सोमवार, 25 फ़रवरी 2019

SADBHAVNA SAMITI ROHTAK


सदभावना समिति एवं नागरिक मंच, रोहतक
प्रैस विज्ञप्ति
रोहतक 25 फरवरी। सद्भावना समिति एवं नागरिक मंच रोहतक के संयुक्त तत्वावधान में आज महामहिम राष्ट्रपति के नाम जिला उपायुक्त डॉ. यश गर्ग को ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में पुलवामा में हुए आतंकी हमले की निन्दा करते हुए सभी नागरिकों से विवेक बनाए रखने का आग्रह किया गया। साथ ही सरकार से भी मांग की गई है कि सरकार शहीदों के परिवारों के जख्मों पर फौरन मरहम लगाई जाए। इन परिवारों को बिना किसी देरी के आर्थिक सहायता उपलब्ध करवाई जानी चाहिए। इस सन्दर्भ में कोई कोताही नहीं की जानी चाहिए। इन परिवारों को ही नहीं, सभी शहीदों के परिवारों को, भारतीय सेना के शहीदों के बराबर रखते हुए आर्थिक एवं अन्य सहायता उपलब्ध करवाई जानी चाहिए। यह भी आवश्यक है कि कम से कम सभी अर्द्ध-सैनिक बलों को तो वास्तविक पेंशन दी ही जानी चाहिए और उन के साथ 2004 के बाद पेंशन के नाम पर किया जाने वाला दिखावा नहीं किया जाना चाहिए। इस के साथ ही सामान्य हालात में भी काम के दौरान इन को मिलने वाली सुविधाओं और संसाधनों में भी सुधार की जरूरत है।
      ज्ञापन में आगे मांग की गई है कि यह भी आवश्यक है कि इस साजिश में शामिल सभी व्यक्तियों को कानून के तहत कड़ी से कड़ी सजा देने का हर उपाय किया जाए। इन के अलावा जिन की लापरवाही से यह कांड हुआ हो, उन को भी चिन्हित कर आवश्यक कारवाई की जानी चाहिए। इस कांड में सब कार्यवाही न्याय की दृष्टि से की जानी चाहिए न कि बदला लेने की भावना से। कोई भी सभ्य समाज सजा अवश्य देता है लेकिन बदला नहीं लेता। इस के साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि इस कांड में शामिल दोषियों के अलावा किसी भी निर्दोष को दण्डित या प्रताड़ित नहीं किया जाए। असल में तो इस घटना की आड़ में तनाव फैलाने की किसी भी कोशिश से कड़ाई से निपटा जाना चाहिए। ऐसा न करने से देश में अलगाव फैलाने वाली ताकतों के मंसूबों को मजबूती मिलती है।  हम यह भी दर्ज करवाना चाहेंगे कि देश के अन्य राज्यों में रह रहे कश्मीरी छात्रों में पैदा की जा रही असुरक्षा की भावना राष्ट्र हित में नहीं है।
      ज्ञापन में यह भी कहा गया है कि असल में तो यह कश्मीर में बरसों से जारी हिंसा की ही अगली कड़ी है। दोषियों को सजा अवश्य हो लेकिन युद्धोन्माद से बचना बेहद जरूरी है। शहीदों को वास्तविक श्रद्धांजली कश्मीर में  शांति और न्याय की बहाली करना होगा ताकि फिर कोई बच्चा अनाथ न हो, किसी माँ-बाप को अपने बेटे-बेटी को कंधा न देना पड़े और कोई महिला विधवा न हो। इस के लिए संवैधानिक दायरे में रहते हुए सभी उपाय किए जाने चाहिएँ। कश्मीर में हिंसा के इस लम्बे दौर में भी तुलनात्मक रूप से शांति के कई दौर रहे हैं और वे इन उपायों की सार्थकता और सम्भावनाओं को रेखांकित करते हैं। स्थायी शांति न्याय-आधारित ही हो सकती है। भारत सरकार इस दिशा में कदम उठाए, हम पूरी तरह से उस के साथ हैं।
जारीकर्ताः प्रो महावीर सिंह नारवाल, संयोजक सद्भावना समिति, रोहतक मो. 9416961039
विनोद देशवाल, संयोजक, नागरिक मंच, रोहतक मो. 9813444392

बुधवार, 20 फ़रवरी 2019

अदम गोंडवी

हिन्दू या मुस्लिम के अहसास को मत छेड़िये

अपनी कुर्सी के लिए जज्बात  को मत छेड़िये

इनमें कोई हूण , कोई शक कोई मंगोल है

दफ़न है जो बात , उस बात को मत छेड़िये


गलतियां बाबर ने की थी , जुम्मन का घर
फिर क्यों जले

ऐसे नाजुक दौर में हालात को मत छेड़िये


हैं कहाँ हिटलर , हलाकू , चंगेज ख़ाँ

मिट गए सब कौम की औकात को मत छेड़िये


छेड़िये एक जंग मिलजुलकर गरीबी के खिलाफ

दोस्त मेरे मजहबी नगमात को मत छेड़िये


-----अदम गोंडवी 

मंगलवार, 19 फ़रवरी 2019

इन्सान की मुक्ति की नैतिकता


      मनुष्य एक सामाजिक जीव है। यह एक सर्व मान्य सच्चाई है। अपने जीवन के सामाजिक उत्पादन में मनुष्य ऐसे निश्चित सम्बन्धों में बन्धते हैं , जो एक प्रकार से जरुरी होते हैं और उनकी इच्छा से स्वतन्त्र होते हैं। उत्पादन के ये सम्बन्ध उत्पादन की भौतिक शक्तियों के विकास की एक निश्चित मंजिल के अनुरुप होते हैं। इन उत्पादन सम्बन्धों के पूर्ण योग को ही समाज के आर्थिक ढांचे की संज्ञा दी जाती है। यह आर्थिक ढांचा ही है जिस पर कानून और राजनीति का उपरी ढांचा अपना जामा पहनता है।ं इसके अनुकूल ही सामाजिक चेतना के निश्चित रुप होते हैं।
       भौतिक जीवन की उत्पादन प्रणाली जीवन की आम सामाजिक , राजनीतिक और भौद्धिक प्रक्रिया को निर्धारित करती है। मनुष्यों की चेतना उनके अस्तित्व को निर्धारित नहीं करती, बल्कि उनका सामाजिक अस्तित्व ही उनकी चेतना को निर्धारित करता है।
    समाजिक उत्पादन प्रणाली विकास की एक खास मंजिल पर पहुंच कर उन सम्पति सम्बन्धों से टकराती है जिनके अर्न्तगत वह उस समय तक काम करती होती है। मुर्गी का बच्चा अन्ततः अन्डे के खोल को ; जिसने उसे पलने बढ़ने में मदद की द्ध तोड़ कर ही जीवन का विकास करता है। ये सम्पति सम्बन्ध उत्पादन प्रणाली के अनुरुप न रह कर उसके लिए बेड़ियां बन जाते हैं। उस वक्त सामाजिक क्रान्ति का युग शुरु होता है।
       आर्थिक बुनियाद के अन्दर बिना मूल भूत परिवर्तन किये समाज का आगे का विकास सम्भव नहीं रहता। इस मूल भूत बदलाव को ही समाज परिवर्तन कहा जा सकता है। इसके हिसाब से ही समाज की मान्यतांएं, कायदे कानून , रीति रिवाज भी बदलते हैं। परन्तु यह सब इतना सीधी रेखा में नहीं होता । यह काफी जटिल प्रक्रिया है। ऐसे बदलाव पर विचार करते समय एक भेद हमेशा ध्यान में रखना चाहिए कि कोई भी समाज व्यवस्था तब तक खत्म नहीं होती जब तक उसके अन्दर तमाम उत्पादन शक्तियां ;  जिनके लिए उसमें जगह है द्ध विकसित नहीं हो जाती और नये उच्चतर उत्पादन सम्बन्धों का आविर्भाव तब तक नहीं होता जब तककि उनके अस्तित्व की भौतिक परिस्थितियां पुराने समाज के गर्भ में ही पुष्ट नहीं हो चुकती।
        जीवन चेतना द्वारा निर्धारित नहीं होता अपितु चेतना जीवन द्वारा निर्धारित होती है। अर्थात मनुष्य अपने भौतिक उत्पादन तथा अपने भौतिक संसर्ग का विकास करते हुए अपने इस वास्तविक अस्तित्व के साथ अपने चिन्तन के परिणामों का विकास करते हैं और बदलते भी हैं।
        यहां यह भी ध्यान रखना होगा कि जहां आर्थिक परिस्थिति बुनियाद है वहीं पर उपरी ढांचे के विविध तत्व -वर्ग संघर्ष के बाद संस्थापित राज्य प्रणाली , उसके परिणाम , धार्मिक मत और पद्धतियों रुप में उनका विकास ऐतिहासिक संघर्ष के प्रकरण पर अपना प्रभाव डालते हैं। बहुत जगह तो संघर्ष के रुप के निर्धारण में इनका ही पलड़ा भारी रहता है । यह अलग बात है कि आर्थिक गति अन्ततः अनिवार्य गति केरुप में प्रगट होती है। इस प्रकार सामाजिक उत्पादन प्रणाली तथा उसके उत्पादन पर स्वामित्व में दो तरफा संघर्ष चलता है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि राजनीति ,न्याय, दर्शन, धर्म,साहित्य , कला आदि का विकास ‘आर्थिक विकास’ पर आश्रित होता है। परन्तु ये सब आपस में एक दूसरे को और ‘आर्थिक आधार’ को भी प्रभवित करते हैं।
          सताधारी वर्ग के विचार हर युग में सताधारी विचार हुआ करते हैं। कहने का सबब है कि जो वर्ग समाज की सताधारी भौतिक शक्ति होता है वह साथ ही उसकी सताधारी बौद्धिक शक्ति भी होता है। जिस वर्ग के पास भौतिक उत्पादन के साधन होते हैं उसका साथ ही साथ ही साथ बौद्धिक उत्पादन पर भी नियन्त्रण रहता है।
    अपने से पहले शासन करने वाले वर्ग के स्थान पर पदासीन होने वाला वर्ग अपने लक्ष्यों की प्राप्ति की खातिर ही अपने हितों को समाज के तमाम सदस्यों के हितों के रुप में प्रस्तुत करने के लिए बाधित होता है। उसे उन विचारों को सार्वत्रिकता का रुप देना पड़ता है, उन्हें वैध विचारों के रुप में प्रस्तुत करना पड़ता है। पूरा समाज उन मूल्यों को अपना भी लेता है। काफी समय तक ऐसा चलता है। परन्तु जब उत्पादन के सम्बन्धों तथा उत्पादन की ताकतों में टकराहट शुरु होती है तो यह ‘ सबके लिए’ वाला मुखौटा टूटने लगता है और सार्व भौमिकता ; सबके भले   की बात की पोल खुलने लगती हैद्ध का सपना बिखरता है। साधन सम्पन्न वर्गों के हितों की तरफदारी करते हुए ये नारे साफ साफ तौर पर दिखाई देने लगते हैं।उदाहरण के लिए आज भयंकर बेरोजगारी की समस्या पर हरियाणा में नजर डाल कर देखें तो पायेंगे कि अच्छी जमीन वाले या अच्दी हैसियत रखने वाले परिचारों के लड़के लड़कियों में बेरोजगारी न के बराबर है। दूसरी तरफ बेरोजगारी का सवाल प्रभावित बहुत बड़े हिस्से को करता है। पैसे वाले की निखद से निखद औलाद को बेरोजगारी की चिन्ता नहीं होती।
         क्रान्ति करने वाला वर्ग क्योंकि सतासीन वर्ग के विरुद्ध है- आरम्भ से ही एक वर्ग के रुप में नहीं वरन पूरे समाज के प्रतिनीधि के रुप में प्रकट होता है। पा्रचीन दुनिया जिस समय अपनी अन्तिम सांसें गिन रही थी उस समय प्राचीन धर्मों को ईसाई धर्म ने पराभूत किया था। जब अठाहरवीं शताब्दी में ईसाई मत बुद्धिजीवी विचारों के सामने धाराशायी हुआ , तब सामंती समाज ने तत्कालीन क्रान्तिकारी बुर्जुआ समाज से अपनी मौत की लड़ाई लड़ी थी।
    बहुत से लोग यह मान कर चलते हैं कि ‘ यह ठीक है कि इतिहास के विकास क्रम में धार्मिक, नैतिक, दार्शनिक,राजनीतिक और कानून सम्बन्धी विचार बदलते आये हैं। मगर इनमें से और भी बहुत से और दूसरे लोग यह भी मानते हैं कि धर्म , नैतिकता,दर्शन, राजनीति और कानून तो सदा इस परिवर्तन से बचे रहे हैं। उनका मानना है कि क्योंकि स्वाधीनता , न्याय, भाईचारा आदि ऐसे शाश्वत सत्य हैं जो हर सामाजिक अवस्था में समान रुप से लागू होते हैं। इन लोगों की यह भी धारणा है कि साम्यवाद इस समाज में धर्म व नैतिकता आदि के शाश्वत सत्यों को खत्म कर देता है, मगर यह पूर्ण रुप से असत्य है।
         समाज अनेक पगकार के लोगों के आचरण पर प्रभाव डालता है। लोगों का आचरण समाज के विकास को प्रभावित करता है। ये आचार मूल्य या मानक प्रथाओं द्वारा लागू होते हैं या कानून के द्वारा लागू किये जाते हैं। नियमन के इनक कार्यक्लापों में नैतिकता का खास स्थान है। मनुष्य की गतिविधियों का कोई भी ऐसा रुप नही है जो नैतिकता के दायरे से बाहर हो। अपने व्यवसायमें,परिवार में,दैनिक जीवन में हम नैतिक मूल्यों की बात करते हें। ये सभी  नैतिक अपेक्षाएं इस बात की धारणा पर आधारित होती हैं कि व्यक्ति के लिए क्या करने योग्य है?इन अपेक्षाओं की वैचारिक अभिपुष्टि होती है।
          नैतिक आचरण नैतिक आदर्शों और सिद्धान्तों के अनुरुप होता है। इनमें भलाई और बुराई की संकल्पनाओं का विशेष स्थान होता है। नैतिक धारणाओं को समाज निरुपित  करता है और उसके विकास के साथ साथ ही ये धारणाएं भी बदलती जाती हैं।प्रत्येक समाज की नैतिकता में सारी मानव जाति के लिए एक समान लक्षण भी होते हैं- अनुकंपा, सहानुभूति, वचनबद्धता,मित्रों की सहायता करने और रोगियों एवम दुर्बलों की हित चिन्ता की तत्परता-ये सब वे नैतिक गुण हें जिन्हें आदिम समाज में तथा उसके बाद की समाज विकास की सभी अवस्थाओं में भी बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस प्रकार के नैतिक मूल्य किसी भी मानव समाज के मूलभूत नियम होते हैं।
         किन्तु व्यक्ति के नैतिक कर्तव्यों के बारे में धारनाएं बहुधा समय केअनुसार बदलती रहती हैं। प्रत्येक वर्ग आधारित समाज में शासक वर्ग की नैतिकता का वर्चस्व होता है। साधन सम्पन्न वर्गों की वर्गीय नैतिकता पहले दासता को , फिर भूदासता के अधिकार को,फिर मजदूरों का शोषण करने के पूंजीपति के अधिकार को स्वाभाविक , अपरिहार्य और चिरस्थाई घोषित करती है। इस या उस समाज के संकट ग्रस्त होने तक समाज के अधिसंख्य शोषित सदस्य भी इस नैतिकता को स्वीकार करते हैं।
        प्राचीन युग के ‘ सच्चे दास’ सामन्तकालीन ‘ आज्ञाकारी प्रजा’ तथा बुजुआ देशों के वे मजदूर जो मिल -कारखाने के स्वामी को अपना ‘ अन्नदाता’ और ‘माई बाप’ समझते हैं, ये सब इस बात का उदाहरण हैं कि किस प्रकार उत्पीड़ित जन  एक समय तक शोषकों के इन नैतिक मूल्यों को भी स्वीकार करते हैं जो सारतः इन जनों के विरुद्ध ही लक्षित होते हैं ।
      शासक वर्ग की नैतिकता का छोटी उम्र से ही आम आदमी पर कितना गहरा प्रभाव पड़ता है यह हम कई साहित्यिक उदाहरणों में स्पष्टतः देख सकते हैं । प्रत्येक युग में उत्पीड़कों की नैतिकता के मुकाबले में उत्पीड़ितों की नैतिकता भी होती है। दासों, भूवासों, मजदूरों, के विद्रोह अन्य सब बातों के अलावा इस नैतिकता का होना भी प्रमाणित करते हैं। उनकी नैतिकता को समझाना तथा उसका भिन्न भिन्न माध्यमों से विकास करना एक महत्वपूर्ण काम है। इसके बिना समाज परिवर्तन की बात अधूरी है। इन उत्पीड़ितों में सफलता पूर्वक काम कर पाना मुश्किल है। इसके लिए एक वैकल्पिक सांस्कृतिक और वैज्ञानिक रुझान के लिए आन्दोलन भी अपेक्षित हैं। इसके बिना भरे पूरे इन्सान की कल्पना तथा ऐसा इन्सान बनाने के लिए सड़ी जा रही सड़ाई अधूरी है।
       प्रत्येक व्यक्ति की नैतिक चेतना चारों और के संसार के अर्न्तविरोध को प्रतिबिम्बित करती है और विभिन्न नैतिक सिद्धान्तों के बीच संघर्ष का अखाड़ा भी बनती है। वास्तव में नैतिकता मानव समाज को अधिक उंचा उठाने,उसे श्रम के शोषण से मुक्त कराने के उद्येश्य की पूर्ति के लिए है। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि धर्म के बिना नैतिकता का अस्तित्व असंभव है परन्तु इतिहास इस कथन का खण्डन करता है।
         राम राज्य अर्थात लोगों के राज्य के स्थापित करने का मतलब वहीं से शुरु होता है जहां मजबूरी तथा बाहरी औचित्य ें निर्धारित श्रम का अन्त होता है। ठीक, सच्ची, आर्थिक ,राजनीतिक तथा आत्मिक स्वतन्त्रता के हालात में ही इन्सान की सृजन शील योग्यता का विकास पूर्ण रुप हो सकता है। इस प्रकार की स्वतन्त्रता सर्वहारा वर्ग की विचारधारा से युक्त समाज में ही सम्भव हो सकती है तथा कलात्मक संस्कृति केविकास में अन्नत प्रगति की असीम सम्भावना प्रदान कर सकती है। क्योंकि इस विचार धारा में ह ीवह ताकत है जो संसार को बदल सकती है और महज अर्थ व्यवस्था तथा राजनीति के ही क्षेत्र में ही नही बल्कि संस्कृति के क्षेत्र में भी प्रगति सुनिश्चित कर सकती है। मानव जाति के उच्च नैतिक तथा सौंदर्यात्मक मूल्यों को पूर्णतः मूर्तरुप देने के लिए अवस्थाएं निर्मित कर सकती है। हमें आज के साहित्य एवम कला की सर्वोतम परम्पराओं को आत्मसात करते हुए इन्सान की मुक्ति के लिए चल रहे संघर्ष में सक्रिय भूमिका निभानी होगी ।   
रणबीर सिंह दहिया 

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2019

rohtak tehsil villages

1AnwalRohtak4,877
2AsanRohtak4,295
3Bahali AnandpurRohtak4,751
4BahmanwasRohtak2,940
5Bahu AkberpurRohtak11,120
6Bahu JamalpurRohtak1,526
7BakhetaRohtak2,954
8BalabRohtak3,359
9BalandRohtak7,129
10BanyaniRohtak6,095
11BasantpurRohtak1,918
12BhagotipurRohtak3,984
13Bhaiyan PurRohtak1,459
14BhalotRohtak7,231
15BoharRohtak11,267
16BusanaRohtak3,399
17ChamariaRohtak4,666
18ChiriRohtak9,735
19DhamarRohtak4,551
20DobhRohtak3,628
21Gaddi KheriRohtak2,690
22Garhi BoharRohtak2,894
23Ghari BalabRohtak1,547
24Ghilor KalanRohtak3,404
25Ghilor KhurdRohtak872
26GhuskaniRohtak1,544
27GudhanRohtak4,334
28GurauthiRohtak5,183
29GurnauthiRohtak4,079
30HumayunpurRohtak3,888
31JasiaRohtak6,700
32JindranRohtak1,518
33Jindran KalanRohtak2,103
34KabulpurRohtak4,399
35KahnaurRohtak8,735
36Kahni 121/2BiswaRohtak1,854
37Kahni 7 1/2 BiswaRohtak1,316
38KakranaRohtak2,768
39KanheliRohtak1,901
40KansalaRohtak5,513
41KarounthaRohtak5,802
42KatesraRohtak4,595
43KatwaraRohtak1,445
44KhadwaliRohtak7,853
45KherariRohtak3,265
46Kiloi DopanaRohtak5,715
47Kiloi KhasRohtak5,690
48LadhotRohtak3,112
49LahliRohtak4,386
50MainaRohtak4,599
51Makrouli KalanRohtak6,157
52Makrouli KhurdRohtak2,828
53ManjhaRohtak588
54Maroudi JatanRohtak2,136
55Maroudi RangranRohtak1,852
56MasudpurRohtak1,425
57MunganRohtak2,785
58NandalRohtak2,976
59NasirpurRohtak556
60NiganaRohtak5,674
61PahrawarRohtak3,387
62PatwapurRohtak2,037
63PilanaRohtak5,167
64PolangiRohtak1,842
65RitauliRohtak5,098
66Rithal NirwalRohtak3,084
67Rithal PhogatRohtak6,201
68RurkiRohtak6,372
69Sahan MajraRohtak152
70Samar GopalpurRohtak6,109
71SampalRohtak4,385
72Sanga HeraRohtak2,754
73SanghiRohtak9,108
74Sarai AhmedRohtak277
75SasrauliRohtak999
76SimliRohtak1,816
77SinghpuraRohtak3,680
78Sunari KhurdRohtak3,211
79SundanaRohtak6,172
80SunderpurRohtak3,848
81TaimurpurRohtak463
82Taja MajraRohtak1,307
83TitoliRohtak10,177

शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2018

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जब संविधान की धज्जियाँ उड़ती हैं, तब रात को जूते की टाप सुनाई देती है।

जब भारत की जनता गहरी नींद में सो रही थी, तब दिल्ली पुलिस के जवान अपने जूते की लेस बाँध रहे थे। बेख़बर जनता को होश ही नहीं रहा कि पुलिस के जवानों के जूते सीबीआई मुख्यालय के बाहर तैनात होते हुए शोर मचा रहे हैं। लोकतंत्र को कुचलने में जूतों का बहुत योगदान है। जब संविधान की धज्जियाँ उड़ती हैं, तब रात को जूते बाँधे जाते हैं। पुलिस के जवान सीबीआई दफ्तर को घेर लेते हैं। रात के पौने एक बज रहे होते हैं। वैसे अंग्रेज़ों में वह गुडमार्निंग कहने का होता है। हम रात को रात कहते हैं। मुल्क पर काली रात का साया गहरा गया है। तभी एक अफ़सर जो शायद जागा हुआ था, उस कुर्सी पर बैठने के लिए घर से निकलता है जिस कुर्सी पर बैठे आलोक वर्मा ने उसके ख़िलाफ़ CVC यानी केंद्रीय सतर्कता आयुक्त से गंभीर आरोपों में जाँच की अर्ज़ी दी है। CVC के वी चौधरी एम नागेश्वर राव को सीबीआई का नया चीफ़ बनाने का रास्ता साफ़ कर देते हैं। एम नागेश्वर राव अपने नंबर वन चीफ़ आलोक वर्मा को हटाने के आदेश देते हैं जिसे छुट्टी पर भेजना कहते हैं। आलोक अस्थाना जिनकी गिरफ़्तारी की अनुमति माँगी गई थी उन्हें भी हटा दिया जाता है। काली रात के बंद कमरे में बारह अफ़सरों को मुख्यालय से बाहर भेजने के आदेश पर दस्तखत होते हैं। नींद में सोई जनता करवट बदल लेती है। तख्ता पलट हो जाता है।

हम जिन आहटों की बात करते रहे हैं, वो सुनाई दें इसलिए जूतों ने वफ़ादारी निभाई है। अब आप पर है कि आप उन जूतों का इशारा समझ पाते हैं या नहीं। मदहोश जनता और ग़ुलाम मीडिया आँखें बंद कर लेती है। शहशांह का इंसाफ़ शहंशाह के लिए होता है। शहंशाह ने अपने लिए इंसाफ़ कर लिया।

दि वायर में स्वाति चतुर्वेदी ने लिखा है कि सीबीआई के इतिहास में कभी नहीं हुआ कि इंस्पेक्टर जनरल( IG) को चीफ़ बना दिया गया। स्वाति ने लिखा है कि वर्मा ने प्रधानमंत्री कार्यालय के क़रीबी यानी जिगरी राकेश अस्थाना के गिरफ़्तारी की अनुमति माँगी थी और वे रफाल डील मामले में जाँच की तरफ़ बढ़ने लगे थे। प्रशांत भूषण, यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी से मिल लेने की ख़बर से सरकार रातों को जागने लगी। दिन में प्रधानमंत्री के भाषणों का वक़्त होता है इसलिए ‘इंसाफ़’ का वक़्त रात का चुना गया। आधी रात के बाद जब जब सरकारें जागीं हैं तब तब ऐसा ही ‘ इंसाफ़’ हुआ है। जूतों की टाप सुनाई देती है।

जनवरी 2017 में आलोक वर्मा को एक कोलिजियम से दो साल के लिए सीबीआई का चीफ़ बनाया गया। आलोक वर्मा का कार्यकाल अगले साल फ़रवरी तक था। इस कोलिजियम में चीफ़ जस्टिस ऑफ़ इंडिया भी थे। जब आलोक वर्मा को हटाया गया तब कोई कोलेजीयम नहीं बना। चीफ़ जस्टिस आफ इंडिया तक को नहीं बताया गया। जब आलोक वर्मा को हटाकर एम नागेश्वर राव को चीफ़ बनाया गया तब इसके लिए कोई कोलिजियम नहीं बनाया गया। चीफ़ जस्टिस आफ इंडिया की कोई भूमिका ही नहीं रही। आलोक वर्मा ने प्रधानमंत्री के ‘इंसाफ़’ के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट से इंसाफ की अपील की है।

आप हिन्दी के पाठकों की हत्या अगर हिन्दी के अख़बारों और चैनलों ने नहीं की होती तो आपको पता होता कि अगस्त महीने में जब सीबीआई लंदन की अदालत में अपने दस्तावेज लेकर पहुँची कि इन गवाहों के बयान के आधार पर विजय माल्या को भारत ले जाना ज़रूरी है तब उन सात गवाहों के बयान पर दस्तखत ही नहीं थे। विजय माल्या 36 सूटकेस लेकर भागा था। स्वाति चतुर्वेदी ने दि वायर में इसे रिपोर्ट किया था।

विजय माल्या ने तभी तो कहा था कि भागने से पहले जेटली से मिला था। जेटली ने खंडन किया। राहुल गांधी ने दस्तावेज़ो के साथ आरोप लगाया कि जेटली की बेटी दामाद के लॉ फ़र्म को माल्या ने फ़ीस दी थी जो उसके भागने को विवाद के बाद लौटा दी गई। एक नैतिक सवाल उठाया गया था मगर तमाम अख़बारों ने इसे जनता तक पहुँचने से रोक दी। जब ख़बरों के पर क़तरे जाते हैं तब जनता के ही पर क़तरे जाते हैं। पाँव परिंदों के कटते हैं और ख़ून जनता का बहता है।

राकेश अस्थाना जो एक वीडियो में ख़ुद को सरदार पटेल के जैसा बता रहे हैं, 2016 में आर के दत्ता को हटाकर सीबीआई में लाए गए थे। इनके बारे में आलोक वर्ना ने सुप्रीम कोर्ट से अपनी फ़रियाद में कहा है कि यह आदमी अफ़सरों के बहुमत के फ़ैसले के ख़िलाफ़ जाकर काम करता है और केस को कमजोर करता है। आलोक वर्मा ने कहा है कि वह ऐसे केस की डिटेल दे सकते हैं।

सवाल उस सीवीसी से है, जिसके पास अस्थाना और राव की शिकायतें थीं। धीमी गति के समाचार की तरह काम करने से सवालों से बचने का मौक़ा मिल जाता है। सीवीसी अपने कर्तव्य के निर्वाहन में फ़ेल रही इसलिए सबसे पहले के वी चौधरी को बर्खास्त करना चाहिए था मगर चौधरी ने ‘चौधरी’ की लाज रख ली! जब अस्थाना मामले की शिकायत पहुँची तब सीवीसी ने क्या किया? जाँच शुरू की?

इंडियन एक्सप्रेस के सुशांत सिंह की ख़बर है। जब अस्थाना ने आलोक वर्मा की शिकायत की तो सीबीआई से दस्तावेज माँगे गए। सीबीआई ने कहा कि अस्थाना ने क्या शिकायत की वो तो बताइये मगर सीवीसी ने नहीं बताया। सीबीआई के ज्वाइंट डायरेक्टर ने नौ अक्तूबर को सीवीसी को पत्र लिखकर पूछा था।

इस मामले में वित्त मंत्री जेटली बयान दे रहे हैं। दो अफसरो ने एक दूसरे पर आरोप लगाए हैं। संस्था का मज़ाक़ उड़ने नहीं दिया जा सकता था। यह ज़रूरी था कि दोनों के आरोपों की जाँच के लिए एस आई टी बने और इन्हें अपने प्रभावों से दूर रखा जाए।

विनीत नारायण बनाम भारत सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि सीबीआई के निदेशक का कार्यकाल तय समय के लिए स्थायी होगा। अगर विशिष्ठ परिस्थिति में तबादला करना भी होगा तब चयन समिति से अनुमति लेनी होगी। क्या अनुमति ली गई ?

अस्थाना कोर्ट में हैं। आलोक वर्ना कोर्ट में हैं। एक डीएसपी जेल में है। और सरकार का आदमी सीबीआई के भीतर है।

इस मामले में इंसाफ़ हो चुका है। अब और इंसाफ की उम्मीद न करें। आइये हम सब न्यूज़ चैनल देखें। वहाँ सर्वे चल रहे हैं। बीजेपी की सनातन जीत की घोषणा हो रही है। चैनलों पर आपकी बेहोशी का इंजेक्शन फ्री में मिल रहा है। आइये हम सब संविधान के बनाए मंदिरों को ढहता छोड़ कर अयोध्या में राम मंदिर बनाने पर बहस करें। ओ मेरे भारत की महान जनता, जब संविधान के बनाए मंदिरों को तोड़ना ही था तो आज़ादी के लिए डेढ़ सौ साल का संघर्ष क्यों किया?

मंगलवार, 23 अक्टूबर 2018



हरयाणा सरकार का महाघोटाला 
किराये पर ली गयी कुल प्राईवेट बस संख्या -- 720 
औसत प्रति किलोमीटर भुगतान --40 /रूपये 
औसत तय किलोमीटर प्रतिदिन -- 450 
एक बस को भुगतान -- 450 x 40 = 18000 रूपये 
720 बसों को एक दिन का  भुगतान  ---720 x 18000 = 12960000 /रूपये 
एक  वर्ष में 720 बसों को भुगतान ---12960000 x 365 = 4730400000 / रूपये 
प्राइवेट बस की औसत आयु --- 10 वर्ष 
720  बसों को दस वर्ष में भुगतान ---4730400000 x 10 = 47304000000 /रूपये 
एक बस की कीमत ---- 1800000/ रूपये 
47304000000 divided by 1800000 =   26280  बसें 
 720 प्राइवेट बसों को सरकार 10 साल में जितना किराया भुगतान करेगी 
उतने रूपये में 26280 सरकारी बसें खरीदी जा सकती हैं 
अब जनता खुद अंदाजा लगा ले कि मुख्यमंत्री जी क्यों अपने पूंजीपति 
दोस्तों की प्राइवेट बसों को किराये पर लेकर रोडवेज में शामिल करना 
चाहते हैं 
दोस्तों अगर रोडवेज और भविष्य में रोजगार के अवसरों को बचाना है तो 
इसे पढ़ें , समझें और शेयर करें 
धन्यवाद 
साथी रमेश 

बुधवार, 18 जुलाई 2018

Promoting Scientific Temper

Promoting Scientific Temper and Observing ‘National Scientific Temper Day on 20th August



Respected Colleague, 

We are writing to you on behalf of the All India People’s Science Network (AIPSN) and Maharashtra Andhashraddha Nirmulan Samiti(MANS). AIPSN is a network of people’s science organizations working in various states of India for the promotion of scientific temper, scientific humanism, and the public understanding of science. MANS is an organized movement dedicated to fighting superstitions and promoting scientific temper in India, particularly in the state of Maharashtra, founded in 1989 by Shaheed Dr. Narendra Dabholkar.

We have initiated the observance of ‘National Scientific Temper Day on the 20th August every year, which commemorates the day Dr Narendra Dabholkar was martyred in 2013. We appeal to you to join in this endeavour.

We have also initiated the following concomitant statement, which has been endorsed by  Dr. Jayant Naralikar, Dr. Naresh Dadhich, Dr. Spenta Wadia, Dr. VidyanandNanjundiah, Dr. K. Subramaniyam and many other scientists and educationists:

“As citizens of India as well as part of the world community of the 21st Century, it is one of our fundamental and civilizational duties “to develop and promote the scientific temper, humanism and the spirit of inquiry and reform;” as per article 51 A(h) of our Constitution.
We believe that this task has not received the attention and commitment it deserves and calls for, and on the contrary, there is a very worrying and disturbing atmosphere being whipped in the opposite direction. There is therefore an urgent need to take it up with much vigour and enthusiasm in a systematic and sustained manner at all levels. The role of schools, colleges and the educational institutions is particularly important and critical in taking it forward. Promoting scientific temper is not only the work of scientists, but of all citizens in Indian democracy.
Dr. Narendra Dabholkar was one of the foremost proponents of scientific temper in recent times. Through his lectures and writings, he spread the message of scientific temper among all sections of society. It is therefore particularly appropriate that 20th August, the day on which he was martyred should be observed as ‘National Scientific Temper Day’ all over the country.
We the undersigned, endorse and support this move, and appeal to all informed and concerned people as well as all educational institutions, organizations to join in this collective national endeavour for observing ‘National Scientific Temper Day’, towards building an India of reason and humanity with well informed and rationally empowered citizens.”

We hope to observe National Scientific Temper Day on a broad and massive scale. This cannot happen without the widespread collective effort of many like-minded organizations, school managements, teachers and individuals.  We send this appeal to you to join this broad collective effort in view of the committed work that you/your organization is doing for the promotion of constitutional values.

We also request you to join this national movement for observing National Scientific Temper Day 0n Aug.20th and by sending a brief endorsement email with your details to gsaipsn@gmail.com and spread it to your colleagues.

With best wishes,

Dr. Sabyasachi Chatterjee                                                                                                                             Avinash Patil
President,                                                                                                                                                           Executive President
AIPSN.                                                                                                                                                                  MA