1925 में विजयदशमी में अपनी स्थापना से लेकर 1947 तक संघ ने अंग्रेजों के खिलाफ चूं तक नहीं की । जब अंग्रेजों के खिलाफ देश की जनता लड़ रही थी तब संघी लोग लोगों को लाठियां भांजना सिखा रहे थे और वह भी अंग्रेजों के खिलाफ नहीं बल्कि अपने ही देश भाईयों के खिलाफ । आर एस एस के संस्थापक सरसंघचालक केशव बलिराम हेडगे वार , दूसरे सरसंघचालक एम.एस. गोलवरकर और हिंदुत्व के प्रचारक बिनायक दामोदर सावरकर ने आजादी की लड़ाई से लगातार अपने को दूर रखा । यही नहीं जब भगत सिंह और उनके साथी अंग्रेज सरकार से यह मांग कर रहे थे कि उन्हें गोली से उड़ा दिया जाये तब सावरकर अंग्रेजी हकूमत को माफीनामे पर माफीनामे लिख रहे थे। जब देश के लाखों लोगों की चेतना में आजादी की लड़ाई में शरीक होने का विचार सबसे प्रमुख था,उस समय आर एस एस ने न तो स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी की और न ही भागीदारी करने की चाहत रखने वालों को ही प्रोत्साहित किया । संघ के लम्बे समय के कार्यकर्त्ता और भूतपूर्व प्रधामन्त्री अटल बिहारी तो गोरी हकूमत का विरोध करने वालों की मुखबरी में शामिल थे ।सोचने की बात है कि आज इन्हें लोगों को देशभक्ति के प्रमाण पत्र बाँटने ठेका किसने दे दिया । |
बुधवार, 21 सितंबर 2016
स्वतंत्रता आंदोलन से विश्वासघात
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