बुधवार, 20 अगस्त 2014

मौजूदा परिस्थिति

मौजूदा परिस्थिति

हमारी सभ्यता (हड़प्पा एवं मोहन जोदड़ो) विश्व की प्राचीन सभ्यताओं में गिनी जाती है। प्राचीन काल में हमारे यहां विभिन्न क्षेत्रों में बहुत सी उपलब्धियां दर्ज हैं। दिल्ली की लौहसतम्भ जैसा शिल्प एवं धातुकर्म, सुश्रुत, चरक जैसे चिकित्सक, आर्यभट्ट जैसे गणितज्ञ एवं वैज्ञानिक तथा तक्षशिला व नालंदा जैसे विश्वप्रसिद्ध विश्वविद्यालय हमारे विरासत हैं। जैन एवं बौद्ध व लोकायत जैसे सामाजिक दर्शन हमारे यहां रहे हैं। यदि हम इतिहास में जाएँ तो पता चलता है कि विचारधाराओं के संघर्ष चलते रहे हैं। आज की असलीयत भी हम सब समझ सकते हैं। इतिहास की पूरी समीक्षा पर न भी जाएं तो भी इस हकीकत से इनकार नहीं किया जा सकता कि आज भी हमारे यहाँ हद दर्जे की सामाजिक विषमता, आर्थिक व औद्योगिक पिछड़ापन, घोर अंधविश्वास, धार्मिक कट्टरता, जातिवाद, अनपढ़ता आदि मौजूद हैं। । 
यह सब हमारे समाज में मौजूद प्रतिगामी शक्तियों के उभार के कारण हुआ है। इन सब की शुरुआत उसी समय हो चुकी थी जब पुनरुर्थानवादी ताकतों की विजय हुई थी (शंकराचार्य व बौद्धों के संघर्ष)। यह त्रासदी चौथी-पांचवीं सदी की है। तभी से हम पिछडऩे शुरू हो गए थे। पुनर्जागरण (14-15वीं सदी) की दौड़ में हम पिछड़ गए। हमारे यहाँ नवजागरण भी देर से हुआ और जैसा भी हुआ वह कमोबेश धार्मिक सुधारों के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गया। फिर भी निश्चित ही वे प्रगतिशील,जनतांत्रिक व सामूहिकता के मूल्य थे जिनकी बदौलत हम आजादी पाने जैसी कठोर परीक्षा में सफल रहे। ‘वैज्ञानिक मानसिकता’ जैसी शब्दावली हमारे यहां गढ़ी गई। शायद हमारा देश ही दुनिया का पहला देश है जिसके संविधान में वैज्ञानिक मानसिकता, मानवतावाद व सुधारवाद को हर नागरिक का मौलिक कर्तव्य कहा गया है। इन प्रयासों के चलते स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरंत बाद के कुछ वर्षों में हम कुछ कर पाए। स्वाभाविक है ऐसा वातावरण प्रतिगामी ताकतों और कट्टरपंथियों को रास नहीं आ सकता। हमें अच्छी तरह मालूम है कि ऐसी शक्तियां हर अवसर का इंतजार करती हैं और अपना खेल खेलने को तैयार रहती हैं।
हमारे समाज के लिए वर्तमान में यह सबसे बड़ी त्रासदी है कि ये शक्तियां संवैधानिक रूप में भी विजयी हो कर आज अपने एजेण्डे को पूरा करने की राह पर है। वर्तमान दौर हमें जर्मनी के 1930-35 के दौर की याद दिला देता है। उस समय विदेशी पूंजी, मीडिया (गोयबल्स), धार्मिक उन्माद (यहूदी विरोधी) के गठबंधन के चलते नाजियों ने अमानवीयता की कौन सी हदें पार नहीं की। ध्यान रहे सभी रेशनल बुद्धिजीवी (यहां तक कि आइन्स्टाइन जैसे वैज्ञानिक) उनके निशाने पर थे। इन कट्टरपंथी ताकतों के लिए ये सहायक परिस्थितियां होती हैं। इसी तरह के उन्माद में आज वही इस्त्राइल (यहूदी देश) गाजापट्टी में क्या कुछ अमानवीय नहीं कर रहा। कहने को हम बेशक पहले ही घोषित कर चुके हों कि यह Age of Reason (Thomas Paine) है। लेकिन यह लड़ाई हमने अभी वैज्ञानिक विचार की ताकत के दम पर सैद्धांतिक स्तर पर ही जीती है। समाज में अतार्किकता (Irrationality)की जड़ें अभी गहरी हैं। जाति-धर्म-क्षेत्र-गोत्र, ऊँच-नीच आदि भी बड़े पैमाने पर हमारे यहाँ व्याप्त हैं। शिक्षा का ढाँचा चरमरा रहा है। राज्य अपने वायदों से मुकर कर इसे निजी हाथों में सौंप रहा है। सेक्यूलरिज्म की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। वर्तमान दौर ऐसा दौर है जहां अंधविश्वास के खिलाफ काम करने वाले व्यक्ति (डॉ. दाभोलकर) की सरेआम हत्या कर दी जाती है। वैज्ञानिकता की बात करने वालों को सांप्रदायिक फासीवादी ताकतें खुल्लम-खुल्ला परिणाम भुगतने और बलात्कार तक करने की धमकी (प्रभा) दे देते हैं। बात तो सभ्य समाज में नागरिक अधिकारों को बचाने तक आ सिमटी है। जाहिर है यह समय इतिहास में भयंकर दमन और संघर्ष के दौर के रूप में दर्ज हो रहा है। अल्पसंख्यकों को सीधे-सीधे राह में आने और सबक सिखाने की बात की जा रही है। अब तो संवैधानिक मूल्यों को ही ताक पर रखा जा रहा है। शिक्षा, स्वास्थ्य, ऊर्जा, उद्योग आदि हर क्षेत्र में संकट है। ज्ञान-विज्ञान की सभी संस्थाओं पर इनकी पैनी नजर है। तमाम प्रकार की अतार्किकताओं को पहचान कर लडऩे की जरूरत है। वर्तमान दौर इस लड़ाई के लिए हमें चुनौती दे रहा है। हमें भी न्याय, समानता व विवेकशीलता की पक्षधर तमाम ताकतों (जिनमें छात्र, अध्यापक, इंजीनियर, डॉक्टर, वैज्ञानिक, कामगार आदि सभी वर्ग) को एकजुट कर इसे स्वीकारना है। यह लड़ाई विज्ञान के विचार को स्थापित करने तक की लड़ाई नहीं है, अपितु समाज परिवर्तन की लड़ाई है।

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