शुक्रवार, 26 सितंबर 2014

अनियोजित शहरीकरण की बड़ी कीमत

अनियोजित शहरीकरण की बड़ी कीमत
बढ़ते पर्यावरण असंतुलन को लेकर राजनीति की रीति भी अजीब है। सम्मेलनों में तो नीति-नियंता इसे बदलने का दावा करते हैं। मगर जब इसका वक्त आता है, तो वे इसकी जिम्मेदारी दूसरे देशों पर थोप देते हैं। यही वजह है कि जब भी जलवायु परिवर्तन पर शिखर बैठकें होती हैं, तब पर्यावरण बचाने की कवायद में जुटे कार्यकर्ता इस विडंबना को उजागर करने की कोशिश में सामने आते हैं। न्यूयॉर्क में २३ सितंबर को हुए जलवायु परिवर्तन पर सम्मेलन के दौरान विरोध प्रदर्शन को भी इसी नजरिये से देखना चाहिए।
लेकिन परिवर्तन को लेकर हो रही चर्चाओं की तरफ न मीडिया का ध्यान जाता है, न आम जनता का। इस जलवायु सम्मेलन से पहले संयुक्त राष्ट्र ने एक अहम रिपोर्ट जारी की, जिसके मुताबिक भारत शहरी क्रांति की ओर बढ़ रहा है। इस रिपोर्ट के अनुसार, २०३१ तक भारतीय शहरों और कस्बों में करीब साठ करोड़ लोग रहने लगेंगे। रपट यह भी बताती है कि दो दशकों में भारत की शहरी आबादी २१ करोड़ ७० लाख से बढ़कर ३७ करोड़ ७० लाख हो चुकी है। आबादी का यह आंकड़ा २०३१ तक बढ़कर कुल जनसंख्या का चालीस प्रतिशत हो जाएगा।
संयुक्त राष्ट्र का यह आंकड़ा लोकसभा चुनाव से पहले का है। तब अपने चुनावी घोषणापत्र में भाजपा ने देश में सौ स्मार्ट सिटी बनाने और शहरीकरण को बढ़ावा देने का वायदा किया था। अगर ऐसा हुआ, तो २०३१ तक शहरी आबादी और बढ़ेगी। संयुक्त राष्ट्र की मौजूदा रिपोर्ट के अनुसार, अगले बीस साल में हमारे यहां बढ़ते शहरों में आधारभूत संरचना मुहैया कराने के लिए ८२७ अरब डॉलर का निवेश करना होगा। पर यदि स्मार्ट सिटी योजना लागू हुई, तो और अधिक निवेश की जरूरत पड़ेगी।
विकास के जिस तरीके को हमने स्वीकार किया है, उसमें शहरीकरण को ही विकास का आधार माना गया है। गांधी जी ने हिंद स्वराज में ग्रामीण सभ्यता को बढ़ावा देने का खाका पेश किया था, जिसके मुताबिक गांवों को स्वावलंबी और स्वच्छ बनाया जाना था। पर आजादी के बाद की सरकारों ने इस तरफ ध्यान नहीं दिया। विकास की जो योजनाएं बनीं, उसके केंद्र में शहर रहे। नतीजतन कृषि आधारित रोजगार कम होता गया और ग्रामीण आबादी का शहरों की ओर पलायन बढ़ा। इससे शहरों पर दबाव बढ़ा और बड़ी आबादी को झुग्गी-झोपड़ियों में नारकीय जीवन जीने के लिए विवश होना पड़ा।
संयुक्त राष्ट्र ने बहुत पहले महानगर नाम से एक पुस्तिका छापी थी, जो बताती थी कि आबादी की बदहाली महानगरों में ज्यादा है। शहरों में बेशक सहूलियतें गांवों की तुलना में ज्यादा हैं, पर स्वास्थ्य की दृष्टि से यह जीवन ठीक नहीं। उस पुस्तिका के मुताबिक, मैक्सिको सिटी, शिकागो, नाइजर और मुंबई जैसे शहरों में बड़ी आबादी गरीबी रेखा से नीचे अस्वास्थ्यकर माहौल में जिंदगी गुजारने को मजबूर है। भारतीय नगरीकरण पर संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट भी बताती है कि २०५० तक भारत में मृत्यु दर में बढ़ोतरी होगी, जिसका बड़ा कारण शहरी वायु प्रदूषण होगा। दरअसल बढ़ते शहरीकरण के चलते पर्यावरण असंतुलन बढ़ा है। शहरों के बाहरी इलाकों में विस्तार हो रहा है। यह विकास अनियोजित तरीके से तो हो ही रहा है, इसमें शहरी मापदंडों और नियमों का उल्लंघन भी हो रहा है। इसी कारण शहरी आबादी के बड़े हिस्से को संसाधनों की भारी कमी का सामना करना पड़ता है। सवाल यह है कि क्या हमारी सरकारें इस अनियोजित विकास पर पुनर्विचार करेंगी। जनता तो खैर जब तक जागरूक होगी, तब तक शहरीकरण की चमक में वह बहुत कुछ खो चुकी होगी।
वर्ष २०५० तक भारत में मृत्यु दर में बढ़ोतरी का बड़ा कारण शहरी वायु प्रदूषण होगा।
उमेश चतुर्वेदी
परिदृश्य

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