गुरुवार, 4 सितंबर 2014

आलोचनात्मक प्रश्न उठाना-सार्वभौमिक या पाश्चात्य?


भाग-तीन
आलोचनात्मक प्रश्न उठाना-सार्वभौमिक या पाश्चात्य?
जैसे ही ‘वैज्ञानिक मानसिकता पर कथन’ (स्स्ञ्ज) जारी हुआ, विभिन्न क्षेत्रों से इसकी तीखी आलोचना शुरू हुई। एक दिशा की आलोचना स्वयं को ‘राष्ट्रभक्त और जनपक्षीय विज्ञान व तकनीकी (क्कक्कस्ञ्ज)’ कहने वालों की ओर से आई। इनके अनुसार यह भारत में ‘पाश्चात्य विज्ञान’ की संकलना लागू करने की कोशिश है। स्वभाविक है पीपीएसटी ने यह कहते हुए कि यह तो ‘पाश्चात्य संकल्पना’ है, ऐसी विज्ञान विधि की संकल्पना का विरोध करना ही था जो सार्वभौमिक है।
हमारा यह मानना है कि ऐसा करके पीपीएसटी की आलोचना इस बात से इनकार करती है जो आलोचनात्मक प्रश्न उठाने पदार्थवाद, अंधविश्वास और रूढि़वाद के खिलाफ पिछले इतिहास में हमारे प्रयास रहे हैं। इस परम्परा में प्राकृतिक विज्ञानों, गणित, राजनीति जैसे लोकायत, चरक, आर्यभट्ट, पी.सी.रे., फुले, पेरियार, अम्बेडकर, नेहरू और भगत सिंह जैसी धर्मनिरपेक्ष धाराएं एवं गौतम बुद्ध जैसे जनतांत्रिक धार्मिक सुधार, भक्ति और सूफी परम्परा से लेकर राजा राम मोहन राय, विवेकानंद, श्री नारायण गुरु व गांधी जी तक की धाराएं भी शामिल हैं। स्वयं में आलोचनात्मक सोच होना और अंधविश्वासों के विरुद्ध लडऩा, समानता के लिए कटिबद्ध होना केवल लोकायत जैसे पदार्थवादी विचार की देन ही नहीं है अपितु स्वामी विवेकानन्द जैसे आदर्शवादी विचारकों की भी देन है। यहां इन परम्पराओं के कुछ उदाहरण दिए गए हैं:
गौतमबुद्ध
किसी बात पर केवल इसीलिए विश्वास न करो कि आपने ऐसा सुना है। केवल इसलिए भी विश्वास न करो कि बहुत से ऐसा कहते हैं। विश्वास इसलिए भी न करो कि ऐसा हमारे धार्मिक ग्रंथों में लिखा हुआ है। इसलिए भी विश्वास न करो कि हमारे सम्मानित बड़े एवं गुरू कह रहे हैं। सदियों से चली आ रही परम्पराओं के नाते भी विश्वास न करो। परीक्षण व विश्लेषण के बाद जब आपको लगे कि वह बात तर्क-विवेक पर खरी है और यह सभी के हित में है, तभी इसे मानो और इस पर चलो।
विवेकानंद
ज्योतिष एवं इस प्रकार की रहस्यवादी बातें कमजोर दिमाग की निशानियां हैं। इसलिए जैसे ही ये हमारे दिमाग को जकडऩे लगें, हम चिकित्सक को दिखाएं, अच्छा भोजन लें और आराम करें।
अंधविश्वास हमारा बड़ा शत्रु है और धोखेबाजी तो इससे भी बड़ा। 
जब अंधविश्वास प्रवेश करता है तो दिमाग निकल जाता है। 
आँख मूंद कर विश्वास करने का अर्थ है मानवी आत्मा का विघटन होना। चाहे तुम नास्तिक बन जाओ परंतु बिना प्रश्न  उठाए किसी बात पर विश्वास मत करो।
भगत सिंह
हर व्यक्ति जो प्रगति चाहता है, उसे प्रत्येक पुरातन विश्वास की समालोचना करनी पड़ेगी, उस पर अविश्वास करना होगा और चुनौती देनी होगी। परत-दर-परत हर मौजूदा विश्वास पर उसे तर्क-विवेक से काम लेना पड़ेगा। यदि पूरे विवेक के साथ किसी दर्शन या विचार पर बात बढ़ती है तो उस विश्वास का स्वागत है। एक व्यक्ति का विवेक कभी-कभी त्रूटिपूर्ण, गलत या दिशाहीन हो सकता है। उसे अपनी गलतियां सुधारने के लिए तैयार होना चाहिए, क्योंकि विवेक ही जीवन का मार्गदर्शक सितारा है। लेकिन केवल मान लेना या अंधविश्वास खतरनाक है, क्योंकि इससे दिमाग कुंद हो जाता है और इससे व्यक्ति प्रतिक्रियावादी बन जाता है। जो व्यक्ति यथार्थवादी होने का दावा करता है, उसे सम्पूर्ण प्राचीन विश्वास को चुनौती देनी पड़ती है। यदि यह विवेक के हमले सहन नहीं कर सकता तो डगमगा कर नीचे गिर जाता है। एक व्यक्ति का पहला कार्य यही बनता है कि वह यहीं से नए दर्शन के लिए रास्ता साफ करे। यह नकारात्मक पक्ष है। यहीं से सकारात्मक पक्ष शुरू होता है। इसी पुराने विश्वास की सामग्री में से कुछ सामग्री कभी-कभी पुनर्निर्माण के काम आ सकती है।
गांधी
शास्त्रों की कोई भी बात विवेकपूर्ण होने के योग्य नहीं है यदि वह तर्क-विवेक के साथ विरोध में है। विश्वास लंगड़ा होता है यदि वह विवेक से जुड़े मामलों में दुस्साहस करता है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें