भारत में महिला सशक्तिकरण आवश्यक
महिला सशक्तिकरण की बात करने से पहले इस प्रश्न का उत्तर ढूंढना होगा कि क्या वास्तव में महिलायें अशक्त हैं ? कहीं ऐसा तो नहीं कि अज्ञानतावश या निहित स्वार्थों के तहत कोई षडयंत्र तो नहीं, महिलाओं को अशक्त बनाये जाने का या उसे अशक्त बताने का…!! मानव सभ्यता जब से पृथ्वी पर पनपने लगी तभी से “बलशाली को ही अधिकार” के सिध्धांत को अपनाते हुए पुरुषवर्ग ने अपने शारिरीक सामर्थ्य का फ़यदा उठाते हुऐ उस पर अपना आधिपत्य जमाना शुरु कर दिया और उसे दोयम दर्जे पर ला खडा किया | धीरे-धीरे नारी ने उसे अपना नसीब व नियति समझ, स्वीकार कर लिया |
भारत में ही नहीं, पूरे विश्व में महिलाओं के प्रति भेदभाव और शोषण की नीतियों का सदियों से ही बोलबाला रहा है | इतना जरुर कह सकते हैं कि मापदंड व तरीके भिन्न-भिन्न जरुर रहे हैं | सीता से लेकर द्रौपदी तक को यहां पुरुष सत्तात्मक मानसिकता को झेलना पडा है | हर युग में पुरुष के वर्चस्व की किमत नारी ने चुकाई है या उसे चुकाने पर मजबुर होना पडा है | यही कारण रहा किढोल,गंवार, शुद्र, पशु नारी , ये सब ताडन के अधिकारी और नारी तेरी यही कहानी आंचल में दूध आंखों में पानी जैसी रचनायें रची गईं , जो सपष्ट इस बात की पूर्ति करती हैं कि वैदिक काल में हमारे देश में जिस नारी को पूज्यनीय माना जाता था , उसे पुरुष समान इज्जत दी जाती थी , मातृ देवो भव : कहा जाता था…..उस नारी- आदर और सम्मान का , उस की दिशा और दशा का किस तरह पतन हुआ…!! क्यों ऐसा हुआ ? क्योंकि मोगल सत्ताधीशों का आंतक इस तरह अपना सिर ऊंचा कर बैठा था कि नर को नारी को इस आतंक से बचाने के लिये पर्दा-प्रथा को लाना पडा | पति के मृत्य के बाद सती बनने की प्रथा लाई गई | दूधपीति की प्रथा का जन्म हुआ और देखते ही देखते कुरिवाजों की बाढ सी आ गई…!! जो नारी चुले से चौपाल तक जा सकने में शक्तिमान थी वह दहलिज लांघने को भी लाचार हो गई…!!
हम ये अच्छी तरह जानते हैं कि मातृत्व के आंगन में ही हमारे व्यकतित्व का विकास होता है | मा ही बच्चे की प्रथम शिक्षिका होती है | हमे ये कतई नहीं भूलना चाहिये कि…
‘सशक्त नारी, सशक्त समाज
सशक्त समाज , सशक्त देश’….
शायद इसीलिये शर-शैया पर लेटे हुए भीष्म-पितामह ने अपने अंतिम समय में पांडवों को राजनीति के पाठ पढाते हुए नसीहत दी थी कि किसी राजा की कुशलता इस तथ्य की मोहताज होती है कि उस के राज्य में महिलाओं का सम्मान कितना होता है ? यही कारण है कि आज महिला सशक्तिकरण सरकार की उपलब्धियां का सार्थक मापदंड बना हुआ है |
वर्ष 2011 के इंदिरा गांधी शांति पुरुस्कार प्रदान करते समय भारत के वर्तमान राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने कहा था कि राष्ट्र की आर्थिक गतिविधियां में महिलाओं की उचित भागीदारी के बिना सामाजिक प्रगति की अपेक्षा रखना तर्क संगत नहीं होगा | जहां-जहां महिलाओं की व्यापार व कॉरपरेट जगत में अहम भागीदारी रही है (एक संयुक्तराष्ट्र के सर्वेक्षण के मुताबिक) वहां करीब 53% अधिक लाभांश और करीब 24% अधिक बिक्री पाई गई है | लेकिन चंद महिलाओं को ऊंचाई पर देख, हम उन बडे प्रतिशत अशिक्षित महिलाओं को नजर अंदाज नहीं कर सकते जो आज भी कुपोषण की शिकार हैं, घरेलू हिंसा और तानाकसी से तार-तार हो रही हैं, दहेज के लिये जलाई जा रहीं हैं , बेटी को जन्म देने के निर्णय के लिये भी वे पुरुष पर निर्भय हैं |
सही अर्थों में देखा जाये तो महिला सशक्तिकरण का अर्थ ही है महिला को आत्म-सम्मान देना | उसे आत्मनिर्भर बनाना | उस के अस्तित्व की रक्षा करना | 8 मार्च को महिला दिवस मनाकर या कानून या अधिनियमों को बनाकर महिला सशक्तिकरण नहीं हो पायेगा | सरकार महिलाओं को हक्क तो दे सकती है पर जब तक उनके अपनों की सोच में परिवर्तन ना आये या वे खुद अपने अंदर परिवर्तन न लायें तब तक उन का चौखट से चौपाल तक आने का सफर आसान नहीं होगा | जब समाज में सामाजिक, पारिवारिक और वैचारिक बदलाव आयेगा,तभी शायद औरतों की समस्यायें कुछ कम हो पायेगी क्योंकि आज सिर्फ पुरुष ही दोषी नहीं हैं वरन महिलायें भी दोषी हैं | एक बहू आज भी अपने ही घर में अपनी सास-ननंद से प्रताडित होती नजर आती है | आज बहू,बेटी,बहन अपने ही घरों में सुरक्षित नहीं हैं |
ये प्रताडना आज से नहीं सदियों से चली आ रही है | महाभारत में अपने ही देवर दुशासन के हथों द्रौपदी का चीर-हरण भरी सभा में कुटुंब के महानुभावों और खुद के ही सशक्त पांच पतियों के सन्मुख हुआ था …!! जब कभी भी हमारे देश में महिला सशक्तिकरण की चर्चायें होती हैं तब आर्थिक और राजनैतिक उत्थान की ही बातें होती हैं | इसी कारण आज हम एक पढी-लिखी आर्थिक रुप से आत्मनिर्भर महिला को हर तरह से सशक्त और सफल मान लेते हैं | पर क्या महिलाओं का सशक्तिकरण आर्थिक रुप से सक्षम हो जाने से हो पायेगा ? कतई नहीं..| ये सही है कि वे कामकाजी तो बनी हैं पर अपने घर वापस सुरक्षित पहूंच ने की गेरंटी क्या उन्हें मिल पाई है ? महिलाओ का राजनैतिक उत्थान बताने हेतु हमारी सरकार ने ग्रामीण महिलाओं को सरपंच तो बना दिया,पर वे सरपंच महिलायें अपने ही पुरुषवर्ग के हथों की कठ्पुतलियां ही मात्र बनी रहीं…!!
जब तक महिलाओं का सामाजिक, वैचारिक एवम पारिवारिक तौर पर उत्थान नहीं होगा तब तक सशक्तिकरण का ढोल पिटना एक खेल मात्र ही बना रहेगा | सामाजिक उत्थान का आधार-स्तंभ है नारी-शिक्षा| शिक्षित व्यक्ति ही अपनी समानता और स्वतंत्रता के साथ-साथ अपने कानूनी अधिकाओं का बेहतर उपयोग कर सकता है | अपने आत्मसम्मान की रक्षा कर सकता है | अपमानित होने से बच सकता है | शायद यही वजह रही है कि हमारे भारतवर्ष में महिला-शिक्षण का प्रतिशत बहूत कम है,क्योंकि हमारे देश के शासन में बैठे मनु महाराज के वंशज ये नहीं चाहते थे कि महिला शिक्षित हो | वे जानते थे कि अगर नारी को पढने देगें तो वह अपना भला-बूरा समझ पायेगी | उन्हें इस बात की भीती भी थी कि घर को सही ढंग से चलानेवाली नारी कहीं हमे ही न चला बैठे…!! जब-जब नारी को मौका मिला है , उस ने तब-तब अपनी शक्ति का परिचय बखुबी दिया है | पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी , पूर्व पुलिस कमिश्नर श्रीमती किरन बेदी , आई सी आई सी बेंक की निदेशक चंदा कोचर आदि इस के उदाहरण हैं |
यह एक मिथ्या सोच ही है कि महिला सश्क्तिकरण से पुरुषों के अधिकारों का हनन होगा | सशक्तिकरण अधिकारों का बंटवारा नहीं बल्कि परिस्थितियों और मापदंडों के सुधार का पर्यायवाची है | अगर महिलाओं की स्थिति में सुधार होगा तो पुरुष की स्थिति भी कई गुणा अधिक प्रगति की राह पर अग्रसर होती दिखेगी | नारी को दुर्गा का रुप माना गया है जो शेर सवारी है और हर हाथ में अस्त्र-शस्त्र थामे हुए है | महिषासुर मर्दनी है | वह शिव की शक्ति है | शिव शक्ति बिना अघूरे हैं | नारी भी नर की शक्ति ही है | तभी तो उसे अर्धांगिनी माना जाता रहा है..!! अगर ये सकारात्मक सोच को सामने रखेंगे तभी महिला सशक्तिकरण को बढावा मिल पायेगा |
स्वतंत्रता के पूर्व की बात को न लें और सिर्फ उसके बाद के वर्षों पर ध्यान दिया जाये तब ही हम समझ पायेगें कि स्वतंत्रता के छ: दशकों के बाद भी नारी का सशक्तिकरण क्यों न हो पाया ? कानून तो बहुत बनें…!! आजादी के बाद हमारे संविधान के निर्माण के समय हिंदू कोड बिल की भी बात उठी थी | इस बिल को सामाजिक विधि-विधान को सामने रख बनाया गया था | दुर्भाग्यवश कुछ स्वार्थों के चलते पारित नहीं हो पाया था | पर उस के बाद 1974-78 में पंचवर्षीय योजना के तहत महिलाओं की परिस्थिति में सुधार लाने के लिये कानून बनाये गये जो काफी सक्षम भी थे…पर सुधार हो पाया ? नहीं | फिर 1990 में राष्ट्रिय महिला आयोग का गठन किया गया | 2009-11 में सात सूत्रीय कर्यक्रमों के तहत बहुत सी बातें को आगे रखा गया, सुरक्षित मातृत्व, समान पारिश्रमिक इत्यादि कई महिला उत्थान को ध्यान में रख कायदे बनाये गये थे | वर्ष 2010 में ‘मिशन पूर्ण शक्ति’ की स्थापना भी हो गई, पर नतीजा क्या हुआ ?
आज भी हमारी महिलाओं को घरेलू हिंसा का सामना करना पड रहा है | आज भी कार्यस्थल पर पद्दोनति के लिये पक्षपात को झेलना पड रहा है व आज अपने ही घरों में यौन शोषण का शिकार बनी देखी जा रही है | उसे शिक्षा से वंचित रखा जा रहा है और सब से दु:खद तो ये है कि आज भी निर्भया, कामिनी ,लज्जा कुछ विकृत मानसिकता वाले भेडियों के कुकर्म का शिकार बनती देखी जा रही हैं | चौराहों पर उन के शील का हनन किया जा रहा है…!!क्या इसे हम नारी सशक्तिकरण मान लें ? क्या कानून बनाकर भी हम नारी अस्मिता को निलाम होने से रोक पाये ? नहीं | क्यों ? क्योंकि मानव बडा समझदार प्राणी है | उस ने अपनी कथनी और करनी को अलग रखना सिख लिया है…!!
ये भी उतना ही सच्च है कि जब-जब अति ने सिर उठया है , उस का तब-तब नाश ही हुआ है | जब कभी धर्म पर अधर्म हावी होने लगता है तो क्रांति का जन्म हुआ है | शायद इसीलिये दिल्ली के गैंगरेप की घटना ने सोये हुए देशवाशियों को जगा दिया | प्रशासन में बैठ जनता के हित के ठेकेदारों को चुनौती दे डाली |
ऐसी घटना क्यों घटी ? क्योंकि…..
राम मेरी नगरी में पैदा हो या न हो,
लेकिन रावण तब भी था और अब भी है |
मेरा मानना है कि हमे कानूनों की बैसाखियों का सहारा तो लेना है पर साथ-साथ अपने आप को शिक्षित कर, खुद के अस्तित्व को ऊपर उठाना है | अपने आत्मसम्मान को बरकरार रखना है | आत्म निर्भय हो आत्म रक्षा के लिये तैयार होना है | मानसिक तौर पर भले ही हम सशक्त हैं , शारिरीक तौर पर भी हमें सशक्त बनना होगा तभी सही अर्थों में हम हमारा सशक्तिकरण को सही दिशा दे पायेंगे |
अंत में इतना ही…..
आकाश मेरी बैसाखियों पर टीका है…
इंद्रधनुष मेरी आंखों का काजल है…..
सूरज की परिक्रमा मेरे गर्भ से गुजरती है….
बादलों में मेरे विचार घुमडते हैं……
पर अफसोस….
मेरी अभिव्यक्ति की बयार का आना अभी बाकी है…
मेरी अभिव्यक्ति की बयार का आना अभी बाकी है…
कमलेश अग्रवाल
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