व्यवस्था का अन्धेरा
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कुमार प्रशांत
वरिष्ठ पत्रकार
नमोहन सिंह को कोयले के मामले में जो करना था, कर गए; नौकरशाहों को अपना दामन बचाना था और पाक-साफ दिखना था, सो वह भी हो गया। कैग को यह गुब्बारा फोड़ना था, उसने फोड़ लिया। सीबीआई को अपनी तरह से तहकीकात करनी थी और ईमानदार दिखना था, सो उसने भी कर लिया। अब बची थी अदालत, सांविधानिक व्यवस्थाओं में से बची एकमात्र व्यवस्था, जो काम करती लगती है। उसने भी अपना काम कर दिया और २१८ में से २१४ खदानों का लाइसेंस अवैध करार दिया। ये वे खदानें हैं, जिनका आवंटन १९९३ से अब तक किया गया था। मतलब यह हुआ कि देश में कोयला खदानें ठप्प हो गईं और अब मात्र चार खदानों को ही देश की कोयला जरूरतों की पूर्ति करनी है।
लेकिन अदालत इतनी कठोर कैसे हो सकती है? उसे देश का ख्याल भी तो रखना है। सो उसने वह भी रखा और सभी अवैध खदानों में से छांटकर ४२ खदानों को ३१ मार्च, २०१५ तक काम करते रहने की अनुमति दे दी है। अब आपको लगता है न कि सब कुछ ठीक-ठाक बैठ गया। अपराधियों को सजा भी हो गई; नौकरशाही की नाक पर मक्खी भी नहीं बैठी; राजनीतिज्ञों के दागदार कुर्ते पर वैसे भी कोई छींटा दिखाई नहीं देता है, अदालत ने कोई छींटा डाला भी नहीं; सीबीआई कॉलर खड़ा कर कह रही है कि हमारा तो जवाब नहीं; अदालत ने अपनी न्यायपूर्ण तटस्थता की तस्वीर और उज्ज्वल कर ली। कोयले का उत्पादन अबाधित रहे, ताकि देश में अंधेरा न हो जाए, उसने इसकी व्यवस्था भी कर दी, तो हो गया न नीर-क्षीर विवेक। ३१ मार्च, २०१५ तक मोदी सरकार को मौका है कि वह खदानों से संबंधित पूरी व्यवस्था को अपने अनुकूल बना ले और फिर धूमधाम से पुरानी व्यवस्था ही लागू कर दी जाए। आखिर व्यवस्था बदलने की बात तो किसी ने कही नहीं है न!
प्रकृति के अज्ञात कारखाने में, न मालूम कितने अंधकार-वर्षों तक निरंतर काम करते रहने के बाद यह रोशनी से भरा काला-कलूटा कोयला तैयार होता है। हम न इसे बना सकते हैं और न इसके बनने की गति तेज कर सकते हैं। हम इसका इस्तेमाल भर कर सकते हैं। तो कम-से-कम इस्तेमाल करें हम, अपनी जरूरत जिसमें समा जाए उतना भर ही; और कानूनी व्यवस्था यह हो कि हम इसका खनन अपनी जरूरत के आधार पर नहीं, बल्कि इसकी उपलब्धता के आधार पर करें। प्रकृति के साथ हमारा संबंध इसी तरह की विवेकपूर्ण कंजूसी के आधार पर बन व निभ सकता है। महात्मा गांधी ने इसे स्वेच्छा से स्वीकारी गरीबी कहा था। लेकिन न कानून यह कहता है, न नौकरशाही यह देखती है और न अदालत इसकी व्यवस्था बनाती है कि ४६ खदानों से यदि इतना कोयला निकाला जा सकता है कि अंधेरा न हो जाए, तो आप १७२ खदानों के खनन की अनुमति दे ही कैसे सकते हैं। अवैध लाइसेंस से भी बड़ा सवाल प्रकृति के अनैतिक दोहन का है।
सुप्रीम कोर्ट ने दूसरी व्यवस्था यह दी है कि लाइसेंस पाने से लेकर अब तक जिसने जितना भी कोयला निकाला है और भविष्य में जितना निकालेंगे, उन सबका भुगतान २९५ रुपये प्रति टन के हिसाब से करना होगा। इसमें वह खनन शामिल नहीं है, जो नरसिंह राव से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौर में किया गया। सीबीआई अब उन कालखंडों की जांच भी कर रही है। लाइसेंसधारी कंपनियों का, जिनमें से अधिकांश बेनामी हैं, रोना यह है कि हम यह कीमत कहां से अदा करें। बैंकों की नींद हराम है कि इस पूरे गोरखधंधे में उनकी नौ खरब रुपये की पूंजी फंसी हुई है। अगर वह सलामत वापस न आई, तो बैंकिंग व्यवस्था का भट्ठा बैठ जाएगा। निजी कंपनियों का कहना है कि रॉयल्टी, सेस, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष करों के रूप में उनका घाटा ४.४ लाख करोड़ रुपयों का होता है। बिजली कंपनियों का कहना है कि इससे उनका उत्पादन खर्च बेहद बढ़ जाएगा, जिसके परिणामस्वरूप बिजली महंगी हो जाएगी।
तो अब हम देखें कि अंतत: मार किसे खानी है। प्राकृतिक संसाधनों के अमर्यादित दोहन की मार जनता पर पड़ती है। उसके जीवन की गुणवत्ता निरंतर गिरती चली जाती है, उस दोहन से मुनाफा कमाने वाले भी उसकी ही जेब काटते हैं। बिजली कंपनियां अपनी कमाई सुरक्षित रखकर ही हमारे घरों को रोशन करती हैं, हमारे ही पैसों से खेलने वाले बैंक भी, हमारी कीमत पर मनमाना मुनाफा कमाते हैं। सभी तरह का काला-सफेद करने के बाद जब कभी ये पकड़ में आते हैं, तो सभी एक ही रोना रोते हैं कि इससे तो सारी व्यवस्था चरमरा जाएगी। ऐसा हल्ला होते ही सरकारें बेल-आउट पैकेज लेकर आ पहुंचती हैं और जनता के पैसों और संसाधनों की हेराफेरी करने वालों को जनता के ही पैसों से बचा लिया जाता है।
दुनिया भर की सरकारें यही करती हैं, क्योंकि दुनिया भर में सरकारें पूंजी और सत्ता के गठजोड़ पर टिकी हुई हैं। यह सबके सामूहिक भ्रष्टाचार को ढांपने और साधारण जन पर उसका बोझ डालने की शर्मनाक चालाकी है। इसलिए न्यायपालिका को यदि न्याय की फिक्र है, जो उसे होनी चाहिए बल्कि जिसके अलावा उसका दूसरा कोई आधार नहीं होना चाहिए, तो उसे साफ कह देना चाहिए कि इस घोटाले में विभिन्न स्तरों पर, विभिन्न भूमिकाएं निभाने वालों को सारा दंड व घाटा स्वयं की कमाई से ही वहन करना होगा। वे उसका थोड़ा भी बोझ जनता या उपभोक्ता पर नहीं डाल सकते हैं। जो घाटे की भरपाई नहीं करेंगे, वे सभी साधारण अपराधियों की तरह जेल जाएंगे। इससे यदि आज की व्यवस्था टूटती है तो टूटे, क्योंकि इस अनुभव में से ही नई व्यवस्था उभरेगी। कई बार अव्यवस्था ही नई व्यवस्था को जन्म देती है। आज हम अपनी पूरी व्यवस्था के संदर्भ में इसी मुकाम पर खड़े हैं।
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