मैं घर लौटना चाहती हूं
पति के अत्याचार से तंग आकर एक स्त्री, बेबी हालदार, अपने तीन बच्चों के साथ घर छोड़ देती है। बंगाल से हरियाणा आने के कुछ वर्षों बाद अपने त्रासद अनुभवों को वह एक किताब की शक्ल देती है, तो साहित्य की दुनिया में हलचल मच जाती है। बारह साल बाद वही बेबी हालदार घर लौटना चाहती हैं। उनका तीसरा उपन्यास, जो अभी छपकर आया नहीं है, इसी पर केंद्रित है। गुड़गांव में रह रहीं बेबी हालदार से कल्लोल चक्रवर्ती ने बात की-
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आपका पहला उपन्यास, आलो-आंधारि एक औरत की बदहाली पर था, दूसरा उपन्यास, ईषत रूपांतर उसके कुछ बन जाने पर। तीसरे उपन्यास की विषयवस्तु क्या है?
मेरा तीसरा उपन्यास मेरे कैशोर्य के दिनों पर केंद्रित है। इसमें मैंने जलंगी और दुर्गापुर में बिताए गए पुराने दिनों को याद किया है। जलंगी मुर्शिदाबाद का कस्बा है और मेरे पिताजी के पूर्वजों का इलाका। जबकि दुर्गापुर औद्योगिक शहर है। दुर्गापुर में मेरी पढ़ाई-लिखाई और शादी हुई और वहीं से मैं अपने बच्चों के साथ पहले फरीदाबाद आई थी, फिर गुड़गांव। तीसरी किताब में मेरे अलावा मेरी एक सहेली का भी चित्रण है। इस उपन्यास का नाम है-घरे फेरार पथे -यानी घर लौटने के रास्ते पर। हालांकि प्रकाशक को इसकी पांडुलिपि दिए डेढ़ साल हो गए हैं, पर अब तक कोई सूचना नहीं है।
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कहीं सच में घर लौटने की तैयारी तो नहीं?
हां, अब मैं लौटना चाहती हूं। मेरे संघर्ष को डेढ़ दशक से अधिक समय हो गया। जिन उद्देश्यों से बाहर निकली थी, वे लगभग पूरे हो चुके हैं। इसलिए अब अपनी जमीन से जुड़कर मैं दूसरे काम करना चाहती हूं।
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बेबी हालदार इतनी चर्चित क्यों हैं? सातवीं पास एक घरेलू कामगार महिला के लेखिका होने के कारण या लेखन के कारण?
मैं मानती हूं कि मेरी चर्चा का बड़ा कारण मेरा घरेलू कामगार महिला होना ही है। लोगों को इस पर आश्चर्य होता था कि दूसरे के घर में काम करने वाली औरत भला लेखिका कैसे हो सकती है। उसे लिखने का समय कब मिलता है? वह अपने जीवन के ब्योरों को किस तरह दर्ज करती है? इसी कारण लोगों ने मेरी किताबों के बारे में दिलचस्पी लेनी शुरू की। मेरे लेखन में चर्चा उसके बाद ही होती है। बल्कि शायद ही कभी इस पर चर्चा होती हो कि बेबी हालदार का लेखन किस तरह का है या नहीं है।
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कभी आगे पढ़ाई करने के बारे में नहीं सोचा?
जब दुर्गापुर से आई थी, तब पेट पालने का सवाल बड़ा था। शुरुआती परेशानियों के बाद सौभाग्य से मैं एक ऐसे व्यक्ति के संपर्क में आई, जो मनुष्यता के रिश्ते को बड़ा मानता था। उन्होंने नौकरी दी और लिखने के लिए प्रोत्साहित भी किया। तब कई लोगों ने मुझे आगे पढ़ने के लिए कहा। पर दूसरों के घर में काम करते हुए, बच्चों को पालते हुए, पढ़ाई कैसे संभव थी? इसलिए मैंने इस पर गंभीरता से नहीं सोचा।
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लेखिका के तौर पर आप सुप्रतिष्ठित हो चुकी हैं। अपने परिजनों और आसपास के लोगों का आपके प्रति व्यवहार कितना बदला है?
जब मैं पश्चिम बंगाल से आई थी, तो तीन छोटे बच्चे मेरे साथ थे। आज बड़े बेटे को छोड़कर, जो अपने पिता के साथ दुर्गापुर में रहता है, दो बच्चे मेरे साथ हैं। वे कॉलेज में पढ़ते हैं। बेटी बीए सेकेंड ईयर में है और ताइक्वांडो की चैंपियन है। बंगाल में मैंने अपना घर भी बना लिया है। लेकिन रिश्ते पहले जैसे ही धूप-छांह वाले हैं। पति ने एक बार भी मुझसे मुलाकात करने की जरूरत नहीं समझी। बड़े बेटे से बातचीत होती है। जिन सहेलियों के साथ मैं खेलती थी, उनमें से ज्यादातर मुझे सम्मान के साथ देखती हैं। जब मैं बंगाल से आई थी, तब मेरे बड़े भैया और भाभी मुझे और मेरे बच्चों को बोझ की तरह देखते थे। लेकिन आज वे गर्व से मेरा परिचय देते हैं। हालांकि नाते-रिश्तेदारों में जलने वाले भी कम नहीं हैं। पर मैं इसे बहुत महत्व नहीं देती। यहां आसपास के घरों में काम करने वाली औरतें मुझे जानती हैं। इनमें से कई बांग्लाभाषी हैं और मेरे उपन्यास पढ़ चुकी हैं। यह सब देख-सुनकर अच्छा लगता है।
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फिर घर वापसी की इच्छा क्यों?
अब मैं थक चुकी हूं। पुराने दिन याद आते हैं, तो लगता है कि वही समय ज्यादा अच्छा था। बच्चों के लिए घर छोड़ा था। अब अपने लिए घर लौटना चाहती हूं। फिर जहां काम कर रही हूं, वहां भी मन नहीं टिकता। तातुश (प्रबोध कुमार) ने मेरे लिए बहुत किया। उन्हीं के कारण मैं उनका घर छोड़कर नहीं जाना चाहती थी। लेकिन उनके परिवारजन अब नहीं चाहते कि मैं यहां रहूं। बच्चे पढ़-लिख चुके हैं, कुछ कर ही लेंगे। इसीलिए घर वापसी की इच्छा है।
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बेबी हालदार का जीवन भले बदल जाए, पर लेखन तो जारी रहेगा?
हां, मैं लिखती रहूंगी। बल्कि संभव है, भविष्य में मेरे लेखन में आप जीवन के दूसरे रंग देखें। अब तक मेरे लेखन में मेरी ही मौजूदगी रही है, आगे शायद उतनी न हो।
सप्ताह का इंटरव्यू
मेरी चर्चा का बड़ा कारण मेरा घरेलू कामगार होना है। लोग आश्चर्य करते हैं कि दूसरे के घरों में काम करने वाली भला लेखिका कैसे हो सकती है।
पति के अत्याचार से तंग आकर एक स्त्री, बेबी हालदार, अपने तीन बच्चों के साथ घर छोड़ देती है। बंगाल से हरियाणा आने के कुछ वर्षों बाद अपने त्रासद अनुभवों को वह एक किताब की शक्ल देती है, तो साहित्य की दुनिया में हलचल मच जाती है। बारह साल बाद वही बेबी हालदार घर लौटना चाहती हैं। उनका तीसरा उपन्यास, जो अभी छपकर आया नहीं है, इसी पर केंद्रित है। गुड़गांव में रह रहीं बेबी हालदार से कल्लोल चक्रवर्ती ने बात की-
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आपका पहला उपन्यास, आलो-आंधारि एक औरत की बदहाली पर था, दूसरा उपन्यास, ईषत रूपांतर उसके कुछ बन जाने पर। तीसरे उपन्यास की विषयवस्तु क्या है?
मेरा तीसरा उपन्यास मेरे कैशोर्य के दिनों पर केंद्रित है। इसमें मैंने जलंगी और दुर्गापुर में बिताए गए पुराने दिनों को याद किया है। जलंगी मुर्शिदाबाद का कस्बा है और मेरे पिताजी के पूर्वजों का इलाका। जबकि दुर्गापुर औद्योगिक शहर है। दुर्गापुर में मेरी पढ़ाई-लिखाई और शादी हुई और वहीं से मैं अपने बच्चों के साथ पहले फरीदाबाद आई थी, फिर गुड़गांव। तीसरी किताब में मेरे अलावा मेरी एक सहेली का भी चित्रण है। इस उपन्यास का नाम है-घरे फेरार पथे -यानी घर लौटने के रास्ते पर। हालांकि प्रकाशक को इसकी पांडुलिपि दिए डेढ़ साल हो गए हैं, पर अब तक कोई सूचना नहीं है।
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कहीं सच में घर लौटने की तैयारी तो नहीं?
हां, अब मैं लौटना चाहती हूं। मेरे संघर्ष को डेढ़ दशक से अधिक समय हो गया। जिन उद्देश्यों से बाहर निकली थी, वे लगभग पूरे हो चुके हैं। इसलिए अब अपनी जमीन से जुड़कर मैं दूसरे काम करना चाहती हूं।
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बेबी हालदार इतनी चर्चित क्यों हैं? सातवीं पास एक घरेलू कामगार महिला के लेखिका होने के कारण या लेखन के कारण?
मैं मानती हूं कि मेरी चर्चा का बड़ा कारण मेरा घरेलू कामगार महिला होना ही है। लोगों को इस पर आश्चर्य होता था कि दूसरे के घर में काम करने वाली औरत भला लेखिका कैसे हो सकती है। उसे लिखने का समय कब मिलता है? वह अपने जीवन के ब्योरों को किस तरह दर्ज करती है? इसी कारण लोगों ने मेरी किताबों के बारे में दिलचस्पी लेनी शुरू की। मेरे लेखन में चर्चा उसके बाद ही होती है। बल्कि शायद ही कभी इस पर चर्चा होती हो कि बेबी हालदार का लेखन किस तरह का है या नहीं है।
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कभी आगे पढ़ाई करने के बारे में नहीं सोचा?
जब दुर्गापुर से आई थी, तब पेट पालने का सवाल बड़ा था। शुरुआती परेशानियों के बाद सौभाग्य से मैं एक ऐसे व्यक्ति के संपर्क में आई, जो मनुष्यता के रिश्ते को बड़ा मानता था। उन्होंने नौकरी दी और लिखने के लिए प्रोत्साहित भी किया। तब कई लोगों ने मुझे आगे पढ़ने के लिए कहा। पर दूसरों के घर में काम करते हुए, बच्चों को पालते हुए, पढ़ाई कैसे संभव थी? इसलिए मैंने इस पर गंभीरता से नहीं सोचा।
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लेखिका के तौर पर आप सुप्रतिष्ठित हो चुकी हैं। अपने परिजनों और आसपास के लोगों का आपके प्रति व्यवहार कितना बदला है?
जब मैं पश्चिम बंगाल से आई थी, तो तीन छोटे बच्चे मेरे साथ थे। आज बड़े बेटे को छोड़कर, जो अपने पिता के साथ दुर्गापुर में रहता है, दो बच्चे मेरे साथ हैं। वे कॉलेज में पढ़ते हैं। बेटी बीए सेकेंड ईयर में है और ताइक्वांडो की चैंपियन है। बंगाल में मैंने अपना घर भी बना लिया है। लेकिन रिश्ते पहले जैसे ही धूप-छांह वाले हैं। पति ने एक बार भी मुझसे मुलाकात करने की जरूरत नहीं समझी। बड़े बेटे से बातचीत होती है। जिन सहेलियों के साथ मैं खेलती थी, उनमें से ज्यादातर मुझे सम्मान के साथ देखती हैं। जब मैं बंगाल से आई थी, तब मेरे बड़े भैया और भाभी मुझे और मेरे बच्चों को बोझ की तरह देखते थे। लेकिन आज वे गर्व से मेरा परिचय देते हैं। हालांकि नाते-रिश्तेदारों में जलने वाले भी कम नहीं हैं। पर मैं इसे बहुत महत्व नहीं देती। यहां आसपास के घरों में काम करने वाली औरतें मुझे जानती हैं। इनमें से कई बांग्लाभाषी हैं और मेरे उपन्यास पढ़ चुकी हैं। यह सब देख-सुनकर अच्छा लगता है।
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फिर घर वापसी की इच्छा क्यों?
अब मैं थक चुकी हूं। पुराने दिन याद आते हैं, तो लगता है कि वही समय ज्यादा अच्छा था। बच्चों के लिए घर छोड़ा था। अब अपने लिए घर लौटना चाहती हूं। फिर जहां काम कर रही हूं, वहां भी मन नहीं टिकता। तातुश (प्रबोध कुमार) ने मेरे लिए बहुत किया। उन्हीं के कारण मैं उनका घर छोड़कर नहीं जाना चाहती थी। लेकिन उनके परिवारजन अब नहीं चाहते कि मैं यहां रहूं। बच्चे पढ़-लिख चुके हैं, कुछ कर ही लेंगे। इसीलिए घर वापसी की इच्छा है।
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बेबी हालदार का जीवन भले बदल जाए, पर लेखन तो जारी रहेगा?
हां, मैं लिखती रहूंगी। बल्कि संभव है, भविष्य में मेरे लेखन में आप जीवन के दूसरे रंग देखें। अब तक मेरे लेखन में मेरी ही मौजूदगी रही है, आगे शायद उतनी न हो।
सप्ताह का इंटरव्यू
मेरी चर्चा का बड़ा कारण मेरा घरेलू कामगार होना है। लोग आश्चर्य करते हैं कि दूसरे के घरों में काम करने वाली भला लेखिका कैसे हो सकती है।

