवा लिया। अपने बच्चों को पढ़ा लिया। बस, यही मानसिकता निरक्षरता तो देखता है पर वह निरक्षर क्यों है इसके मूल मे नहीं जाती। अगर हमारे बच्चे साक्षर
हो रहे हैं तो वह निरक्षर न रहें इसके लिए आपका और हमारा योगदान क्या रहा?" जब हम संसदीय राजनीति के असफलता की चर्चा कर रहे हैं तो दलित चिंतक व्यक्तिगत कर्तव्यों पर क्यों आकर टिक जाता है? क्या यह दलित बुद्धिजीविता की कमी के कारण ऐसा सोचता है या तर्क परंपरा में अपनी हेठी समझ कर कुछ भी तर्क देना शुरू कर देता है क्योंकि दलित निरक्षरता का कारण संवैधानिक मसौदा ही है जो दलितों का बौद्धिक वर्ग सोचता ही नहीं है। दलितों का बौद्धिक वर्ग सिर्फ अपने आरक्षण के लिए सतर्क और आंदोलित रहता है।

बहुत से दलित कहते है कि सुश्री मायावती की वजह से दलितों में दृढ़ता और आत्मविश्वास पैदा हुआ है। कोई शक नहीं कि आप और मेरे जैसे दलितों में दृढ़ता और आत्मविश्वास पैदा हुआ है लेकिन 27 करोड़ दलितों में सुश्री की वजह से आत्म विश्वास क्यों नहीं पैदा हुआ? क्या सुश्री मायावती को उनके लिए नहीं कुछ करना चाहिए? मेरा तो बस यह सवाल है कि संसदीय राजनीति में मायावती हो या कोई और सभी अपनी जातियों का बेहतरीन शोषण करते हैं। उनके लिए कोई भी संवैधानिक रास्ता सुनिश्चित करने की तकलीफ़ नहीं उठाते हैं।

दलित विमर्श में हमारे साथी हमलावर होकर पूछते हैं, "आप 27 करोड़ को छोड़ दीजये आप अपने गाँव जाईयेगा केवल अपने नाते रिश्तेदारों को देखियेगा कितने लोग आप की तरह शहर मे मकान बनाने मे सक्षम है, कितने मेदान्ता के कई चक्कर लगाने मे सक्षम है, और अगर नहीं है तो आपका क्या योगदान है कि वह भी सक्षम बनें।" मैं तो आप की इसी बात को उठा रहा हूँ। इसका जवाब हमें ढूढना है इसलिए अनेक राजनीतिक सवालों से टकराना है एवं तर्क पद्धति को विकसित करना है। लेकिन हमारे कई मित्र सवालों के हल खोजने के बजाय मुझसे या मेरे जैसों से भिड़ने की ठान लेते हैं। वहां सोचिए जहाँ से भला होना है। भला तभी किया जा सकता है जब हम उनके लिए क्रांतिकारी सिद्धांत सुनिश्चित कर एक क्रांतिकारी संगठन को विकसित करे। वह संगठन अपने कार्यकर्ताओं के साथ आंदोलन खड़ा कर सरकार को मजबूर कर दे कि शोषित-पीड़ितों के लिए हर आवश्यक भौतिक और नैतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कार्य संपादित करे।

दलित साथियों का एक सवाल हमेशा तीर-कमान की तरह तैयार रहता है कि बाबा साहब ने क्यों कहा था कि हम को पढ़े-लिखे लोगों ने धोखा दिया, क्योंकि दलित जातियाँ उनकी बात नहीं मान रही थीं और मनमानी कर रही थीं। आज भी दलित जातियाँ बाबा साहब की बात "जातिप्रथा उन्मूलन", "राजकीय समाजवाद", "एक व्यक्ति एक मूल्य", "लोकतंत्र", "आर्य कौन हैं", "पृथक निर्वाचन", "पूना पैक्ट" "संपत्ति का समानीकरण" "समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व" को उनके अनुसार नहीं मानती हैं। अपने-अपने तरह से राजनीति में उलझी हैं। दलित जातियाँ नाम बाबा साहब का जरूर लेती हैं, ब्राह्मणवाद का विरोध जरूर करती हैं लेकिन बाबा साहब की एक भी बात नहीं मानती हैं और न ब्राह्मणवाद के यथार्थ में विरोध ही करती हैं बल्कि दलित जातियाँ स्वयं ही अपने जाति का प्रमाण-पत्र बनवाकर ब्राह्मणवाद को मजबूत करती हैं। कहाँ है जातिवाद का विरोध?

भारत में हर व्यक्ति अपनी ही जाति का भला करने में लगा हुआ है और उसके नेता की राजनीतिक मजबूरी है कि वह जाति के नाते अपनी जाति का भला नहीं कर पाता है। सुश्री मायावती ने अपने ही गुरु रहे मान्यवर कांशीराम साहब के बहुजन के सिद्धांत को सर्वजन वैचारिकी में तब्दील कर दिया तथा स्वीपर को दी जाने वाली नौकरियों को सर्वजन को दे दिया। एससी/एसटी 89 का कानून 2007 में कमजोर कर सर्वजन को मुक्त कर दिया। फिर भी जानता ने अपनी जड़ मजबूत करने के लिए 2007 का चुनाव सुश्री मायावती के पक्ष में जिताया। जनता विमर्श करने का ऑप्शन खुला रखती है लेकिन अपनी ही रेड़ मारने वाले के पक्ष में वोट देती है जिससे उसकी जड़ कमजोर न होने पाए।

कभी-कभी कुछ पूर्वग्राह्युक्त साथी अच्छी बात के साथ असंतुलित बात भी कहते हैं। एक ऐसे ही साथी का मानना है, "जब कोई ये कहता है कि मैं अमुक जाति का नेता हूँ, तब ऐसा लगता है कि वह उस जाति विशेष का सामन्त है और वह जिसका नेता बन रहा है, वह जनता उसका गुलाम।" यह बात बहुत ही खूबसूरत है, बहुत ही तर्क संगत है। किंतु जब वह इसे स्पष्ट करने के लिए उदाहरण प्रस्तुत करता है तो उसके अंदर छिपी जातीय संस्कृति का अवशेष दिखाई पड़ने लगता है, जैसे की उसी व्यक्ति के उक्ति से यह बात समझा जा सकता है, " मायावती विकृत मानसिकता से ग्रस्त हैं। इनसे किसी का भी भला नहीं हो सकता है।" सवाल ये है कि अन्य नेता दूध के धुले हैं? जब आप नेताओं की कृतियों की बात कर रहे हैं तो मोदी और योगी को भला कैसे साबित कर सकते है जबकि वे भी इसी संसदीय राजनीति के सिपहसालार हैं? क्या बात है पांडेय जी, आप मोदी और योगी को बहुत आदर सहित उच्चारण कर रहे हैं? यही तो जाति के प्रति मोह है जब आप कहते हैं, " भला मोदी-योगी जी से भी नहीं हो सकता है।" उनके कार्यों को नकारते हुए भी उनके नाम में "जी" शब्द जोड़कर इज्जत बक्सते हैं। किसी भी व्यक्ति व नेता को इज्जत देना बुरी बात नहीं है लेकिन उसी देश, काल, परिस्थिति, पार्टी और राजनीति के किसी दलित को "विकृत" कहें और सवर्ण को "जी" कहकर संबोधित करें तो यह अनजाने ही सही सवर्णीय मानसिकता को प्रदर्शित करता है। संसदीय राजनीति की आलोचना करने वाला निश्चित ही पूँजीवाद विरोधी समाजवादी क्रान्ति का कायल होगा। वह संसदीय राजनीति के नेताओं को सामान रूप से गन्दा मानता है किंतु मनुष्य होने के नाते किसी भी तरह के अपशब्द से बचता है। आप ने लिखा है, "ये संक्रमण काल है।" निश्चित ये संक्रमण काल नहीं है। यह मरणासन्न पूँजीवाद का साम्राज्यवादी काल है। इस काल में अधिकतम मुनाफा कमाना पूँजीपति का उद्देश्य होता है। आप की अगली बात जरूर सत्य है कि, "इस समय कोई नेता नहीं दिख रहा है जो सामान्य जन के हित में कार्य करे।" एक बात और, इस समय सभी नेता अपनी जातियों को बेवकूफ बनाने के लिए पीएचडी करते हैं तथा अन्य कार्यकर्ताओं को भी अपनी जातियों को बेवकूफ बनाने की जुगत ढूढ़ने में लगाए रखते हैं। जनता जाति और धर्म के नशे में धुत उनकी बात मान लेती है। सुश्री मायावती की मानसिकता बिलकुल भी विकृत नहीं है, वह बहुत अच्छी तरह से सोच समझ कर अपने वर्ग के हितों की रक्षा करती है। कोई विकृत मानसिकता का व्यकि ऐसा नहीं कर सकता है।

यह पोलिमिक और वैविध्यपूर्ण और लाभदाई हो जाती है जब कोई साथी यह कहता है कि जाति और धर्म से जुडी बहसें संसाधन के स्वामित्व से जुड़े सवालों और बहसों से जनता का ध्यान डायवर्ट करती हैं जिसका सीधा फायदा पूँजीवादी व्यवस्था को होता है। आम जनता की समस्याएं वैसी की वैसी ही बनी रहती हैं। सवाल सिर्फ जाति के सम्मान और धार्मिक आस्था का नहीं है बल्कि रोटी, रोजगार और लोकतंत्र का है। परंतु दलित साथी हमेशा डॉ. आम्बेडकर, सुश्री मायावती, मा. कांशीराम, ब्राह्मणवाद, जातिवाद, बसपा और बामसेफ के इर्द-गिर्द ही रहता है। दलितों का मानना है कि यदि संसद पर कब्ज़ा कर लिया जाय तो दलितों की मुक्ति संभव है। ऐसा ही एक साथी का उद्धरण है, "Capture this temple of power for your emancipation." -Dr. B R Ambedkar। उनका वक्तव्य आगे भी है, "ये temple शब्द संसद के लिए ही आया है । स्पष्ट है राजनीति संसदीय ही होगी। पर, पता नही आप कौन सी दुनिया में रहते हैं। लोकतांत्रिक देश है तो संसद तो होगी ही।
वैसे आपने नोट किया होगा कि आप जैसे ही बहन जी के बारे में कोई बकवास लिखते हैं आपके सवर्ण मित्र तुरंत आपकी तारीफ़ शुरू कर देते हैं। बहन जी को मानसिक विकृत तक लिख देते हैं। आपसे पूछना चाहता हूँ जब भी वह शासन चलाती हैं तो आपको मानसिक विकृत लगती हैं क्या? उनके शासन काल में कहीं कोई दंगे की ख़बर ढूंढे नही मिलती, कोई भी व्यक्ति गलत कार्य करे तुरंत कार्यवाही होती है चाहे वो उनकी पार्टी का ही क्यों न हो। अपने ही लोगों को न बक्सना ये शायद आप लोगों की नज़र में मानसिक विकृति होगी। सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय की बात मानसिक विकृत ही कर सकता है। सलाम आपके लेख को और उन लोगों को भी जिन्होंने आपके लेख में अपने comments के द्वारा चार चांद लगा दिए । डॉ. आम्बेडकर ने "राज्य और अल्पसंख्यक" में लिखा है,

"In parliamentary politics, the majority party is able to change very good views and paragraphs, and this is also a failure of parliamentary politics." उसका हिंदी अनुवाद, "संसदीय राजनीति में बहुमत दल बहुत अच्छे मतों-अनुच्छेदों को बदल सकने का समर्थ रखता है, और यही संसदीय राजनीति का फैल्लुअर भी है।"-डॉ. आम्बेडकर। बहुत सुंदर दिखने वाला यह मंदिर कितने समय तक हमारे हाथों में रह सकता है? क्या उसे हाथों में रखने के लिए हम तानाशाही की तरफ बढ़ेंगे? निष्चित नहीं। फिर क्या करेंगे, कौन सा विकल्प खोजेंगे? डॉ. आम्बेडकर ने "State and minorities" में Vallume-l में पेज न.371 से संविधान का ड्राफ्ट लिखा है जिसे नेहरू और राजेंद्र प्रसाद की कंपनी ने माना ही नहीं-में वास्तविक संविधान का मसौदा लिखा है, को पढ़कर हम अपनी भावनात्मक गलतियों को शुद्ध कर सकते हैं और दलित समाज को वास्तविक परिवर्तन के लिए गाइड कर सकते हैं। सवाल है किसी अन्य साथी की बातों को गहराई से महसूस करने की और यह मानने की कि वह कहीं आप के बराबर अथवा आप से अधिक पढ़ता-लिखता व चिंतन करता है। संविधान सभा का गठन 11.5 उच्च सवर्णों, राजे-रजवाड़ों के वोट से हुआ है। आम जनता का कोई योगदान नहीं था। यह संविधान औपनिवेशिक सत्ता का प्रतिफल है। डॉ. आम्बेडकर साहब की संविधान सभा की स्पीच सुनिए या पढ़िए, आप की ग़लतफ़हमी दूर हो जाएगी। आप की नफ़रत दूर हो जाएगी। डॉ. आम्बेडकर साहब के संविधान का स्वरूप संसदीय नहीं, राजकीय समाजवाद का था लेकिन धूर्तों ने उनके ड्राफ्ट को स्वीकार न करके दलित जातियों को गुमराह कर दिया। संसदीय राजनीति में जीवन-यापन करना एक बात है और संसदीय राजनीति की खामियों को बताना दूसरी बात है। अन्य जातियों की तरह दलितों के अधिकार साथियों को संसदीय राजनीति अच्छी लगती है क्योंकि वह मानता है कि इस देश का संविधान दलितों के मशीहा डॉ. आम्बेडकर ने लिखा है। अब डॉ. आम्बेडकर ने लिखा है तो वह आलोच्य कैसे हो सकता है, वह गलत कैसे हो सकता है। वह संविधान को त्रुटिहीन मानता है। संविधान और संसदीय व्यवस्था दलितों के लिए पूज्य है। जब मैं या कोई अन्य संसदीय व्यवस्था पर चोट करते हैं तो अन्य भारतीय से अधिक दलित तिलमिला उठता है। दलित न डॉ. आम्बेडकर को पढ़ता है, न संविधान को पढ़ता है और न संसदीय व्यवस्था का मतलब ही समझता है। ये सभी चीजें उसके लिए आस्था का विषय हो गई हैं। आस्था में मनुष्य तर्क नहीं करता है। सुश्री मायावती प्रो दलित कहता है कि मैं मायावती के बारे में बकवास लिखता हूँ। अंधश्रद्धा का वह व्यक्ति यह नहीं समझ पाता है कि मायावती एक उदाहरण हैं, बातें तो इस व्यवस्था के सभी नेताओं की हो रही हैं। ये सही बात है कि जातिवादी मानसिकता से ग्रस्त सवर्ण किसी दलित लेखक के दलित नेताओं पर हमलावर होने से बहुत खुश होते हैं वो इसलिए जब हम अपनी ही जाति के लोगों पर वार करते हैं तो तमाशा देखने वाले और सीटी बजाने वाले ज्यादा मिल जाते हैं।
लेख पर कमेंट्स देखने से पता चलता है कि ये सभी जाति की मानसिकता से ग्रस्त हैं, पर सुश्री मायावती का नाम ले लेने से सभी सवर्ण मानसिकता के साथी भी लेख से सहमत जता रहे हैं । लेकिन, आप यह क्यों भूल जाते हैं कि जो काम सवर्ण कर रहा है वही कार्य करने के लिए आप मुझसे भी अपेक्षा करते हैं। आप भी चाहते हैं कि हम दलितों का ही पक्ष लें जैसे ब्राह्मण ब्राह्मणों का पक्ष लेता है। फिर यही तो जातिवाद है, यही तो जातिप्रथा है। कहाँ है यह आंबेडकरवाद, कहाँ चला गया बुद्ध का दर्शन जिसे आप अप्प दीपो भव कहते हैं, कहाँ गया वैज्ञानिक सत्य जिसे आप वैज्ञानिक कहते हैं, कहाँ गया मानव-मानव का प्रेम जिसे आप मानवतावादी कहते हैं? फिर हम भी भविष्य के बाफले रूप में ब्राह्मण ही तो हैं। वह अन्यायी था हम अन्यायी होना चाहते हैं।

मेरा टिप्पणी उन दलितों के बारे में है जो जातिवादी दृष्टिकोण से काम लेते हैं और मुझे या मेरे जैसे कटु आलोचकों को दलित विरोधी करार देते हैं जबकि हमें एक क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए कार्य करने की जरूरत है। हमें ब्राह्मणवादी झाँसे में आकर अपनी जाति को मजबूत नहीं करना है बल्कि जाति की कमजोर कड़ी को सर्वप्रथम तोडना प्रारंभ करना है।

मुझे आशा और विश्वास है कि आप जातिवादी मानसिकता का विरोध करेंगे। आप जैसे तर्कशील और साहसी व्यक्ति से ही क्रान्ति की उम्मीद है। शेष, न आम्बेडकर को पढ़ते हैं और न उनके सपनों को पूरा करने का उनमें कोई सकल्प ही है। कभी मायावती, तो कभी मेश्राम और कभी भीम आर्मी के चंद्रशेषर उनकी समझ होते हैं। लोग तर्क से नहीं भावना से काम लेते हैं। भावना करुणा का आधार जरूर है लेकिन विज्ञान तर्क की जान है, पद्धति है। बिना विज्ञान व तर्क के करुणा कोरी बकवास सिद्ध होगी। बिल्कुल सही है, बाबा साहब की पुस्तकें आप के घर में होनी चाहिए और उससे भी बड़ी जिम्मेदारी यह है कि आप उन पुस्तकों को पूर्ण रूप से पढ़ डालें। यदि आप ने ऐसा कर लिया है तो आप दलित समाज के बहुत अच्छे प्रवर्तक हैं।

जब भी हम उदहारण दें जातिवाद की झलक न हो। नहीं तो हम पर भी वही तोहमत लग जाएगी। जब हम दूसरों को रास्ता दिखाते हैं तो उससे पूर्व मेरे अंदर से वह गलतियां ख़त्म होनी चाहिए।

सिर्फ़ एक दलित की फ़ालतू दौलत दिखाने से जातिवाद की कुंठा प्रकट होती है जबकि आवश्यकता है इस तरह के हर पार्टियों के प्रत्येक नेताओं के इनकम के स्रोत को उजागर किया जाय। कांग्रेस के पंडित सुखराम देश के पहले उदाहरण बने। आज सभी नेताओं का लक्ष्य धन-दौलत इकठ्ठा करना है। जाति और धर्म की बात बेईमानी है। वर्तमान राजनीति का चरित्र ही ऐसा है कि कोई भी नेता दुश्चरित्र है। जब हम किसी जाति के नेता पर हमलावर होते हैं तो हम अपनी जाति की कुंठा दिखाते हैं। इस तरह के अप्रोच हमें जातिवादी नफ़रत से निकलने में मदद नहीं करते हैं बल्कि एक दूसरी तरह से हम जातिवाद के शिकार हो जाते हैं।

शोषित जनता को व्यवस्था परिवर्तन के लिए एक सक्रिय प्रतिपक्ष बनने के लिए संघर्ष करना चाहिए और जिसके लिए एक जूझारू सतंत्र जन संगठन और क्रन्तिकारी कार्यक्रम तैयार करने की जरूरत है .संसदीय दल या उनके द्वारा बनाये संगठनों से यह काम नहीं हो सकता . शहीद ए आज़म भगत सिंह द्वारा लिखित 'नवजवान सभा की घोषणा पत्र '1926 और ' हिन्दोस्तानी समाजवादी प्रजातान्त्रिक संगठन ISRO की घोषणापत्र '1928 और डॉ अम्बेडकर द्वारा लिखित 'RPI के संविधान की प्रस्तावना' ,1952 में ऐसी विचार स्पष्ट रूप लिखी हुयी है जिसको मौजूदा दौर के परिप्रेक्ष में देखना होगा. इसके अलावा कई ऐतिहासिक दस्ताबेज है जैसे 'India Mortgaged' (T Nagi Reddy) , जयप्रकाश नारायण की 'सम्पूर्ण क्रांति ' आदि।

"वर्तमान क्रांतिकारी कार्यक्रम का मसौदा" क्या हो जिसमें दलित डॉ. आम्बेडकर सहित समाहित हों-लिखना उचित होगा। वैसे मैंने भगत सिंह को भी पढ़ा है और कई तरह से विमर्श को प्रस्तुत भी कर चुका हूँ लेकिन दलित है जो डॉ. आम्बेडकर को तो रटता है किन्तु उनकी वाली नहीं करता है। दलित मायावती को नेत्री तो मानता है किंतु उनसे डॉ. आम्बेडकर के सपनों पर तर्क नहीं करता है। अज़ीब है दलित।

जो भी जातिवादी हैं चाहे दलित हों या सवर्ण उन्हें मेरे विचार अच्छे नहीं लगते हैं। दोनों अतिवादी तरह से मेरा विरोध करने पर उतारू हो जाते हैं। ऐसे लोग न डॉक्टर आम्बेडकर को पढ़ते हैं न मार्क्स को ही लेकिन विद्वान एक नंबर के बनते हैं।

सभी नेता ऐसा ही करते हैं। सुश्री मायावती कोई अलग से नहीं हैं। अलग व्यक्तित्व व समझ हमारी होनी चाहिए क्योंकि क्रान्ति की जरूरत हमारी है, वर्गीय एकता की जरूरत हमको है इसलिए हमें जाति, धर्म, संप्रदाय की खेमेबाजी छोड़कर श्रमिक वर्ग को एक होकर पूँजीवाद व जातिवाद के विरुद्ध लड़ना होगा तथा एक नए समाजवादी संविधान को दृढ़ता पूर्वक लागू करना होगा। इस तरह करने से क्या दलित क्या ब्राह्मण, सभी जातिवादी लोग हमारे विरुद्ध खड़े होकर अनजाने ही पूँजीपतियों का साथ देने लगेंगे क्योंकि ये जनता है और जनता अभी जाति और धर्म के चिंतन से ऊपर नहीं उठ पाई है। यदि हम भी जातिवाद से अपने को मुक्त नहीं कर पाए हैं तो हमें भी अपने चिंतन और संस्कृति को डी-कास्ट कर लेना चाहिए।

बहन जी गलत हैं लेकिन मोदी भी संसदीय राजनीति के धुरंधर खिलाड़ी हैं वे दूध के धुले नहीं हैं। संसदीय राजनीति का कोई भी नेता दूध का धुला नहीं है। जनता की आवाज किसी विशेष पार्टी और नेता के विरुद्ध नहीं, पूरी व्यवस्था के विरुद्ध होना चाहिए। यदि ऐसा नहीं है तो हम किसी न किसी जाति व जातिवादी पार्टी के पक्ष में हैं।

दलितों की आवाज़ क्या है, जातिप्रथा उन्मूलन अथवा जाति का ध्रुवीकरण कर सत्ता हासिल करना? यदि दलितों की आवाज़ जातिप्रथा उन्मूलन है तो उसकी आवाज़ कोई नहीं सुनता है और यदि, उसकी आवाज़ सत्ता पर कब्ज़ा करना है तो सुश्री मायावती से बेहतर कोई नहीं सुनता है।

दलित असहमतियाँ मुझे अच्छी लग रही हैं। इससे मैं पुनरचिन्तन करने के लिए बाध्य होऊँगा। मार्क्स ने कहा था, "बहुत सारे दार्शनिकों ने दुनिया की विभिन्न तरह से व्याख्या की है किंतु, सवाल यह है कि दुनिया को बदला कैसे जाय?" यह सवाल आज तक और अभी भी यक्ष प्रश्न की तरह जिन्दा है। डॉ. आम्बेडकर के "The annihilation of caste" के अनुसार जातिप्रथा उन्मूलन किया जाना है। डॉ. आम्बेडकर ने जाति उत्पत्ति की बहुत ही ऐतिहासिक और वैज्ञानिक व्याख्या करते हुए हमें हमारे इतिहास से अवगत करा दिया है। अब जरूरत शेष है जातिप्रथा की दीवार में वैज्ञानिक तौर-तरीकों से कील ठोंकने की। लेकिन, दुर्भाग्य यह है कि दलित अपने विरोधाभास में जीवित हो उठा है। जैसे उदाहरण के रूप में, जो किसी भी तरह इलीट वर्ग में चले गए उन्हें अब सम्मान चाहिए, इसलिए ब्राह्मणवाद को दोषी मानते हुए ब्राह्मणवाद के जनक पर आक्रामक रहते हैं और शूद-चमार-भंगी कहलवाने से गुरेज करते हैं। ठीक है, मुझे सम्मान का हक़ है। किंतु, वहीं दूसरी ठौर पर दलित जातियाँ शूद-चमार-भंगी बने रहकर वोट की राजनीति भी करना चाहती हैं। एक तरफ जाति उन्हें काटती है और ब्राह्मणों पर जातिप्रथा के प्रवर्तक के रूप में उन्हें जिम्मेदार भी ठहराते हैं दूसरी तरफ जाति प्रमाण-पत्र बनवाकर स्वयं को चमार, कोरी, धोबी, पासी, धानुक और भंगी साबित भी करते रहते हैं। दलित सवाल यह है कि पहले वह सुनिश्चित कर ले कि वह अपनी जाति पर गर्व करेगा अथवा जातिप्रथा को ख़त्म करने का संघर्ष करते हुए इस अपमान जनक संस्कृति को नेस्तनाबूत करेगा। यदि दलित जाति पर गर्व करता है तो फिर ब्राह्मणों पर भी गर्व करना होगा क्योंकि उसी ने तो हमें इस वर्ण-व्यवस्था में गर्व करने लायक स्थान दिया है। और, यदि नेस्तनाबूत करना है तो यह सवाल मार्क्स का भी था और हमारे प्रिय अन्यतम विद्वान बाबा साहब डॉ. भीम राव आम्बेडकर का भी था, जो किया जाना शेष है।

कुछ साथियों की आदत होती है कि एक अच्छे खासे क्रांतिकारी को भी जाति के दायरे में खड़ा करके उसकी मिट्टी पलीद करने लगते है। सच यह होता है कि ऐसे साथी वैचारिक रूप से चाहते तो अच्छा हैं लेकिन बौद्धिक और सांस्कृतिक रूप से जाति के चिंतन से खुद को बाहर नहीं निकाल पाए हैं। जाने-अनजाने उनमें जातीय अहम् बना हुआ है। जो व्यक्ति अपने को डी-कास्ट नहीं कर पाया है, उससे संबंधित जाति को गाली देने से, वह बौखला उठता है क्योंकि अभी वह अपने को उस जाति का मानता है, चाहे वह चमार हो अथवा ब्राह्मण।

दलितों के अंदर जातिप्रथा-उन्मूलन को विमर्श में उतारना अति आवश्यक है क्योंकि यह दलित ही है जो क्रांतिकारी वर्ग होते हुए भी आरएसएस जैसी विचारधारा में फंसा हुआ है। यह वह वर्ग है जो ब्राह्मणों पर आरोप लगाएगा लेकिन अपनी ही जाति से चिपका रहेगा। खुद ही कम्युनिस्ट नहीं हो पाता है। वेद-पुराण, रामायण और महाभारत पढ़ता है लेकिन मार्क्स का द्वंद्वात्मक भौतिकवाद नहीं पढ़ता है। क्यों? क्योंकि दलितों को ब्राह्मणवाद से अधिक मार्क्सवाद से डर लगता है। आखिर क्यों? इसलिए कि इसके मस्तिष्क में एक बात आरएसएस ने घुसेड़ दी है कि बाबा साहब मार्क्सवाद नहीं चाहते थे, मार्क्सवाद आंबेडकरवाद विरोधी है। दलित अपना स्वयं का विवेक नहीं लगाता है क्योंकि पढ़ने से डरता है। 1 प्रतिशत दलित भी डॉ. आम्बेडकर की पुस्तकों को नहीं पढ़ा है। कैसे समझेगा? रिसर्च करके देख लीजिए, एक शहर में दस दलितों के घर में डॉ. आम्बेडकर वांगमय निकल जाए तो कहिए। और, यह भी रिसर्च कर लीजिए कि शहर में एक व्यक्ति से अधिक किसी दलित ने बाबा साहब का वांगमय कंप्लीट पढ़ा हो। यहाँ तक कि "जातिप्रथा उन्मूलन" को भी लोग गलती से नहीं पढ़ते हैं। क्या करेंगे।

दलित विद्वान ब्राह्मणों पर आरोप लगाता है कि ब्राह्मण भले प्रगतिशीलता की बात करे, वह भले ही कम्युनिस्ट क्यों न हो, लेकिन वह अपने जाति को नहीं छोड़ता है। सबसे पहले वह हिंदू रहता है, फिर ब्राह्मण होता है तथा बाद में और अंत में, वह प्रगतिशील व कम्युनिस्ट कहलाता है। यह सवाल भारत में सवर्णों पर ही नहीं, सर! अवर्णों पर भी लागू है। हम दलित जब भी सोचते हैं स्वयं को दलित मानकर ही सोचते-लिखते व प्रतिक्रिया देते हैं। हमने स्वयं को डी-कास्ट कहाँ किया है? अन्य जातियों के सापेक्ष छोड़िए, दलितों के मध्य भी हमारा स्वयं का कोरी, चमार, धोबी, पासी, मुसहर की समझ और ऐंठ बना हुआ है। हम प्रथम भी दलित होते हैं और अंततः भी दलित ही बने रहते हैं। हम दलितों के अंदर तो प्रगतिशीलता छू भी नहीं जा रही है। हम ब्राह्मणों को रोज गरियाते हैं लेकिन ब्राह्मणवाद से खुद ही नहीं निकलते हैं और न बाबा साहेब डॉ. आम्बेडकर के "जातिप्रथा उन्मूलन" के निमित्त कार्य ही करते हैं। हमारी एक मानसिकता है कि ब्राह्मण अपनी जाति नहीं त्याग रहा है। अरे दलित मित्रों! हमने भी तो अभी तक अपनी जाति नहीं त्यागी। आखिर क्या कारण है? जबकि दलित जाति तो भारत की सबसे निकृष्ट और घिनौनी जाति मानी जाती है जिस पर हम-आप गौरवान्वित होने लगे हैं और चमारों, कोरियों तथा पासियों का गौरवशाली इतिहास लिखने व पढ़ने लगे हैं। फिर, हम-दलितों ने अभी तक कोई ऐसा विकल्प तैयार किया क्या कि कोई व्यक्ति अपनी जाति त्यागने के बाद कहाँ और कैसे रहे, उसकी संस्कृति और जीवन पद्धति क्या होगी? खुद दलित जातियाँ ऐसे किसी विकल्प के तहत उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए क्या किसी ऐसे अर्थात "जातिविहीन-ब्राह्मणवाद विहीन जीवन पद्धति संघ" में रह रही हैं, जहाँ से दलित बड़े फ़क्र के साथ कह सके कि सुनो ब्राह्मणों! देखो ब्राह्मणों! मैंने ब्राह्मणवाद को लात मार दिया है, मैंने जातिवाद छोड़ दिया है, मैंने तुम्हारे द्वारा बनाई जाति-व्यवस्था की अपनी भी जाति छोड़ दी है।

मेरा काम है अपने विचार लोगों के मध्य रखना, मैंने लिख दिया। अब उन लोगों का काम है उस पर विमर्श करना। वे अपनी मान्यताओं और शिक्षा के स्तर के अनुसार बात रखते हैं। उनकी बातों से अन्य लोग एक्टिव होते हैं। यही उपलब्धि है। अनेक लोग हैं अनेक मत हैं। ईमानदार लोग धीरे-धीरे सत्य तक पहुँच ही जाते हैं। चालाक लोग अपनी ऐंठ में न बात समझ पाते हैं न कुछ कर ही पाते हैं। वे हमेशा धतुआ बने रहने के फ़िराक में रहते हैं। वे हमेशा दूसरों को कमतर समझते हैं। वे हमेशा अपने को ही बेहतर समझते रहते हैं। क्या किया जाय।

आप ने बात सही समझा है। लोगों को मेरे कहे पर यकीन न हो कोई बात नहीं, लेकिन उसकी पुष्टि के लिए आप बाबा साहब के पास तो जाइए, उनकी लिखी पुस्तकें तो पढ़िए और सत्यापित करिए मेरी बात। लेकिन, मेरी बात भी गलत कहेंगे और बाबा साहब की बात जानने की जहमत भी नहीं उठाएंगे।

अरे, कई बार तो ऐसा भी होता है कि साथी लोग सुश्री मायावती जी की तो तरफदारी करते हैं लेकिन सुश्री मायावती जी की सर्वजन वाली बात भी नहीं मानते हैं। जब मायावती जी को ब्राह्मणों से परहेज़ नहीं है तो आप क्यों करैले को और तीता करते हैं।

एक ब्राह्मण साथी ने लिखा है, "जब हम तुम्हें नीच समझते थे तब तुम मेरा सम्मान करते थे और आशा करते थे कि मैं तुमसे प्यार से बोलूँ किन्तु अब जब मैं तुम्हें गले लगाना चाहता हूँ, भेदभाव को छोड़ना चाहता हूँ तो तुम आग मूतना शुरू कर दिए हो और नफ़रत का बीज बो रहे हो। संख्याबल में मुझसे बहुत अधिक होने के बाद भी इतिहास में तुम मुझसे हार गए और मेरे गुलाम बन गए। तुमने अपनी औकात देख ली है। हमने साजिश करके तुम्हारे विरुद्ध न जाने कितनी किताबें लिख डाली और तुम एक किताब नहीं लिख पाए, तुमने अपनी विद्वता भी देख ली है। इसलिए, सहिष्णुता और सामंजस्य बरतों, नहीं तो दुबारा लतियाये गए और गुलाम बनाए गए तो हमारे दरवाजे के सामने निरीह बैठे-बैठे तोते की तरह बस "जय भीम-जय भीम" रटते रहोगे।"

वैसे मुझे इस संबंध में यह कहना है, हम विकास के उस चरण में पहुँच गए हैं कि हमें दुबारा गुलाम बनाना नामुमकिन है। मानसिक विकास का स्तर हमें मरने-मिटने को तैयार कर देगा। हाँ, उसकी यह बात सही है कि हमें रणकौशल अपना कर समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व प्राप्त करने की लड़ाई लड़नी चाहिए। ब्राह्मणवाद एक नफ़रत और ऊँच-नीच की संस्कृति है। हमें उसे न मानकर उसको कमजोर कर देना चाहिए लेकिन उसके समर्थकों के आस्था को जातीय आधार पर चोट नहीं पहुंचानी चाहिए। हमें ब्राह्मण-सवर्ण विरोध नहीं करना चाहिए जिस तरह हम मुस्लिम-इस्लाम विरोध नहीं करते हैं अथवा इस्लाम हिंदू रीति-रिवाज़ों का विरोध उनके मध्य में कहीं नहीं करता है न हिन्दू इस्लाम के मध्य कोई विरोध पैदा करते हैं। वे उनकी नहीं मानते तो वे उनकी नहीं मानते हैं। यह विरोध का नहीं अपनी श्रेष्ठता का मामला है लेकिन दलित है जो यह कहता फिरता है कि ब्राह्मण हमें नीच समझता है। अरे ब्राह्मण के नीच समझने को आप सही क्यों मान लेते हैं, क्यों उसकी बातों से प्रभावित हो जाते हैं? वह तो इस्लाम को भी नीच मानता है तो वह कहाँ अपनी फिलॉसफी बदल लेता है। वह अपने घर में नीच मानता है मानता रहे। मैं उसकी बात नहीं मानता। उससे क्यों अपेक्षा करते हैं कि वह अपने घर मुझे खिलाए-पिलाए, अपने रजाई-गद्दा में सुलाए, अपनी चारपाई पर बैठाए? वो हमें कुर्सी देता है हम उसे कुर्सी दें। वह हमें नीच समझता है, हम भी उसे नीच समझें। किन्तु, जो सवर्ण हमारे साथ ऐसा व्यवहार नहीं करते हैं हम उनसे नफ़रत क्यों करें, उनमें नफ़रत क्यों बोएं? समता पहले विचारों में ही आएगी फिर व्यवहारिक रूप से जातियों के स्तर पर समता लाई जा सकती है परंतु वैमनस्य पैदा करके हम जाति की मानसिकता एवं संस्कृति नहीं ख़त्म कर सकते हैं। प्रगतिशील सवर्णों को साथ लेकर काम करना बुरा नहीं है।

गैर दलित साथी के उस वक्तव्य से हमें अपना मूल्यांकन करना चाहिए। सर्वजन के रूप में हम एक तरफ सुश्री मायावती का पक्ष लेते हैं लेकिन दूसरी तरफ सांस्कृतिक, बौद्धिक और व्यवहारिक तौर पर उन्हीं के दर्शन का विरोध करते हैं। ऐसा क्यों? एक तरफ हम "जय भीम" कहते हुए नहीं थकते तथा बाबा साहब के ग्रेट अनुयायी बनते हैं लेकिन दूसरी तरफ बाबा की मूल विचारधारा समझते ही नहीं, उनकी लिखी पुस्तकें नहीं पढ़ते, यहाँ तक कि बहुत सारे स्तर पर हम बाबा साहब के विरोध में खड़े मिलते हैं। ऐसा क्यों?

आप समझ सकते हैं कि बाबा साहब की मूल विचारधारा न समझने से और वैसा समाज न बनाने से हम सामाजिक विकास में पुनः सदियों-सदियों के लिए पिछड़ जाएंगे।

दलित साथियों को इस विषय पर बहुत गम्भीरता से चिंतन करना पड़ेगा कि वह "जय भीम" रटता हुआ भी बाबा साहब की लिखी बातों को क्यों नहीं मान रहा है? वह सुश्री मायावती के सर्वजन के आधार पर वोट देता हुआ समाज में सर्वजन के सिद्धांत पर क्यों कार्य नहीं करता है? दलितों में अपने मनीषियों का ऑरिजिनल विचार क्यों नहीं फैलता है क्यों अन्य बातों पर अमल करता हुआ गुमराह रहता है? दलित व्यवहारिक तौर पर सवर्णों से चिपका रहता है, जी हुजूरी करता है लेकिन पीठ पीछे उसके विरुद्ध जहर उगला है जबकि होना तह चाहिए कि व्यवहारिक स्तर पर दलितों को सवर्णों का विरोध करना चाहिए किन्तु सैद्धांतिक स्तर पर एक रहने के लिए कन्विंस करने की कोशिश करना चाहिए। इस तरह असत्य का व्यवहारिक विरोध भी होगा तथा सैद्धांतिक स्तर पर एक करने का विमर्श भी चलेगा।

संसदीय राजनीति के अलावा कौन सा रास्ता है?

रविवार, 27 मई 2018

आधुनिक राष्ट्र का उदभव

आधुनिक राष्ट्र का उदभव - नागरिक राष्ट्रवाद बनाम रक्तिय और नस्लीय
राष्ट्रवाद
               ‘राष्ट्र’ की आधुनिक परिभाषा अठारहवीं  सदी के यूरोप में उभरी । इससे पहले वहां पर राजाओं और शासकों का राज्य था । उनकी रियासतों की अपनी सीमायें थी , लेकिन कोई भी एक देश नहीं था । उदाहरण के तौर पर देखें तो आस्ट्रो -हंगेरियन साम्राज्य, तुर्क साम्राज्य मध्य यूरोप के लगभग आधे हिस्से में था , ब्रिटिश साम्राज्य इंग्लैंड के बाहर की दुनिया केे एक बडे़ हिस्से में फैला था । फ्रेंच और जर्मन ,जो बार- बार यूरोप में एक दूसरे से युद्ध लड़ रहे थे, यहां पर एक राष्ट्र की कोई अवधारणा नहीं थी । प्रत्येंक समाज अपनी सीमाओं और विभिन्न धार्मिक समूहों के रुप में आपस में संघर्ष कर रहे थे जैसे- कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट आपस में एक दूसरे का विरोध कर रहे थे । दोनों ने पूर्वी रुढ़िवादी चर्च का विरोध किया । राष्ट्रों की अवधारणा , अठारहवीं सदी में परिभाषित की गई । कार्ल मार्क्स ने इसे पूजीवाद के तहत बाजार की आर्थिक सीमा कहा । यह आधुनिक राष्ट्र -राज्य का आधार बना।
 राष्ट्र -राज्यों के निर्माण की प्रक्रिया में पहचान हेतु एक सार्वजानिक सांस्कृतिक मापदंड बनाये गए ा इसमें सबसे अधिक भाषा को पहचान मिली | यह राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया का सबसे पहला भाग था |  भाषाओँ ,जिसके द्वारा हम यूरोप में सबसे अधिक देशों की पहचान आज करते हैं जैसे अंग्रेजी।, फ्रेंच ,इतालवी, डच ,जर्मन , पुर्तगाली , स्पेनिश आदि |  अपनी पहचान को बनाये रखने के लिए इन देशों का संघर्ष का एक लम्बा इतिहास है |   भाषाओँ की एक से अधिक संख्या की वजह से प्रमुख भाषा की पहचान के लिए विवाद हुए |  जैसे स्पेन में केटलोनिआ (बार्सिलोना के आसपास ) में लोगों का तर्क है कि कैटलन भाषा स्पेनिश भाषा से अलग है , फिर भी केटलिन भाषा को स्पेनिश के रूप में वर्गीकृत किया गया है |  इस प्रकार राष्ट्र के निर्माण की प्रक्रिया साधारण नहीं है कि अचानक , एक राष्ट्र का रूप ले ले | एक राष्ट्र के उभार में  बड़े सांस्कृतिक आदान - प्रदान का योगदान है | साथ ही अक्सर , हिंसक संघर्ष की भी हिस्सेदारी होती है |  राष्ट्र के निर्माण की प्रक्रिया में पूंजीवाद बाजार की स्थापना के साथ साथ एक भाषा को भी राष्ट्रीय पहचान के रूप में स्थापित होते देखा गया है |
           लेकिन क्या एक राष्ट्र और राष्ट्रवाद की परिभाषा को एक दो अलग अलग तरीकों से समझा जा सकता है |  दोनों परिभाषाओं में क्षेत्र या देश को एक भौगोलिक सीमा से परिभाषित किया गया है , जिसमें एक सीमाओं पर केंद्रित है जबकि दूसरी जनता को केंद्रित करती है |  नागरिक राष्ट्रवाद के विचा को फ़्रांसिसी क्रांति से प्रेरणा मिलती है |  जिसके अनुसार वे सभी लोग , जो देश की सीमा के भीतर रहते हैं फ़्रांस के पूर्ण नागरिक हैं |  इसलिए सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समान रूप में देखा गया और इसलिए " स्वतंत्रता , समानता,और भाईचारे" का नारा दिया गया | फ़्रांसिसी क्रांति ने न केवल सत्तारूढ़ अभिजात वर्ग को उखाड़  फैंका  है , बल्कि फ़्रांस में रहने वाले , सभी लोगों को पूर्ण नागरिकता का अधिकार दिया है जिसमें यहूदी भी शामिल थे |

जिन लोगों ने इस धारणा को आगे बढ़ाया या उससे प्रभावित थे, जो जर्मनी के अतीत और उनके पूर्वजों से आकर्षित थे उन्होंने नस्लीय शुद्धता की बात पर जोर दिया। यह एक काल्पनिक अतीत पर आधारित था , जैसा कि हम जानते हैं कि दुनिया में कोई भी देश नहीं है जहां पर सिर्फ एक ही तरह के लोगों  की आबादी  निवास करती हो । आबादी का आवागमन अलग अलग जगहों पर चलता रहता है । शुद्ध जर्मन राष्ट्र की यह अवधारणा सिर्फ एक मिथक है कि एक राष्ट्र उसके मूल निवासी की नस्लीय विशेताओं के साथ एक विशेष नस्ल की पहचान पर आधारित है। यह अपवर्ज नात्मक राष्ट्रवाद कुछ मनमाने ढंग की विशेषता पर आधारित है, जबकि सभी दूसरों को छोड़कर लोगों में से एक नस्ल में शामिल है ।
    यूरोपीय इतिहास के अंतिम तीन सौ साल में राष्ट्र की इन दो विवादास्पद विचारों का एक प्रतिबिम्ब बनाया गया है। इस तरह के समरूप रक्त और नस्लीय राष्ट्र को बनाने के प्रयास को आगे बढ़ाया गया। उदाहरण के लिए , डेनमार्क और नार्वे  से कैथोलिक और फ़्रांस से प्रोटेस्टेंट को बाहर किया गया । यूरोप में सैंकड़ों साल तक समरूप रक्त और नस्लीय राष्ट्रों के निर्माण के लिए युद्ध होते रहे । युद्ध , नरसंहार , जातीय सफाई और अल्पसंख्यक जनता के निर्वासन का खूनी इतिहास यूरोपीय राष्ट्रवाद के साथ जुड़ा है।
       रक्त और नस्लीय राष्ट्र की अवधारणा ने जर्मनी में फासीवाद को जन्म दिया । जिनके भी पूर्वज जर्मनी में निवास नहीं करते थे वे शुद्ध जर्मन नहीं माने जाते थे। और उनके लिए जर्मनी में कोई स्थान नहीं था । यह हिटलर की बुनियादी समझ थी । इस आधार पर जर्मनी में यहूदियों और जिप्सी को मारा गया । इस प्रकार जर्मनी में फासीवाद का उदय हुआ और द्वीतीय विश्व युद्ध के एक ख़राब प्रभाव के साथ समापन हुआ ।
      हिटलर और जर्मनी में अन्य फासिस्टों के प्रस्तावित राष्ट्रवाद का यह रूप पौराणिक अतीत में अपने मूल में नहीं था । समरूप रक्त और नस्लीय राष्ट्रवाद के विपरीत दूसरी परिभाषा का निर्माण सैकड़ों - हजारों सालों से लोगों के बीच बातचीत के माध्यम से निर्मित हुआ है । साझा संस्कृति का उद्भव , सांझी ( या कई भाषाओं के देशों में ) भाषा और एक राष्ट्र के रूप में एक साझा उद्देश्य से प्रेरित राष्ट्रवाद का परिणाम है । यूरोपीय राष्ट्रों के उद्भव में बातचीत एवम खूनी संघर्ष के एक साथ हुए थे । 

शनिवार, 26 मई 2018

WALMART


PUBLIC STATEMENT

24 May 2018

WALMART-FLIPKART DEAL:
CONTINUING ATTACK ON RETAILERS, PRODUCERS, FARMERS & LABOUR,
AND ON INDIA’S DIGITAL SOVEREIGNTY

The US based Multinational Corporation (MNC) Walmart’s acquisition of Flipkart undermines India’s economic and digital sovereignty and the livelihood of millions in India. If the $ 16 billion deal goes through, two US companies (the other being Amazon) will dominate India’s e-retail sector. They will also own India’s key consumer and other economic data, making them our digital overlords, joining the ranks of Google and Facebook.

The acquisition of the largest e-commerce firm promoted by Indian entrepreneurs is the latest step in a series of developments aimed at circumventing the existing cap on FDI in multi-brand retail by permitting foreign-owned online retail in India, and developing a digital stranglehold by foreign companies over India’s consumer goods value chains.

This process saw the gradual take-over of majority stake in the formerly Indian-owned Flipkart, the entry of the world’s largest e-retailer Amazon, and now the take-over of Flipkart by Walmart. Jack Ma, head of China’s Alibaba, says all e-commerce companies now have integrated online and offline strategies, consolidating operations towards one ‘new retail’. This is also evidenced by recent moves in the US by Walmart to enter e-retail and by Amazon to move into brick-and-mortar retail. It should therefore be clear to everyone that allowing FDI in e-retail in India is but a back-door entry of foreign players into multi-brand retail. Ironically, the same political party, which a decade ago strongly opposed the entry of Walmart into India, is now happy to welcome its far more powerful, digitally-enabled avatar.

India’s domestic digital retail industry will of course suffer by the domination of these two US MNCs. But worst affected will be small brick-and-mortar retail stores accounting for over 90% of the Indian retail sector,  SME manufacturers, small delivery companies and suppliers of goods including farmers whose margins will be ruthlessly squeezed, with their behaviour digitally-controlled. Walmart is well-known for its global supply chain, especially of cheap goods from China, which means local manufacturers and suppliers will suffer deep hits.

This is similar to what would happen with FDI in brick-and-mortar multi-brand retail. It will, in fact, be worse, as digitally-enabled ‘new retail’ becomes omnipresent and omnipotent. The concentration of economic power with the two US MNCs, now constituting a potential duopoly in India, will render them too powerful to be meaningfully regulated. In the US, the trail of destruction of small stores, local businesses, small manufacturers and countless workers left behind by Walmart and other giant retailers is well documented, and the EU has also witnessed the same. ‘New retail’ seeks to own and control key data of all trading activity across sectors resulting in unassailable power. National policy or regulatory remits over them would then be as ineffective as they currently are over Google or Facebook.  Manufacturers, suppliers and traders, producers and service providers, all become enslaved to digitally controlled platforms, working as per their parameters, but denied any rights or benefits. In this context, it is critical that the Competition Commission of India (CCI) examine the issue of monopolistic trade practices vis-a-vis this deal.

It is argued that Walmart and other retail giants will generate employment, but of what kind? Walmart has a long history of busting trade unions, violating the right to collective bargaining, paying poverty wages and disregarding social security laws. In e-commerce, work will also be outsourced to couriers and other service providers, making it a long stretch to prove that they are workers. Further, even if Walmart and Amazon employ a few thousand more, they are unlikely to neutralise the massive employment loss associated with the collapse of both the formal and informal retail sector. In this business model, whether in retail or in so-called ‘aggregators’ such as Uber, the giant corporations provide temporary benefits to consumers, and hence appearing to be on their side, by squeezing everybody in between including small producers and the vast majority of workers in the supply chain.

Digitalisation will soon be central to a wide range of economic activities, many of these being controlled by MNCs. A sovereign nation must be able to regulate e-commerce companies, making them comply with policies that uphold public interest, and ensuring that all economic actors get their fair share. This will be next to impossible with giant corporations operating from abroad and storing all their data overseas. There is an urgent need to reverse the entry of foreign e-commerce companies and their take-over of Indian entities, and to evolve effective regulations to govern the operations of domestic entities and protect the interests of the different players involved.  

Digital companies such as Google and Facebook frequently refuse government or court orders for content take-down  asserting that their data, algorithms and platforms operate from the US, and are subject to the latter’s laws. It will not be very different for data and Artificial Intelligence powering e-commerce platforms. This is what makes it extremely difficult to nationally regulate global digital companies, including e-commerce ones, and the reason that digital platforms in key sectors, including on-line retail, should be domestically owned.

After trailing behind India in software technologies till a decade back, China is now a global leader in digital technologies. China has been able to leverage its growing software capability because it has incubated domestically-owned digital e-commerce systems such as Baidu, Alibaba and Tencent, which also store their data locally.

The Government is seemingly blind to, or does not care about, the extra-ordinary dangers that the country would face if India’s e-commerce ecosystems are foreign-owned and controlled. Not just China, but the US and EU have also begun to disallow foreign takeovers of digital companies considered of strategic or economic importance. If the growing tendency of foreign control of digital platforms in key sectors is not resisted and reversed, India runs the danger of what has been called digital colonization.

Citizens of India should be deeply concerned about the ongoing developments in the e-commerce and especially the online retail space, the latest of which is the Walmart-Flipkart deal. We the undersigned, call for an urgent national debate on this important issue of economic independence and digital sovereignty, affecting the interests of many millions of Indians in different walks of life from workers to farmers, small shopkeepers and suppliers, manufacturers and traders, and a host of service providers, apart from potentially compromising consumption data of hundreds of millions of Indians.

Pending a national debate involving all the affected constituencies, and an informed collective decision based on it, we further demand that the Government of India halts Walmart’s takeover of Flipkart, upholds the policy of restricting FDI in multi-brand retail, and draws up a policy in consonance with this for online retail. We also seek a comprehensive policy on leveraging the strategic value of India’s data for the interest of India and her people, and on domestic ownership and regulation of digital platforms in key sectors.

Endorsed by:
Organisations/ Networks

1.      All India Bank Officers Confederation (AIBOC)
2.      All India Kisan Sabha (AIKS)
3.      All India Online Vendors Associations
4.      All India Public Sector and Central Government Officers Confederation
5.      Centre for Financial Accountability ( CFA)
6.      Chamber of Associations of Maharashtra Industry and Trade (CAMIT)
7.      Delhi Science Forum
8.      Environment Support Group (ESG)
9.      Federation of Traders Organisations of West Bengal
10.  Focus on the Global South
11.  Forum against Free Trade Agreements (FTAs)
12.  Free Software Movement of India (FSMI)
13.  Hawkers Joint Action Committee
14.  India FDI Watch
15.  Indian Social Action Forum (INSAF)
16.  IT For Change
17.  Knowledge Commons
18.  National Alliance of Peoples Movements (NAPM)
19.  National Fishworkers Forum (NFF)
20.  National Working Group on Patent Laws and WTO (NWGPL)
21.  New Trade Union Initiative (NTUI)
22.  Small Business Congress

Individuals:

1.      Prabir Purkayastha, Chief Editor, Newsclick
2.      Prof. Biswajit Dhar, Jawaharlal Nehru University (JNU), New Delhi
3.      Prof. CP Chandrasekhar, Jawaharlal Nehru University (JNU), New Delhi
4.      Prof. Dinesh Abrol, Institute for Studies in Industrial Development (ISID), Delhi
5.      Prof. Jayati Ghosh, Jawaharlal Nehru University (JNU)New Delhi



A Note for Campaign for composite culture of India:


A Note for Campaign for composite culture of India:
Our country is going through a phase when Scientific thought, freedom of expression, pluralistic tradition and democracy are in grave danger and the worst form of intolerance is staring us in face. Many scientists, historians, writers, intellectuals, journalists and activists have been put to death for their independent thoughts and works. The scientists, intellectuals and artists community is being targeted for its words and tortured for voicing its opinions. On one hand, very unscientific boasting is taking place, which is nothing short of falsification by describing ancient India as one of unqualified glorious past. On the other, ,while on the other, the budget for scientific research has been drastically cut down. By creating controversies around the food, ways of living and ways of dressing of ordinary people, a climate of hate and intolerance is being created. Our scientists, writers, intellectuals and artists have stood up against this and are protesting against it in different ways. More than 100 scientists, writers and film-makers have returned their Padma Bhushan and other National awards along with Sahitya Akademy and State Akademy prizes, while Many others have resigned from their posts in different institutions. This unique protest which has spread to all languages and states of India is one of its kind in the world.
We, the people of India, are the inheritors of a composite and pluralistic culture which has evolved through the ages and these are reflected in our personal and social life. They are found in our art and literature. Kathak , which was enriched in the Mughal courts may have bhajan recital in the background. The silk sarees that the Bharatanatyam dancers adorn have Indian designs on them but silk as a material for clothing was introduced by the Chinese. The famous Mysore silk, took its roots at the initiative of Tipu Sultan, who brought the cocoons from China and encouraged mulberry cultivation in his state, with state patronage. Mysore's Channapatna dolls were first crafted there by Persian artisans. The paper that we write on was an invention of the Chinese , brought to India in mass scale via Persia and later the know-how was modified significantly in our own country. The sitar derived its originality after several modifications of the Veena in the Moghal court: the name is derived from the Persian word “setar”, which means a three-stringed instrument, of the type that was used in Persia. Apart form these, the variety of drums, string instruments and pipe instruments that we use, arose first from our different tribal societies and are also played there with unbelievable perfection with the accompaniment of vibrant musical and dance forms. The vanishing wax technique, designed to make the famous Chola bronze idols, or the iron pillar of Kutab Minar and the Damascus steel made around Hampi in Karnataka had the elementary technical know-how developed by tribal societies.
We , the people of India, have always defended this plurality and compositeness. Our languages are testimony to that. According to the famous linguist, Suniti Kumar Chatterjee, the Bengali language has about 2000 words that are of Persian, Arabic and Turkish origin.  It is not only that we have accepted things that have originated in lands far away but our contributions to world culture are immense.  Discovery of ancient Roman coins in Arakkamedu, near Pondicherry and  Tamil- Brahmi scripts found in Quseir al Quadim in Egypt and Khor Rori in Oman, being dated as 1st BCE - 2nd CE, show the mutual interrelations between these societies.  
 Today, we need to uphold our composite and pluralistic culture by securing and strengthening the values of scientific outlook, secularism, progressivism and our strong tradition of unity in diversity. The role of Science and technology is not limited to laboratories, in fact, it provides us an outlook to solve the problems of our lives and make our life easier. Science and technology has always shared its fruit of knowledge and inventions in the whole world, without which the world wouldn't have progressed. The things that we wear, we eat, all are not our own, they are taken from the world and that's how things develop. The things which seem integral part of our being may have their origin in a faraway land. The humble tomato, which has become an essential part of our curries, has its origins in South America. Iran gave as our delicious 'biriyani'. The 'shirts', 'pants' and nickers' that we flaunt today, are actually European dresses.
We know that Indians introduced the present day numeral system to the world and also the number zero. Their profundity can hardly be overestimated.  'Aryabhata's (5th CE) importance can be judged by the fact that he was the pioneer in mathematics, astronomy and mechanics. His pioneering role in India is acknowledged by all and planted the seeds for the development of the Kerala  school about a thousand years later. Early Indian astronomical knowledge travelled to Persia and Central Asia, got enriched there, in a more precise form and returned to India to be practised by Maharaja Jai Singh. Interactions between India and South East Asia flourished through the port of Tamralipta, which acted the gateway from Emperor Asoka's time to seventh century AD. Similarly, cultural and trade related contacts between South India and South East Asia continued for several centuries until the 15th century AD, i.e. up to the advent of competition between colonial merchantile capital. Comparison between the Pallava scripts of South India and those discovered in South East Asia are topics of interesting research by present day historians.
Unlike the example given above, in the present day world, it is possible for knowledge to travel with tremendous rapidity. In making this possible, the role of the European renaissance, the nineteenth century industrial revolution and the twentieth century revolution in science are to be acknowledged. How important this was can be found from the following quotation from the Nobel Prize winning physicist , Abdus Salam ( be was born in pre Independence India, was a Pakistani citizen) :
It is good to recall that three centuries ago, around the year 1660, two of the greatest monuments of modern history were erected, one in the West and one in East: St. Paul's Cathedral in London and the Taj Mahal in Agra. Between them, the two symbolize, perhaps better than words can describe, the comparative level of architectural technology, the comparative level of craftsmanship and the comparative level of affluence and sophistication the two cultures had attained at that epoch of history. But about the same time there was also created- and this time only in the West- a third monument, a monument still greater in its eventual import for humanity. This was Newton's Principia, published in 1687. Newton's work had no counterpart in the India of the Moghuls.” 
Let us see how important this is in our present day life. The information, whether in our mobile phones, e-mails or in our television programmes are transmitted with the help of satellite communication. When we say that we have succeeded in sending a rocket to Mars, it is not without the essential knowledge of western space science and shared technology. There is also a similar mutual exchange between the states of our country, reflecting our composite culture.
In all our Indian languages, during different times, there has been a progressive and secular tradition which stemmed from our composite culture. A tradition which talked of a larger human equality and created new concepts of equality, dignity and secularism by fighting the tradition values. Our languages have a vast literature on criticism of divisions caused by casteism and religious fanaticism at the same time striving for equality of women. The social life and works of Basvanna and Mahadevi in Kannada, Vemana in Telugu, Thiruvalluvar in Tamil, Sant Tukaram and Sant Namdev in Marathi, Kabirdas and Meerabai in Hindi, Nanak and Farid in Punjabi have created an alternative progressive tradition. The vibrant sufi culture nurtured an assimilation of those cultures from east and west.
Birth of Indian nationalism took inspirations from these and also from experiments in the west. One of the by products of that was the emergence of modern science in India. rld wide recognition through the works of JC Bose, Sriniviasa Ramanujan, MN Saha, CV Raman, KS Krishnan, SN Bose, PC Mahalanobis, SS Bhatnagar. Though a late starter, these scientific contributions by Indian scientists gained wor, HJ Bhabha, CR Rao , RC Bose, GN Ramachandran etc. Social experiments elsewhere, brought in fresh thinking in our minds about the future of India. While analyzing the positive aspects of many of the practices, the ideas of liberty, equality and fraternity resonated in the socio political scene of India, as the country struggled to throw away colonial rule. In fact, many of the concepts and experiments that were attempted in western societies made us conscious about equality of gender, questions of social justice and scientific temper.
Indian social reformers thus sought to modify what was thought to be unchangeable. For example, we have today abolished the practice of Sati, and questions of women's rights like in education, employment and social equality are being emphatically championed by many, challenging the forces of conservatism. It was also understood in our freedom movement that science and technology would give future India the material basis for a better quality of life for the citizen and a scientific outlook would invigorate the society for progress towards a more just social system, with deep roots in democracy and material and social equality. The Indian constitution takes cognisance of many of these above ideas. Their practical realization is yet to be fulfilled. But these aspirations are to be the points of unity for people of diverse cultural background, such as those from Kashmir to Kerala and Kanyakumari or from Manipur to Gujarat and Rajasthan.
Unfortunately, today this shared culture and diversity is in a grave danger as there has been a constant attack on these. The sources of our diversity are under attack and they are being erased. This alternative progressive tradition is being forgotten or being turned and twisted. False information are being flaunted on so called epoch making achievements, while the real ones are never spoken about. The people who see this world from a scientific and progressive viewpoint and believe that the country should be working on  scientific principles need to reconnect with this alternative tradition. We need to bring it back in today's context for the new generations. It is thus necessary to bring forth again our pluralistic culture and our natural propensity to present dissenting alternatives based on objective understandings of nature and society. Argumentative Indians did not consider traditions and values as immutable and this aspect needs further elaborate expression in the present juncture.
The role of dissent in Indian tradition needs to be emphasized. It is being  believed by many that Indian cultural is embodiment of spiritualism. This is not entirely true. While spiritualism of various hues do survive, Indian culture has also seen the evolution of several schools which are materialist in their core, e.g. those propagated by Budhdha and the Carvakas.
It has often been argued that India's decline took place due to foreign invasions. The need is to look at India's history objectively. It is necessary also see the internal contradiction in the Indian society as perpetuated by the caste system. The separation of theory and practical hands on experience led to collapse of innovations on the one hand and intellectual field was taken over by decadence. P.C. Ray, in his History of Hindu Chemistry has thus commented, “The caste system was established de novo in a more rigid form. The drift of Manu and of the later Puranas is in the direction of glorifying the priestly class, which set up most arrogant and outrageous pretensions....The intellectual portion of the community being thus withdrawn form active participation in the arts, the how and why of phenomena- the coordination of cause and effect – were lost sight of-the spirit of enquiry gradually died out among a nation naturally prone to speculation and metaphysical subtleties and India for one bade adieu to experimental and inductive sciences. Her soil was rendered morally unfit for the birth of Boyle, a Descartes or a Newton and her very name was all but expunged from the map of scientific world.”
The people who see this world from a scientific and progressive viewpoint and believe that the country should be working on scientific principles need to reconnect with this alternative tradition. We need to bring it back in today's context for the new generations. What does the world really need today? Quality health, quality education, safe housing, drinking water, food supplies and similar essential things, whereas in the name of 'smart cities', we are creating gated communities and a new kind of elitism, which leaves a big chunk of population out of the development index. This is not inclusive development in which every human being's equality and dignity is not ensured. On the foreground, there is great talk of everyone's inclusion and development, but in the background, access to basic necessities is being weakened, be it education, health or food. Policies aiming to profit the corporate sector and foreign multinational cannot be termed as development as it creates further divides in already unequal and unjust income levels. Maybe, the time has come to rethink and rework on our concept of real development where equality and dignity of every human being is ensured.
Keeping the challenges of this time in mind, we need to prepare a campaign; on the lines of scientific outlook, pluralistic tradition, and equality and dignity of all by combining contributions of Indian sciences, history, literature and arts, to include and reach all people: literate and semi-literate in the true act of nation building.

नारी मुक्ति



भूमिका
हमारा भारत सबका भारत अभियान हेतु महिला मुद्दों पर दो पुस्तिकाओं का प्रकाशन किया जा रहा है. यह इस कड़ी की पहली पुस्तक है जिसमे नारी मुक्ति के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और दृ
ष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है. आशा है कि पुस्तिका अभियान के दौरान काम आएगीइसी उम्मीद में शुभकामानों के साथ
वीना गुप्ता
परिचय
महिलाओं पर हिंसा और उनके साथ भेद भाव तो मानव इतिहास में आदिम काल को छोड़कर लगातार होता आया है. लेकिन 1990 के दशक से स्त्रियों पर बर्बर, जघन्य जानलेवा हमलों में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है. तेजाब फेंकने, बलात्कार, हत्या, अपहरण, दूसरे धर्म या जाति में विवाह के कारण परिवार द्वारा हत्या, पंचायतों के स्त्री विरोधी फरमान, साम्प्रदायिक और जाति आधारित हिंसा में महिलाओं और बच्चियों पर हमले, शादी के नाम पर औरतों का व्यापार, संगठित सेक्स रैकेट, समेत सभी अपराधों में कई गुना बढ़ोतरी हुई है. महिला हिंसा के मामलों मै संख्यात्मक बढ़ोतरी ही नहीं बल्कि हिंसा की विभीषता और बर्बरता में भी वृद्धि हुई है. जब भी कोई महिला हिंसा की बड़ी वारदात होती है चारों और से कानून व्यवस्था पर सवाल उठाने लगते हैं, कड़े कानून बनाने ,चप्पे-चप्पे पर पुलिस तैनात करने के प्रस्ताव आने लगते हैं, महिलाओं की ड्रेस, शिक्षा , घर से अकेले निकलने पर सवाल खड़े होने लगते हैं. महिलाओं को ही हिंसा के लिए जिम्मेदार बताना, या महिलाओं पर बढ़ रही हिंसा को कानून - व्यवस्था से जोड़ना समस्या का अति सरलीकरण है. गंभीर विचार का विषय यह है कि 90 के दशक से, जब से उदारीकरण,निजीकरण,और वैश्वीकरण की आर्थिक नीतियां देश में लागू की गयी है, तभी से गरीबी व् बेरोजगारी बढी है. यही नहीं मानव तस्करी, मानव अंग तस्करी,वैश्यावृत्ति,जुआ घर या केसीनो,और ड्रग्स जैसे समाज विरोधी कारोबार में बहुत वृद्धि हुई है. संगठित क्षेत्र में रोजगार की जगह संविदा, ठेका , और मानदेय आधारित रोजगार, जिसमे ना रोजगार की सुरक्षा है ना ही कोई सामाजिक सुरक्षा ने बहुत बड़ी आबादी को जोखिम में डाल दिया है . इसी अरसे में समाज में जातीय, साम्प्रदायिक और महिला हिंसा में भी बेतहाशा वृद्धि हुई है।महिलाओं पर लगातार बढती हिंसा, घटता लिंग अनुपात हमारी सामजिक-आर्थिक -राजनीतिक ढाँचे में अन्तर्निहित अंतर्विरोधों के साथ-साथ सामंती-पूंजीवादी-साम्राज्यवादी नीतियों के प्रभाव का
परिणाम है.

स्त्रियों पर बढ़ती हिंसा और स्त्री हिंसा मुक्त समाज की स्थापना की संभावना के वर्तमान हालात का विश्लेषण करने से पहले यह भी जरूरी है कि हम मानव समाज के विकास की पृष्ठ भूमि में परिवार,विवाह, स्त्री - पुरुष सम्बन्ध, इसके इतिहास और महिलाओं की बदलती स्थिति के बारे में संक्षिप्त सा लेकिन गहराई से जायजा लें.
प्रारंभिक समाज में लिंगभेद आपने मानव समाज के विकास की कहानी जरूर पढी और समझी होगी। में आपकी याद दहानी के लिए एक बार फिर इसे दोहरा रही हूँ. विकास क्रम में जब मानव जीवन अस्तित्व में आया उन दिनों मानव समूह में रहता था, कंद-मूल-फल और शिकार द्वारा जानवरों का मांस ही उसका मुख्य आहार था. पत्थर के हथियार थे और अकेले शिकार करना आसान ना था, इसीलिये मानव समूह में रहता था. यह मानव समाज के विकास का सबसे आरंभिक दौर था, जिसे आदिम काल जाता है. इस वक्त समाज में स्त्री - पुरुष के आधार पर या अन्य किसी भी प्रकार का ऊंच- नीच का किसी भी प्रकार का कोई भेद- भाव ना था. स्त्री-पुरुषों से बना यह कबीला सामूहिक रूप से शिकार करता था और शिकार से प्राप्त भोजन का सामूहिक उपयोग भी करता था. उन दिनों स्त्री पुरुष दोनों मिलकर शिकार करते थे, काम का बंटवारा था भी तो इतना ही कि बीमार व् बूढ़े कंद -मूल-फल इकट्ठे करने चले जाते थे . शिकार की तरह आदिम खेती व् कंद -मूल-फल संग्रह को मान्यता प्राप्त थी और किसी भी काम को छोटा नहीं समझा जाता था. स्त्री को पूरी तरह स्वतंत्रता और समानता प्राप्त थी. सामूहिक यौन संबंधों के कारण पिता की जानकारी संभव ना थी, अतः संतान को माँ के नाम से जाना जाता था. कबीले में उत्तराधिकार का अधिकार भी माँ के रूप में स्त्री को ही प्राप्त था. आज भी देश के बहुत से हिस्सों में आदिवासी समाजों में मातृ प्रधान कबीलों का अस्तित्व है. प्रकृति के साथ संघर्ष करते हुए मानव को नये-नये अनुभव हुए,और उत्पादन के औजारों में भी बदलाव आया. धनुष - वाण और धातु के प्रयोग ने समाज की संरचना बदलने में बड़ी भूमिका निभायी. पशुपालन ने तो समाज में बहुत बड़ा बदलाव ला दिया.पशुपालन अब जीविका का एक अन्य प्रमुख साधन बन गया. धीरेधीरे खेती शुरू हुई और पशुपालन उत्पादन का स्रोत बना. अब कबीले घुमक्कड़ी के स्थान पर एक ही स्थान पर वास करने लगे. कबीलों के बीच युद्धों में विजयी कबीले हारे हुए कबीले के पशु, शस्त्र और स्त्री-पुरुषों कब्जा कर लेते थे. पशु जीते हुए कबीले की अतिरिक्त संपत्ति में शामिल हो जाते थे,और दास खेती और अन्य उत्पादन के कामों में लग जाते थे. अब ज्यादा अतिरिक्त संपत्ति इकट्ठा होने लगी. अब धातु के बने अस्त्र-शास्त्रों से शिकार भी आसान हुआ और कबीलों के पास अब इतना उत्पादन होने लगा कि उनकी जरूरत पूरी होने के बाद भी बच जाता था. इस अतिरिक्त उत्पादन ने विशालकाय
कबीलों को तोड़ कर कुटुंब या युग्म परिवार को जन्म दिया. कुटुंब के स्त्री पुरुषों के बीच युग्म में यौन सम्बन्ध होने लगे. स्त्री और पुरुष युग्म के बीच ये सम्बन्ध स्थायी और कठोर नहीं थेस्त्री पुरुष एक दूसरे को छोड़कर आसानी से अलग हो सकते थे. सामाजिक उत्पादन में स्त्री - पुरुष का बराबर का योगदान था. इसीलिये स्त्री आर्थिक रूप से सुरक्षित व् सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित थी. युग्म विवाह टूटने पर शिकार के हथियार पुरुषों की संपत्ति तो खेती के अन्न और घरेलु चीजों पर स्त्री का अधिकार बना रहता था.

उत्पादन में पुरुषों की भूमिका बढ़ने लगी. अतिरिक्त संपत्ति की हिफाजत के लिए स्त्रियों का प्रयोग किया जाने लगा. उत्तराधिकार के नियम स्त्री वंशावली पर आधारित थे, पुरुषों को यह मंजूर ना था. अब उत्तराधिकार के नियम बदले गए, स्त्री के स्थान पर पुरुष को अब मुखिया माना जाने लगा. आगे उत्तराधिकार परिवार की स्त्री के स्थान पर पुरुष को दिया जाने लगापुरुष यह भी सुनिश्चित करना चाहता था कि उत्तराधिकार में संपत्ति उसी के अपने पुत्र को मिले, इसके लिए एकनिष्ठ विवाह शुरू हुए. स्त्री को घर में कैद कर दिया गया. स्त्री अपनी
प्रजनन क्षमता के कारण संतान को जन्म देती है,इसलिए वह स्वयं में एक संसाधन है, इसलिए स्त्री की यौनिकता पर नियंत्रण जरूरी था. पुरुष ने स्त्री के अपने ही पुत्र को संपत्ति का उत्तराधिकारी बनाने के लिए स्त्री को घर में कैद कर दिया. मातृवंशीय परिवार के स्थान पर पितृसत्तात्मक परिवार की स्थापना ने स्त्री को सामजिक श्रम में भागीदारी से वंचित कर दियाबराबरी, न्याय, समानता के मूल्य स्त्री के लिए बेमानी हो गए. सामाजिक श्रम से ही नहीं संपत्ति से भी वंचित होकर स्त्री मात्र एक शरीर, शिशु को जन्म देने वाले संसाधन में बदल गई, जिसका नियंत्रण पूरी तरह पुरुष के हाथ में गया, यही पितृसत्ता की शुरुआत थी.

पितृसत्ता का उदय

पितृसत्ता एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था है, जिसके अन्तर्गत सत्ता प्राथमिक रूप से पुरुषों के नियंत्रण में रहती है, सामजिक विशेषाधिकारों, नैतिकता, संस्कृति, राजनीती में आर्थिक क्षेत्रों में वर्चस्व पुरुष का ही होता है. परिवार के अंदर परिवार का वरिष्ठतम पुरुष सदस्य मुखिया होता है और बच्चों, महिलाओं समेत सभी पर नियंत्रण करता है। विभिन्न समाजों, धर्मों,संस्कृतियों,समुदायों में और इतिहास के भिन्न- भिन्न कालों में पितृसत्ता का रूप बदलता रहा हैपरंतु हर जगह और हर काल में इसके प्रमुख गुण हैं-राजसत्ता में महिलाओं की नगण्य या प्रतीकात्मक भागीदारी, स्त्रियों का मुख्य व् प्राथमिक कार्य घर की देखभाल और बच्चों का पालन-पोषण,घर के अंदर और घर के बाहर दोनों जगह समाज के अन्य तबकों के मुकाबले
महिलाएं हिंसा की शिकार ज्यादा, स्त्रियों को सामान काम का समान वेतन या मजदूरी नहीं ,मीडिया में महिलाओं की विकृत व् नकारात्मक छवि का प्रस्तुतीकरण, लिंग- भेद, व् स्त्री की यौनिकता का नकारात्मक प्रस्तुतीकरण, सांस्कृतिक व्यवहार, प्रथाओं,धार्मिक परम्पराओं में महिला विरोधी या महिलाओं की समानता,व् स्वतंत्रता विरोधी धारणाओं की बहुलता आदिपितृसत्ता ने स्त्रियों को सामाजिक उत्पादन,संपत्ति में अधिकार, और सामजिक प्रतिष्ठा से वंचित कर दिया था. अब शासक वर्ग के सामने चुनौती थी कि स्त्रियाँ अपनी इस हार को और पितृसत्ता की आधीनता को आसानी से स्वीकार कर लें. अतः पितृसत्ता को स्थापित करने के लिए परम्परा, संस्कार, नैतिकता, कर्तव्य, लोकाचार, धर्म संस्कृति के नाम पर वातावरण निर्मित किया गया, जिसमे महिलाओं को पुरुष के आधीन रहना ही था. लेखकों, कवियों, चित्रकारों, नाटककारों, धार्मिक संस्थाओं, धर्मगुरुओं,राजनीतिक नेताओं सभी ने मिलकर इस बातावरण को तैयार करने में मदद की. यहीं से जेंडर विभेद शुरू हुआ और पुरुषत्व और स्त्रीत्व की अवधारणा को गढ़ा गया. पितृसत्ता के मूल्यों को स्थापित करने के लिए आदर्श पुरुष और आदर्श स्त्री की एक काल्पनिक छवि गढ़ी गयी, जिसमे दोनों के लिए अलग अलग मापदंड तै किये गये. स्त्रियों के लिए आत्म- निग्रह,त्याग, सतीत्व,दया, सेवा, कर्तव्य,जैसे गुणों का महिमामंडन किया गया. धर्म,संस्कृति,परम्पराओं के नाम पर स्त्री विरोधी मान्यताओं को इस तरह प्रचारित किया गया कि स्त्री को अपनी शत्रु परिस्थितियों के साथ अनुकूलन करना पड़ा. नैतिकता का दोहरा मापदंड सामने था-स्त्री को तलाक का हक ना था और पुरुष कई शादियां कर सकता था, पुरुष के विवाहेतर सम्बन्ध भी स्वीकार्य थे जबकि विधवा, यहाँ तक कि - साल की बाल विधवा का पुनर्विवाह निषेध था, उसका सांसारिक सुखों को त्यागकर वंचित जीवन बिताना था. लेकिन पति पत्नी के मरते ही दूसरा विवाह कर सकता था. सती - साध्वी स्त्री का ऐसा पाखण्ड रचा कि जो स्त्री इसमें जरा भी फिट ना थी, उसे ष्वैश्या ष् ष्बदचलन ष् जैसे विशेषणों से नवाजा गया. सती साध्वी स्त्री की पहचान का ऐसा आदर्श सामने रखकर, कि दूसरे पुरुष की परछाई भी उसपर ना पड़े, स्त्री को घर के अंदर भी परदे में कैद कर दिया. यह कैद मात्र पुरुषों से दूर रखने,या स्त्री की हिफाजत के लिए नहीं थी, बल्कि यह तो स्त्री को सामाजिक,राजनीतिकऔर आर्थिक क्षेत्र में चल रही प्रक्रियाओं, घटनाओं से दूर रखना था. घर में पति की मृत्यु होने पर स्त्री को ना कारोबार के बारे में पता होता था, यहाँ तक की उन्हें यह भी नहीं पता होता था की उनके परिवार के पास कितनी संपत्ति या जमीन है. ये सब बातें पुरुषों को ही पता थीं, अतःपिता की मृत्यु के वक्त यदि पुत्र काम आयु का हुआ तो घर के पुरुष देखभाल करते थे. इसीलिये विधवा होने से बड़ा अभिशाप कोई ना थास्त्री को घर में सीमित करने के लिये आभूषण,साज- श्रृंगार, महंगे वस्त्र को उसकी जरूरत बताकर प्रचारित किया गया. इन्ही सब चीजों ने स्त्री को भी घर की सजावट के सामान में बदल दिया. इन चीजों के चयन का भी अधिकार स्त्री को नहीं था. उसे तो आभूषण, साज- श्रृंगार, और वस्त्र भी अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को प्रदर्शित करने के लिए पहनने थेवह चाहे भी तो सादगी से नहीं रह सकती थी. स्त्री की भूमिका बच्चे पैदा करने, उन्हें पालने और एक शोपीस में सीमित हो गयी जिसके विचारों,सोच,और नजरिये का कोई महत्व ना था.
धर्म ने पुनर्जन्म और भाग्य की अवधारणाएं लाकर स्त्री की पराधीनता को स्थाई बनाने की दिशा में और कदम बढ़ाया . विवाह एक संजोग है, अब जो भी हो निभाना तो पड़ेगा ही , ये बाते अक्सर स्त्रियों को समझायी जाती हैं. दुखद पक्ष तो यह है कि स्त्री ने अपनी पराधीनता को स्वीकार कर लिया बल्कि इसमें गौरव और आनंद का भी अनुभव करने लगी. यही से लिंग भेद यानी जेंडर भेद शुरू हुआ , स्त्रीत्व और पुरुषत्व की अवधारणा ने स्त्री और पुरुष को दो ऐसे व्यक्तित्व में बाँट दिया गया, जिन्होंने दोनों के बीच के प्राकृतिक सम्बन्ध को असंभव बना दिया, जिसका खामियाजा स्त्रियों को ही नहीं पुरुषों को भी भुगतना पड़ापितृसत्ता शासक वर्ग विचारधारा थी जिसे उन्होंने शासितों पर थोपा, और कुछ हद तक उत्पीड़ितों ने भी शासकों के विचारो को श्रेष्ठतर मान कर मानकर बिना किसी विश्लेषण के आँख मूंद कर इन मूल्यों का अनुकरण किया. शासक वर्ग पितृसत्ता को सामजिक नियंत्रण के एक औजार के रूप में प्रयोग करता है . इसलिए पितृसत्ता के पूंजीवादी ,साम्राज्यवादी, जातिवादी , साम्प्रदायिक ताकतों के साथ अंतर्संबंधों की जटिलता को भी समझना होगा.

लिंग भेद जेंडर विभेद
 सेक्स एक जैविक पहचान है जो शिशु के लिंग के बारे में बताता है,और जेंडर वे गुण धर्म हैं जो समाज स्त्री व् पुरुष पर आरोपित करता है. अंग्रेजी में ये दोनों शब्द अलग-अलग संदर्भो में प्रयोग किये जाते हैं. यहाँ हमने सेक्स के लिए लिंग और जेंडर के लिए लिंगभेद शब्दों प्रयोग किया है. लिंग या सेक्स के द्वारा शिशु के नर, मादा, या उभयलिंगी होने व् उसके शरीर की विशेषताओं के बारे में जानकारी मिलती है. जेंडर या लिंग भेद जन्म के तुरंत बाद शिशु के साथ सामजिक,आर्थिक और राजनीतिक व्यबहार में बदलाव को दर्शाता है. पितृसत्ता
और शासक वर्ग द्वारा प्रत्येक लिंग के लिए निर्धारित की गयी भूमिकाओं और इन भूमिकाओं के अनुसार गढी गयी छवियों में शिशु को ढालने लिए समाज कमर कस कर तैयार हो जाता हैशिशु के विकास में आर्थिक संसाधन भी उसके लिंग के अनुसार खर्च किये जाते हैं,राजसत्ता भी ऐसी नीतियां बनाती है जो लिंग के आधार पर भेदभाव की मानसिकता को प्रदर्शित करता है लिंग या सेक्स एक प्राकृतिक चीज है जबकि लिंग भेद या जेंडर सामाजिक प्रक्रियाओं की देन, स्त्रीत्व और पुरुषत्व की अवधारणा के रूप में सामने आती ैलिंग भेद की शुरुआत दास समाज में ही शुरू हो गयी थी. भारत में दास प्रथा ज्यादा लंबे समय तक नहीं रही क्योंकि मनुस्मृति ने समाज का जो निर्मम विभेदीकरण किया, उसने सामंती समाज में भी और पूंजीवादी समाज में भी प्रतिक्रियावादी ताकतों के साथ गठजोड़ करके अपने अस्तित्व को मजबूती से बनाये रखा है.

शिशु से स्त्री व् पुरुष बनाने तक का सफर

शिशु के गर्भ में आते ही उसके लिंग के अनुमान को लेकर घर में उत्सुकता भरी हलचल शुरू जाती है. बहुत से पुरुष बेटा होने को अपने पुरुषत्व की जीत के तौर पर देखते हैं. शायद उन्हें पता ही नहीं कि लिंग निर्धारण में पुरुष की ही भूमिका है, स्त्री की नहीं. घर की प्रौढ़ और बूढ़ी औरतें गर्भवती से पूछेंगी कि उसे कैसा महसूस हो रहा है , और लक्षण पूछ कर अनुमान लगाएंगी कि बेटा होगा या बेटी. दाई, नर्स, जान पहचान वाले, रिश्तेदार,मोहल्लेदार, पड़ोसी सभी अनुमान लगाएंगे और कई तो दावा भी कर देंगे कि बेटा होगा. यही नहीं बेटा
होने पर कौन क्या उपहार लेगा ये भी सब जता देते है. बेटी होने का कोई दावा नहीं करता, यदि अनुमान हुआ भी कि बेटी होगी तो चुप रह जाते हैं, कोई बोलता नही है. यदि गर्भवती के पहले से बेटी है, तो पहचान वाले तो छोड़िये अस्पताल में घूम रहे अजनबी भी बेटा होने की दुआ करेंगे। कैसे तैयार होती है यह मानसिकता जो बेटी की पैदाइश को भाग्य का लिखा मानकर स्वीकार करती है, और बेटे की पैदाइश को ईश्वर का तोहफा. यदि परिवार को बेटा होने की उम्मीद है तो गर्भवती की खिलाई-पिलाई पर ध्यान दिया जाएगा, डॉक्टर को दिखाया जाएगा और थोड़ा बहुत आराम का भी ख्याल रखा जाएगा. यदि पहले से एक या दो बेटियां है तो गर्भवती की देखभाल, पोषण, और चेक अप में अनियमितता रहती है. इस पुरे बातावरण में सबसे ज्यादा तनाव में गर्भवती रहती है, भविष्य की अनिश्चितता और चिंता उसे हर वक्त घेरे रहती है . शिशु के जन्म लेने पर उसके लिंग के अनुसार , अर्थात वह नर है, मादा है, या उभयलिंगी (ट्रांसजेंडर ) है, ही सामाजिक व्यवहार किया जाता है. यदि बेटा हुआ है तो जोर शोर से घोषणा होगी, मिठाई बांटी जाएगी, नाना के घर से भी उपहार आएंगे, अपने घर से भी उपहार बांटे जाएंगे, मेहमान आएंगे दावते होंगी,बहुत सी ऐसी रस्मे निभाई जाएंगी जो बेटी के होने में नहीं निभाई जातीं. समाज भी खुशी और हक से दावत और मिठाई मांगेगा. बच्चे की माँ की भी कद्र बढ़ जाएगी. बेटी के होने पर कोई खास चहल-पहल नहीं दिखाई देगी, वह भी अगर दूसरी संतान भी बेटी है तो मातमपुर्सी का माहौल दिखाई देगा. हमारे समाज की यह बहुत बड़ी विडम्बना है कि हम जीवन के यथार्थ, उसकी सच्चाई को देखना ही नहीं चाहते, बल्कि हम जो सोचते है वही देखना चाहते है. जीवन के प्रति यही अवैज्ञानिकता हमारे कष्टों और दुखों का सबसे बड़ा कारण है. यदि शिशु उभयलिंगी ट्रांसजेंडर हुआ तो परिवार के दुखों का पार नहीं, किसी को कानों खबर ना होगी , रातों रात बच्चे को घर से दूर ट्रांसजेंडर समुदाय में भेज देंगे, और फिर कभी उस तरफ पलट कर भी नहीं देखेंगे. लिंगभेद की मानसिकता ने हमारे समाज को किस कदर क्रूर, अमानवीय,डरपोक और कठोर बना दिया है कि अपने ही रक्त बीज से जन्मी संतान की जान लेने, या उसे अनजानी जगह पर छोड़ने पर भी हमारी संवेदनाओं, भावनाओं और विचारों में हलचल तक नहीं होती. कहाँ जाता है उसवक्त माँ बनाने का गौरव और पिता बनने का सुख दुनिया की सबसे बड़ी खुशी है , क्या ये भावनाएं ट्रांसजेंडर बच्चों के लिए नहीं हो सकती. इस प्राकृतिक कारण में उन बच्चों का क्या दोष,और माता पिता का भी क्या दोष है? एक और ओर भेद-भाव जो हमारे समाज में बहुत गहराई से व्याप्त है, और इस बुराई के दुष्प्रभावों पर पर्याप्त फोकस नहीं दिया गया है, वह है त्वचा का रंग, और शारीरिक बनावट से जुडी पूर्वधारणाएं. समाज में गोरे रंग के प्रति एक वहशियाना जूनून है. लड़के का रंग यदि गहरा है तो सोचते हैं की गोरी दुल्हन ले आएंगे, वहीँ अगर लड़की का रंग गहरा है तो पूरा परिवार चिंता में पड़ जाता है कि दहेज की मात्रा बढ़ जाएगी . १५ दिन की बच्ची के रंग, उसके नयन नक्श पर हर व्यक्ति आसानी से बिना यह सोचे कि उसके विकास, या व्यक्तित्व पर क्या प्रभाव पड़ेगा अपनी टिप्पड़ी कर जाता है. दरअसल गोरा रंग, ऊंचा माथा, बड़ी आँखे, ऊंची नाक, पतले होंठ की शारीरिक सुन्दरता की अवधारणा आर्यों का स्थानीय निवासियों को कमतर बताने और अपना प्रभुत्व स्थापित करने का शासक वर्ग द्वारा किया गया आपराधिक षड्यंत्र है. सौन्दर्य के प्रतिमान को सुद्रढ़ करने में भारत के शासक वर्ग और यूरोपियन साम्राज्यवादियों के विचार, मिल गए. इस मिलन को बाजारवाद ने उपरोक्त प्रतिमानों के आधार पर तैयार गुड़िया के माध्यम से घर घर तक पंहुचा दिया.

बच्चों के लिए खिलौने लाये जाते है, बच्चे के लिए मोटर गाड़ी, बन्दूक,गेंद, बल्ला, और नयी-नयी तरह के खिलौने, पर बच्ची के लिए वही गुड़िया, चौका - चूल्हा और बर्तन। गुड़िया का भी दुल्हन रूप सबसे ज्यादा प्रचलित है. एक तरफ तो ये घरों में खेले जाने वाले खेल लड़कियों को घर के अंदर सीमित करके बाहर की दुनिया के अनुभव से वंचित करते हैं, दूसरी तरफ उसे दिमागी तौर पर से घरेलू भूमिका के लिए तैयार करते हैं. बच्चे अपने घर वालों की भूमिका का अनुकरण करते हैं. बेटी माँ का अनुकरण करती है, प्रोत्साहन मिलता है
लेकिन लड़कों को माँ का अनुकरण नहीं करने दिया जाता. दोनों को ही अच्छी तरह से समझाया जाता है कि लड़कियों के काम क्या हैं और लड़कों के काम क्या हैं. लड़कों को घर का काम करने से बल पूर्वक रोका जाता है. उत्तर भारत में तो लड़कों को तो गाने - बजाने व् नृत्य से भी रोका जाता हैबच्चे की देखभाल में सारा घर लग जाता है. उसकी छोटी बहन तक को ताकीद की जाती है कि भाई का ख्याल करे, जैसे- खाना खिलाना, सफाई करना, मुंह पोछना, खेलते समय गिरे ना का ख्याल करना, रोये बिलकुल ना, हर वह ख्वाहिश जो भी परिवार के बस में है, पूरी करने की कोशिश की जाती है. बच्चे को विशेष तौर पर खेल भी खिलाया जाता है, कोशिश रहती है कि बच्चा स्वयं ना करे. बच्चे के अंदर शारीरिक श्रम के प्रति यह नकारात्मक नजरिया आगे के उसके उसके जीवन और समाज पर बुरा असर डालता है. बच्ची को ये सब विशेष सुविधायें उपलब्ध नहीं होतीबच्चे जब स्कूल जाना शुरू करते हैं, बच्चे को तैयार करने, उसका बस्ता तैयार करने ,बस्ता उठा कर स्कुल तक ले जाने काम घर का कोई कोई सदस्य करता है, कुछ आधुनिक परिवारों में बच्ची के लिए भी यह काम परिवार के लोग करते तो है पर साथ-साथ ये चर्चा भी चलती है कि लड़कियों को काम की आदत बचपन से ही डालनी चाहिए, काम स्वयं ही करना चाहिए. गांव में तो बहन ना सिर्फ स्वयं तैयार होती है बल्कि अपने भाई बहनों को भी तैयार करके
स्कुल ले जाती है. स्कूल में अध्यापकों द्वारा,सीनियर विद्यार्थियों द्वारा, सहपाठियों द्वारा रंग, लिंग,जाति,धर्म के
आधार भेद भाव होता है, लेकिन सबसे ज्यादा भेद भाव तो अध्यापकों की यह मानसिकता करती है कि, लड़कियों के बस की पढाई लिखाई नहीं है, और पढ़ भी गयी तो घर में रोटी ही बनानी है कौन सी नौकरी करनी है. लड़कियों के से ड्राप आउट का यह बहुत बड़ा कारण हैकिसी तरह कक्षा 5 पास भी कर ली तो स्कूल गांव से बहुत दूर होगा, सभी लड़कियों का वहां तक जाना संभव नहीं है. इसी तरह इण्टर कॉलेज, डिग्री कॉलेज,तकनीकी शिक्षा संस्थानों तक इन लड़कियों की पहुच घटती जाती है. खराब रास्ते, सार्वजनिक ट्रांसपोर्ट का अभाव, पितृसत्तात्मक वर्चस्ववादी सोच से ग्रस्त छेड़ छाड व् असुरक्षा का माहौल लड़कियों को शिक्षा से दूर करके उन्हें रोजगार के अवसरों से भी वंचित कर देता हैकिशोरावस्था आते आते लड़कों को शारीरिक रूप से मजबूत बनाने के लिए ,पहलवानी, कुश्ती एवं अन्य बाहर खेले जाने वाले खेलों के लिए सुविधाएं जुटायीं जाती हैं, इसी हिसाब से इनकी डाइट का ख्याल रखा जाता है. कम संसाधन हों,तब भी घर के जरूरी खर्च कम करके भी इन सुविधाओं का खयाल रखा जाएगा. सुविधाओं के साथ इस बात ध्यान रखा जाता है कि लड़का खुश
रहे, उदास ना रहे. इसी उम्र में लड़कियों को घर का काम , खाना बनाना, सिलाई, कढ़ाई, अचार चटनी बनाने, गाना, बजाना व् नृत्य सीखने के लिए प्रेरित किया जाता हैमेरा यह आशय नहीं है की ये सभी काम एक साथ सिखाये जाते हैं, लेकिन पढ़ाई के साथ इन सभी में से कुछ ना कुछ कामों को सिखाने पर जोर रहता है. जोर से ना बोलने, बड़ों के सामने मुंह ना खोलने, मर्दों से बहस ना करने की सीख दी जाती है. सुंदर दिखने, दुबली पतली दिखने, रंग गोरा रखने, बाल लंबे और काले रखने का निर्देश दिया जाता है. इतने सारे दवाबों के साथ माहवारी शुरू होने का तनाव और कमजोरी के बावजूद लड़कियों के स्वास्थ्य व् पोषण पर ध्यान नहीं दिया जाता और नतीजा यह निकलता है कि अधिकाँश लड़कियां एनीमिया और कुपोषण की शिकार बन जाती है.

कानून द्वारा बाल विवाह अर्थात 18 वर्ष से कम उम्र में लड़की की शादी पर पाबंदी के बावजूद लगभग ४० प्रतिशत लड़कियों का बाल विवाह होता है. विवाह भी एक सामाजिक व्यापार है जहाँ दोनों पक्षों की आर्थिक व् सामाजिक स्थिति का मेल देखा जाता है, फिर ये तै होता है कि शादी में वधु पक्ष वर पक्ष को कितना आभूषण, पैसा व् अन्य सामान और किन किन रस्मों के वकत देगा. हकीकत यह है कि दहेज स्त्री का सबसे बड़ा अपमान है. कामकाजी स्त्रियों, नौकरी स्त्रियों से भी पुरुष तब शादी को राजी नहीं होता, जब तक मन माफिक दहेज ना मिले. शादी की सारी रस्मे विशेषकर हिन्दू समाज में पुरुष वर्चस्व व् वर्णाश्रम व्यवस्था को स्थापितं करने वाली हैं. अतः विवाह विधी का भी लोकतंत्रीकरण बेहद जरूरी है. शादी के बाद लिंगभेद के बातावरण में तैयार पुरुष और स्त्री आपसी सहयोगी नहीं बल्कि पितृसत्ता के अन्तर्गत श्रेणीगत ढाँचे का हिस्सा बन जाते हैं, जहाँ पुरुष और स्त्री दोनों से परंपरागत भूमिकाओं की अपेक्षा की जाती है. पहले से ही शारीरिक रूप से कमजोर स्त्री बच्चों को जन्म देती है, बच्चे भी कमजोर पैदा होते हैं , सैकड़ों औरतों की तो एनीमिया और कुपोषण के कारन बच्चे पैदा करने में ही जान चली जाती है.स्त्री अपने पति , जो उसका मालिक भी है, की रक्षा, स्वास्थ्य, दीर्घायु, के साथ बेटे , जो उसका बुढापे का सहारा है के लिए भी उपवास रखती है.उसके बच्चे भी कम बेश उसी प्रक्रिया से जिसका ऊपर जिक्र किया है बड़े होने लगते हैंउपरोक्त विवरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि शिशु जन्म लेता है, उसका लिंग और नर, मादा या उभयलिंगी कुछ भी हो सकता है. समाज व्यवस्था स्त्री, पुरुष या किन्नर की विशेषताएं उस पर आरोपित करके यथा स्थिति को बनाये रखने का प्रयास करती है. अतरू वर्तमान सामाजिक व्यवहार, और अर्थ व्यवस्था को बदलने सिर्फ पितृसत्ता से ही संघर्ष नहीं बल्कि
सामाजिक न्याय, लोकतंत्र,और सामान अधिकार के लिए चल रहे संघर्ष में शामिल होने और इन प्रयासों को तेज करने की आवश्यकता हैस्त्री समानता की भावना निष्क्रिय भागीदारी से नहीं, ना ही घर में बैठकर और ना ही कानून या पुलिस से आएगी. यह तब होगी जब स्त्री-पुरुष साथ-साथ-संघर्ष करेंगे. साझा संघर्ष में आपस में बहस- मुबाहिसे होंगे, कभी-कभी होंगे,हो सकता है कभी कटुता भी जाये तो कभी निकटता भी हो सकती है. यही वैचारिक संघर्ष शॉसकों के वर्चस्व के आधार स्तम्भ पितृसत्ता, राजसत्ता और पूंजी के राज को ध्वस्त करने के लिए चल रहे आन्दोलनों को मजबूत करेगा. साझा आंदोलन के अन्य घटकों को भी समझना चाहिए कि सशक्त आंदोलन की परिस्थितियां तभी बनेंगी जब महिलाओं की सक्रीय,सजग, और सक्षम भागीदारी आंदोलन में होगी और स्त्री चेतन में नारी मुक्ति के साथ मानव मुक्ति का लक्ष्य सामने होगा. स्त्री पराधीनता की शुरुआत व्यक्तिगत संपत्ति और समाज में वर्ग विभाजन के साथ शुरू हुई,और यह व्यक्तिगत संपत्ति के खात्मे और वर्ग विहीन समाज स्थापना के साथ ही खतम
होगीबार-बार पूछे जाने वाले कुछ सवाल और उनके जवाब- ( पृश्न संख्या - तक की अधिकाँश सामग्री आज के पृश्न श्रृंखला में प्रकाशित वन्दना चक्रवती के साक्षात्कार से साभार ली गयी है.)

प्रश्न - प्राचीन भारत या वैदिक युग हमारा स्वर्ण काल था, उस वक्त समाज में स्त्रियों का बड़ा आदर था, उनकी पूजा की जाती थी. हमारी प्राचीन संस्कृति में स्त्रियों को बड़ा उच्च स्थान प्राप्त था.
 उत्तर -अतीत को महिमामंडित करने और स्त्री पुरुष संबंधों को आदर्शीकृत करने का यह प्रयास सच्चाई पर नहीं, कल्पना पर आधारित है. इस कल्पना पर बल उन्नीसवीं शताब्दी के समाज सुधारको ने स्त्री शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए प्राचीन काल की गार्गी और मैत्रेयी जैसी स्त्रियों के उदाहरण देकर दिया था कि देखो,हमारे यहाँ भी स्त्रियां कितनी विद्वान होती थीं, पुरुषों से शास्त्रार्थ करती थीं. यह उदाहरण उस युग में पितृसत्ता की मजबूती को भी स्पष्ट करता है. गार्गी और याज्ञवल्क्य के बीच शास्त्रार्थ की कथा बड़ी दिलचस्प है.एक बार राजा जनक ने अश्वमेघ यज्ञ के अवसर पर शास्त्रार्थ का आयोजन किया और सर्व श्रेष्ठ विद्याएं को स्वर्ण मुद्राओं के साथ १००० गायों का पुरूस्कार देने की घोषणा की. याज्ञवल्क्य ने घमंड से कहा कि यहाँ में ही सबसे बड़ा विद्वान हूँ , और यह कह कर गांव को लेकर चल दिए. लेकिन उसे विद्वानों ने चुनौती दी, जिनमे पुरुष और स्त्री थी.पाँचों विद्वान याज्ञवल्क्य से हार गए, तब गार्गी की बारी आयी. इससे एक तो यह पता चलता है कि उस वक्त पुरुषों की तुलना में स्त्रियाँ बहुत कम शिक्षित थीं, दूसरा यह है कि स्त्रियों को हीन दृष्टी से देखा जाता था, इसीलिये गार्गी की बारी सबसे आखिर में आयी. खैर गार्गी और याज्ञवल्क्य के बीच शास्त्रार्थ होने लगा. याज्ञवल्क्य गार्गी के प्रश्नों से परेशान हो गए, पहले तो उसने गार्गी को यह कहकर डांटा कि वह ,प्रश्न बहुत पूछती है. फिर क्रोध में आकर कहा कि अगर तूने कोई कोई और प्रश्न पूछा तो तेरा सिर कट जायेगा। अब आप ही बताईये, जब भरी सभा में कोई पुरुष किसी स्त्री को , और वह भी साधारण स्त्री नहीं विदुषी स्त्री को ऐसी धमकी देता है तो इससे क्या पता चलता है ? उस जमाने में भी अगर कोई स्त्री सवाल करती थी, या कोई तार्किक बात करती थी तो उसे बलपूर्वक चुप करा दिया जाता था. किसी को भी बोलने ना देना, उसके विरुद्ध सबसे बड़ी हिंसा है क्योंकि जब धमकी से काम चल जाता है तो फिर वास्तविक हिंसा की कोई जरूरत ही नहीं पड़ती। यह अप्रत्यक्ष हिंसा ही व्यक्ति को सत्ता का समर्थक बनाती है, चाहे वह राज सत्ता हो, धर्म की सत्ता हो या पुरुष सत्ता .
प्रश्न - आदिम काल में मातृसत्तात्मक समाज था. आज भी कई आदिवासी समाजों मातृसत्तात्मक समाज है , स्त्री हिंसा आधुनिक समाज की देन है?
 उत्तर - आदिम समाज में कबीले को माँ के नाम से पहचाना जाता था. स्त्री ही समूह की मुखिया थी. मातृसत्ता जैसी कोई चीज नहीं है. कुछ स्थानों या समाजों में आज भी पिता की जगह माँ परिवार की मुखिया होती है वंश पिता के नाम से नहीं माता के नाम से चलता हैलेकिन इसे पितृसत्ता के ठीक विपरीत व्यवस्था समझना ठीक नहीं है. पितृ सत्ता में जिस तरह स्त्री शरीर, उसके श्रम, उसके स्त्रीत्व पर पुरुष का नियंत्रण होता है , उसी तरह पुरुष के श्रम , उसके शरीर पर स्त्री का नियंत्रण कभी भी कहीं भी नहीं रहा. आज भी कुछ समाजों में वंश मान के नाम से चलता है लेकिन इसके लिए सही शब्द उंजतपंतबील या मातृसत्ता नहीं बल्कि उंजतपसपदल मातृवंशीयता है. स्त्री हिंसा से ही चली रही है. ऊपर दिए उदाहरण में आपने देखा याज्ञवल्क्य गार्गी को बोलने नहीं देते. यह तो बहुत बड़ी जिनसे है जहाँ शारीरिक हिंसा के बिना ही काम हो जाता है। जैसा हम कहें वह ठीक, और पीड़ित स्त्री बिना प्रतिरोध के उसे मान ले. शुरू के दौर को छोड़ दे तो समाज के विकास के हर दौर में हिंसा और भेदभाव उसके रूप बदल जाते हैं.
प्रश्न - कहा जाता है कि स्त्री और पुरुष के बीच पृकृति ने ही ऐसा श्रम विभाजन कर रखा है कि स्त्री घर में रहकर बच्चे पाले पुरुष घर से बाहर जाकर काम करे और कमा कर लाये ?
उत्तर -  यह सच है कि स्त्री पुरुष में जैविक भिन्नता एक प्राकृतिक भिन्नता है. पृकृति में ऐसा कुछ नहीं है जो स्त्री को पुरुष के आधीन करने या घरेलु काम करने की बाध्यता पैदा करेसेक्स एक प्राकृतिक चीज है और जेंडर की अवधारणा समाज ने गढ़ी है. आरंभिक मानव समाजों या आदिम समाज में कहीं भी स्त्री पर पुरुष का नियंत्रण नहीं पाया जाता. दरअसल, पुरुष को स्त्री से श्रेष्ठ बताने के लिए यह कहा जाता है कि वह शुरू से घर के लिए रोटी कमाने वाला या इतमंक ूपददमत रहा है. दलील यह दी जाती है कि आरंभिक समाज में पुरुष शिकार करने जाते थे और स्त्रियाँ घर और बच्चों को सम्हालती थीं. लेकिन इतिहास बताता है कि शिकार और आहार संग्रह का काम एक साथ होता था. पुरुष शिकार करने के लिए जाते थे, और स्त्रियाँ आहार - संग्रह के लिए जाती थीं. भोजन में शिकार करके लाये मांस का हिस्सा कम होता था और स्त्रियों द्वारा संग्रह किये गए कंद - मूल - फल का ज्यादा. आदिवासी समाजों में आज भी हैं कि स्त्रियों पर पुरुषों का वैसा नियंत्रण नहीं होता जैसा सामंती या उत्पादन से जुड़े समाजों में होता है. इससे स्पष्ट है की जेंडर अवधारणा, और पितृसत्ता का विकास ना तो प्राकृतिक है और ना ही सदा से ऐसा चला रहा है, बल्कि ये बाद में आने वाली चीजे हैं.

प्रश्न - वर्गीय, जातीय,और साम्प्रदायिक हिंसा में प्रत्यक्ष हिंसा भी दिखायी देती है ,और दूसरी तरफ से भी संगठित विरोध भी दिखायी दे ही जाता है, पर महिला हिंसा के मामले में प्रत्यक्ष हिंसा या विरोध कम ही होता है
उत्तर- जाति , वर्ग और संप्रदाय की हिंसा को स्त्री के लिए समझना आसान है. पर अपने ही घर, जाति , संप्रदाय और वर्ग में अपनी स्थिति को समझना मुश्किल हो जाता है. पुरुष होने के नाते अन्याय करने वाला मेरा ही भाई, बेटा , या पति है , ऐसे में भावनाएं आड़े जाती हैं. यही नहीं भावनाओं के साथ रिश्ते, रिवाज , परम्परायें , परिवार, बच्चों की सुरक्षा, आदि की चिंता भी प्रतिरोध को कुंद करने और परिस्थितियों से अनुकूलन करने की ओर ले जाती हैइस तरह वे पुरुषों द्वारा किये अत्याचारों में सहभागी हो जाती हैं,यही कारण है कि पितृ सत्ता का विरोध एक सीमा से आगे नहीं जा पाता . इसके बिना पितृसत्ता चल ही नहीं सकती। लेकिन इस व्यवस्था के विरोध में महिलाएं समय-समय पर आवाज उठाती रही हैं.
प्रश्न - स्त्री वाद, स्त्री मुक्ति ,न्याय, समानता के लिए स्त्री संघर्ष की बातें पश्चिम की अवधारणा है, पश्चिम की नकल करने वाली आधुनिकता की शिकार महिलाएं इसका प्रचार कर रही हैं. हमारे देश की परम्पराओं और संस्कृति में ऐसे विचारों की कोई जगह नहीं है ?
उत्तर - स्त्री मुक्ति आंदोलन के महत्त्व को कम करने के लिए पितृसत्ता के समर्थक इस तरह का दुष्प्रचार करते हैं. स्त्रियों का स्वयं के अस्तित्व का अहसास करना , इसे बनाये रखने के लिए संघर्ष करना, सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर स्त्री विरोधी सवालों पर प्रश्न चिन्ह लगाना, और इन प्रश्नों पर अपने सवाल खड़े करना समाज में पुराने समय से ही चला रहा है. बुद्ध ने अपना संघ बनाया उसमे शुरू में स्त्रियों आने की अनुमति नहीं थी, लेकिन बाद में स्त्रियों के संघ में आने की इच्छा के आगे उन्हें झुकना पड़ा और संघ में आने की अनुमति देनी
पडी. बौद्ध साहित्य में कुछ रचनाएं मिलती हैं जिन्हें थेरी गाथा कहते हैं. वृद्धा बौद्ध भिक्षुणियों को थेरी कहा जाता था. थेरी गाथा में इन वृद्धा बौद्ध भिक्षुणियोंने सामजिक बंधनों से मुक्ति पुरुष समानता के गीत, उनके आध्यात्मिक अनुभव जीवन की संक्षिप्त कहानियाँ हैं. ये गाथाएं स्त्रियों के अपने बारे में लेखन अपने लेखन के सबसे पुराने प्रमाण हैं. 18वीं शताब्दी में पितृसत्ता की आलोचना मुखर हो जाती है. पंडिता रमाबाई, ताराबाई शिंदे ने पितृसत्ता की तीखी आलोचना की।

इसके बाद तो स्त्री मुक्ति आंदोलन की बहुत सी धाराएं देखने को मिलती हैं. कुल मिला कर बात यह है कि पितृसत्ता की आलोचना, इसके साथ संघर्ष प्राचीन समय से ही हमारे समाज का हिस्सा रहा है. इस तरह समझ सकते हैं कि पितृसत्ता स्त्री को पुरुष के आधीन रखने की व्यवस्था है और स्त्री मुक्ति इस जकड़न से छूटने की छटपटाहट। स्त्री वाद, स्त्री मुक्ति ,न्याय, समानता के लिए स्त्री संघर्ष की बातें हमारे समाज में प्रारम्भिक दौर से ही रही हैं. ये हमारी संस्कृति और इतिहास का हिस्सा है.
 प्रश्न - स्त्री के जीवन की पूर्णता मातृत्व में निहित है, यही जीवन का सच्चा सुख और उद्देश्य है. जो स्त्री इस सुख से वंचित है, उसका जीवन निरर्थक है
उत्तर - सृजन का आनंद संसार में सबसे ज्यादा है. सृजन की पीड़ा और आनंद का वर्णन बहुत से कवि और लेखकों ने किया है. स्त्री स्वयं सृजनकर्ता है, वह स्वयं नए जीवन का सृजन करती है, सृजन की पीड़ा से गुजराती है, इसीलिये अपने द्वारा सृजित जीवन की भलाई की कामना जिंदगी भर करती है. सृजन की इस पीड़ा और आनंद का अनुभव हमें कार्यों से भी मिलता है. सृजन के अनुभव को सिर्फ मातृत्व में सीमित करके स्त्री को समाज के अन्य दायित्वों करना पितृसत्ता और राजसत्ता का षडयंत्र है. दूसरी बात यह है कि नए जीवन का अकेले नहीं करती, पुरुष भी है. अतः यदि मातृत्व इतना महत्वपूर्ण है तो पितृत्व या पिता बनना भी उतना ही आनंददायक,गौरवपूर्ण और महत्वपूर्ण होना चाहिए . यदि मान भी लें कि मातृत्व महत्वपूर्ण है तो बेटी या उभयलिंगी संतान का गौरव क्यों नहीं मनाया जाता. समाज में मातृत्व का इतना बड़ा हौव्वा खड़ा किया जाता है कि जो स्त्री किसी कारन से माँ नहीं बन पाती, वह अपने जीवन को अभिशप्त मानती है. ये तो चिकित्सा विज्ञानं की तरक्की ने बता दिया कि शिशु के लिंग निर्धारण में स्त्री की भूमिका नहीं है, और संतान ना पैदा होने का कारण पुरुष भी हो सकता है, और स्त्री की जान बची. वरना समाज इन कारणों के लिए स्त्री को ही दोषी ठहराता था. माँ बनाना स्त्री का प्राकृतिक गुण है,और मातृत्व का महिमामंडन पितृसत्ता का छल.
प्रश्न - ऐसा माना जाता है कि स्त्री प्रेम, त्याग, तपस्या, बलिदान,की प्रतिमूर्ति है, वे भावुक होती हैं, तार्किक और कठोर निर्णय नहीं ले सकती अतरू वे घर से बाहर काम करने के योग्य नहीं हैं
उत्तर- शिशु जन्म लेने के बाद अपने परिवेश, घर, परिवार और समाज के बीच सीखते हुए बड़ा होता है. बच्ची की परवरिश इस तरह की होती है वह घर के अंदर, और ज्यादा से ज्यादा शिक्षण संस्थान तक सीमित रहती है. उसके साथ की अन्य लड़कियों का भी अनुभव जगत ऐसी की तरह बहुत सीमित होता है. जबकि लडके बचपन से खेल, कूद,दौड़ना भागना, कूदना , गिरना में बिंदास भागीदारी करते हैं. लड़कियों विभिन्न सामाजिक वर्जनाओं के कारण चीजों से रोका जाता है जो इंसान में जबरदस्त आत्मविश्वास पैदा करती हैं. लड़कों का ऐसे
भी लड़कों से मिलना जुलना रहता है जो कभी-कभी शराब पी लेते हों, असलाह चलाना जानते हों, असलाह रखते भी हों, लड़ाई-झगड़ा करते हों, हो सकता है एकाध बार हवालात में भी रह आया हो, या फिर जो पढाई में अच्छे हो, उनके पास अच्छी अतिरिक्त किताबें हों, घर में कोई मदद करने वाला हो, आगे लिए अच्छे संस्थानों के बारे में जानता हो ...आदि ...आदि

इन सब का साथ लड़कों के अनुभव जगत को विस्तार देता है. लड़कियों को यह मौका नहीं मिलता. स्त्रियों को मजबूत नहीं बनने दिया जाता क्यों कि अबोधता, अज्ञानता, भावुकता लड़कियों का गुण माना जाता है. इस कारण कुछ हद तक स्त्रियों में भावुकता का पुट ज्यादा हो जाता है पर यह कोई कमजोरी नहीं है. दूसरी और पुरुषों में भी भावुकता होती है पर पितृसत्तात्मक समाज इसे अभिव्यक्त नहीं करने देता. स्त्रियां संबंधों को भी बहुत महत्त्व देती हैंइतिहास गवाह है कि स्त्रियां ना सिर्फ शासक रही हैं बल्कि आज वे शासन- प्रशासन के वरिष्ठ पदों पर भी हैं. जिन स्त्रियों को भी व्यापक अर्थों में सीखने का अवसर मिला, उन्होंने स्वयं को कहीं पीछे नहीं रहने दिया. यह भ्रम कि स्त्रियां कठोर निर्णय नहीं ले सकती, अब टूट रहा है लेकिन यथास्थिति वादी ताकतें मजबूती इस भ्रम को खिलाफ प्रयोग कर रही हैं.