रविवार, 14 सितंबर 2014

AISA KYON

---आपकी ज़िन्दगी बस यूँ ही नहीं घट जाती. चाहे आप जानते हों या नहीं ये आपही के द्वारा डिजाईन की जाती है. आखिरकार आप ही अपने विकल्प चुनते हैं. आप खुशियाँ चुनते हैं . आप दुःख चुनते हैं.आप निश्चितता चुनते हैं. आप अपनी अनिश्चितता चुनते हैं.आप अपनी सफलता चुनते हैं. आप अपनी असफलता चुनते हैं.आप साहस चुनते हैं.आप डर चुनते हैं.इतना याद रखिये कि हर एक क्षणहर एक परिस्थिति आपको एक नया विकल्प देती है.और ऐसे में आपके पास हमेशा ये अपॉरचुनिटी  होती है कि आप चीजों को अलग तेरीके से करें और अपने लिए और पोजिटिव रिजल्ट प्रॉड्यूस  करें. ---
मगर एक बात साथ और भी है की ऐसे बहुत कम लोग होते हैं जो ऐसा कर पाते  हैं ?? क्या बाकि करना नहीं चाहते या और गहरी बातें हैं इसके पीछे । 

रविवार, 7 सितंबर 2014

तोहफे



हरयाणा में एक तरफ  तो विकास के लम्बे चौड़े दावे  किये जा रहे हैं परन्तु दूसरी और रोजगार ,शिक्षा -स्वास्थ्य , आवास ,भोजन   बुनियादी जरूरतों  से वंचित आदमी की दशा बद से बदतर होती जा रही है । जिंदगी  की सभी जरूरी चीजों की कमर तोड़ मंहगाई से उसका जीना दूभर हो गया है । जन मोर्चों ने लम्बे संघर्षों से नरेगा , खाद्य सुरक्षा अधिकार , शिक्षा अधिकार  जैसे जो कानून बनवाए हैं आज  उन पर खतरा मंडरा रहा है । सब्सिडी  खैरात के रूप में प्रचारित करके अनाज , खाद , बीज , डीजल , गैस आदि  पर से सरकार खर्चा घटा रही है । लेकिन बड़े पूंजीपतियों और विदेशी कंपनियों को पहले मनमोहन सरकार और अब मोदी सरकार लाखों करोड़ रूपये की रियायतों के तोहफे दे रही  है.  




पंडित नेकी राम शर्मा

स्वतंत्रता सेनानी पंडित नेकी राम शर्मा  के जनम दिन के मौके पर
कुलभूषण आर्य भिवानी

टेक : जाति  बाहर गेरया था वो पंडित  नेकीराम सुण्या होगा रै ।
         जित रहया करैं थे वो भी केलंगा गाम सुण्या होगा रै ।
                  7 सितम्बर 1887 मैं एक अच्छी घड़ी आई थी
                  पांच भाइयों मैं चौथे नंबर पर जगह पाई थी
                  पढ़ लिख कर पंडित बणज्या दादा नै इच्छा जताई थी
                  सीतापुर और बनारस के म्हां शुरू  करी पढ़ाई थी
           समय हो बलवान न्यूँ  सब पर कहते सुण्या होगा रै ।
                   किसानों की देख हालत चिंता गहरी जताई थी
                   9 जनवरी सन 1929 को अलखपुरा मैं किसान सभा बनाई थी
                   लालपत राय और नेकीराम नै कठ्ठे हो सलाह मिलाई थी
                   आजादी पावण  की खातर संघर्ष की राह बताई थी
           15 नवम्बर 1929  गढ़ी मैं आये मदन मोहन मालवीय नाम सुण्या होगा रै ।
                    बेगार प्रथा हो खत्म न्यूँ योजना पूरी बनाई थी
                    16 गॉवों की हो जनता कठ्ठी करी शुरू लड़ाई थी
                    सिवाना,जीतपुरा , सिकंदरपुर , गढ़ी , हजारी खेड़ी आई थी
                    अलखपुरा -मेहन्दा -कूंगड़ -बड़सी और दुर्जनपुर   नै मिल करी चढ़ाई थी
           आगै होकै लिया भाग वो जालिम स्कीनर सुण्या होगा रै ।
                    5 दिसंबर 1940 को जवाहर चौंक मैं चिंगारी एक सुलगाई थी
                     सुण  भाषण नेकीराम का अंगरेजी सरकार थर्राई थी
                     चाँद नारायण ए डी एम  की अदालत मैं कड़ी सजा सुनायी थी
                     पंडित जी ना घबराया भाई कसम आजादी की खाई थी
            रास्ते से नां भटकने वाला वीर नेकीराम सुण्या होगा रै ।
                      के के बतावां पंडित   या  घणी  बड़ी कहानी सै
                       समझे  कोन्या अच्छी तरियां या म्हारी नादानी सै
                       इब बी ले समझ तो जा बण बात या लम्बी जिंदगानी सै
                        पंडित जी की बात कुलभूषण जन जन तक पहुँचानी सै
            लडैगा  वह जीतैगा यूं पंडित जी का पैगाम सुण्या होगा रै ।  
स्वतंत्रता सेनानी पंडित नेकीराम शर्मा के जन्म दिवस के मौके पर 
                                 सेमिनार 
आज का  किसान आंदोलन और  चुनौतियाँ 

 स्वतंत्रता सेनानी पंडित नेकीराम शर्मा के जन्म दिवस के मौके पर सेमिनार  में डाक्टर रणबीर सिंह दहिया , कॉमरेड इंदरजीत सिंह , भूतपूर्व एम एल ए  चौधरी बलबीर सिंह ग्रेवाल ,महेश शर्मा जी ग्राण्ड सन ऑफ पंडित नेकी राम शर्मा जी , बलबीर शर्मा जी दामाद , मैडम उर्मिल शर्मा पौती , मैडम पुष्पा शर्मा प्रिंसिपल -पौती , बृजेश कुमार एडवोकेट सुप्रीम कोर्ट - पौता चौधरी लाजपत राय व अन्य गण मान्य व्यक्तियों और महिलाओं ने हिस्सेदारी की और उनके संघर्षशील जीवन के विभिन पक्षों पर प्रकाश डालते हुए उनको याद किया । 7 सितम्बर 1887 को केलंगा गाँव में उनका जनम हुआ । वे  फ्रीडम फाइटर थे और समाज सुधारक थे ॥ बेजोड़ विवाह , छुआ छूत , जाति प्रथा  ,विधवाओं की दुर्दशा , पर्दा प्रथा , बाल विवाह , ब्याह शादियों  फिजूल खर्ची जैसी कुरीतियों के खिलाफ गाँव गॉंव जाकर जनता को लामबंद किया । होम रूल आंदोलन 1916 से 18 में उनका नाम हमेशा याद किया जायेगा । उन्होंने अंग्रेजों का डट कर विरोध किया । कुल मिलाकर 9 बार गिरफ्तार किया गया उनको । 2200 दिन पंजाब की जेलों में रहे । 250 दिन  कठोर कारावास के हैं । किसान सभा का गठन किया और संघर्ष किया । जून 1956 में हमारा साथ छोड़ गए । 

गुरुवार, 4 सितंबर 2014

आलोचनात्मक प्रश्न उठाना-सार्वभौमिक या पाश्चात्य?


भाग-तीन
आलोचनात्मक प्रश्न उठाना-सार्वभौमिक या पाश्चात्य?
जैसे ही ‘वैज्ञानिक मानसिकता पर कथन’ (स्स्ञ्ज) जारी हुआ, विभिन्न क्षेत्रों से इसकी तीखी आलोचना शुरू हुई। एक दिशा की आलोचना स्वयं को ‘राष्ट्रभक्त और जनपक्षीय विज्ञान व तकनीकी (क्कक्कस्ञ्ज)’ कहने वालों की ओर से आई। इनके अनुसार यह भारत में ‘पाश्चात्य विज्ञान’ की संकलना लागू करने की कोशिश है। स्वभाविक है पीपीएसटी ने यह कहते हुए कि यह तो ‘पाश्चात्य संकल्पना’ है, ऐसी विज्ञान विधि की संकल्पना का विरोध करना ही था जो सार्वभौमिक है।
हमारा यह मानना है कि ऐसा करके पीपीएसटी की आलोचना इस बात से इनकार करती है जो आलोचनात्मक प्रश्न उठाने पदार्थवाद, अंधविश्वास और रूढि़वाद के खिलाफ पिछले इतिहास में हमारे प्रयास रहे हैं। इस परम्परा में प्राकृतिक विज्ञानों, गणित, राजनीति जैसे लोकायत, चरक, आर्यभट्ट, पी.सी.रे., फुले, पेरियार, अम्बेडकर, नेहरू और भगत सिंह जैसी धर्मनिरपेक्ष धाराएं एवं गौतम बुद्ध जैसे जनतांत्रिक धार्मिक सुधार, भक्ति और सूफी परम्परा से लेकर राजा राम मोहन राय, विवेकानंद, श्री नारायण गुरु व गांधी जी तक की धाराएं भी शामिल हैं। स्वयं में आलोचनात्मक सोच होना और अंधविश्वासों के विरुद्ध लडऩा, समानता के लिए कटिबद्ध होना केवल लोकायत जैसे पदार्थवादी विचार की देन ही नहीं है अपितु स्वामी विवेकानन्द जैसे आदर्शवादी विचारकों की भी देन है। यहां इन परम्पराओं के कुछ उदाहरण दिए गए हैं:
गौतमबुद्ध
किसी बात पर केवल इसीलिए विश्वास न करो कि आपने ऐसा सुना है। केवल इसलिए भी विश्वास न करो कि बहुत से ऐसा कहते हैं। विश्वास इसलिए भी न करो कि ऐसा हमारे धार्मिक ग्रंथों में लिखा हुआ है। इसलिए भी विश्वास न करो कि हमारे सम्मानित बड़े एवं गुरू कह रहे हैं। सदियों से चली आ रही परम्पराओं के नाते भी विश्वास न करो। परीक्षण व विश्लेषण के बाद जब आपको लगे कि वह बात तर्क-विवेक पर खरी है और यह सभी के हित में है, तभी इसे मानो और इस पर चलो।
विवेकानंद
ज्योतिष एवं इस प्रकार की रहस्यवादी बातें कमजोर दिमाग की निशानियां हैं। इसलिए जैसे ही ये हमारे दिमाग को जकडऩे लगें, हम चिकित्सक को दिखाएं, अच्छा भोजन लें और आराम करें।
अंधविश्वास हमारा बड़ा शत्रु है और धोखेबाजी तो इससे भी बड़ा। 
जब अंधविश्वास प्रवेश करता है तो दिमाग निकल जाता है। 
आँख मूंद कर विश्वास करने का अर्थ है मानवी आत्मा का विघटन होना। चाहे तुम नास्तिक बन जाओ परंतु बिना प्रश्न  उठाए किसी बात पर विश्वास मत करो।
भगत सिंह
हर व्यक्ति जो प्रगति चाहता है, उसे प्रत्येक पुरातन विश्वास की समालोचना करनी पड़ेगी, उस पर अविश्वास करना होगा और चुनौती देनी होगी। परत-दर-परत हर मौजूदा विश्वास पर उसे तर्क-विवेक से काम लेना पड़ेगा। यदि पूरे विवेक के साथ किसी दर्शन या विचार पर बात बढ़ती है तो उस विश्वास का स्वागत है। एक व्यक्ति का विवेक कभी-कभी त्रूटिपूर्ण, गलत या दिशाहीन हो सकता है। उसे अपनी गलतियां सुधारने के लिए तैयार होना चाहिए, क्योंकि विवेक ही जीवन का मार्गदर्शक सितारा है। लेकिन केवल मान लेना या अंधविश्वास खतरनाक है, क्योंकि इससे दिमाग कुंद हो जाता है और इससे व्यक्ति प्रतिक्रियावादी बन जाता है। जो व्यक्ति यथार्थवादी होने का दावा करता है, उसे सम्पूर्ण प्राचीन विश्वास को चुनौती देनी पड़ती है। यदि यह विवेक के हमले सहन नहीं कर सकता तो डगमगा कर नीचे गिर जाता है। एक व्यक्ति का पहला कार्य यही बनता है कि वह यहीं से नए दर्शन के लिए रास्ता साफ करे। यह नकारात्मक पक्ष है। यहीं से सकारात्मक पक्ष शुरू होता है। इसी पुराने विश्वास की सामग्री में से कुछ सामग्री कभी-कभी पुनर्निर्माण के काम आ सकती है।
गांधी
शास्त्रों की कोई भी बात विवेकपूर्ण होने के योग्य नहीं है यदि वह तर्क-विवेक के साथ विरोध में है। विश्वास लंगड़ा होता है यदि वह विवेक से जुड़े मामलों में दुस्साहस करता है।

वैज्ञानिक मानसिकता क्या है?

भाग-दो

वैज्ञानिक मानसिकता क्या है?
हमारा संविधान बड़े पैमाने पर वैज्ञानिक मानसिकता बनाने के प्रयासों में हमारे पास एक बहुत महत्वपूर्ण आधार है। शायद हमारा देश ही दुनिया में एकमात्र देश है जहां संविधान में वैज्ञानिक मानसिकता स्थापित करने की बात कही गई है। भारतीय संविधान की धारा 51-क में कहा गया है:-
51क मौलिक कर्तव्य-हर भारतीय नागरिक का यह मौलिक कर्तव्य है कि
(८) वह वैज्ञानिक मानसिकता, मानवतावाद, सुधार एवं खोज भावना विकसित करे।
सन् 1981 में नेहरू केंद्र में बुद्धिजीवियों के एक समुह ने एक बैठक कर ‘वैज्ञानिक मानसिकता पर कथन’ के रूप में यह स्थापित कर पारित किया जिसमें वैज्ञानिक मानसिकता को विज्ञान विधि के रूप में इस प्रकार परिभाषित किया:
‘क’ कि विज्ञान विधि, ज्ञान प्राप्त करने की विधि का एक योग्य तरीका है,
‘ख’ कि विज्ञान विधि का प्रयोग कर प्राप्त किए गए ज्ञान से मनुष्य की समस्याएं समझी जा सकती हैं और उनका समाधान किया जा सकता है,
‘ग’ कि दैनिक जीवन में नीतिशास्त्र से राजनीतिक शास्त्र व अर्थशास्त्र तक मानवीय क्रियाकलापों के प्रत्येक पहलु में विज्ञान विधि का प्रयोग मनुष्य के अस्तित्व एवं विकास के लिए अनिवार्य है, और
 ‘घ’ कि विज्ञान विधि अपनाकर प्राप्त किया गया ज्ञान किसी भी समय में सत्य के सबसे निकट एवं इस ज्ञान की संगति के हर प्रश्न के संदर्भ में होता है और हर समय समकालीन ज्ञान के मूल आधार की जांच पड़ताल करते रहना चाहिए।
आइये इसका कुछ विस्तार से वर्णन करें।
विज्ञान विधि से हमारा क्या अर्थ है? मौलिक रूप में इसका अर्थ है कि किसी बात को वैज्ञानिक रूप में वैध या सत्य मानने से पहले हमें इसे कई परीक्षणों से गुजारना चाहिए। ये परीक्षण व्यवहारिक व प्रायोगिक हो सकते हैं। कुछ प्रयोग तर्क, विवेक एवं निरंतरता के हो सकते हैं। किसी बात को सत्य घोषित करने से पहले उसे ऐसे प्रयोगों से गुजारना चाहिए, जिनमें आंतरिक विरोधाभास न हो और वे उन अन्य बातों की संगति में हो जिन्हें सत्य जाना जा चुका है क्योंकि ऐसी बातें पहले ही परीक्षणों से गुजर चुकी होती हैं।
परीक्षण से गुजरने को तैयार
            जो भी वैज्ञानिक स्तर पर सही होने का दावा करे उसे कड़े परीक्षणों से गुजरने के लिए खुला होना चाहिए। ज्ञान की कोई भी प्रक्रिया जो विज्ञान के बड़े परीक्षणों से गुजरने को तैयार नहीं, वह वैज्ञानिक स्तर पर सच होने का दावा नहीं कर सकती।
उदाहरणार्थ ज्योतिष वैज्ञानिक स्तर पर सच होने का दावा नहीं कर सकती, सीधा-सा कारण है कि कोई भी ज्योतिषी अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति द्वारा प्रस्तुत साधारण से परीक्षणों का भी सामना करने को तैयार नहीं।                     जो ज्योतिषी सामने आए भी, वे डॉ. जयंत नर्लिकर और डॉ. दाभोलकर द्वारा प्रस्तुत परीक्षणों के सामने असफल हो गए।
आलोचनात्मक प्रश्न उठाना
                  हम आज जिसे विज्ञान विधि कह रहे हैं, वह विश्व के सभी भागों में समस्त मानवजाति द्वारा लम्बे इतिहस से सीखन का परिणाम है।
                आलोचनात्मक प्रश्न उठाना विज्ञान विधि का मूल है। हर कोई प्रश्न उठा सकता है। कोई भी सामान्य विद्यार्थी व हर सोचने वाला व्यक्ति, विज्ञान के बड़े-से-बड़े व्यक्ति से प्रश्न कर सकता है। विज्ञान में पवित्र कहे जाने जैसा कोई लेखन नहीं जिस पर काई सवाल न उठाया जा सके, और विज्ञान में न ही कोई मठाधीश है। वैज्ञानिक रूप में सही कहे जाने वाली हर बात को प्रमाण देने होंगे और परीक्षणों से गुजरने को तैयार रहना होगा। प्रसिद्ध भौतिकविद् रिचर्ड फियनमन ने विज्ञान का वर्णन कुछ इस प्रकार किया है-
                           ‘विज्ञान यह सीखने का लम्बा इतिहास है कि किस प्रकार हम स्वयं को मूर्ख बनाने से बचें।’
विज्ञान विधि हमेशा ही संशय में और आलोचनात्मक रहती है। यह हमेशा प्रश्न के घेरे में और खारिज करने की स्थिति में रहती है। यह कोई भी ‘सत्य’ अंतिम नहीं मानती। आइन्स्टाइन ने इसे यूं कहा है: ‘अधिकतर मामलों में यह कहती है ‘हो सकता है’ और अधिकतर तो यही कहती है कि ‘नहीं’। यदि कोई प्रयोग किसी सिद्धांत से सहमत होता है तो इसका मतलब है कि यह सिद्धांत ‘संभव’, है और यदि सहमत नहीं होता तो इसका मतलब है कि ‘नहीं’। संभवत: हर सिद्धांत को कभी-न-कभी ‘नहीं’ का अनुभव होता है, और बहुत से सिद्धांत तो बनते ही तुरंत ‘नहीं’ का अनुभव करते हैं।
              इस प्रकार विज्ञान विधि औचित्य पर प्रश्न उठाने का एक निश्चित तरीका है। विज्ञान में कभी निश्चितता नहीं है। ज्यादा-से-ज्यादा यह आश्वस्तता का बढ़ा हुआ स्तर है। इसे दूसरे शब्दों में ऐसे भी कर सकते हैं कि यह अनिश्चितता और अविश्वास का कम होता स्तर है।
मूल रूप से कट्टरवाद के विरुद्ध
                      विज्ञान चरणबद्ध तरीके से अविश्वास पर आधारित है। वह मूल रूप में हर प्रकार के कट्टरवाद का विरोध करती है। इस कट्टरवाद में बिना सवाल उठाए विश्वास करना या ऐसे पवित्र लेख या परम्पराएं हो सकती हैं जिनके बारे में यह हो कि ये सवालों से ऊपर हैं और दोषरहित हैं। हमारे देश में कई प्रकार के धार्मिक कट्टरवाद मौजूद हैं जो जनसामान्य व यहां तक कि बुद्धिजीवियों को भी प्रभावित किए हुए हैं। गैर धार्मिक रूप का कट्टरवाद भी बहुत ही सामान्य है। जहां भी विषय को समझने की दिक्कत हो, विज्ञान का निश्चित रूप से इन कट्टरवादी प्रवृतियों से विरोध है।
जनतांत्रिक धर्म
                                दूसरी ओर हमारे यहां गैर कट्टरवाद और धार्मिक सुधारों की भी एक लम्बी परम्परा है, इनमें देश के विभिन्न भागों में चलने वाले मानवतावादी धार्मिक आंदोलन भी हैं। मध्ययुग की भक्ति-सूफी धारा, महात्मा बुद्ध का बौद्धमत व राजा राम मोहन राय व श्री नारायण गुरु के काम इनमें शामिल हैं। इस प्रकार के धार्मिक आंदोलनों ने स्थापित जातिगत भेदभाव व असमानता की व्यवस्था पर प्रश्न उठाने को प्रोत्साहित किया। बेशक इनका स्वरूप धार्मिक रहा हो ये धार्मिक कट्टरवाद के मुकाबले वैज्ञानिक मानसिकता के साथ ज्यादा सहमत दिखे। यह संयोग की बात नहीं है कि ‘वैज्ञानिक मानसिकता, मानवतावाद, खोज भावना व सुधार’ हमारे संविधान में एक साथ आए हैं। ये चारों गुण हमारे पूरे इतिहास में एक साथ जुड़े रहे हैं।

सभी के लिए वैज्ञानिक मानसिकता

सभी के लिए वैज्ञानिक मानसिकता


डा. नरेंद्र दाभोलकर ने अपने चिकित्सीय व्यवसाय का त्याग कर जन सामान्य में वैज्ञानिक दृष्टि के प्रसार हेतु एवं अंधविश्वासों से लडऩे के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। अगस्त 20, 2013 को किराए के गुुंडों द्वारा पुणे (महाराष्ट्र) में उनकी हत्या कर दी गई। अखिल भारतीय जन-विज्ञान नेटवर्क ने उनकी शहादत पर यह प्रस्ताव पारित किया:-
                          अखिल भारतीय जन विज्ञान नेटवर्क आतंकवादियों द्वारा आज पुणे में डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की हत्या की पुरजोर भत्र्सना करता है। ऐसा पता चला है कि धर्म के नाम पर काम करने वाले आतंकी संगठनों द्वारा उन्हें जान से मारने की लगातार धमकियां मिलती रही थी। इन धमकियों की परवाह किए बिना वे साहसपूर्वक अपना कार्य करते रहे। वैज्ञानिक रुझान पैदा करने, बाबाओं की धोखाधड़ी, तांत्रिकों व स्वयंभू देवपुरुषों के कारनामों को उजागर करने में वे लगे रहे। आप अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के संस्थापक एवं नेता तथा प्रगतिशील पत्रिका ‘साधना’ के सम्पादक रहे।
                      हम डॉ. नरेंद्र दाभोलकर के जीवन से यह प्रेरणा लेते हैं और प्रण करते हैं कि हम वैज्ञानिक मानसिकता के प्रयास हेतु उनके आदर्श, सभी प्रकार के अंधविश्वासों का विरोध तथा धार्मिक रूढि़वाद से जुड़े तमाम अंधविश्वासों का विरोध करने वाले उनके काम को जारी रखेंगे। हम प्रण करते हैं कि हम उन साम्प्रदायिक फासिस्ट ताकतों और उस आतंकवाद से लड़ेंगे जो देश के विभिन्न भागों में धर्म के नाम पर सक्रिय हैं। हम भारतीय संविधान के मूल्यों-वैज्ञानिक मानसिकता, धर्म निरपेक्षता, समानता व जनतंत्र में अपनी आस्था व्यक्त करते हैं और इसमें निहित संदेश को अपने देश व प्रत्येक विद्यालय, शहर व गांव तक पहुंचाने का कार्य करेंगे।
                    जिस प्रकार गांधी जी के हत्यारे उनके मूल्यों एवं उनके संदेश को नहीं रोक पाए उसी प्रकार ये कायराना हत्या डॉ. नरेंद्र दाभोलकर के संदेश एवं मूल्यों को नहीं रोक सकती। जन-विज्ञान आंदोलन में काम करने वाले हम सभी और ज्यादा दृढ़ इरादों व ताकत से जनता के बड़े हिस्से में विज्ञान व वैज्ञानिक सोच को बढ़ाने के लिए काम करेंगे ताकि देश की साम्प्रदायिक फासीवादी ताकतों व रूढि़वादी ताकतों को हटाया जाए तथा वैचारिक लड़ाई को जीता जाए।
                        डॉ. दाभोलकर की हत्या ने पूरे देश के स्वाभिमान को हिला कर रख दिया है और आज भारत में वैज्ञानिक मानसिकता को बढ़ाने की जरूरत को रेखांकित किया है।
अखिल भारतीय जन-विज्ञान नेटवर्क यह प्रस्ताव रखता है कि हम सभी प्रत्येक नागरिक में, विद्यालय, देश के हर गांव व शहर में वैज्ञानिक सोच का पोषण करें। क्या यह कार्य सम्भव है?
तीस से अधिक वर्ष पूर्व सन् 1981 में प्रमुख बुद्धिजीवियों के समुह ने वैज्ञानिक मानसिकता पर कथन जारी किया था जिसमें दूरगामी परिप्रेक्ष्य को लिया था। अभी हम उन उद्देश्यों को पूरा नहीं कर पाए हैं। अभी भी बहुत बड़ी भीड़ अंधविश्वासों, ज्योतिष, नाना प्रकार के अतार्किक विश्वासों, धोखेबाज बाबाओं, स्वयंभू देव पुरुषों के पीछे भागती है। स्पष्ट है, यह स्थिति ठीक नहीं है। हमें क्या करने की जरूरत है इस बारे में हमारी सोच और ज्यादा गहरी और अच्छी होनी चाहिए।
               क्या हम बड़े पैमाने पर वैज्ञानिक मानसिकता के निर्माण की बात के काम को एक वैज्ञानिक समस्या के रूप में ले सकते हैं? इसे एक वैज्ञानिक कार्य के रूप में लेने का क्या अर्थ है?
मानव जाति के खाते में ऐसी बहुत सी सार्वभौमिक महान उपलब्धियां दर्ज हैं जहां कार्य वैज्ञानिक रूप में किया गया है। इस ग्रह के बहुत से भागों से बड़े स्तर पर चलाए गए वैज्ञानिक अभियानों के जरिए पोलियो व चेचक जैसी जानलेवा बीमारियों से छुटकारा पा लिया गया है। बहुत से देशों में सार्वभौमिक साक्षरता पा लेने जैसे उदाहरण हैं। एक सौ पचास वर्ष पहले तक दलित व महिलाओं को शिक्षा से वंचित रखना हमारी परम्परा में शामिल था। आज निस्संदेह यह एक उपलब्धि है कि लगभग हर बच्चा विद्यालय में है चाहे वह किसी भी जाति व लिंग से हो। इन सार्वभौमिक उपलब्धियों के बीज ज्योतिबा फुले व सावित्रीबाई फुले जैसे सामाजिक सुधारकों द्वारा बोए गए थे जो ‘सत्य शोधक समाज’ के जरिए काम कर रहे थे। वैज्ञानिक मानसिकता भी एक विशष प्रकार का सत्यशोधन है। ये सभी उदाहरण हमें हौंसला देते हैं कि वैज्ञानिक मानसिकता का सार्वभौमिकीकरण संभव है, समय लग सकता है।
                           वैज्ञानिक वैधता व्यवहारिक उपलब्धियों से स्थापित होती है। सार्वभौमिकता का अर्थ है बड़े पैमाने पर उपलब्धि। विज्ञान के सार्वभौमिकीकरण के काम को हाथ में लेने का अर्थ है कि हमें बड़े स्तर पर व्यवहारिक उपलब्धि सिद्ध करनी होगी। हमें ऐसे तरीके निकालने होंगे जिनसे प्रगति-ठहराव, सफलता-विफलता के मापन की पड़ताल हो सके। अगले पृष्ठों में हम ऐसे ही कुछ पहलुओं का विश्लेषण कर रहे हैं कि विज्ञान के सार्वभौमिकीकरण को किस प्रकार एक वैज्ञानिक कार्य के रूप में किया जाए।