गुरुवार, 28 अगस्त 2014
सोमवार, 25 अगस्त 2014
दिल्ली के सिर पै बसै हरयाणा
खुद्दारी हरयाणा स्टाईल
बाई
जाट कवि --कर्नल मेहर सिंह दहिया, शौर्य चक्र
दिल्ली के सिर पै बसै हरयाणा
आप बोवै ,आप खा , बेरा जी मनै ना दे दाणा
1 जगह म्हारी घणी खास सै ,बड़यां की मेहनत और और प्रयास सै, बैरी का आड़ै हुया नाश सै,ना चाल्या इसतैं कोए धिंगताणा
दिल्ली के सिर पै बसै हरयाणा ।
2 .महारी धरती का कोए तोल नहीं सै, दरया दिली का कोए मोल नहीं सै, हिस्साब मैं कोए रोल नहीं सै जाण्या सदा ले कै लोटाना
दिल्ली के सिर पै बसै हरयाणा
3 .मेहमान का मान बड़ा सै ,बण हनुमान यू सदा लड़ै सै
दिल्ली के सिर पै बसै हरयाणा
4 . तोल पिछाण कै यो हाथ हाथ मिलावै ,दुश्मन नै यू धूल चटावै
बोद्दे कै सदा साहरा लावै बोल इसके पै कति मत जाणा
दिल्ली के सिर पै बसै हरयाणा
5 . के दिखै सै सादा भोला , पहले टकरे मैं पादे रोला ,
तर्क मैं इसनै हर कोए झिकोला ,आवै खूब बातां मैं बतलाना
दिल्ली के सिर पै बसै हरयाणा
6 . बिना वजह मत इसनै छेड़िए,करया हमला जाऊँ भेडीए
छुडा पेंडा तुरत नमेड़िए , वरना महंगा पड़ै इसतैं भिड़ जाणा
6 . बिना वजह मत इसनै छेड़िए,करया हमला जाऊँ भेडीए
छुडा पेंडा तुरत नमेड़िए , वरना महंगा पड़ै इसतैं भिड़ जाणा
दिल्ली के सिर पै बसै हरयाणा
7 . हर माणस मैं पावै कविताई ,शिक्षा बेशक यहाँ देर से आई अनपढ़ भी करै अगवाही ,देख पंचों का ज्ञान पुराणा
दिल्ली के सिर पै बसै हरयाणा
8 . दिल्ली की हमनै मरोड़ काढ़ दी, जी चाहा जब टाड्ड दी
पकड़ नाड़ सही झाड़ दी ,नहीं होण दें मां माम निमाणा
दिल्ली के सिर पै बसै हरयाणा
9 . कर्नल मेहर सिंह की बात सही सै , समझनिया नै खूब लहि सै
वफादार इस बरगा कोई नहीं सै पर मुंह इसको कति नहीं लाना
दिल्ली के सिर पै बसै हरयाणा
9.KARNAL MEHAR SINGH KI BAAT SAHI SYE, SAMJHANIYA NE KHOOB LAHI SE, WAFADAR IS BARGA KOI NAHI SE, PAR MOOH ISKO KATI NAHI LANA.
DILLI KE SIR PE BASHA HARAYANA
20 AUG2014
शुक्रवार, 22 अगस्त 2014
बुधवार, 20 अगस्त 2014
VIVEK
विवेक
सूरज साहमी कोहरा टिकै ना अज्ञान विवेक मयी वाणी कै।
अज्ञानता छिन्न-भिन्न होण लगै हो पैदा चिन्तन नया प्राणी कै।।
ढोंग अर अन्ध विश्वास पै टिक्या चिन्तन फेर बचै कोण्या
यज्ञ हवन वेद शास्त्र फेर पत्थर पूजा प्रपंच रचै कोण्या
पुरोहित की मिथ्या बात का दुनिया मैं तहलका मचै कोण्या
मन्द बुद्धि लालची माणस कै विवेकमय दया पचै कोण्या
शिक्षित अनपढ़ धनी निर्धन बीच मैं आवैं फेर कहाणी कै।।
आत्मा परमात्मा सब गौण होज्यां सामाजिक दृष्टि छाज्या फेर
समानता एक आधार बणै औरत सम्मान पूरा पाज्या फेर
मानवता पूरी निखर कै आवै दुनिया कै जीसा आज्या फेर
कार्य कारणता नै समझकै माणस कैसे गच्चा खाज्या फेर
माणस माणस का दुख समझै ना गुलाम बणै राजाराणी कै।।
संवेदनशील समाज होवै ईश्वर केंद्र मैं रहवै नहीं
मानव केन्द्रित संस्कृति हो पराधीनता कोए सहवै नहीं
स्वतंत्रता बढ़ै व्यक्ति की परजीवी कोए कहवै नहीं
खत्म हों युद्ध के हथियार माणस आपस मैं फहवै नहीं
विवेक न्याय करूणा समानता खरोंच मारैं सोच पुराणी कै।।
अदृश्य सत्ता का कोढ़ आड़ै फेर कति ना टोहया पावै
सोच बिचार के तरीके बदलैं जन चेतना बढ़ती जावै
मनुष्य खुद का सृष्टा बणै कुदरत गैल मेल बिठावै
कर्म बिना बेकार आदमी जो परजीवी का जीवन बितावै
रणबीर बरोने आला ना लावै हाथ चीज बिराणी कै।।
सूरज साहमी कोहरा टिकै ना अज्ञान विवेक मयी वाणी कै।
अज्ञानता छिन्न-भिन्न होण लगै हो पैदा चिन्तन नया प्राणी कै।।
ढोंग अर अन्ध विश्वास पै टिक्या चिन्तन फेर बचै कोण्या
यज्ञ हवन वेद शास्त्र फेर पत्थर पूजा प्रपंच रचै कोण्या
पुरोहित की मिथ्या बात का दुनिया मैं तहलका मचै कोण्या
मन्द बुद्धि लालची माणस कै विवेकमय दया पचै कोण्या
शिक्षित अनपढ़ धनी निर्धन बीच मैं आवैं फेर कहाणी कै।।
आत्मा परमात्मा सब गौण होज्यां सामाजिक दृष्टि छाज्या फेर
समानता एक आधार बणै औरत सम्मान पूरा पाज्या फेर
मानवता पूरी निखर कै आवै दुनिया कै जीसा आज्या फेर
कार्य कारणता नै समझकै माणस कैसे गच्चा खाज्या फेर
माणस माणस का दुख समझै ना गुलाम बणै राजाराणी कै।।
संवेदनशील समाज होवै ईश्वर केंद्र मैं रहवै नहीं
मानव केन्द्रित संस्कृति हो पराधीनता कोए सहवै नहीं
स्वतंत्रता बढ़ै व्यक्ति की परजीवी कोए कहवै नहीं
खत्म हों युद्ध के हथियार माणस आपस मैं फहवै नहीं
विवेक न्याय करूणा समानता खरोंच मारैं सोच पुराणी कै।।
अदृश्य सत्ता का कोढ़ आड़ै फेर कति ना टोहया पावै
सोच बिचार के तरीके बदलैं जन चेतना बढ़ती जावै
मनुष्य खुद का सृष्टा बणै कुदरत गैल मेल बिठावै
कर्म बिना बेकार आदमी जो परजीवी का जीवन बितावै
रणबीर बरोने आला ना लावै हाथ चीज बिराणी कै।।
विज्ञान की अच्छाई भूल कै
विज्ञान की अच्छाई भूल कै
विज्ञान की अच्छाई भूल कै इसनै बैरी बतावण लागे।।
माणस की करतूतां नै हम इसकै सिर लावण लागे।।
कलयुग पापी बता बता कवियां नै शोर मचाया
कल का नाम कहैं पुरजा युग माने बख्त बताया
बढ़ी चेतना इन्सानां की जब जरुरत पै आया
इस कुदरत तैं खोज खोज पुरजे का खेल रचाया
आप बनाया आप चलाया अपने आप उडावण लागे।।
कुदरत के सब जीवों मैं इन्सान पवित्र पाया
जीवन की वस्तु सारी खुद आप खोज कै ल्याया
ऐसे यन्त्र तैयार बणा लिए अजब कमाल दिखाया
करकै खोज पृथ्वी की आसमान ढूंढ़ना चाहया
बणा बणा कै पुरजे पै सारा काम करावण लागे।।
कलयुग इतना छाज्या इसका कोए अन्त ना पाया
फेर मुनाफे नै इस कलयुग पै अपना जोर जमाया
सब कुछ कर लिया कब्जे मैं ऐसा महाघोर मचाया
इस पापी की करनी नै दुख मैं यो संसार फंसाया
विज्ञान तैं बम बणा बणा कै नरक बणावण लागे।।
हरिचन्द कहै कलयुग जैसी ओर समों ना आणी
सब प्रजा ने समझाद्यां चाहे याणी हो चाहे स्याणी
साइंस असली राही चालै हमनै होगी अलख जगाणी
फेर ना रहै कोए भूखा नहीं सै या झूठी बाणी
न्यों पाप खत्म होज्यागा हम साच बतावण लागे।।
विज्ञान की अच्छाई भूल कै इसनै बैरी बतावण लागे।।
माणस की करतूतां नै हम इसकै सिर लावण लागे।।
कलयुग पापी बता बता कवियां नै शोर मचाया
कल का नाम कहैं पुरजा युग माने बख्त बताया
बढ़ी चेतना इन्सानां की जब जरुरत पै आया
इस कुदरत तैं खोज खोज पुरजे का खेल रचाया
आप बनाया आप चलाया अपने आप उडावण लागे।।
कुदरत के सब जीवों मैं इन्सान पवित्र पाया
जीवन की वस्तु सारी खुद आप खोज कै ल्याया
ऐसे यन्त्र तैयार बणा लिए अजब कमाल दिखाया
करकै खोज पृथ्वी की आसमान ढूंढ़ना चाहया
बणा बणा कै पुरजे पै सारा काम करावण लागे।।
कलयुग इतना छाज्या इसका कोए अन्त ना पाया
फेर मुनाफे नै इस कलयुग पै अपना जोर जमाया
सब कुछ कर लिया कब्जे मैं ऐसा महाघोर मचाया
इस पापी की करनी नै दुख मैं यो संसार फंसाया
विज्ञान तैं बम बणा बणा कै नरक बणावण लागे।।
हरिचन्द कहै कलयुग जैसी ओर समों ना आणी
सब प्रजा ने समझाद्यां चाहे याणी हो चाहे स्याणी
साइंस असली राही चालै हमनै होगी अलख जगाणी
फेर ना रहै कोए भूखा नहीं सै या झूठी बाणी
न्यों पाप खत्म होज्यागा हम साच बतावण लागे।।
क्या क्यों और कैसे बिना
क्या क्यों और कैसे बिना
क्या क्यों और कैसे बिना मिलै दुनिया का सार नहीं।।
ज्ञान विज्ञान के प्रकाश बिना होवै दूर अन्धकार नहीं।।
नीले आसमान मैं क्यों ये चकमक करते तारे भाई
क्यों इन्द्रधनुष के म्हां ये रंग बिरंगे प्यारे भाई
मोर के पंख न्यारे भाई क्यों लाया कदे विचार नहीं।।
तोता कोयल फर फर करकै क्यूकर गगन मैं उडज्यां
क्यों ना बिल्ली के तन पै भी पंख मोर के उगज्यां
क्यों मकड़ी जाला बुणज्यां म्हारी समझ तैं बाहर नहीं।।
क्यों जुगनू की कड़ के उपर जलती हुई मशाल भाई
क्यों गैंडे अर हाथी की पीठ सै उनकी ढाल भाई
विज्ञान के ये कमाल भाई झूठा इसका प्रचार नहीं।।
क्यों फूल गुडहल का हो सुर्ख एक दम लाल कहैं
क्यों झिलमिल करता ये मकड़ी का जाल कहैं
विज्ञान ठावै सवाल कहैं या माया अपरम पार नहीं।।
आम नीम अर इमली क्यों हमनै खड़े दिखाई दें
क्यों समुन्द्र मैं ऊंची नीची उठती लहर दिखाई दें
मछली क्यों रंगीन दिखाई दें जानै सै नम्बरदार नहीं।।
जुबां पै लाग्या ताला यो हमनैं पड़ै तोड़ना सुनियो
सवालां का यो पिटारा तो हमनै पड़ै खोलना सुनियो
हमनै पड़ै बोलना सुनियो क्यों बिना म्हारा उद्धार नहीं।।
क्या क्यों और कैसे बिना मिलै दुनिया का सार नहीं।।
ज्ञान विज्ञान के प्रकाश बिना होवै दूर अन्धकार नहीं।।
नीले आसमान मैं क्यों ये चकमक करते तारे भाई
क्यों इन्द्रधनुष के म्हां ये रंग बिरंगे प्यारे भाई
मोर के पंख न्यारे भाई क्यों लाया कदे विचार नहीं।।
तोता कोयल फर फर करकै क्यूकर गगन मैं उडज्यां
क्यों ना बिल्ली के तन पै भी पंख मोर के उगज्यां
क्यों मकड़ी जाला बुणज्यां म्हारी समझ तैं बाहर नहीं।।
क्यों जुगनू की कड़ के उपर जलती हुई मशाल भाई
क्यों गैंडे अर हाथी की पीठ सै उनकी ढाल भाई
विज्ञान के ये कमाल भाई झूठा इसका प्रचार नहीं।।
क्यों फूल गुडहल का हो सुर्ख एक दम लाल कहैं
क्यों झिलमिल करता ये मकड़ी का जाल कहैं
विज्ञान ठावै सवाल कहैं या माया अपरम पार नहीं।।
आम नीम अर इमली क्यों हमनै खड़े दिखाई दें
क्यों समुन्द्र मैं ऊंची नीची उठती लहर दिखाई दें
मछली क्यों रंगीन दिखाई दें जानै सै नम्बरदार नहीं।।
जुबां पै लाग्या ताला यो हमनैं पड़ै तोड़ना सुनियो
सवालां का यो पिटारा तो हमनै पड़ै खोलना सुनियो
हमनै पड़ै बोलना सुनियो क्यों बिना म्हारा उद्धार नहीं।।
मौजूदा परिस्थिति
मौजूदा परिस्थिति
हमारी सभ्यता (हड़प्पा एवं मोहन जोदड़ो) विश्व की प्राचीन सभ्यताओं में गिनी जाती है। प्राचीन काल में हमारे यहां विभिन्न क्षेत्रों में बहुत सी उपलब्धियां दर्ज हैं। दिल्ली की लौहसतम्भ जैसा शिल्प एवं धातुकर्म, सुश्रुत, चरक जैसे चिकित्सक, आर्यभट्ट जैसे गणितज्ञ एवं वैज्ञानिक तथा तक्षशिला व नालंदा जैसे विश्वप्रसिद्ध विश्वविद्यालय हमारे विरासत हैं। जैन एवं बौद्ध व लोकायत जैसे सामाजिक दर्शन हमारे यहां रहे हैं। यदि हम इतिहास में जाएँ तो पता चलता है कि विचारधाराओं के संघर्ष चलते रहे हैं। आज की असलीयत भी हम सब समझ सकते हैं। इतिहास की पूरी समीक्षा पर न भी जाएं तो भी इस हकीकत से इनकार नहीं किया जा सकता कि आज भी हमारे यहाँ हद दर्जे की सामाजिक विषमता, आर्थिक व औद्योगिक पिछड़ापन, घोर अंधविश्वास, धार्मिक कट्टरता, जातिवाद, अनपढ़ता आदि मौजूद हैं। ।
यह सब हमारे समाज में मौजूद प्रतिगामी शक्तियों के उभार के कारण हुआ है। इन सब की शुरुआत उसी समय हो चुकी थी जब पुनरुर्थानवादी ताकतों की विजय हुई थी (शंकराचार्य व बौद्धों के संघर्ष)। यह त्रासदी चौथी-पांचवीं सदी की है। तभी से हम पिछडऩे शुरू हो गए थे। पुनर्जागरण (14-15वीं सदी) की दौड़ में हम पिछड़ गए। हमारे यहाँ नवजागरण भी देर से हुआ और जैसा भी हुआ वह कमोबेश धार्मिक सुधारों के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गया। फिर भी निश्चित ही वे प्रगतिशील,जनतांत्रिक व सामूहिकता के मूल्य थे जिनकी बदौलत हम आजादी पाने जैसी कठोर परीक्षा में सफल रहे। ‘वैज्ञानिक मानसिकता’ जैसी शब्दावली हमारे यहां गढ़ी गई। शायद हमारा देश ही दुनिया का पहला देश है जिसके संविधान में वैज्ञानिक मानसिकता, मानवतावाद व सुधारवाद को हर नागरिक का मौलिक कर्तव्य कहा गया है। इन प्रयासों के चलते स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरंत बाद के कुछ वर्षों में हम कुछ कर पाए। स्वाभाविक है ऐसा वातावरण प्रतिगामी ताकतों और कट्टरपंथियों को रास नहीं आ सकता। हमें अच्छी तरह मालूम है कि ऐसी शक्तियां हर अवसर का इंतजार करती हैं और अपना खेल खेलने को तैयार रहती हैं।
हमारे समाज के लिए वर्तमान में यह सबसे बड़ी त्रासदी है कि ये शक्तियां संवैधानिक रूप में भी विजयी हो कर आज अपने एजेण्डे को पूरा करने की राह पर है। वर्तमान दौर हमें जर्मनी के 1930-35 के दौर की याद दिला देता है। उस समय विदेशी पूंजी, मीडिया (गोयबल्स), धार्मिक उन्माद (यहूदी विरोधी) के गठबंधन के चलते नाजियों ने अमानवीयता की कौन सी हदें पार नहीं की। ध्यान रहे सभी रेशनल बुद्धिजीवी (यहां तक कि आइन्स्टाइन जैसे वैज्ञानिक) उनके निशाने पर थे। इन कट्टरपंथी ताकतों के लिए ये सहायक परिस्थितियां होती हैं। इसी तरह के उन्माद में आज वही इस्त्राइल (यहूदी देश) गाजापट्टी में क्या कुछ अमानवीय नहीं कर रहा। कहने को हम बेशक पहले ही घोषित कर चुके हों कि यह Age of Reason (Thomas Paine) है। लेकिन यह लड़ाई हमने अभी वैज्ञानिक विचार की ताकत के दम पर सैद्धांतिक स्तर पर ही जीती है। समाज में अतार्किकता (Irrationality)की जड़ें अभी गहरी हैं। जाति-धर्म-क्षेत्र-गोत्र, ऊँच-नीच आदि भी बड़े पैमाने पर हमारे यहाँ व्याप्त हैं। शिक्षा का ढाँचा चरमरा रहा है। राज्य अपने वायदों से मुकर कर इसे निजी हाथों में सौंप रहा है। सेक्यूलरिज्म की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। वर्तमान दौर ऐसा दौर है जहां अंधविश्वास के खिलाफ काम करने वाले व्यक्ति (डॉ. दाभोलकर) की सरेआम हत्या कर दी जाती है। वैज्ञानिकता की बात करने वालों को सांप्रदायिक फासीवादी ताकतें खुल्लम-खुल्ला परिणाम भुगतने और बलात्कार तक करने की धमकी (प्रभा) दे देते हैं। बात तो सभ्य समाज में नागरिक अधिकारों को बचाने तक आ सिमटी है। जाहिर है यह समय इतिहास में भयंकर दमन और संघर्ष के दौर के रूप में दर्ज हो रहा है। अल्पसंख्यकों को सीधे-सीधे राह में आने और सबक सिखाने की बात की जा रही है। अब तो संवैधानिक मूल्यों को ही ताक पर रखा जा रहा है। शिक्षा, स्वास्थ्य, ऊर्जा, उद्योग आदि हर क्षेत्र में संकट है। ज्ञान-विज्ञान की सभी संस्थाओं पर इनकी पैनी नजर है। तमाम प्रकार की अतार्किकताओं को पहचान कर लडऩे की जरूरत है। वर्तमान दौर इस लड़ाई के लिए हमें चुनौती दे रहा है। हमें भी न्याय, समानता व विवेकशीलता की पक्षधर तमाम ताकतों (जिनमें छात्र, अध्यापक, इंजीनियर, डॉक्टर, वैज्ञानिक, कामगार आदि सभी वर्ग) को एकजुट कर इसे स्वीकारना है। यह लड़ाई विज्ञान के विचार को स्थापित करने तक की लड़ाई नहीं है, अपितु समाज परिवर्तन की लड़ाई है।
हमारी सभ्यता (हड़प्पा एवं मोहन जोदड़ो) विश्व की प्राचीन सभ्यताओं में गिनी जाती है। प्राचीन काल में हमारे यहां विभिन्न क्षेत्रों में बहुत सी उपलब्धियां दर्ज हैं। दिल्ली की लौहसतम्भ जैसा शिल्प एवं धातुकर्म, सुश्रुत, चरक जैसे चिकित्सक, आर्यभट्ट जैसे गणितज्ञ एवं वैज्ञानिक तथा तक्षशिला व नालंदा जैसे विश्वप्रसिद्ध विश्वविद्यालय हमारे विरासत हैं। जैन एवं बौद्ध व लोकायत जैसे सामाजिक दर्शन हमारे यहां रहे हैं। यदि हम इतिहास में जाएँ तो पता चलता है कि विचारधाराओं के संघर्ष चलते रहे हैं। आज की असलीयत भी हम सब समझ सकते हैं। इतिहास की पूरी समीक्षा पर न भी जाएं तो भी इस हकीकत से इनकार नहीं किया जा सकता कि आज भी हमारे यहाँ हद दर्जे की सामाजिक विषमता, आर्थिक व औद्योगिक पिछड़ापन, घोर अंधविश्वास, धार्मिक कट्टरता, जातिवाद, अनपढ़ता आदि मौजूद हैं। ।
यह सब हमारे समाज में मौजूद प्रतिगामी शक्तियों के उभार के कारण हुआ है। इन सब की शुरुआत उसी समय हो चुकी थी जब पुनरुर्थानवादी ताकतों की विजय हुई थी (शंकराचार्य व बौद्धों के संघर्ष)। यह त्रासदी चौथी-पांचवीं सदी की है। तभी से हम पिछडऩे शुरू हो गए थे। पुनर्जागरण (14-15वीं सदी) की दौड़ में हम पिछड़ गए। हमारे यहाँ नवजागरण भी देर से हुआ और जैसा भी हुआ वह कमोबेश धार्मिक सुधारों के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गया। फिर भी निश्चित ही वे प्रगतिशील,जनतांत्रिक व सामूहिकता के मूल्य थे जिनकी बदौलत हम आजादी पाने जैसी कठोर परीक्षा में सफल रहे। ‘वैज्ञानिक मानसिकता’ जैसी शब्दावली हमारे यहां गढ़ी गई। शायद हमारा देश ही दुनिया का पहला देश है जिसके संविधान में वैज्ञानिक मानसिकता, मानवतावाद व सुधारवाद को हर नागरिक का मौलिक कर्तव्य कहा गया है। इन प्रयासों के चलते स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरंत बाद के कुछ वर्षों में हम कुछ कर पाए। स्वाभाविक है ऐसा वातावरण प्रतिगामी ताकतों और कट्टरपंथियों को रास नहीं आ सकता। हमें अच्छी तरह मालूम है कि ऐसी शक्तियां हर अवसर का इंतजार करती हैं और अपना खेल खेलने को तैयार रहती हैं।
हमारे समाज के लिए वर्तमान में यह सबसे बड़ी त्रासदी है कि ये शक्तियां संवैधानिक रूप में भी विजयी हो कर आज अपने एजेण्डे को पूरा करने की राह पर है। वर्तमान दौर हमें जर्मनी के 1930-35 के दौर की याद दिला देता है। उस समय विदेशी पूंजी, मीडिया (गोयबल्स), धार्मिक उन्माद (यहूदी विरोधी) के गठबंधन के चलते नाजियों ने अमानवीयता की कौन सी हदें पार नहीं की। ध्यान रहे सभी रेशनल बुद्धिजीवी (यहां तक कि आइन्स्टाइन जैसे वैज्ञानिक) उनके निशाने पर थे। इन कट्टरपंथी ताकतों के लिए ये सहायक परिस्थितियां होती हैं। इसी तरह के उन्माद में आज वही इस्त्राइल (यहूदी देश) गाजापट्टी में क्या कुछ अमानवीय नहीं कर रहा। कहने को हम बेशक पहले ही घोषित कर चुके हों कि यह Age of Reason (Thomas Paine) है। लेकिन यह लड़ाई हमने अभी वैज्ञानिक विचार की ताकत के दम पर सैद्धांतिक स्तर पर ही जीती है। समाज में अतार्किकता (Irrationality)की जड़ें अभी गहरी हैं। जाति-धर्म-क्षेत्र-गोत्र, ऊँच-नीच आदि भी बड़े पैमाने पर हमारे यहाँ व्याप्त हैं। शिक्षा का ढाँचा चरमरा रहा है। राज्य अपने वायदों से मुकर कर इसे निजी हाथों में सौंप रहा है। सेक्यूलरिज्म की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। वर्तमान दौर ऐसा दौर है जहां अंधविश्वास के खिलाफ काम करने वाले व्यक्ति (डॉ. दाभोलकर) की सरेआम हत्या कर दी जाती है। वैज्ञानिकता की बात करने वालों को सांप्रदायिक फासीवादी ताकतें खुल्लम-खुल्ला परिणाम भुगतने और बलात्कार तक करने की धमकी (प्रभा) दे देते हैं। बात तो सभ्य समाज में नागरिक अधिकारों को बचाने तक आ सिमटी है। जाहिर है यह समय इतिहास में भयंकर दमन और संघर्ष के दौर के रूप में दर्ज हो रहा है। अल्पसंख्यकों को सीधे-सीधे राह में आने और सबक सिखाने की बात की जा रही है। अब तो संवैधानिक मूल्यों को ही ताक पर रखा जा रहा है। शिक्षा, स्वास्थ्य, ऊर्जा, उद्योग आदि हर क्षेत्र में संकट है। ज्ञान-विज्ञान की सभी संस्थाओं पर इनकी पैनी नजर है। तमाम प्रकार की अतार्किकताओं को पहचान कर लडऩे की जरूरत है। वर्तमान दौर इस लड़ाई के लिए हमें चुनौती दे रहा है। हमें भी न्याय, समानता व विवेकशीलता की पक्षधर तमाम ताकतों (जिनमें छात्र, अध्यापक, इंजीनियर, डॉक्टर, वैज्ञानिक, कामगार आदि सभी वर्ग) को एकजुट कर इसे स्वीकारना है। यह लड़ाई विज्ञान के विचार को स्थापित करने तक की लड़ाई नहीं है, अपितु समाज परिवर्तन की लड़ाई है।
रविवार, 3 अगस्त 2014
पांच पिचानवै
आज पांच प्रतिशत लूटेरे और पिचानवै प्रतिशत कमेरे की लड़ाई पूरी दुनिया में अलग अलग ढंग से चल रही है । इसे समझना और समझाना बहुत जरूरी हो गया है । क्या बताया भला कवि ने :
पिचानवै और पांच की दुनिया मैं छिड़ी लड़ाई रै
पांच नै प्रपंच रच कै पिचानवै की गेंद बनाई रै
पांच की जात मुनाफा मुनाफा है उसका भगवान
मुनाफे की खातर मचाया पूरी दुनिया मैं घमासान
मुनाफा छिपाने की खातर प्रपंच रचे बेउनमान
हथियार लेकै किस्मत का धराशायी करया इंसान
पिचानवै रोवै किस्मत नै पांच की देखो चतुराई रै
पूरे संसार के माँ पांच की कट पुतली ये सरकार
फ़ौज इनके इशारे ऊपर संघर्षों पर करती वार
कोर्ट कचहरी दुनिया मैं बताये इनके ताबेदार
इनकी बढ़ै रोजाना मंदी मैं कहते लूट की मार
कितै जात कितै धरम पै पिचानवै की फूट बढ़ायी रै
सारा तंत्र पांच खातर पिचानवै नै लूट रहया रै
कमाई पिचानवै की पर पांच ऐश कूट रहया रै
पिचानवै न्यारा न्यारा पी सबर का घूँट रहया रै
डाल फूट पिचानवै मैं पांच खागड़ छूट रहया रै
आपस मैं सिर फुड़ावां सम्मान इज्जत गंवाई रै
जब पिचानवै कठ्ठा होकै घाल अपनी घालैगा भाई
भ्र्ष्टाचारी पांच का शासन ऊपर तक हालैगा भाई
उन्नीस के बाँटै एक आवै ना कोए अस्त्र चालैगा भाई
नया सीस्टम् भगत सिंह का इंसानियत पालैगा भाई
कहै रणबीर दीखै ना और कोए मुक्ति की राही रै
चिंगारी प्रोडक्सन
गायक -साथी गुलाब सिंह
लेखक -साथी रणबीर सिंह
पिचानवै और पांच की दुनिया मैं छिड़ी लड़ाई रै
पांच नै प्रपंच रच कै पिचानवै की गेंद बनाई रै
पांच की जात मुनाफा मुनाफा है उसका भगवान
मुनाफे की खातर मचाया पूरी दुनिया मैं घमासान
मुनाफा छिपाने की खातर प्रपंच रचे बेउनमान
हथियार लेकै किस्मत का धराशायी करया इंसान
पिचानवै रोवै किस्मत नै पांच की देखो चतुराई रै
पूरे संसार के माँ पांच की कट पुतली ये सरकार
फ़ौज इनके इशारे ऊपर संघर्षों पर करती वार
कोर्ट कचहरी दुनिया मैं बताये इनके ताबेदार
इनकी बढ़ै रोजाना मंदी मैं कहते लूट की मार
कितै जात कितै धरम पै पिचानवै की फूट बढ़ायी रै
सारा तंत्र पांच खातर पिचानवै नै लूट रहया रै
कमाई पिचानवै की पर पांच ऐश कूट रहया रै
पिचानवै न्यारा न्यारा पी सबर का घूँट रहया रै
डाल फूट पिचानवै मैं पांच खागड़ छूट रहया रै
आपस मैं सिर फुड़ावां सम्मान इज्जत गंवाई रै
जब पिचानवै कठ्ठा होकै घाल अपनी घालैगा भाई
भ्र्ष्टाचारी पांच का शासन ऊपर तक हालैगा भाई
उन्नीस के बाँटै एक आवै ना कोए अस्त्र चालैगा भाई
नया सीस्टम् भगत सिंह का इंसानियत पालैगा भाई
कहै रणबीर दीखै ना और कोए मुक्ति की राही रै
चिंगारी प्रोडक्सन
गायक -साथी गुलाब सिंह
लेखक -साथी रणबीर सिंह
पन्दरा अगस्त
पन्दरा अगस्त
पन्दरा अगस्त सैंतालिस का
दिन लाखां जान
खपा कै आया।
घणे हुये कुर्बान
देस पै जिब
आजादी का राह
पाया।।
सैंतालिस
की आजादी र्इब
दो हजार आ
लिया
बस का भाड़ा
याद करो यो
कड़ै सी जा
लिया
सीमैंट का कटटा
कितने का आज
कौणसे भा लिया
एक गिहूं बोरी देकै
सीमैंट हमनै कितना
पा लिया
चिन्ता नै घेर
लिये जिब लेखा-जोखा आज
लगाया।।
आबादी बèाी
दोगणी पर नाज
चौगुणा पैदा करया
पचास मैं थी
जो हालत उसमैं
बताओ के जोड़ धरया
बिना पढ़ार्इ दवार्इ खजाना
सरकारी हमनै रोज
भरया
र्इमानदारी
की करी कमार्इ
फेर बी मनै
कड़ सरया
भ्रष्टाचार
बेइमानी नै क्यों
सतरंगा जाल बिछाया।।
यो दिन देखण
नै के भगत
सिंह नै फांसी
पार्इ थी
यो दिन देखण
नै के सुभाष
बोस नै फौज
बनार्इ थी
यो दिन देखण
नै के गांधी बापू
नै गोली खार्इ
थी
यो दिन देखण
नै के अम्बेडकर
ने संविधान बनार्इ थी
नये-नये घोटाले
सुणकै यो मेरा
सिर चकराया।।
गणतंत्र
दिवस पै कसम
उठावां नया हरियाणा
बणावांगे
भगत सिंह का
सपना अधूरा
उसनै पूरा कर
दिखावांगे
ना हो लूट
खसोट देस मैं
घर-घर अलख
जगावांगे
या दुनिया घणी सुन्दर
होज्या मिलकै हांगा लावांगे
रणबीर सिंह मिलकै
सोचां गया बख्त
किसकै थ्याया।।
शनिवार, 2 अगस्त 2014
हरयाणा विज्ञानं मंच एग्रीकल्चर कोर ग्रुप मीटिंग
हरयाणा विज्ञानं मंच एग्रीकल्चर कोर ग्रुप की मीटिंग डाक्टर महावीर नरवाल की अधक़स्ता में हुई । दिल्ली से साथी दिनेश अबरोल और विक्रम ने हिस्सेदारी की । राजेंदर सिंह ADO ,बलजीत भयान जिला हिसार , सतबीर नागल सचीव हरयाणा विज्ञानं मंच , साथी इंदरजीत AIKS ,सोहन दास सचिव हरयाणा ज्ञान विज्ञानं समिति , डाक्टर आर.एस. दहिया अधयक्ष हरयाणा ज्ञान विज्ञानं समिति , सुनील कुमार प्राध्यापक और अमन लेक्चरर फिज़िक्स ने हिस्सेदारी की । 4 बिन्दूओं पर बातचीत हुई ।
1 बीज का कार्यक्रम --अपना गाँव अपना बीज के लिए करनाल जिले के जोरा गाँव के सन्दर्भ में विस्तार से चर्चा हुई ।
2 पशुपालन के क्षेत्र में जोर गाँव में एक कैटल शेड बनाने पर बातचीत की गयी ।
3 कीट साक्षरता कक्षा -- बलजीत भयान ने विस्तार से बताया । यह प्रयोग हिसार जिले के जेवरा गाँव में शुरू किया गया है और प्रत्येक गुरूवार (thursday ) वहां कीट पाठशाला का आयोजन किया जा रहा है । इसमें जींद जिले की निडाना कीट पाठशाला के किसान रिसोर्स परसन के रूप में जाते हैं ।
4 कृषि क्षेत्र के बारे चार क्षेत्रों में दो दो गाव में सर्वे किया जाये इसके भिन्न भिन्न पहलूओं पर भी काफी गहन विचार विमर्श किया गया ।
5. हरयाणा के स्तर पर कृषि क्षेत्र पर एक स्टेटस पेपर तयार करने की जिम्मेवारी डाक्टर महावीर नरवाल को दी गयी ।
तालिबानी हिन्दू बनाने की मुहिम --9
लोकसंघर्ष ! |
मैंने अस्थिकलश यात्रियों से भोजन करने का जैसे ही आग्रह किया, वे थोडा सा झिझके, मुझे सेवा भारती के तत्कालीन जिला प्रमुख और संघ के एक पदाधिकारी तुरंत एक तरफ ले कर गए, बहुत ही प्यार से उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा, मेरे द्वारा किए गए इस शानदार आयोजन की भूरि-भूरि प्रशंसा की, मेरे काम को देर तक सराहने और मेरी संघ और राष्ट्र के प्रति निष्ठा पर अतीव प्रसन्नता जाहिर करने के बाद वे अत्यंत ही धीमी आवाज में बोले-बन्धु, आप तो हमारे समाज की विषमता से परिचित ही है, संघ के सारे प्रयासों के बाद भी अभी तक हिन्दू समाज समरस नहीं हो सका, हम तो आप जब भी चाहोगे तब आपके साथ आपके ही घर पर एक ही थाली में बैठकर खाना खा लेंगे, पर आज हमारे साथ साधु संत और अन्य लोग भी हैं, वे यह स्वीकार नहीं करेंगे कि हमने उन्हें किसी वंचित समुदाय के घर का खाना खिला दिया है, वे नाराज हो कर यात्रा छोड़कर वापस चले जाएँगे, मुझे काटो तो उस वक्त खून नहीं निकले, मैं स्तब्ध था, मेरे मस्तिष्क में विचारों की कई आँधियाँ एक साथ चल रही थी, मेरे जबान पर कोई शब्द ही नहीं आ रहे थे, जिससे मैं उन्हें अपनी परिस्थिति बता पाता, न मैं कुछ बोल पा रहा था और न ही उनके द्वारा दिए जा रहे तर्कों कुतर्कों को ही मैं सुन पा रहा था लेकिन उनके आखिरी वाक्य मुझे आज तक याद रह गए है-आप ऐसा करो कि खाना पैक करके गाड़ी में रखवा दो, अगले गाँव में कार्यक्रम के बाद सबको बैठाकर खिला देंगे मतलब साफ था कि वे बिना यह बताए कि यह मुझ दलित स्वयंसेवक के घर का बना खाना है, इसे चुपचाप सबको अगले गाँव में खिला दिया जाएगा। मेरी स्थिति उस वक्त बड़ी विचित्र हो गई थी, मैं अपने ही घर में हार महसूस कर रहा था, बिना कुछ किए ही मेरे पिताजी जीतते प्रतीत हो रहे थे, मैं उलझन में था कि पिताजी के सवालों का क्या जवाब दूँगा कि क्यों नहीं खाना खाया उन लोगों ने? फिर भी दिल कड़ा करके मैंने खाना पैक करवाना शुरू करवाया, घरवालों ने कारण पूछा तो मैंने कह दिया कि अगले गाँव भगवानपुरा में एक और कार्यक्रम है, पहले ही बहुत देरी हो गई है, इसलिए वहीं जाकर खाएँगे खाना, जैसे तैसे यह कह कर मैंने उस वक्त तो अपना पिंड छुड़वा लिया पर मन का सारा उत्साह जाता रहा, जाति से हीन होने का भाव हावी होने लगा, बार-बार यही सोच उभर कर आने लगी कि मेरे साथ यह क्या हो रहा है? संघ के लोग मेरे साथ ऐसा कैसे कर सकते हैं? मैं एक अनुशासित स्वयंसेवक, जुनूनी कारसेवक, जिला कार्यालय प्रमुख अगर मेरे साथ ही ऐसा छुआछूत, तो मेरे अन्य समाज बंधुओं के साथ कैसा दुर्व्यवहार हो रहा होगा? उस दिन पहली बार मैंने एक हिन्दू से परे हट कर सिर्फ निम्न जातिय दलित के नजरिए से सोचना शुरू किया, मैं जितना सोचता था, उतना ही उलझता जाता था सही बात तो यह है कि वह रात मेरे जीवन की सबसे लम्बी रात थी, बीतने का नाम ही नहीं लेती थी आँखों ही आँखों में गुजारी वह रात और कल का सूरज तो और भी भयंकर उदित होने जा रहा था, उसकी तो शायद मैंने कल्पना भी नहीं की थी।
और उन्होंने खाना फेंक दिया
आज मेरे लिए कयामत का दिन था, कल की रात अभी बीती ही थी कि सुबह का भयावह सूरज अपनी तेज किरणों के साथ उपस्थित था, मेरे साथी स्वयंसेवक पुरुषोत्तम क्षत्रिय जो की अस्थि कलश यात्रा के साथ ही चल रहे थे, घर आ पहुँचे, वे मेरे अम्बेडकर छात्रावास के दिनों के पड़ोसी भी थे, कवि होने के नाते अच्छे दोस्त भी। हम लोग आजाद नगर शाखा में साथ साथ जाते थे, हर बात एक दूसरे को साझा करते थे, गहरी मित्रता थी, वे सुबह खीर की केतली लेकर लौटे थे, उन्होंने जो कुछ मुझे बताया, वह अविश्वसनीय और अकल्पनीय था, उनके द्वारा दी जा रही सूचना मेरे दिमाग पर हथौड़े मारने जैसी थी। पुरुषोत्तम जी ने बताया कि आपके यहाँ से ले जाई गई खीर, पूरी भगवानपुरा मोड़ पर सड़क किनारे फेंक दी गई और रात को खाना वैध शर्मा के यहाँ बनवा कर देर रात खाया गया, मुझे कहा गया है कि मैं आपको यह बात नहीं बताऊँ लेकिन मैं झूठ नहीं बोलना चाहता, आपके खाने को खाया नहीं गया बल्कि फेंक दिया गया, मैंने पुरुषोत्तम जी से साफ कहा कि कुछ भी हो लेकिन संघ के स्वयंसेवक इतने जातिवादी और निकृष्ट नहीं हो सकते हैं, आप मजाक करने के लिए इतना बड़ा सफेद झूठ नहीं बोल सकते हैं? उन्होंने कहा कि यकीन नहीं होता है तो चल कर देख लो, कुछ ना कुछ तो अवशेष वहाँ मिल ही जाएँगे हम दोनों दोस्त साईकिल पर सवार हुए और भगवानपुरा मोड़ पर पहँुचे, जाकर देखा, पुरुषोत्तम सही साबित हुए, वाकई मेरे घर से गया खाना सड़क किनारे बिखरा हुआ था, जिसे चील, कौव्वे, कुत्ते, चींटिया बिना किसी भेदभाव के लगभग चटकर चुके थे, यह मेरे बर्दाश्त के बाहर था। उस शाम अस्थि कलश यात्रा ब्राह्मणों की सरेरी पहँुचने वाली थी, मैंने वहा जाकर खुल कर बात करने का निश्चय कर लिया था, अब बहुत हो चुका था, निर्णायक जंग का वक्त आ पहँुचा था, लड़ाई शुरू हो गई थी, सिर्फ घोषणा बाकी थी।
कहीं कोई सुनवाई नहीं
शाम को मैं अत्यंत आक्रोश के साथ ब्राह्मणों की सरेरी पहुँचा, मैंने अस्थि कलश यात्रियों से इस शर्मनाक घटनाक्रम के बारे में सफाई माँगी, उन्होंने भोजन फेंकने की घटना से साफ इनकार कर दिया, जब मैंने उन्हें बताया कि पुरुषोत्तम जी ने मुझे यह जानकारी दी है तब उन्होंने यह तो स्वीकार किया कि भोजन लिए गाड़ी में पीछे बैठे व्यक्ति के हाथ से भगवानपुरा के मोड़ पर जब गाड़ी स्पीड में मुड़ी तो खाना गिर गया, अब भला गिरा हुआ खाना कैसे खाते? इसलिए वैद जी के घर पर रात में खाना बनवा कर खाना पड़ा मैं उनके शब्दों और उनके चेहरे के भावों के बीच फंसे हुए सच को साफ-साफ देख पा रहा था, ये परम पूज्य भाई साहब सफेद झूठ भी कितनी आसानी से बोल रहे हैं। मुझे पक्का यकीन हो गया कि वे सरासर असत्य बोल रहे हैं। अगर खाना किसी के हाथ से गिरता तो सड़क के बीचों बीच गिरता, सड़क के किनारे पर जा कर कैसे गिरा खाना? दूसरे अगर पूरी गिरती तो खीर बची रहती और अगर खीर गिरती तो केतली पर मोच के निशान आते, मगर खीर और पूरी दोनों ही फेंके गए थे जान बूझ कर, उन्होंने पूरे होशोहवास में एक दलित स्वयंसेवक के घर से आया खाना फेंक दिया था, अब इस गलती को गलती मानने के बजाए अजीब से कुतर्क देने पर तुले हुए थे उनके झूठ और जूठ को सच के रूप में स्थापित करने की कोशिश से मेरा दिल फट गया, मुझे अत्यंत लज्जा और अपमान का अहसास हुआ, मैंने महसूस किया कि संघ के लोगों ने सिर्फ मेरे घर का बना खाना ही नहीं फेंका बल्कि मुझे भी दूर फेंक दिया है। मेरे सामने वह सारा समय और घटनाक्रम चलचित्र की भाँति गतिशील था, जब मैं अपनी पूरी क्षमता लगा कर संघ के काम को बढ़ाने पर तुला हुआ था। मैं उस मौके को याद कर रहा था, जब मैं रामजी के नाम पर शहीद होने के लिए घर से भाग गया था अगर मैं अयोध्या पहँुचने में सफल हो जाता और सरयू पुल पर पुलिस की गोली का शिकार हो जाता तो क्या वे मेरी लाश को भी छूते, मेरी मृतदेह घर भी पहँुचाई जाती या खाने की ही तरह सरयू में फेंक दी जाती? मैंने खुद से सवाल किया कि क्या मैं इसी हिन्दू राष्ट्र के लिए मरने मारने पर उतारू हूँ, जिसमें मेरा स्थान ही नहीं है। मेरी औकात क्या है? मेरी अपनी पहचान क्या है? मैं क्या हूँ? आखिर कौन हूँ मैं? एक रामभक्त कारसेवक हिन्दू या शूद्र अछूत जिसके घर का बना खाना भी स्वीकार नहीं। हिन्दू राष्ट्र की ध्वजा फहराने वालों के साथ मैं अपने को किस पहचान के साथ खड़ा करूँ?
बहुत सोचा पाया कि हिन्दू वर्ण व्यवस्था में शूद्र और जाति व्यवस्था में अछूत हूँ मैं अवर्ण मैं भले ही स्वयंसेवक था लेकिन पूरा हिन्दू नहीं था इसलिए मेरी स्वीकार्यता नहीं थी इसीलिए मुझे विस्तारक बनने की तो सलाह दी गई थी लेकिन प्रचारक बनने से रोक दिया गया था बस, अब मुझे खुद को जानना है, अपने साथ हुए हादसे के कारणों को खोजना है और उन कारणों को जड़ से मिटा देना है। मैंने इस अन्याय और भेदभाव के खिलाफ नागपुर तक अपनी आवाज बुलंद करने का निश्चय कर लिया मैं अस्थि कलश यात्रा के साथ चल रहे नेताओं से लेकर संघ के विभिन्न स्तर के प्रचारकों के पास गया मैंने कोई भी जगह और स्तर नहीं बाकी रख छोड़ा, जहाँ अपनी व्यथा नहीं पहँुचाई हो लेकिन सुनवाई कहीं भी नहीं होती दिखी, तब मैंने माननीय सर संघचालक रज्जू भैय्या तक भी अपनी गुहार लगाई। उन्हें पत्र लिखा, सारी बात लिखी और कहा कि आपके संगठन के स्थानीय ठेकेदार नहीं चाहते हैं कि मैं अब और एक भी दिन हिन्दू के नाते रहूँ और काम करूँ, लेकिन संघ के नक्कारखाने में मुझ तूती की आवाज को कौन सुनता? वहाँ भी किसी ने नहीं सुना सही बात तो यह थी कि सुनना ही नहीं था, जिन-जिन भी संघ प्रचारकों और पदाधिकारियों से मैं मिला, उन्होंने इसे एक बहुत छोटी सी बात कह कर टाल दिया, उल्टे मुझे ही नसीहतें मिलीं कि इस बात को छोड़कर मैं सकारात्मक काम में मन लगाऊँ पर मैं मानने को कतई तैयार नहीं था कि यह छोटी सी बात है, तब भी नहीं और आज भी नहीं, छुआछूत और भेदभाव किसी भी इन्सान की जिन्दगी में छोटी सी बात नहीं होती है, सिर्फ हिन्दू राष्ट्र के निर्माताओं के लिए यह छोटी सी बात हो सकती है।
-भँवर मेघवंशी
मो-09571047777
क्रमश :
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित
communiqué, dated November 14, 1948,
communiqué, dated November 14, 1948, once again emphasized, that "theinformation received by the Government of India shows that the activities carriedon in various forms and ways by the people associated with the RSS tend to beanti-national and often subversive and violent and that persistent attempts are beingmade by the RSS to receive an atmosphere in the country which was productive of such disastrous consequences in the past". While rejecting all pleas of Golwalkar the communiqué continued: "He has written letters both to the Prime Minister andthe Home Minister explaining inter alia that the RSS agrees entirely in theconception of a secular state for India and that it accepts the National Flag of thecountry and requesting that the ban imposed on the organization in Februaryshould now be lifted. These professions of the RSS leader are, however, quiteinconsistent with the practice of his followers and for the reasons already explainedabove, the Government of India find themselves unable to advise provincialgovernments to lift the ban. The Prime Minister has, therefore, declined theinterview which Mr. Golwalkar had sought". Government of India decided to liftthe ban on RSS on July 11, 1949, only after Golwalkar gave an undertaking to beloyal to the Constitution of India and respect the National Flag.It is well-known that the then Home Minister, Sardar Patel, had a soft-corner for the RSS. Sardar Patel continues to be a favourite with the RSS and references tohim are invariably for the purpose of denigrating Gandhi and Nehru. However even Patel found it difficult to defend the RSS in the aftermath of Gandhiji'sassassination. In a letter written to Golwalkar, dated 11 September 1948, Sardar Patel stated:"Organizing the Hindus and helping them is one thing but going in for revenge for its sufferings on innocent and helpless men, women and children is quite another thing.
"Apart from this, their opposition to the Congress, that too of such virulence,disregarding all considerations of personality, decency or decorum, created a kindof unrest among the people. All their speeches were full of communal poison. Itwas not necessary to spread poison in order to enthuse the Hindus and organize for their protection. As a final result of the poison, the country had to suffer thesacrifice of the invaluable life of Gandhiji. Even an iota of the sympathy of theGovernment, or of the people, no more remained for the RSS. In fact oppositiongrew. Opposition turned more severe, when the RSS men expressed joy anddistributed sweets after Gandhiji's death. Under these conditions it becameinevitable for the Government to take action against the RSS."Since then, over six months have elapsed. We had hoped that after this lapse of time, with full and proper consideration the RSS persons would come to the right path. But from the reports that come to me, it is evident that attempts to put freshlife into their same old activities are afoot". (Justice on Trial: Historic Documentsof Guruji-Government Correspondence, Delhi).In all fairness to Guru Golwalkar, he did not claim that the RSS had been opposedto the British. During the course of a speech at Indore in 1960 he said, "Many people worked with the inspiration to free the country by throwing the British out.After formal departure of the British this inspiration slackened. In fact there was noneed to have this much inspiration. We should remember that in our pledge wehave talked of the freedom of the country through defending religion and culture.These is no mention of departure of the British in that".
24
Guruji, the Sarsanghchalak of the RSS, was never able to hide his opposition toany movement against foreign rule. As late as March 1947when the British had
decided to go away from India, Guruji while addressing the annual day function of the RSS at Delhi, declared that leaders with narrow vision were trying to opposedthe state power of the British. While elaborating the point he said that it was wrongto hold the powerful foreigners responsible for all our ills. He decried the tendencyof "initiating the political movements on the basis of our hatred towards our victors".
25
While narrating an incident in the course of his speech he got moreoriginal on the issue: "Once a respectable senior gentleman came to our shakha(the drill). He had brought a new message for the volunteers of the RSS. Whengiven an opportunity to address the volunteers of the shakha, he spoke in a veryimpressive tone, 'Now do only one work. Catch hold of the British, bash them andthrow them out. Whatever happens we will see late on'. He said this much and satdown. Behind this ideology is a feeling of anger and sorrow towards state power and reactionary tendency based on hatred. The evil with today's politicalsentimentalism is that its basis is reaction, sorrow and anger, and opposition to thevictors forgetting friendliness. Somebody went to the extent of saying that, 'it isthrough opposition that national life builds up and only through it power of organization appears'. And if a question is put before them that what is the basis of the opposition? Then the reason is told that we are being exploited economically.We get fewer jobs in armed forces, government offices. Freedom is required sothat lot of wealth is gotten, there is no shortage of employment and food and water.In other words 'freedom is freedom from poverty' in other words if get rich we will be free. If a dog procures lots of fresh bread then it is sufficient. Their ideal is thatIndia should become dog of a rich person, and face no shortage of food water andshelter".
26
The RSS was not even willing to regard colonial domination as an injustice. In aspeech of June 8, 1942, Golwalkar had declared: "Sangh does not want to blame
anybody else for the present degraded state of the society. When the people start blaming others, then there is weakness in them. It is futile to blame the strong for the injustice done to the weak... Sangh does not want to waste its invaluable timein abusing or criticizing other. If we know that large fish eat the smaller ones, it isoutright madness to blame the big fish. Law of nature whether good or bad is trueall the time. This rule does not change by terming it unjust".
27
The RSS leadership has always tried to defend its inactivity against British rule bytaking the plea that theirs was a cultural organisation and could not have possiblytaken up political issues. Pro-RSS people in the media work overtime to strengthenthis impression. The RSS keeps on changing its face as per their politicalconvenience. On the issue of minorities, secularism and Hindu nationalism, theyare extremely political. But the moment the issue of the inhuman British Raj cropsup, they are transformed into a cultural organization. Irrespective of the public postures of the RSS leadership it may be worthwhile to know the ideas of Gurujion the subject of participation in political activities. While addressing senior activists of the RSS in a training camp, he said, "We know this also that some of our volunteers work in politics. There according to the needs of the work they haveto organize public meetings, processions etc., have to raise slogans. All thesethings have no place in our work. However, the actor should portray the character given to him to the best of his capability. But sometimes volunteers go beyond therole assigned to an actor as they develop over-zealousness in their hearts, to theextent that they become useless for this work. This is not good".
28
It will be shocking for any Indian who loves the martyrs of the freedom movementto know what Dr. Hedgewar and the RSS felt about the revolutionaries fightingagainst the British. According to his biography published by the RSS, "Patriotism
is not only going to prison. It is not correct to be carried away by such superficial patriotism. He used to urge that while remaining prepared to die of the countrywhen the time came, it is very necessary to have a desire to live while organizingfor the freedom of the country".
29
It is indeed a pity that 'fools' like Bhagat Singh,Rajguru, Sukhdev, Ashfaqullah, Chandrashekhar Azad did not come into contactwith this 'great patriotic thinker'. If they had the great opportunity to meet him,these martyrs could have been saved from giving their lives for "superficial patriotism". This also must be the reason that RSS produced no martyrs during thefreedom movement.Even the word 'shameful' is not appropriate to describe the attitude of the RSSleadership towards those who had sacrificed everything in the struggle against theBritish rulers. The last Mughal ruler of India, Bahadur Zafar, had emerged as therallying point and symbol of the Great War of Independence of 1857. Golwalkar wrote thus while making fun of him: "In 1857, the so-called last emperor of Indiahad given the clarion call - Gazio mein bu rahegi jub talak eeman ki/takhte Londontak chalegi tegh Hindustan ki (Till the warriors remain faithful to their task/Indianswords will reach London.) But ultimately what happened? Everybody knowsthat".
30
What Golwalkar thought of the people sacrificing their lot for the countryis obvious from the following words also. He had the temerity to ask the greatrevolutionaries who wished to lay down their lives for the freedom of themotherland the following question as if he was representing the British: "But oneshould think whether complete national interest is accomplished by that? Sacrificedoes not lead to increase in the thinking of the society of giving all for the interestof the nation. It is borne by the experience upto now that this fire in the heart isunbearable to the common people".
31
What did the British rule mean to an average patriotic Indian? It symbolizedrepression, plunder, and pauperization of the people of this country. It meant thedivide and rule policy of the foreign rulers through which they encouragedcommunal and sectarian divisions in Indian society. And what could be the movingspirit behind any struggle against such a British rule? What could have been theessence of the freedom movement against British rule? It could not have beenanything other than a call to throw the British out.The BJP leadership is very keen to project the RSS as a component of the freedomstruggle. This is an attempt to gain greater respectability and wider acceptance. For a party which claims to be the touchstone of patriotism this is an importantconsideration. The BJP finds it embarrassing that the RSS - to which the topleadership as well as the overwhelming majority of the cadre of the BJP belong -was not a part of the freedom movement. It is politically inconvenient for anorganization which constantly refers to its glorious past, that it has no legacy of ananti-colonial struggle - the mightiest struggle of the Indian people in this century.The RSS lacks the courage to categorically state that it did not participate in thefreedom struggle because its ideology prevented it from doing so. The politicalstream of the Hindu rightwing has, of course, accumulated enormous experience infalsifying history. It is hardly surprising then that all manner of falsehoods areresorted to with the aim of distorting the history of the freedom struggle. Will agreat nation which has a glorious tradition of anti-imperialist struggles fall prey tothis attempt?References1. The Hindu, March 19, 1999.
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ (Atom)



