बुधवार, 24 सितंबर 2014

कड़ै सै बिल्ली ?

आंधी दौड़ 
रमलू एक दिन जाल कै तलै टूटी सी खाट  पै लोट्या लोट्या सोचण लागरया अक जमाना कड़े का कड़ै जा लिया - रोहतक की कालोनी देखी सैं रमलू नै जड़ै लोग भेडयां की ढाल रेवड़ के रेवड़ रहवैं सैं कोठरियां मैं ।  सारे रिश्ते नाते बेर ना बचे बी सैं अक नहीं ? समाज के बंधन गलत सही सब टूटते जावण लागरे सैं । अर नए कितै दीखते ना । काम के नै मानसां की कड़ तोड़ कै धरदी । सारी हाणां भाजले भाजले  लागी रैह सै । गाम मैं औरत सारे खेत के अर घर के काम तै करया ए करया करती , बुळधाँ का अर बैल गाड्डी का काम मर्द माणस करया करते । बैल  जरूरत थी तो गऊ बी  माता थी म्हारी । यो ट्रैक्टर ईसा आया इसनै बुलध पढ़न बिठा दिया । गऊ की जरूरत कम करवा दी । माता की जगां खोस ली ट्रैक्टर महाराज नै । बैल गाड्डी की जागां झोटा बुग्गी आगी ।अर या भी औरतां  कै बांटै आगी । लोग तो बैठे ताश खेलें जावैं सैं । 
                                        जिसनै देखो वोही गाम छोड़ कै शहर कांही थोबड़ा ठाएँ भाज्या जावण लागरया सै ।  खेती मैं मन लगता ना अर जै कोए मन ला कै बी काम करो तै गुजारा होंता ना । खेती आली धरती बिकन लागरी सैं । एन सी आर नै दिल्ली के गामां की ढालां नौ दस जिले तो  जीम लिए बाकी बी सहज सहज जीम  ज्यागा ।  सड़क चौड़ी होगी फ्लाई ओवर बनगे , टैक्स टोल आगे । छोटे मोटे कारखाने चिमकैं सै कितै कितै सड़कां के साहरे । पहलम फेर  माणस थ्यावास की जिंदगी जीवैं थे । ईब तै बेरा ए ना कद के होज्या । बिन पैंदे का लौटा बणग्या माणस । अंध विस्वाश टूटण की जागां और मजबूत होंते जान  लागरे सैं । न्याय तो कई कई कोस ताहीं कितै बी नहीं दीखता । मुठ्ठी भर लोग सैं जो राजपाट के ठाठ लूटरे सैं । चाहे राज किसे का हो । 
उन ताहिं खास प्रिविलेज सैं बाकी जनता जाओ चाहे भाड़ मैं । व्यापार धोखाधड़ी मैं बदलता जावण लागरया सै ।प्रतिस्पर्धा दुश्मनी मैं बदलगी । तलवार की जागां सोने नै ले ली । काले धन का औड़ नहीं । बिदेशां मैं जमा कराओ फेर भारत मैं ल्यावण का सांग करो । इसतैं  अच्छा  इसके पैदा होवण पै रोक क्यूँ ना लागै ? 
                            औरत की कोए कदर नहीं छोड़डी । वा मंडी का माल बना कै छोड़ दी । वा बस भोग की वस्तु  बना दी अर बाजार बीच लया खड़ी करी । वा बी माणस सै , वा बी इंसान सै ,इस ढाल की सोच का मानस छिद्दा ए पावैगा । वैश्यावृत्ति  अपने पूरे उफान पै सै । भरम और अराजकता चारों कांही दीखैं सैं । इसे माहौल मैं भी लोग अंतोल्या मुनाफा कमावण तैं बाज नहीं आंते । करोड़ पति तैं रातों रात अरबपति बणण के सपने देखैं सैं । भीम काय मशीनां नै अर उन्नत तकनीक नै कुछ मुठ्ठी भर लोग तै माला माल कर दिए अर लोक जन गुलाम बना दिया । 
                       रमलू नै सोच्या न्यून क्यूकर काम चालैगा ? या अंधी गली की दौड़ मानस नै किट पहोंचावैगी । सोच सोच कै उसका सिर पाट्टण नै होग्या । रमलू तो बेचारा अनपढ़ पाली सै । रै पढ़े लिख्यो तम बी तै सोचो किमैं ? तमनै कति ए सोचना बंद कर दिया । कमरे मैं कबूतर बैठ्या हो अर बिल्ली आज्या तो कबूतर आँख बंद करकै सोच्या करै एक कड़ै सै बिल्ली ?  

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