आज के दौर में संस्कृति का साम्प्रदायिकरण तथा भूमंडलीकरण जातीय संघर्ष एवम तनाव जहाँ आज विकासोन्मुख समाज के समक्ष चुनौती बनकर उभरे हैं , वहीँ इनसे अलग मानवीय संवेदना में हवाश , विकास के नाम पर पर्यावरण सन्तुलन का बिगड़ना एवम नयी टैक्नोलॉजी से उत्पन्न आतंकवादी गतिविधियां भी मानवता और उसके अस्तित्व की सुरक्षा के लिए कम चुनौतीपूर्ण प्रश्न नहीं हैं ? इस सन्दर्भ में पुराने समय से चली आ रही विवेकमयी वैज्ञानिक दृष्टि और अधिक प्रासंगिक हुई है । मात्र आप्त वचनों के आधार पर कल्पनात्मकता और अंधआस्था को नहीं मानना बुद्ध जैसे ज्ञानियों ने पुराने वक्तों में भी भारत वासीयों को समझाया था ।
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