शुक्रवार, 26 सितंबर 2014

मैं घर लौटना चाहती हूं

मैं घर लौटना चाहती हूं
पति के अत्याचार से तंग आकर एक स्त्री, बेबी हालदार, अपने तीन बच्चों के साथ घर छोड़ देती है। बंगाल से हरियाणा आने के कुछ वर्षों बाद अपने त्रासद अनुभवों को वह एक किताब की शक्ल देती है, तो साहित्य की दुनिया में हलचल मच जाती है। बारह साल बाद वही बेबी हालदार घर लौटना चाहती हैं। उनका तीसरा उपन्यास, जो अभी छपकर आया नहीं है, इसी पर केंद्रित है। गुड़गांव में रह रहीं बेबी हालदार से कल्लोल चक्रवर्ती ने बात की-
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आपका पहला उपन्यास, आलो-आंधारि एक औरत की बदहाली पर था, दूसरा उपन्यास, ईषत रूपांतर उसके कुछ बन जाने पर। तीसरे उपन्यास की विषयवस्तु क्या है?
मेरा तीसरा उपन्यास मेरे कैशोर्य के दिनों पर केंद्रित है। इसमें मैंने जलंगी और दुर्गापुर में बिताए गए पुराने दिनों को याद किया है। जलंगी मुर्शिदाबाद का कस्बा है और मेरे पिताजी के पूर्वजों का इलाका। जबकि दुर्गापुर औद्योगिक शहर है। दुर्गापुर में मेरी पढ़ाई-लिखाई और शादी हुई और वहीं से मैं अपने बच्चों के साथ पहले फरीदाबाद आई थी, फिर गुड़गांव। तीसरी किताब में मेरे अलावा मेरी एक सहेली का भी चित्रण है। इस उपन्यास का नाम है-घरे फेरार पथे -यानी घर लौटने के रास्ते पर। हालांकि प्रकाशक को इसकी पांडुलिपि दिए डेढ़ साल हो गए हैं, पर अब तक कोई सूचना नहीं है।
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कहीं सच में घर लौटने की तैयारी तो नहीं?
हां, अब मैं लौटना चाहती हूं। मेरे संघर्ष को डेढ़ दशक से अधिक समय हो गया। जिन उद्देश्यों से बाहर निकली थी, वे लगभग पूरे हो चुके हैं। इसलिए अब अपनी जमीन से जुड़कर मैं दूसरे काम करना चाहती हूं।
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बेबी हालदार इतनी चर्चित क्यों हैं? सातवीं पास एक घरेलू कामगार महिला के लेखिका होने के कारण या लेखन के कारण?
मैं मानती हूं कि मेरी चर्चा का बड़ा कारण मेरा घरेलू कामगार महिला होना ही है। लोगों को इस पर आश्चर्य होता था कि दूसरे के घर में काम करने वाली औरत भला लेखिका कैसे हो सकती है। उसे लिखने का समय कब मिलता है? वह अपने जीवन के ब्योरों को किस तरह दर्ज करती है? इसी कारण लोगों ने मेरी किताबों के बारे में दिलचस्पी लेनी शुरू की। मेरे लेखन में चर्चा उसके बाद ही होती है। बल्कि शायद ही कभी इस पर चर्चा होती हो कि बेबी हालदार का लेखन किस तरह का है या नहीं है।
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कभी आगे पढ़ाई करने के बारे में नहीं सोचा?
जब दुर्गापुर से आई थी, तब पेट पालने का सवाल बड़ा था। शुरुआती परेशानियों के बाद सौभाग्य से मैं एक ऐसे व्यक्ति के संपर्क में आई, जो मनुष्यता के रिश्ते को बड़ा मानता था। उन्होंने नौकरी दी और लिखने के लिए प्रोत्साहित भी किया। तब कई लोगों ने मुझे आगे पढ़ने के लिए कहा। पर दूसरों के घर में काम करते हुए, बच्चों को पालते हुए, पढ़ाई कैसे संभव थी? इसलिए मैंने इस पर गंभीरता से नहीं सोचा।
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लेखिका के तौर पर आप सुप्रतिष्ठित हो चुकी हैं। अपने परिजनों और आसपास के लोगों का आपके प्रति व्यवहार कितना बदला है?
जब मैं पश्चिम बंगाल से आई थी, तो तीन छोटे बच्चे मेरे साथ थे। आज बड़े बेटे को छोड़कर, जो अपने पिता के साथ दुर्गापुर में रहता है, दो बच्चे मेरे साथ हैं। वे कॉलेज में पढ़ते हैं। बेटी बीए सेकेंड ईयर में है और ताइक्वांडो की चैंपियन है। बंगाल में मैंने अपना घर भी बना लिया है। लेकिन रिश्ते पहले जैसे ही धूप-छांह वाले हैं। पति ने एक बार भी मुझसे मुलाकात करने की जरूरत नहीं समझी। बड़े बेटे से बातचीत होती है। जिन सहेलियों के साथ मैं खेलती थी, उनमें से ज्यादातर मुझे सम्मान के साथ देखती हैं। जब मैं बंगाल से आई थी, तब मेरे बड़े भैया और भाभी मुझे और मेरे बच्चों को बोझ की तरह देखते थे। लेकिन आज वे गर्व से मेरा परिचय देते हैं। हालांकि नाते-रिश्तेदारों में जलने वाले भी कम नहीं हैं। पर मैं इसे बहुत महत्व नहीं देती। यहां आसपास के घरों में काम करने वाली औरतें मुझे जानती हैं। इनमें से कई बांग्लाभाषी हैं और मेरे उपन्यास पढ़ चुकी हैं। यह सब देख-सुनकर अच्छा लगता है।
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फिर घर वापसी की इच्छा क्यों?
अब मैं थक चुकी हूं। पुराने दिन याद आते हैं, तो लगता है कि वही समय ज्यादा अच्छा था। बच्चों के लिए घर छोड़ा था। अब अपने लिए घर लौटना चाहती हूं। फिर जहां काम कर रही हूं, वहां भी मन नहीं टिकता। तातुश (प्रबोध कुमार) ने मेरे लिए बहुत किया। उन्हीं के कारण मैं उनका घर छोड़कर नहीं जाना चाहती थी। लेकिन उनके परिवारजन अब नहीं चाहते कि मैं यहां रहूं। बच्चे पढ़-लिख चुके हैं, कुछ कर ही लेंगे। इसीलिए घर वापसी की इच्छा है।
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बेबी हालदार का जीवन भले बदल जाए, पर लेखन तो जारी रहेगा?
हां, मैं लिखती रहूंगी। बल्कि संभव है, भविष्य में मेरे लेखन में आप जीवन के दूसरे रंग देखें। अब तक मेरे लेखन में मेरी ही मौजूदगी रही है, आगे शायद उतनी न हो।
सप्ताह का इंटरव्यू
मेरी चर्चा का बड़ा कारण मेरा घरेलू कामगार होना है। लोग आश्चर्य करते हैं कि दूसरे के घरों में काम करने वाली भला लेखिका कैसे हो सकती है।

व्यवस्था का अन्धेरा


















व्यवस्था का अन्धेरा


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कुमार प्रशांत
वरिष्ठ पत्रकार
नमोहन सिंह को कोयले के मामले में जो करना था, कर गए; नौकरशाहों को अपना दामन बचाना था और पाक-साफ दिखना था, सो वह भी हो गया। कैग को यह गुब्बारा फोड़ना था, उसने फोड़ लिया। सीबीआई को अपनी तरह से तहकीकात करनी थी और ईमानदार दिखना था, सो उसने भी कर लिया। अब बची थी अदालत, सांविधानिक व्यवस्थाओं में से बची एकमात्र व्यवस्था, जो काम करती लगती है। उसने भी अपना काम कर दिया और २१८ में से २१४ खदानों का लाइसेंस अवैध करार दिया। ये वे खदानें हैं, जिनका आवंटन १९९३ से अब तक किया गया था। मतलब यह हुआ कि देश में कोयला खदानें ठप्प हो गईं और अब मात्र चार खदानों को ही देश की कोयला जरूरतों की पूर्ति करनी है।
लेकिन अदालत इतनी कठोर कैसे हो सकती है? उसे देश का ख्याल भी तो रखना है। सो उसने वह भी रखा और सभी अवैध खदानों में से छांटकर ४२ खदानों को ३१ मार्च, २०१५ तक काम करते रहने की अनुमति दे दी है। अब आपको लगता है न कि सब कुछ ठीक-ठाक बैठ गया। अपराधियों को सजा भी हो गई; नौकरशाही की नाक पर मक्खी भी नहीं बैठी; राजनीतिज्ञों के दागदार कुर्ते पर वैसे भी कोई छींटा दिखाई नहीं देता है, अदालत ने कोई छींटा डाला भी नहीं; सीबीआई कॉलर खड़ा कर कह रही है कि हमारा तो जवाब नहीं; अदालत ने अपनी न्यायपूर्ण तटस्थता की तस्वीर और उज्ज्वल कर ली। कोयले का उत्पादन अबाधित रहे, ताकि देश में अंधेरा न हो जाए, उसने इसकी व्यवस्था भी कर दी, तो हो गया न नीर-क्षीर विवेक। ३१ मार्च, २०१५ तक मोदी सरकार को मौका है कि वह खदानों से संबंधित पूरी व्यवस्था को अपने अनुकूल बना ले और फिर धूमधाम से पुरानी व्यवस्था ही लागू कर दी जाए। आखिर व्यवस्था बदलने की बात तो किसी ने कही नहीं है न!
प्रकृति के अज्ञात कारखाने में, न मालूम कितने अंधकार-वर्षों तक निरंतर काम करते रहने के बाद यह रोशनी से भरा काला-कलूटा कोयला तैयार होता है। हम न इसे बना सकते हैं और न इसके बनने की गति तेज कर सकते हैं। हम इसका इस्तेमाल भर कर सकते हैं। तो कम-से-कम इस्तेमाल करें हम, अपनी जरूरत जिसमें समा जाए उतना भर ही; और कानूनी व्यवस्था यह हो कि हम इसका खनन अपनी जरूरत के आधार पर नहीं, बल्कि इसकी उपलब्धता के आधार पर करें। प्रकृति के साथ हमारा संबंध इसी तरह की विवेकपूर्ण कंजूसी के आधार पर बन व निभ सकता है। महात्मा गांधी ने इसे स्वेच्छा से स्वीकारी गरीबी कहा था। लेकिन न कानून यह कहता है, न नौकरशाही यह देखती है और न अदालत इसकी व्यवस्था बनाती है कि ४६ खदानों से यदि इतना कोयला निकाला जा सकता है कि अंधेरा न हो जाए, तो आप १७२ खदानों के खनन की अनुमति दे ही कैसे सकते हैं। अवैध लाइसेंस से भी बड़ा सवाल प्रकृति के अनैतिक दोहन का है।
सुप्रीम कोर्ट ने दूसरी व्यवस्था यह दी है कि लाइसेंस पाने से लेकर अब तक जिसने जितना भी कोयला निकाला है और भविष्य में जितना निकालेंगे, उन सबका भुगतान २९५ रुपये प्रति टन के हिसाब से करना होगा। इसमें वह खनन शामिल नहीं है, जो नरसिंह राव से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौर में किया गया। सीबीआई अब उन कालखंडों की जांच भी कर रही है। लाइसेंसधारी कंपनियों का, जिनमें से अधिकांश बेनामी हैं, रोना यह है कि हम यह कीमत कहां से अदा करें। बैंकों की नींद हराम है कि इस पूरे गोरखधंधे में उनकी नौ खरब रुपये की पूंजी फंसी हुई है। अगर वह सलामत वापस न आई, तो बैंकिंग व्यवस्था का भट्ठा बैठ जाएगा। निजी कंपनियों का कहना है कि रॉयल्टी, सेस, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष करों के रूप में उनका घाटा ४.४ लाख करोड़ रुपयों का होता है। बिजली कंपनियों का कहना है कि इससे उनका उत्पादन खर्च बेहद बढ़ जाएगा, जिसके परिणामस्वरूप बिजली महंगी हो जाएगी।
तो अब हम देखें कि अंतत: मार किसे खानी है। प्राकृतिक संसाधनों के अमर्यादित दोहन की मार जनता पर पड़ती है। उसके जीवन की गुणवत्ता निरंतर गिरती चली जाती है, उस दोहन से मुनाफा कमाने वाले भी उसकी ही जेब काटते हैं। बिजली कंपनियां अपनी कमाई सुरक्षित रखकर ही हमारे घरों को रोशन करती हैं, हमारे ही पैसों से खेलने वाले बैंक भी, हमारी कीमत पर मनमाना मुनाफा कमाते हैं। सभी तरह का काला-सफेद करने के बाद जब कभी ये पकड़ में आते हैं, तो सभी एक ही रोना रोते हैं कि इससे तो सारी व्यवस्था चरमरा जाएगी। ऐसा हल्ला होते ही सरकारें बेल-आउट पैकेज लेकर आ पहुंचती हैं और जनता के पैसों और संसाधनों की हेराफेरी करने वालों को जनता के ही पैसों से बचा लिया जाता है।
दुनिया भर की सरकारें यही करती हैं, क्योंकि दुनिया भर में सरकारें पूंजी और सत्ता के गठजोड़ पर टिकी हुई हैं। यह सबके सामूहिक भ्रष्टाचार को ढांपने और साधारण जन पर उसका बोझ डालने की शर्मनाक चालाकी है। इसलिए न्यायपालिका को यदि न्याय की फिक्र है, जो उसे होनी चाहिए बल्कि जिसके अलावा उसका दूसरा कोई आधार नहीं होना चाहिए, तो उसे साफ कह देना चाहिए कि इस घोटाले में विभिन्न स्तरों पर, विभिन्न भूमिकाएं निभाने वालों को सारा दंड व घाटा स्वयं की कमाई से ही वहन करना होगा। वे उसका थोड़ा भी बोझ जनता या उपभोक्ता पर नहीं डाल सकते हैं। जो घाटे की भरपाई नहीं करेंगे, वे सभी साधारण अपराधियों की तरह जेल जाएंगे। इससे यदि आज की व्यवस्था टूटती है तो टूटे, क्योंकि इस अनुभव में से ही नई व्यवस्था उभरेगी। कई बार अव्यवस्था ही नई व्यवस्था को जन्म देती है। आज हम अपनी पूरी व्यवस्था के संदर्भ में इसी मुकाम पर खड़े हैं।

अनियोजित शहरीकरण की बड़ी कीमत

अनियोजित शहरीकरण की बड़ी कीमत
बढ़ते पर्यावरण असंतुलन को लेकर राजनीति की रीति भी अजीब है। सम्मेलनों में तो नीति-नियंता इसे बदलने का दावा करते हैं। मगर जब इसका वक्त आता है, तो वे इसकी जिम्मेदारी दूसरे देशों पर थोप देते हैं। यही वजह है कि जब भी जलवायु परिवर्तन पर शिखर बैठकें होती हैं, तब पर्यावरण बचाने की कवायद में जुटे कार्यकर्ता इस विडंबना को उजागर करने की कोशिश में सामने आते हैं। न्यूयॉर्क में २३ सितंबर को हुए जलवायु परिवर्तन पर सम्मेलन के दौरान विरोध प्रदर्शन को भी इसी नजरिये से देखना चाहिए।
लेकिन परिवर्तन को लेकर हो रही चर्चाओं की तरफ न मीडिया का ध्यान जाता है, न आम जनता का। इस जलवायु सम्मेलन से पहले संयुक्त राष्ट्र ने एक अहम रिपोर्ट जारी की, जिसके मुताबिक भारत शहरी क्रांति की ओर बढ़ रहा है। इस रिपोर्ट के अनुसार, २०३१ तक भारतीय शहरों और कस्बों में करीब साठ करोड़ लोग रहने लगेंगे। रपट यह भी बताती है कि दो दशकों में भारत की शहरी आबादी २१ करोड़ ७० लाख से बढ़कर ३७ करोड़ ७० लाख हो चुकी है। आबादी का यह आंकड़ा २०३१ तक बढ़कर कुल जनसंख्या का चालीस प्रतिशत हो जाएगा।
संयुक्त राष्ट्र का यह आंकड़ा लोकसभा चुनाव से पहले का है। तब अपने चुनावी घोषणापत्र में भाजपा ने देश में सौ स्मार्ट सिटी बनाने और शहरीकरण को बढ़ावा देने का वायदा किया था। अगर ऐसा हुआ, तो २०३१ तक शहरी आबादी और बढ़ेगी। संयुक्त राष्ट्र की मौजूदा रिपोर्ट के अनुसार, अगले बीस साल में हमारे यहां बढ़ते शहरों में आधारभूत संरचना मुहैया कराने के लिए ८२७ अरब डॉलर का निवेश करना होगा। पर यदि स्मार्ट सिटी योजना लागू हुई, तो और अधिक निवेश की जरूरत पड़ेगी।
विकास के जिस तरीके को हमने स्वीकार किया है, उसमें शहरीकरण को ही विकास का आधार माना गया है। गांधी जी ने हिंद स्वराज में ग्रामीण सभ्यता को बढ़ावा देने का खाका पेश किया था, जिसके मुताबिक गांवों को स्वावलंबी और स्वच्छ बनाया जाना था। पर आजादी के बाद की सरकारों ने इस तरफ ध्यान नहीं दिया। विकास की जो योजनाएं बनीं, उसके केंद्र में शहर रहे। नतीजतन कृषि आधारित रोजगार कम होता गया और ग्रामीण आबादी का शहरों की ओर पलायन बढ़ा। इससे शहरों पर दबाव बढ़ा और बड़ी आबादी को झुग्गी-झोपड़ियों में नारकीय जीवन जीने के लिए विवश होना पड़ा।
संयुक्त राष्ट्र ने बहुत पहले महानगर नाम से एक पुस्तिका छापी थी, जो बताती थी कि आबादी की बदहाली महानगरों में ज्यादा है। शहरों में बेशक सहूलियतें गांवों की तुलना में ज्यादा हैं, पर स्वास्थ्य की दृष्टि से यह जीवन ठीक नहीं। उस पुस्तिका के मुताबिक, मैक्सिको सिटी, शिकागो, नाइजर और मुंबई जैसे शहरों में बड़ी आबादी गरीबी रेखा से नीचे अस्वास्थ्यकर माहौल में जिंदगी गुजारने को मजबूर है। भारतीय नगरीकरण पर संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट भी बताती है कि २०५० तक भारत में मृत्यु दर में बढ़ोतरी होगी, जिसका बड़ा कारण शहरी वायु प्रदूषण होगा। दरअसल बढ़ते शहरीकरण के चलते पर्यावरण असंतुलन बढ़ा है। शहरों के बाहरी इलाकों में विस्तार हो रहा है। यह विकास अनियोजित तरीके से तो हो ही रहा है, इसमें शहरी मापदंडों और नियमों का उल्लंघन भी हो रहा है। इसी कारण शहरी आबादी के बड़े हिस्से को संसाधनों की भारी कमी का सामना करना पड़ता है। सवाल यह है कि क्या हमारी सरकारें इस अनियोजित विकास पर पुनर्विचार करेंगी। जनता तो खैर जब तक जागरूक होगी, तब तक शहरीकरण की चमक में वह बहुत कुछ खो चुकी होगी।
वर्ष २०५० तक भारत में मृत्यु दर में बढ़ोतरी का बड़ा कारण शहरी वायु प्रदूषण होगा।
उमेश चतुर्वेदी
परिदृश्य

बुधवार, 24 सितंबर 2014

कड़ै सै बिल्ली ?

आंधी दौड़ 
रमलू एक दिन जाल कै तलै टूटी सी खाट  पै लोट्या लोट्या सोचण लागरया अक जमाना कड़े का कड़ै जा लिया - रोहतक की कालोनी देखी सैं रमलू नै जड़ै लोग भेडयां की ढाल रेवड़ के रेवड़ रहवैं सैं कोठरियां मैं ।  सारे रिश्ते नाते बेर ना बचे बी सैं अक नहीं ? समाज के बंधन गलत सही सब टूटते जावण लागरे सैं । अर नए कितै दीखते ना । काम के नै मानसां की कड़ तोड़ कै धरदी । सारी हाणां भाजले भाजले  लागी रैह सै । गाम मैं औरत सारे खेत के अर घर के काम तै करया ए करया करती , बुळधाँ का अर बैल गाड्डी का काम मर्द माणस करया करते । बैल  जरूरत थी तो गऊ बी  माता थी म्हारी । यो ट्रैक्टर ईसा आया इसनै बुलध पढ़न बिठा दिया । गऊ की जरूरत कम करवा दी । माता की जगां खोस ली ट्रैक्टर महाराज नै । बैल गाड्डी की जागां झोटा बुग्गी आगी ।अर या भी औरतां  कै बांटै आगी । लोग तो बैठे ताश खेलें जावैं सैं । 
                                        जिसनै देखो वोही गाम छोड़ कै शहर कांही थोबड़ा ठाएँ भाज्या जावण लागरया सै ।  खेती मैं मन लगता ना अर जै कोए मन ला कै बी काम करो तै गुजारा होंता ना । खेती आली धरती बिकन लागरी सैं । एन सी आर नै दिल्ली के गामां की ढालां नौ दस जिले तो  जीम लिए बाकी बी सहज सहज जीम  ज्यागा ।  सड़क चौड़ी होगी फ्लाई ओवर बनगे , टैक्स टोल आगे । छोटे मोटे कारखाने चिमकैं सै कितै कितै सड़कां के साहरे । पहलम फेर  माणस थ्यावास की जिंदगी जीवैं थे । ईब तै बेरा ए ना कद के होज्या । बिन पैंदे का लौटा बणग्या माणस । अंध विस्वाश टूटण की जागां और मजबूत होंते जान  लागरे सैं । न्याय तो कई कई कोस ताहीं कितै बी नहीं दीखता । मुठ्ठी भर लोग सैं जो राजपाट के ठाठ लूटरे सैं । चाहे राज किसे का हो । 
उन ताहिं खास प्रिविलेज सैं बाकी जनता जाओ चाहे भाड़ मैं । व्यापार धोखाधड़ी मैं बदलता जावण लागरया सै ।प्रतिस्पर्धा दुश्मनी मैं बदलगी । तलवार की जागां सोने नै ले ली । काले धन का औड़ नहीं । बिदेशां मैं जमा कराओ फेर भारत मैं ल्यावण का सांग करो । इसतैं  अच्छा  इसके पैदा होवण पै रोक क्यूँ ना लागै ? 
                            औरत की कोए कदर नहीं छोड़डी । वा मंडी का माल बना कै छोड़ दी । वा बस भोग की वस्तु  बना दी अर बाजार बीच लया खड़ी करी । वा बी माणस सै , वा बी इंसान सै ,इस ढाल की सोच का मानस छिद्दा ए पावैगा । वैश्यावृत्ति  अपने पूरे उफान पै सै । भरम और अराजकता चारों कांही दीखैं सैं । इसे माहौल मैं भी लोग अंतोल्या मुनाफा कमावण तैं बाज नहीं आंते । करोड़ पति तैं रातों रात अरबपति बणण के सपने देखैं सैं । भीम काय मशीनां नै अर उन्नत तकनीक नै कुछ मुठ्ठी भर लोग तै माला माल कर दिए अर लोक जन गुलाम बना दिया । 
                       रमलू नै सोच्या न्यून क्यूकर काम चालैगा ? या अंधी गली की दौड़ मानस नै किट पहोंचावैगी । सोच सोच कै उसका सिर पाट्टण नै होग्या । रमलू तो बेचारा अनपढ़ पाली सै । रै पढ़े लिख्यो तम बी तै सोचो किमैं ? तमनै कति ए सोचना बंद कर दिया । कमरे मैं कबूतर बैठ्या हो अर बिल्ली आज्या तो कबूतर आँख बंद करकै सोच्या करै एक कड़ै सै बिल्ली ?  

गाम की इज्ज़त --घूँघट


गाम की इज्ज़त --घूँघट 
ठमलू रमलू और कमलू  बैठक मैं बैठ कै बात फोडण लागरे थे । इतने मैं रमलू  का छोरा भाज्या भाज्या आया अर बोल्या - बाबू बाबू चाल मेरी माँ बुलावै सै । राशन कार्ड आले आरे सैं । वे फोटू खींचैगे सबका कठ्ठा । रमलू उसकी साथ चला गया । कमलू बोल्या - देख लिया जोरू का गुलाम । फोटो खिंचवावैगा सारे कुनबे का । बहु बी उड़ै ए अर सुसरा बी उड़ै ए । घूँघट तार  कै , नँगी होकै , बड़े बडेरयां कै साहमी फोटू ?गाम मैं रहणा सैहना कुछ ना भाई । बिना घूंघट किसी बहु ? घूंघट तै लिहाज शर्म खातर होसै । पर बेरा  ना आज काल के बालकां कै के होरया सै ? बेशर्मी की बी कोए हद होसै ? न्यूँ बहु छाती दिखान्ती हांडै या के बर्दास्त होवण  की बात मार मार सै ? ठमलू बी कमलू की भकायी मैं आग्या अर दोनूँ लठ ठा ठा कै भाज लिये  चौपाड़ कान्ही । और बी कई माणस जेली अर गंडासे ठा ठा कै उनकी साथ भाज लिए।   बूझी बी अक रै के बात होई ? कमलू  बोल्या - रै गाम की इज्जत का मसला सै । बस बूझो मतना । तीस चालीस लोग उनकी गेल्याँ होगे । ल ठ , जेली अर गंडासे लोगां  के   हाथां मैं देख कै फोटो खींचनिया तै दो ए सैकिण्ड मैं रफू चक्कर होगे उड़े तैं । ठमलू अर कमलू नै गाम की इज्जत बचा ए ली आखिर मैं । रमलू नै बूझ्या अक यो गाम की इज्जत  का रोला म्हारे कुनबे की फोटो गेल्याँ क्यूकर  चिपग्या ? कमलू नै घूंघट के फेर गुणगान  दिए । 
रमलू बोल्या - जिब उड़ै खेताँ मैं लुगाईयां गेल्याँ बलात्कार हों जिब गाम की इज्जत कड़ै जाया करै ?
जिब ओटड़े कूद कै बदमाश म्हारे घर मैं बड़ज्याँ अर बद फेली करैं अर घर का माणस विरोध करै तो मार मार कै  उसनै वे बदमाश ना जीण मैं छोड़ड़ैं ना मरण मैं , जिब गाम की इज्जत कड़ै चाळी जा सै ? 
जिब गाम के छोरे दारू पी कै अर स्मैक चढ़ा कै बीरबानियां नै जँगल होकै आवण की बी मुश्किल करदें सैं , जिब गाम की इज्जत कड़ै जा सै ?
जिब गाम के चौधरी अर कुबधि लोग बिजली के सीधे तार फिट करकै बिजली की चोरी करैं सैं तो गाम की इज्जत कित जा सै ?
अर रही घूंघट की बात । तै भाई इज्जत का अर घूंघट का कोए मेल कोण्या । जिन कौमाँ मैं औरत घूंघट नहीं करदी उनकै के इज्जत कोन्या ? अर जो घूंघट तै गोड्यां ताहीं का करले अर घणी भैड़ी बोलै वा बात सही ? मैं थारी बात कोन्या मानूं । औरतां नै दाब कै राखण खातर इस घूंघट का साहरा लिया जा सै । जै या बात ना हो अर मान सम्मान का ए मसला हो तै फेर छोरियाँ नै बी घूंघट करना चाहिए । घूंघट आज्ञाकारिता का , शुद्ध चरित्र का ,औरत की पवित्रता का , उसकी शालीनता का बड़ी चतुराई तैं एक सामाजिक पैमाना बना दिया । असल मैं घर के , गाम के (पंचायत के ) , हल्के के , प्रदेश के अर देश के जरूरी फैंसले करण  मैं औरत शामिल ना हो पावै , इस खातर यो सब प्रपंच रच राख्या सै । ज्ञान प्राप्त पांच इन्द्रियाँ तैं प्राप्त करया जा सकै सै -आँख तै देख कै , कान तैं सुण कै , नाक तैं सूंघ कै , जीभ तैं चाट कै , अर हाथ तैं छू कै । इनमें तैं चार इंद्री घूंघट मैं घोंट दी । ज्ञान कैसे प्राप्त करै ? कितनी बड्डी साजिश ?? आई किमैं समझ मैं कमलू ठमलू ? जै औरतां नै आगै बढ़ना सै तो घूंघट तो तार कै फेंकना ए पड़ैगा । ठमलू बोल्या - रै ओ रमलू सुनिये एक बै । तूँ  उन ज्ञान विज्ञान आल्यां मैं तो नहीं जावण लॉग लिया सै ? वे ए इसी उल्टी सीधी बात सीखावैं सैं औरतां नैं । उनकी गेल्याँ बी कदे दो दो हाथ होना पड़ैगा । रमलू बोल्या - साच्ची कैहदी तै जणू आंख्यां मैं आंगली दे दी । 
रणबीर सिंह 
24. 9. 2014 

        

बुधवार, 17 सितंबर 2014

बांटने वाली राजनीति के दो हथियार :नफरत फैलाने वाली भाषा और पितृसत्तात्मक मूल्य

लोकसंघर्ष !


Posted: 16 Sep 2014 08:37 AM PDT
पिछले आम चुनाव में विजय हासिल करने के बाद से भाजपा का चुनावी मुकाबलों में प्रदर्शन बहुत अच्छा नहीं रहा है। आम चुनाव के बाद हुये उपचुनावों में पार्टी को करारी मात खानी पड़ी है। बिहार में भाजपा को परास्त करने में लालू.नीतीश मॉडल काम आया। उत्तरप्रदेश में उपचुनाव में क्या इस मॉडल को राज्य की राजनैतिक पार्टियां अपना सकीं हैंए यह प्रश्न अभी अनुत्तरित है। भाजपा ने उत्तरप्रदेश में चुनावी विजय हासिल करने के लिए अपने पुराने हथियार.विभाजनकारी राजनीति.का जमकर इस्तेमाल किया। योगी आदित्यनाथ जहर उगलते पूरे प्रदेश में घूमे। इसके साथ हीए 'लव जिहाद' के नाम पर ढ़ेर सारी अफवाहें और झूठ फैलाये गये।
भाजपा की विभाजनकारी राजनीति के इस सीजन की शुरूआत, लोकसभा में योगी आदित्यनाथ के भड़काऊ भाषण से हुई। उन्होंने अपने भाषण में सांप्रदायिक दंगों के लिए मुसलमानों और केवल मुसलमानों को दोषी ठहराया। आगे भी वे इसी तर्ज पर बातें करते रहे। उन्होंने इस आशय के निराधार आरोप लगाये कि जिस इलाके में मुसलमानों की आबादी जितनी ज्यादा होती है वहां उतना ही तनाव और हिंसा होती है। उन्होंने कहा कि मुसलमान, हिंसा की शुरूआत करते हैं और बाद में इसका फल भी भोगते हैं। भारत में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं की व्यापक जांचें और विश्लेषण हुये हैं और इनके नतीजे, योगी आदित्यनाथ के आरोपों को झुठलाते हैं। लव जिहाद की तरफ इशारा करते हुए आदित्यनाथ ने कहा कि अगर 'वे एक हिंदू लड़की को मुसलमान बनायेंगे तो हम सौ मुस्लिम लड़कियों को हिंदू बनायेंगे।' योगी आदित्यनाथ लगातार नफरत फैलाने वाली बातें कह रहे हैं और यह तब, जबकि प्रधानमंत्री ने यह कहा है कि देश में हिंसा पर 10 साल तक पूर्ण रोक लगनी चाहिए।
आरएसएस.भाजपा गठबंधन को मानो लव जिहाद के नाम पर सोने की खान हाथ लग गई है। लव जिहाद को मुद्दा बनाने से उन्हें दोहरा लाभ हुआ है। जब वे यह कहते हैं कि मुस्लिम लड़कों को हिंदू लड़कियों को प्रेम जाल में फंसाने के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है तो एक ओर वे मुसलमानों का दानवीकरण करते हैं तो दूसरी ओर महिलाओं और लड़कियों के जीवन पर उनका नियंत्रण और कड़ा होता है। इस प्रचार में यह निहित है कि हिंदू महिलाओं को आसानी से बहलाया.फुसलाया जा सकता है और वे अपनी जिंदगी के बारे में सही निर्णय लेने में सक्षम नहीं हैं। इस तरह,सांप्रदायिक राजनीति के एजेण्डे के दो लक्ष्य एक साथ पूरे होते हैं। सांप्रदायिक राजनीतिए धार्मिक अल्पसंख्यकों को समाज के हाशिये पर पटकना चाहती है और साथ में समाज में महिलाओं के अधिकारों और उनकी स्वतंत्रताओं पर रोक लगाना भी उसके एजेण्डे में रहता है।
भाजपा और उसके साथी लव जिहाद का न सिर्फ भाषणों और वक्तव्यों के जरिये विरोध कर रहे हैं वरन् उन्होंने लव जिहाद का 'मुकाबला' करने के लिए मोर्चे बनाने भी शुरू कर दिये हैं। ऐसा ही एक मोर्चा मेरठ में गठित किया गया है और अन्य शहरों में भी इस तरह के संगठन बनाये जाने की चर्चा है। विहिप ने इस मुद्दे पर मोर्चा संभाल लिया है। विहिप का कहना है कि 'लव जिहाद के विरूद्ध हमारी लड़ाई का देशभक्त समर्थन करेंगे क्योंकि यह देश को एक दूसरे विभाजन की ओर ले जा रहा है।'संघ परिवार से जुड़ा एक अन्य संगठन धर्म जागरण मंच अचानक सक्रिय हो गया है और उसने एक अभियान चलाकर हिंदुओं से लव जिहाद के'खतरे' से लड़ने की अपील की है।
जहां तक लव जिहाद के जरिये हिंदू लड़कियों को मुसलमान बनाने के आरोप का संबंध है इसमें कोई दम नहीं है। मेरे एक मित्र, जो उत्तरप्रदेश में रहते हैंए ने बताया कि वे वहां लड़कियों के एक कालेज में किसी विषय पर भाषण देने गये थे। वहां पर उन्हें कालेज के एक युवा शिक्षक ने.जो हिंदू लड़कियों की रक्षा के लिए कटिबद्ध थे.बताया कि उनके इलाके में 6,000 से अधिक लड़कियां मुसलमान बन गई हैं। परंतु जब उनसे यह कहा गया कि वे उनमें से कम से कम 60 के नाम दे दें तो वे पीछे हट गये। उन्होंने कहा कि ये बात उनने सुनी थीं और इसलिए सच होंगी!
लव जिहाद के षड़यंत्र के संबंध में 15 रूपये कीमत की एक पुस्तिका भी जगह.जगह दिखलाई दे रही है। इस पुस्तिका का शीर्षक है 'हमारी महिलाओं को लव जिहाद के आतंकवाद से कैसे बचायें?'इसमें लव जिहाद के कुछ तथाकथित मामलों का वर्णन किया गया है। सभी विवरण लगभग एक से हैं। कोई मुस्लिम पुरूष स्वयं को हिंदू बताकर किसी हिंदू लड़की से प्रेम संबंध स्थापित कर लेता है। पुस्तिका में यह दावा किया गया है कि शादी हो जाने के बादए लड़कियों पर इस्लाम कुबूल करने का दबाव डाला जाता है। ऐसी लड़कियों को 'मुक्त' कराये जाने की जरूरत है।
लव जिहाद के मुद्दे पर कई बातें कही जा रही हैं परंतु इनमे से दो महत्वपूर्ण हैं। कई विश्लेषकों ने मोदी की राजनीति की तुलना हिटलर की राजनीति से की है। हिटलर ने भी जर्मनी के नागरिकों को यहूदियों का शत्रु बनाने के लिए इसी तरह की रणनीति का इस्तेमाल किया था। यहूदियों को 'आतंरिक शत्रु' बताया जाता था। हिटलर की प्रचार मशीनरी यह कहती थी कि युवा यहूदी पुरूष, जर्मन लड़कियों को बहला.फुसलाकर आर्य नस्ल की शुद्धता को प्रदूषित कर रहे हैं और उनका उद्देश्य जर्मन राष्ट्र को गुलाम बनाना है।
भारत में आर्यसमाज और हिंदू महासभा ने सन् 1920 के दशक में इसी तरह की रणनीति अपनाई थी। उस समय भी इन संस्थाओं ने हिंदू महिलाओं के सम्मान को बचाने का आह्वान करते हुए पर्चे निकाले थे जिनमें से एक का शीर्षक था 'हिन्दू औरतों की लूट'। इस दुष्प्रचार का इस्तेमाल समाज को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत करने के लिए किया गया था।
क्या इस दुष्प्रचार का मुकाबला करने का कोई तरीका है? एक खबर यह है कि लव जिहाद के धुआंधार प्रचार में घिरे कुछ इलाकों के मुस्लिम युवकों ने सद्भाव का वातावरण निर्मित करने के लिए शांतिमार्च निकालने का निर्णय किया है। हमें उम्मीद है कि ऐसे ढे़र सारे मार्च निकाले जायेंगे और हमारे समाज को उस पागलपन से बचाया जायेगा जिस ओर उसे ढकेला जा रहा है।
-राम पुनियानी

मंगलवार, 16 सितंबर 2014

मुख्य मंत्री बणन का नुस्खा

मुख्य मंत्री बणन का नुस्खा
             एक बै दो मंत्री चर्चा करण लागरे थे अक चीफ मिनिस्टर क्यूकर बण्या जा ? पहला बोल्या -इस बात का डाँ ना ठावै । भीतां कै भी कान हों सैं । जै मुख्य मंत्री नै बेरा  लाग ग्या तो या झंडी आली कार बी जांदी रैहगी । दूसरा बोल्या - मुख्य मंत्री नै क्यूकर बेरा लागैगा ? पहला बोल्या -के बेर इस साइंस का ? जिब रिमोट कंट्रोल तैं माणस मारया जा सकै सै तो रिमोट कंट्रोल तैं म्हारी बात क्यूँ नहीं सुनी जा सकदी ? दूसरा बोल्या - बात तो सही सै पर के सारे हरयाणा मैं रिमोट कंट्रोल फिट कर राखे होंगे ? आपाँ इंद्री के रैस्ट हॉउस मैं चाल कै बात करांगे ? दूसरा बोल्या - सारा सरकारी स्टाफ छोड़ दयां सां अर सरकारी कार बी छोड़ दयांगे फेर म्हारी बात क्यूकर लीक होज्यागी ? अर आपाँ लोटै नून  गेरल्यां सां अक इन बाताँ का किसे तीसरे आगै जिकरा नहीं करांगे ।
      पहला बोल्या - फेर सिक्योरटी का मामला आज्यागा । दोनूं भोत घने लाचार हुए । पेट पाट्टण नै होरया अर बात नहीं कर सकदे । आच्छे साके होए करै  तो के करैं ?माहौल गरमारया सै बेरा  ना कद महं कै कोए दा मारज्या अर या चीफमिनिस्टर सिप फेर कानां धोरे कै लिकड़ज्यागी । दोनों कोठी के बाहरले बगड़ मैं आगे । उसतैं पहलम सारे लत्ते बी बदले । सोची कदे लतयां मैं किमैं धर ना राख्या हो । बगड़ मैं बी देख्या कोए ट्रांसमीटर तो फिट नहीं कर राख्या सै । पहला मंत्री बोल्या-एक बै मुख्यमंत्री रंगीले मूड मैं बैठ्या था । मनै बख्त बिचार कै बूझ लिया -साहब जी के कारण सै अक धरती चाहे न्यून तैं न्यून होज्या फेर मुख्यमंत्री आपै बणो  सो ?लोग न्यूँ कहवैं सैं थारा पत्ता कटण आला सै । मनै तो 50 करोड़ की  शर्त ला ली अक म्हारे मुख्यमंत्री जी का पत्ता कोनी  सकदा । ।बस फर के था साहब  फैलग्या अर मेरे ताहिं सारे दा पेच समझावण लाग्या । नयों बोल्या अक ये बाल घाम मैं ओएं थोड़े काले कर राखे सैं । एक खास नुस्खा तयार करया सै जिसका पेटैंट बस मेरे धोरै सै ज्याहें करकै हिर  फिर कै मैं ए  चीफ मिनिस्टर बनूँ सूँ । इसतैं  बढ़िया नुस्खे आला ए मेरै धोबी पिच्छाड़ मार सकै सै । झोंक झोंक मैं बताग्या नुस्खा अर मैं तो अपने दिल पै लिखता चाल्या गया । फेर बाद मैं उसकै समझ मैं आई  अक हो तो गलती गयी अर मेरे पाँ पकड़ कै नयों बोल्या - लागदार मेरे  जींवते जी इस नुस्खे नै अजमा कै मतना  देखिये । मनै सैड दे सी राम की सों खाई अक आप के रहंते किस की  मजाल जो मुख्यमंत्री बणन की सोचै । फेर भाई मनै इबकै यो नुस्खा आजमा कै जरूर देखणा सै । पहला मंत्री एकै साँस मैं इतनी बात कैहग्या ।            दूसरा मंत्री बोल्या- तों साठ तैं उप्पर जा लिया अर मेरी तो इबै चालीस बर्ष की ए उम्र सै । मैं तो इबै सबर कर ल्यूँगा । फेर ओ नुस्खा तो बता कितै कोए ऊक चूक होगी तो नुस्खा तेरी ए गेल्याँ दफ़न होज्यागा । मुख्यमंत्री तो तोयें बणिये पर एकाध साथी बी तो चाहिएगा । पहला मंत्री बोल्या-तनै बता कै मैं  अपणे पाहयाँ पै कुल्हाड़ी क्यूँ मारूँ ? दूसरा बोल्या- जै तेरै इब हार्ट अटैक होज्या तो गया ना नुस्खा तेरी गेल्याँ । तेरे बालकां नै धरती भिड़ी होज्यागी । मैं तो तेरा  आगे का राह बाँधूँ सूँ । पहला मंत्री नुस्खा बतावन लाग्या --
                               दस तोले सही सही तोल कै चोरबाजारी के बीज होणे चाहियें । पांच तोले खुदगर्जी की जड़ हों । छह तोले रिश्वतखोरी के पत्ते हों । तीस तोले कोरी गपशप हों । इन सबनै मोमजस्ते मैं गैर कै खूब बारीक करकै अर इसमैं पांच दगा की भस्म मिलादी जा । इस ढालाँ यूं कुल छप्पन तोले माल बणग्या । चार तोले की एक पुड़िया बनाकै तैयार करली जा  । पांच तोले बुजदिली ,  चार तोले फूल खुसामद ,तीन तोले बेकूफी के पत्ते कूट करकै अर कपड़  छान करकै ,पार्टी बाजी के पाणी मैं तीन मिहने भिगोई जां । अर फेर आच्छी ढाल इसकी चटनी बनाई जा । या चटनी बनगी  चौदा तोले । पन्द्रा तोले अंधेरगर्दी  की खाल हो पर निखालिस हिन्दुस्तानी , 50 तोले छान करकै ,लूट के पाणी मैं काढ़ा लेकै इनकी दो दो तोले की गोली बना  ली जावैं । बस नुस्खा तैयार सै ।
                                 इनके सेवन  का तरीका बी खास सै अर अपणे ए ढंग का सै । यो बी याद राखणा बहोत जरूरी सै । इन गोलियां का इस्तेमाल छब्बीस जनवरी अर पन्दरा अगस्त नै तो करया ए करया जा । दूसरा बोल्या-गोली गर्म पाणी गेल्याँ खानी अंक सीले पाणी गेल्याँ ?
पहला बोल्या- इतना अधीर क्यूँ होरया सै ? ठगी का पाईया शर्बत लेकै अर सबकी  आँख बचाकै दो गोली खानी पड़ेंगी ।
                  दूसरा बोल्या- नुस्खा तो घणा मारके का सै पर अष्टा बहोत लागै सै । पहला बोल्या - अष्टा क्यूकर ? ये सारी चीज तो थोक मैं मिलैं सैं बस रोळा तो इनके अनुपात का अर सही मौके का सै । दूसरा बोल्या-इसके खाएं तैं बेड़ा पार होज्यागा ? पहला बोल्या -अधम बिचाळै मतना टोकै । सेवन विधि पूरी हो लेण दे । बीच मैं भूलग्या तो नाश हो ज्यागा । दूसरा चुपचाप पहले की बात ध्यान तैं सुणन लाग्या । पहला-सेवन करण खातर राज घाट पै जाणा होगा अर मौसम देख कै एक की समाधी पै माथा टेकना पड़ैगा । उस समाधी के सात चक्कर काट कै मन-मन मैं दिल्ली की कुर्सी पै बैठे मानस की जय सात बरियां बोलणी पड़ैगी । गोली खाकै प्रेम तैं शीश झुकाना पड़ैगा ।
                दूसरा बोल्या- इब मेरै पक्की जचगी तों मुख्यमंत्री जरूर बनैगा । कति मुँह ज़ुबानी घोटरया सै नुस्खा । मेरै तो आच्छी ढालाँ याद बी कोन्या हुया । मनै लिखवा दे ।
                   पहला बोल्या -इबै नहीं भाई । लिखवाऊंगा मुख्यमंत्री बने पाच्छै ।
 रणबीर सिंह




रविवार, 14 सितंबर 2014

AISA KYON

---आपकी ज़िन्दगी बस यूँ ही नहीं घट जाती. चाहे आप जानते हों या नहीं ये आपही के द्वारा डिजाईन की जाती है. आखिरकार आप ही अपने विकल्प चुनते हैं. आप खुशियाँ चुनते हैं . आप दुःख चुनते हैं.आप निश्चितता चुनते हैं. आप अपनी अनिश्चितता चुनते हैं.आप अपनी सफलता चुनते हैं. आप अपनी असफलता चुनते हैं.आप साहस चुनते हैं.आप डर चुनते हैं.इतना याद रखिये कि हर एक क्षणहर एक परिस्थिति आपको एक नया विकल्प देती है.और ऐसे में आपके पास हमेशा ये अपॉरचुनिटी  होती है कि आप चीजों को अलग तेरीके से करें और अपने लिए और पोजिटिव रिजल्ट प्रॉड्यूस  करें. ---
मगर एक बात साथ और भी है की ऐसे बहुत कम लोग होते हैं जो ऐसा कर पाते  हैं ?? क्या बाकि करना नहीं चाहते या और गहरी बातें हैं इसके पीछे । 

रविवार, 7 सितंबर 2014

तोहफे



हरयाणा में एक तरफ  तो विकास के लम्बे चौड़े दावे  किये जा रहे हैं परन्तु दूसरी और रोजगार ,शिक्षा -स्वास्थ्य , आवास ,भोजन   बुनियादी जरूरतों  से वंचित आदमी की दशा बद से बदतर होती जा रही है । जिंदगी  की सभी जरूरी चीजों की कमर तोड़ मंहगाई से उसका जीना दूभर हो गया है । जन मोर्चों ने लम्बे संघर्षों से नरेगा , खाद्य सुरक्षा अधिकार , शिक्षा अधिकार  जैसे जो कानून बनवाए हैं आज  उन पर खतरा मंडरा रहा है । सब्सिडी  खैरात के रूप में प्रचारित करके अनाज , खाद , बीज , डीजल , गैस आदि  पर से सरकार खर्चा घटा रही है । लेकिन बड़े पूंजीपतियों और विदेशी कंपनियों को पहले मनमोहन सरकार और अब मोदी सरकार लाखों करोड़ रूपये की रियायतों के तोहफे दे रही  है.  




पंडित नेकी राम शर्मा

स्वतंत्रता सेनानी पंडित नेकी राम शर्मा  के जनम दिन के मौके पर
कुलभूषण आर्य भिवानी

टेक : जाति  बाहर गेरया था वो पंडित  नेकीराम सुण्या होगा रै ।
         जित रहया करैं थे वो भी केलंगा गाम सुण्या होगा रै ।
                  7 सितम्बर 1887 मैं एक अच्छी घड़ी आई थी
                  पांच भाइयों मैं चौथे नंबर पर जगह पाई थी
                  पढ़ लिख कर पंडित बणज्या दादा नै इच्छा जताई थी
                  सीतापुर और बनारस के म्हां शुरू  करी पढ़ाई थी
           समय हो बलवान न्यूँ  सब पर कहते सुण्या होगा रै ।
                   किसानों की देख हालत चिंता गहरी जताई थी
                   9 जनवरी सन 1929 को अलखपुरा मैं किसान सभा बनाई थी
                   लालपत राय और नेकीराम नै कठ्ठे हो सलाह मिलाई थी
                   आजादी पावण  की खातर संघर्ष की राह बताई थी
           15 नवम्बर 1929  गढ़ी मैं आये मदन मोहन मालवीय नाम सुण्या होगा रै ।
                    बेगार प्रथा हो खत्म न्यूँ योजना पूरी बनाई थी
                    16 गॉवों की हो जनता कठ्ठी करी शुरू लड़ाई थी
                    सिवाना,जीतपुरा , सिकंदरपुर , गढ़ी , हजारी खेड़ी आई थी
                    अलखपुरा -मेहन्दा -कूंगड़ -बड़सी और दुर्जनपुर   नै मिल करी चढ़ाई थी
           आगै होकै लिया भाग वो जालिम स्कीनर सुण्या होगा रै ।
                    5 दिसंबर 1940 को जवाहर चौंक मैं चिंगारी एक सुलगाई थी
                     सुण  भाषण नेकीराम का अंगरेजी सरकार थर्राई थी
                     चाँद नारायण ए डी एम  की अदालत मैं कड़ी सजा सुनायी थी
                     पंडित जी ना घबराया भाई कसम आजादी की खाई थी
            रास्ते से नां भटकने वाला वीर नेकीराम सुण्या होगा रै ।
                      के के बतावां पंडित   या  घणी  बड़ी कहानी सै
                       समझे  कोन्या अच्छी तरियां या म्हारी नादानी सै
                       इब बी ले समझ तो जा बण बात या लम्बी जिंदगानी सै
                        पंडित जी की बात कुलभूषण जन जन तक पहुँचानी सै
            लडैगा  वह जीतैगा यूं पंडित जी का पैगाम सुण्या होगा रै ।  
स्वतंत्रता सेनानी पंडित नेकीराम शर्मा के जन्म दिवस के मौके पर 
                                 सेमिनार 
आज का  किसान आंदोलन और  चुनौतियाँ 

 स्वतंत्रता सेनानी पंडित नेकीराम शर्मा के जन्म दिवस के मौके पर सेमिनार  में डाक्टर रणबीर सिंह दहिया , कॉमरेड इंदरजीत सिंह , भूतपूर्व एम एल ए  चौधरी बलबीर सिंह ग्रेवाल ,महेश शर्मा जी ग्राण्ड सन ऑफ पंडित नेकी राम शर्मा जी , बलबीर शर्मा जी दामाद , मैडम उर्मिल शर्मा पौती , मैडम पुष्पा शर्मा प्रिंसिपल -पौती , बृजेश कुमार एडवोकेट सुप्रीम कोर्ट - पौता चौधरी लाजपत राय व अन्य गण मान्य व्यक्तियों और महिलाओं ने हिस्सेदारी की और उनके संघर्षशील जीवन के विभिन पक्षों पर प्रकाश डालते हुए उनको याद किया । 7 सितम्बर 1887 को केलंगा गाँव में उनका जनम हुआ । वे  फ्रीडम फाइटर थे और समाज सुधारक थे ॥ बेजोड़ विवाह , छुआ छूत , जाति प्रथा  ,विधवाओं की दुर्दशा , पर्दा प्रथा , बाल विवाह , ब्याह शादियों  फिजूल खर्ची जैसी कुरीतियों के खिलाफ गाँव गॉंव जाकर जनता को लामबंद किया । होम रूल आंदोलन 1916 से 18 में उनका नाम हमेशा याद किया जायेगा । उन्होंने अंग्रेजों का डट कर विरोध किया । कुल मिलाकर 9 बार गिरफ्तार किया गया उनको । 2200 दिन पंजाब की जेलों में रहे । 250 दिन  कठोर कारावास के हैं । किसान सभा का गठन किया और संघर्ष किया । जून 1956 में हमारा साथ छोड़ गए । 

गुरुवार, 4 सितंबर 2014

आलोचनात्मक प्रश्न उठाना-सार्वभौमिक या पाश्चात्य?


भाग-तीन
आलोचनात्मक प्रश्न उठाना-सार्वभौमिक या पाश्चात्य?
जैसे ही ‘वैज्ञानिक मानसिकता पर कथन’ (स्स्ञ्ज) जारी हुआ, विभिन्न क्षेत्रों से इसकी तीखी आलोचना शुरू हुई। एक दिशा की आलोचना स्वयं को ‘राष्ट्रभक्त और जनपक्षीय विज्ञान व तकनीकी (क्कक्कस्ञ्ज)’ कहने वालों की ओर से आई। इनके अनुसार यह भारत में ‘पाश्चात्य विज्ञान’ की संकलना लागू करने की कोशिश है। स्वभाविक है पीपीएसटी ने यह कहते हुए कि यह तो ‘पाश्चात्य संकल्पना’ है, ऐसी विज्ञान विधि की संकल्पना का विरोध करना ही था जो सार्वभौमिक है।
हमारा यह मानना है कि ऐसा करके पीपीएसटी की आलोचना इस बात से इनकार करती है जो आलोचनात्मक प्रश्न उठाने पदार्थवाद, अंधविश्वास और रूढि़वाद के खिलाफ पिछले इतिहास में हमारे प्रयास रहे हैं। इस परम्परा में प्राकृतिक विज्ञानों, गणित, राजनीति जैसे लोकायत, चरक, आर्यभट्ट, पी.सी.रे., फुले, पेरियार, अम्बेडकर, नेहरू और भगत सिंह जैसी धर्मनिरपेक्ष धाराएं एवं गौतम बुद्ध जैसे जनतांत्रिक धार्मिक सुधार, भक्ति और सूफी परम्परा से लेकर राजा राम मोहन राय, विवेकानंद, श्री नारायण गुरु व गांधी जी तक की धाराएं भी शामिल हैं। स्वयं में आलोचनात्मक सोच होना और अंधविश्वासों के विरुद्ध लडऩा, समानता के लिए कटिबद्ध होना केवल लोकायत जैसे पदार्थवादी विचार की देन ही नहीं है अपितु स्वामी विवेकानन्द जैसे आदर्शवादी विचारकों की भी देन है। यहां इन परम्पराओं के कुछ उदाहरण दिए गए हैं:
गौतमबुद्ध
किसी बात पर केवल इसीलिए विश्वास न करो कि आपने ऐसा सुना है। केवल इसलिए भी विश्वास न करो कि बहुत से ऐसा कहते हैं। विश्वास इसलिए भी न करो कि ऐसा हमारे धार्मिक ग्रंथों में लिखा हुआ है। इसलिए भी विश्वास न करो कि हमारे सम्मानित बड़े एवं गुरू कह रहे हैं। सदियों से चली आ रही परम्पराओं के नाते भी विश्वास न करो। परीक्षण व विश्लेषण के बाद जब आपको लगे कि वह बात तर्क-विवेक पर खरी है और यह सभी के हित में है, तभी इसे मानो और इस पर चलो।
विवेकानंद
ज्योतिष एवं इस प्रकार की रहस्यवादी बातें कमजोर दिमाग की निशानियां हैं। इसलिए जैसे ही ये हमारे दिमाग को जकडऩे लगें, हम चिकित्सक को दिखाएं, अच्छा भोजन लें और आराम करें।
अंधविश्वास हमारा बड़ा शत्रु है और धोखेबाजी तो इससे भी बड़ा। 
जब अंधविश्वास प्रवेश करता है तो दिमाग निकल जाता है। 
आँख मूंद कर विश्वास करने का अर्थ है मानवी आत्मा का विघटन होना। चाहे तुम नास्तिक बन जाओ परंतु बिना प्रश्न  उठाए किसी बात पर विश्वास मत करो।
भगत सिंह
हर व्यक्ति जो प्रगति चाहता है, उसे प्रत्येक पुरातन विश्वास की समालोचना करनी पड़ेगी, उस पर अविश्वास करना होगा और चुनौती देनी होगी। परत-दर-परत हर मौजूदा विश्वास पर उसे तर्क-विवेक से काम लेना पड़ेगा। यदि पूरे विवेक के साथ किसी दर्शन या विचार पर बात बढ़ती है तो उस विश्वास का स्वागत है। एक व्यक्ति का विवेक कभी-कभी त्रूटिपूर्ण, गलत या दिशाहीन हो सकता है। उसे अपनी गलतियां सुधारने के लिए तैयार होना चाहिए, क्योंकि विवेक ही जीवन का मार्गदर्शक सितारा है। लेकिन केवल मान लेना या अंधविश्वास खतरनाक है, क्योंकि इससे दिमाग कुंद हो जाता है और इससे व्यक्ति प्रतिक्रियावादी बन जाता है। जो व्यक्ति यथार्थवादी होने का दावा करता है, उसे सम्पूर्ण प्राचीन विश्वास को चुनौती देनी पड़ती है। यदि यह विवेक के हमले सहन नहीं कर सकता तो डगमगा कर नीचे गिर जाता है। एक व्यक्ति का पहला कार्य यही बनता है कि वह यहीं से नए दर्शन के लिए रास्ता साफ करे। यह नकारात्मक पक्ष है। यहीं से सकारात्मक पक्ष शुरू होता है। इसी पुराने विश्वास की सामग्री में से कुछ सामग्री कभी-कभी पुनर्निर्माण के काम आ सकती है।
गांधी
शास्त्रों की कोई भी बात विवेकपूर्ण होने के योग्य नहीं है यदि वह तर्क-विवेक के साथ विरोध में है। विश्वास लंगड़ा होता है यदि वह विवेक से जुड़े मामलों में दुस्साहस करता है।

वैज्ञानिक मानसिकता क्या है?

भाग-दो

वैज्ञानिक मानसिकता क्या है?
हमारा संविधान बड़े पैमाने पर वैज्ञानिक मानसिकता बनाने के प्रयासों में हमारे पास एक बहुत महत्वपूर्ण आधार है। शायद हमारा देश ही दुनिया में एकमात्र देश है जहां संविधान में वैज्ञानिक मानसिकता स्थापित करने की बात कही गई है। भारतीय संविधान की धारा 51-क में कहा गया है:-
51क मौलिक कर्तव्य-हर भारतीय नागरिक का यह मौलिक कर्तव्य है कि
(८) वह वैज्ञानिक मानसिकता, मानवतावाद, सुधार एवं खोज भावना विकसित करे।
सन् 1981 में नेहरू केंद्र में बुद्धिजीवियों के एक समुह ने एक बैठक कर ‘वैज्ञानिक मानसिकता पर कथन’ के रूप में यह स्थापित कर पारित किया जिसमें वैज्ञानिक मानसिकता को विज्ञान विधि के रूप में इस प्रकार परिभाषित किया:
‘क’ कि विज्ञान विधि, ज्ञान प्राप्त करने की विधि का एक योग्य तरीका है,
‘ख’ कि विज्ञान विधि का प्रयोग कर प्राप्त किए गए ज्ञान से मनुष्य की समस्याएं समझी जा सकती हैं और उनका समाधान किया जा सकता है,
‘ग’ कि दैनिक जीवन में नीतिशास्त्र से राजनीतिक शास्त्र व अर्थशास्त्र तक मानवीय क्रियाकलापों के प्रत्येक पहलु में विज्ञान विधि का प्रयोग मनुष्य के अस्तित्व एवं विकास के लिए अनिवार्य है, और
 ‘घ’ कि विज्ञान विधि अपनाकर प्राप्त किया गया ज्ञान किसी भी समय में सत्य के सबसे निकट एवं इस ज्ञान की संगति के हर प्रश्न के संदर्भ में होता है और हर समय समकालीन ज्ञान के मूल आधार की जांच पड़ताल करते रहना चाहिए।
आइये इसका कुछ विस्तार से वर्णन करें।
विज्ञान विधि से हमारा क्या अर्थ है? मौलिक रूप में इसका अर्थ है कि किसी बात को वैज्ञानिक रूप में वैध या सत्य मानने से पहले हमें इसे कई परीक्षणों से गुजारना चाहिए। ये परीक्षण व्यवहारिक व प्रायोगिक हो सकते हैं। कुछ प्रयोग तर्क, विवेक एवं निरंतरता के हो सकते हैं। किसी बात को सत्य घोषित करने से पहले उसे ऐसे प्रयोगों से गुजारना चाहिए, जिनमें आंतरिक विरोधाभास न हो और वे उन अन्य बातों की संगति में हो जिन्हें सत्य जाना जा चुका है क्योंकि ऐसी बातें पहले ही परीक्षणों से गुजर चुकी होती हैं।
परीक्षण से गुजरने को तैयार
            जो भी वैज्ञानिक स्तर पर सही होने का दावा करे उसे कड़े परीक्षणों से गुजरने के लिए खुला होना चाहिए। ज्ञान की कोई भी प्रक्रिया जो विज्ञान के बड़े परीक्षणों से गुजरने को तैयार नहीं, वह वैज्ञानिक स्तर पर सच होने का दावा नहीं कर सकती।
उदाहरणार्थ ज्योतिष वैज्ञानिक स्तर पर सच होने का दावा नहीं कर सकती, सीधा-सा कारण है कि कोई भी ज्योतिषी अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति द्वारा प्रस्तुत साधारण से परीक्षणों का भी सामना करने को तैयार नहीं।                     जो ज्योतिषी सामने आए भी, वे डॉ. जयंत नर्लिकर और डॉ. दाभोलकर द्वारा प्रस्तुत परीक्षणों के सामने असफल हो गए।
आलोचनात्मक प्रश्न उठाना
                  हम आज जिसे विज्ञान विधि कह रहे हैं, वह विश्व के सभी भागों में समस्त मानवजाति द्वारा लम्बे इतिहस से सीखन का परिणाम है।
                आलोचनात्मक प्रश्न उठाना विज्ञान विधि का मूल है। हर कोई प्रश्न उठा सकता है। कोई भी सामान्य विद्यार्थी व हर सोचने वाला व्यक्ति, विज्ञान के बड़े-से-बड़े व्यक्ति से प्रश्न कर सकता है। विज्ञान में पवित्र कहे जाने जैसा कोई लेखन नहीं जिस पर काई सवाल न उठाया जा सके, और विज्ञान में न ही कोई मठाधीश है। वैज्ञानिक रूप में सही कहे जाने वाली हर बात को प्रमाण देने होंगे और परीक्षणों से गुजरने को तैयार रहना होगा। प्रसिद्ध भौतिकविद् रिचर्ड फियनमन ने विज्ञान का वर्णन कुछ इस प्रकार किया है-
                           ‘विज्ञान यह सीखने का लम्बा इतिहास है कि किस प्रकार हम स्वयं को मूर्ख बनाने से बचें।’
विज्ञान विधि हमेशा ही संशय में और आलोचनात्मक रहती है। यह हमेशा प्रश्न के घेरे में और खारिज करने की स्थिति में रहती है। यह कोई भी ‘सत्य’ अंतिम नहीं मानती। आइन्स्टाइन ने इसे यूं कहा है: ‘अधिकतर मामलों में यह कहती है ‘हो सकता है’ और अधिकतर तो यही कहती है कि ‘नहीं’। यदि कोई प्रयोग किसी सिद्धांत से सहमत होता है तो इसका मतलब है कि यह सिद्धांत ‘संभव’, है और यदि सहमत नहीं होता तो इसका मतलब है कि ‘नहीं’। संभवत: हर सिद्धांत को कभी-न-कभी ‘नहीं’ का अनुभव होता है, और बहुत से सिद्धांत तो बनते ही तुरंत ‘नहीं’ का अनुभव करते हैं।
              इस प्रकार विज्ञान विधि औचित्य पर प्रश्न उठाने का एक निश्चित तरीका है। विज्ञान में कभी निश्चितता नहीं है। ज्यादा-से-ज्यादा यह आश्वस्तता का बढ़ा हुआ स्तर है। इसे दूसरे शब्दों में ऐसे भी कर सकते हैं कि यह अनिश्चितता और अविश्वास का कम होता स्तर है।
मूल रूप से कट्टरवाद के विरुद्ध
                      विज्ञान चरणबद्ध तरीके से अविश्वास पर आधारित है। वह मूल रूप में हर प्रकार के कट्टरवाद का विरोध करती है। इस कट्टरवाद में बिना सवाल उठाए विश्वास करना या ऐसे पवित्र लेख या परम्पराएं हो सकती हैं जिनके बारे में यह हो कि ये सवालों से ऊपर हैं और दोषरहित हैं। हमारे देश में कई प्रकार के धार्मिक कट्टरवाद मौजूद हैं जो जनसामान्य व यहां तक कि बुद्धिजीवियों को भी प्रभावित किए हुए हैं। गैर धार्मिक रूप का कट्टरवाद भी बहुत ही सामान्य है। जहां भी विषय को समझने की दिक्कत हो, विज्ञान का निश्चित रूप से इन कट्टरवादी प्रवृतियों से विरोध है।
जनतांत्रिक धर्म
                                दूसरी ओर हमारे यहां गैर कट्टरवाद और धार्मिक सुधारों की भी एक लम्बी परम्परा है, इनमें देश के विभिन्न भागों में चलने वाले मानवतावादी धार्मिक आंदोलन भी हैं। मध्ययुग की भक्ति-सूफी धारा, महात्मा बुद्ध का बौद्धमत व राजा राम मोहन राय व श्री नारायण गुरु के काम इनमें शामिल हैं। इस प्रकार के धार्मिक आंदोलनों ने स्थापित जातिगत भेदभाव व असमानता की व्यवस्था पर प्रश्न उठाने को प्रोत्साहित किया। बेशक इनका स्वरूप धार्मिक रहा हो ये धार्मिक कट्टरवाद के मुकाबले वैज्ञानिक मानसिकता के साथ ज्यादा सहमत दिखे। यह संयोग की बात नहीं है कि ‘वैज्ञानिक मानसिकता, मानवतावाद, खोज भावना व सुधार’ हमारे संविधान में एक साथ आए हैं। ये चारों गुण हमारे पूरे इतिहास में एक साथ जुड़े रहे हैं।

सभी के लिए वैज्ञानिक मानसिकता

सभी के लिए वैज्ञानिक मानसिकता


डा. नरेंद्र दाभोलकर ने अपने चिकित्सीय व्यवसाय का त्याग कर जन सामान्य में वैज्ञानिक दृष्टि के प्रसार हेतु एवं अंधविश्वासों से लडऩे के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। अगस्त 20, 2013 को किराए के गुुंडों द्वारा पुणे (महाराष्ट्र) में उनकी हत्या कर दी गई। अखिल भारतीय जन-विज्ञान नेटवर्क ने उनकी शहादत पर यह प्रस्ताव पारित किया:-
                          अखिल भारतीय जन विज्ञान नेटवर्क आतंकवादियों द्वारा आज पुणे में डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की हत्या की पुरजोर भत्र्सना करता है। ऐसा पता चला है कि धर्म के नाम पर काम करने वाले आतंकी संगठनों द्वारा उन्हें जान से मारने की लगातार धमकियां मिलती रही थी। इन धमकियों की परवाह किए बिना वे साहसपूर्वक अपना कार्य करते रहे। वैज्ञानिक रुझान पैदा करने, बाबाओं की धोखाधड़ी, तांत्रिकों व स्वयंभू देवपुरुषों के कारनामों को उजागर करने में वे लगे रहे। आप अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के संस्थापक एवं नेता तथा प्रगतिशील पत्रिका ‘साधना’ के सम्पादक रहे।
                      हम डॉ. नरेंद्र दाभोलकर के जीवन से यह प्रेरणा लेते हैं और प्रण करते हैं कि हम वैज्ञानिक मानसिकता के प्रयास हेतु उनके आदर्श, सभी प्रकार के अंधविश्वासों का विरोध तथा धार्मिक रूढि़वाद से जुड़े तमाम अंधविश्वासों का विरोध करने वाले उनके काम को जारी रखेंगे। हम प्रण करते हैं कि हम उन साम्प्रदायिक फासिस्ट ताकतों और उस आतंकवाद से लड़ेंगे जो देश के विभिन्न भागों में धर्म के नाम पर सक्रिय हैं। हम भारतीय संविधान के मूल्यों-वैज्ञानिक मानसिकता, धर्म निरपेक्षता, समानता व जनतंत्र में अपनी आस्था व्यक्त करते हैं और इसमें निहित संदेश को अपने देश व प्रत्येक विद्यालय, शहर व गांव तक पहुंचाने का कार्य करेंगे।
                    जिस प्रकार गांधी जी के हत्यारे उनके मूल्यों एवं उनके संदेश को नहीं रोक पाए उसी प्रकार ये कायराना हत्या डॉ. नरेंद्र दाभोलकर के संदेश एवं मूल्यों को नहीं रोक सकती। जन-विज्ञान आंदोलन में काम करने वाले हम सभी और ज्यादा दृढ़ इरादों व ताकत से जनता के बड़े हिस्से में विज्ञान व वैज्ञानिक सोच को बढ़ाने के लिए काम करेंगे ताकि देश की साम्प्रदायिक फासीवादी ताकतों व रूढि़वादी ताकतों को हटाया जाए तथा वैचारिक लड़ाई को जीता जाए।
                        डॉ. दाभोलकर की हत्या ने पूरे देश के स्वाभिमान को हिला कर रख दिया है और आज भारत में वैज्ञानिक मानसिकता को बढ़ाने की जरूरत को रेखांकित किया है।
अखिल भारतीय जन-विज्ञान नेटवर्क यह प्रस्ताव रखता है कि हम सभी प्रत्येक नागरिक में, विद्यालय, देश के हर गांव व शहर में वैज्ञानिक सोच का पोषण करें। क्या यह कार्य सम्भव है?
तीस से अधिक वर्ष पूर्व सन् 1981 में प्रमुख बुद्धिजीवियों के समुह ने वैज्ञानिक मानसिकता पर कथन जारी किया था जिसमें दूरगामी परिप्रेक्ष्य को लिया था। अभी हम उन उद्देश्यों को पूरा नहीं कर पाए हैं। अभी भी बहुत बड़ी भीड़ अंधविश्वासों, ज्योतिष, नाना प्रकार के अतार्किक विश्वासों, धोखेबाज बाबाओं, स्वयंभू देव पुरुषों के पीछे भागती है। स्पष्ट है, यह स्थिति ठीक नहीं है। हमें क्या करने की जरूरत है इस बारे में हमारी सोच और ज्यादा गहरी और अच्छी होनी चाहिए।
               क्या हम बड़े पैमाने पर वैज्ञानिक मानसिकता के निर्माण की बात के काम को एक वैज्ञानिक समस्या के रूप में ले सकते हैं? इसे एक वैज्ञानिक कार्य के रूप में लेने का क्या अर्थ है?
मानव जाति के खाते में ऐसी बहुत सी सार्वभौमिक महान उपलब्धियां दर्ज हैं जहां कार्य वैज्ञानिक रूप में किया गया है। इस ग्रह के बहुत से भागों से बड़े स्तर पर चलाए गए वैज्ञानिक अभियानों के जरिए पोलियो व चेचक जैसी जानलेवा बीमारियों से छुटकारा पा लिया गया है। बहुत से देशों में सार्वभौमिक साक्षरता पा लेने जैसे उदाहरण हैं। एक सौ पचास वर्ष पहले तक दलित व महिलाओं को शिक्षा से वंचित रखना हमारी परम्परा में शामिल था। आज निस्संदेह यह एक उपलब्धि है कि लगभग हर बच्चा विद्यालय में है चाहे वह किसी भी जाति व लिंग से हो। इन सार्वभौमिक उपलब्धियों के बीज ज्योतिबा फुले व सावित्रीबाई फुले जैसे सामाजिक सुधारकों द्वारा बोए गए थे जो ‘सत्य शोधक समाज’ के जरिए काम कर रहे थे। वैज्ञानिक मानसिकता भी एक विशष प्रकार का सत्यशोधन है। ये सभी उदाहरण हमें हौंसला देते हैं कि वैज्ञानिक मानसिकता का सार्वभौमिकीकरण संभव है, समय लग सकता है।
                           वैज्ञानिक वैधता व्यवहारिक उपलब्धियों से स्थापित होती है। सार्वभौमिकता का अर्थ है बड़े पैमाने पर उपलब्धि। विज्ञान के सार्वभौमिकीकरण के काम को हाथ में लेने का अर्थ है कि हमें बड़े स्तर पर व्यवहारिक उपलब्धि सिद्ध करनी होगी। हमें ऐसे तरीके निकालने होंगे जिनसे प्रगति-ठहराव, सफलता-विफलता के मापन की पड़ताल हो सके। अगले पृष्ठों में हम ऐसे ही कुछ पहलुओं का विश्लेषण कर रहे हैं कि विज्ञान के सार्वभौमिकीकरण को किस प्रकार एक वैज्ञानिक कार्य के रूप में किया जाए।