शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2014

आज का कड़ुआ सच

आज का कड़ुआ सच
दरअसल मानवीय प्राथमिकताओं के भयावह असंतुलन से नजरें चुराकर ही आप आज की दुनिया में तथाकथित वैश्वीकरण उदारीकरण व् निजीकरण की हिमायत कर सकते हैं । साधनों की इन भयावह विषमताओं और पूंजी पर बहुराष्ट्रीय दानवों के बढ़ते शिकंजे के चलते क्या इस दुनिया के लिए अपनी समूची जनसंख्या के लिए  भेद भाव लाये एक बड़े परिवार की तरह खिलाना पिलाना और पोषित करना सम्भव है ?सांस्कृतिक और आर्थिक खाई को पाटने की रामबाण दवाई हैं ये तीन शब्द ।  इस रामबाण दवाई ने रिएक्शन करना ही था और यह कर दिया और बेचैनी पैदा हुई जिसको आज दक्षिण पंथी ताकतों ने बखूबी भुना लिया है । अभी देखना है और लड़ना है । 

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