भाग-दो
वैज्ञानिक मानसिकता क्या है?
हमारा संविधान बड़े पैमाने पर वैज्ञानिक मानसिकता बनाने के प्रयासों में हमारे पास एक बहुत महत्वपूर्ण आधार है। शायद हमारा देश ही दुनिया में एकमात्र देश है जहां संविधान में वैज्ञानिक मानसिकता स्थापित करने की बात कही गई है। भारतीय संविधान की धारा 51-क में कहा गया है:-
51क मौलिक कर्तव्य-हर भारतीय नागरिक का यह मौलिक कर्तव्य है कि
(८) वह वैज्ञानिक मानसिकता, मानवतावाद, सुधार एवं खोज भावना विकसित करे।
सन् 1981 में नेहरू केंद्र में बुद्धिजीवियों के एक समुह ने एक बैठक कर ‘वैज्ञानिक मानसिकता पर कथन’ के रूप में यह स्थापित कर पारित किया जिसमें वैज्ञानिक मानसिकता को विज्ञान विधि के रूप में इस प्रकार परिभाषित किया:
‘क’ कि विज्ञान विधि, ज्ञान प्राप्त करने की विधि का एक योग्य तरीका है,
‘ख’ कि विज्ञान विधि का प्रयोग कर प्राप्त किए गए ज्ञान से मनुष्य की समस्याएं समझी जा सकती हैं और उनका समाधान किया जा सकता है,
‘ग’ कि दैनिक जीवन में नीतिशास्त्र से राजनीतिक शास्त्र व अर्थशास्त्र तक मानवीय क्रियाकलापों के प्रत्येक पहलु में विज्ञान विधि का प्रयोग मनुष्य के अस्तित्व एवं विकास के लिए अनिवार्य है, और
‘घ’ कि विज्ञान विधि अपनाकर प्राप्त किया गया ज्ञान किसी भी समय में सत्य के सबसे निकट एवं इस ज्ञान की संगति के हर प्रश्न के संदर्भ में होता है और हर समय समकालीन ज्ञान के मूल आधार की जांच पड़ताल करते रहना चाहिए।
आइये इसका कुछ विस्तार से वर्णन करें।
विज्ञान विधि से हमारा क्या अर्थ है? मौलिक रूप में इसका अर्थ है कि किसी बात को वैज्ञानिक रूप में वैध या सत्य मानने से पहले हमें इसे कई परीक्षणों से गुजारना चाहिए। ये परीक्षण व्यवहारिक व प्रायोगिक हो सकते हैं। कुछ प्रयोग तर्क, विवेक एवं निरंतरता के हो सकते हैं। किसी बात को सत्य घोषित करने से पहले उसे ऐसे प्रयोगों से गुजारना चाहिए, जिनमें आंतरिक विरोधाभास न हो और वे उन अन्य बातों की संगति में हो जिन्हें सत्य जाना जा चुका है क्योंकि ऐसी बातें पहले ही परीक्षणों से गुजर चुकी होती हैं।
परीक्षण से गुजरने को तैयार
जो भी वैज्ञानिक स्तर पर सही होने का दावा करे उसे कड़े परीक्षणों से गुजरने के लिए खुला होना चाहिए। ज्ञान की कोई भी प्रक्रिया जो विज्ञान के बड़े परीक्षणों से गुजरने को तैयार नहीं, वह वैज्ञानिक स्तर पर सच होने का दावा नहीं कर सकती।
उदाहरणार्थ ज्योतिष वैज्ञानिक स्तर पर सच होने का दावा नहीं कर सकती, सीधा-सा कारण है कि कोई भी ज्योतिषी अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति द्वारा प्रस्तुत साधारण से परीक्षणों का भी सामना करने को तैयार नहीं। जो ज्योतिषी सामने आए भी, वे डॉ. जयंत नर्लिकर और डॉ. दाभोलकर द्वारा प्रस्तुत परीक्षणों के सामने असफल हो गए।
आलोचनात्मक प्रश्न उठाना
हम आज जिसे विज्ञान विधि कह रहे हैं, वह विश्व के सभी भागों में समस्त मानवजाति द्वारा लम्बे इतिहस से सीखन का परिणाम है।
आलोचनात्मक प्रश्न उठाना विज्ञान विधि का मूल है। हर कोई प्रश्न उठा सकता है। कोई भी सामान्य विद्यार्थी व हर सोचने वाला व्यक्ति, विज्ञान के बड़े-से-बड़े व्यक्ति से प्रश्न कर सकता है। विज्ञान में पवित्र कहे जाने जैसा कोई लेखन नहीं जिस पर काई सवाल न उठाया जा सके, और विज्ञान में न ही कोई मठाधीश है। वैज्ञानिक रूप में सही कहे जाने वाली हर बात को प्रमाण देने होंगे और परीक्षणों से गुजरने को तैयार रहना होगा। प्रसिद्ध भौतिकविद् रिचर्ड फियनमन ने विज्ञान का वर्णन कुछ इस प्रकार किया है-
‘विज्ञान यह सीखने का लम्बा इतिहास है कि किस प्रकार हम स्वयं को मूर्ख बनाने से बचें।’
विज्ञान विधि हमेशा ही संशय में और आलोचनात्मक रहती है। यह हमेशा प्रश्न के घेरे में और खारिज करने की स्थिति में रहती है। यह कोई भी ‘सत्य’ अंतिम नहीं मानती। आइन्स्टाइन ने इसे यूं कहा है: ‘अधिकतर मामलों में यह कहती है ‘हो सकता है’ और अधिकतर तो यही कहती है कि ‘नहीं’। यदि कोई प्रयोग किसी सिद्धांत से सहमत होता है तो इसका मतलब है कि यह सिद्धांत ‘संभव’, है और यदि सहमत नहीं होता तो इसका मतलब है कि ‘नहीं’। संभवत: हर सिद्धांत को कभी-न-कभी ‘नहीं’ का अनुभव होता है, और बहुत से सिद्धांत तो बनते ही तुरंत ‘नहीं’ का अनुभव करते हैं।
इस प्रकार विज्ञान विधि औचित्य पर प्रश्न उठाने का एक निश्चित तरीका है। विज्ञान में कभी निश्चितता नहीं है। ज्यादा-से-ज्यादा यह आश्वस्तता का बढ़ा हुआ स्तर है। इसे दूसरे शब्दों में ऐसे भी कर सकते हैं कि यह अनिश्चितता और अविश्वास का कम होता स्तर है।
मूल रूप से कट्टरवाद के विरुद्ध
विज्ञान चरणबद्ध तरीके से अविश्वास पर आधारित है। वह मूल रूप में हर प्रकार के कट्टरवाद का विरोध करती है। इस कट्टरवाद में बिना सवाल उठाए विश्वास करना या ऐसे पवित्र लेख या परम्पराएं हो सकती हैं जिनके बारे में यह हो कि ये सवालों से ऊपर हैं और दोषरहित हैं। हमारे देश में कई प्रकार के धार्मिक कट्टरवाद मौजूद हैं जो जनसामान्य व यहां तक कि बुद्धिजीवियों को भी प्रभावित किए हुए हैं। गैर धार्मिक रूप का कट्टरवाद भी बहुत ही सामान्य है। जहां भी विषय को समझने की दिक्कत हो, विज्ञान का निश्चित रूप से इन कट्टरवादी प्रवृतियों से विरोध है।
जनतांत्रिक धर्म
दूसरी ओर हमारे यहां गैर कट्टरवाद और धार्मिक सुधारों की भी एक लम्बी परम्परा है, इनमें देश के विभिन्न भागों में चलने वाले मानवतावादी धार्मिक आंदोलन भी हैं। मध्ययुग की भक्ति-सूफी धारा, महात्मा बुद्ध का बौद्धमत व राजा राम मोहन राय व श्री नारायण गुरु के काम इनमें शामिल हैं। इस प्रकार के धार्मिक आंदोलनों ने स्थापित जातिगत भेदभाव व असमानता की व्यवस्था पर प्रश्न उठाने को प्रोत्साहित किया। बेशक इनका स्वरूप धार्मिक रहा हो ये धार्मिक कट्टरवाद के मुकाबले वैज्ञानिक मानसिकता के साथ ज्यादा सहमत दिखे। यह संयोग की बात नहीं है कि ‘वैज्ञानिक मानसिकता, मानवतावाद, खोज भावना व सुधार’ हमारे संविधान में एक साथ आए हैं। ये चारों गुण हमारे पूरे इतिहास में एक साथ जुड़े रहे हैं।
very nice.
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