प्राचीन आर्यों की बहुदेवतावादी अवधारणा ( ऋग्वेद ,अथर्ववेद से स्पष्ट है ) से आरम्भ होकर वैदिक संस्कृति उपनिषद की एकेश्वरवाद (ब्रह्म ) की विचारधारा एवम आदर्शवादी रूप से गुजरती हुई उत्तरवैदिक कॉल में प्रवेश कर चुकी थी जिसमें वैदिक अंतर्ज्ञान की मूल अंतर्वस्तु पर कर्म काण्ड हावी हो चुका था । वैदिक संस्कृति का सूर्य ढलान की और था एवम
वर्णाश्रम व्यवस्था का ग्राफ उत्कर्ष की ओर था । हिन्दू जो चार वर्णों ( ब्राह्मण ,क्षत्रीय ,वैश्य एवम शुद्र ) में विभाजित थी उनमें शूद्रों का स्थान समाज में निम्न कोटि का था उन्हें अछूत समझा जाता था । स्त्रियों की दशा बड़ी शोचनीय थी । धार्मिक विशेषाधिकार सम्पन्न पुरोहित वर्ग अस्तित्व में आ चुका था जिसने अपने आप को मनुष्य और ईश्वर के बीच प्रतिस्थापित कर लिया था । इस वर्ग का वस्तुतः वैदिक मुनियों एवम उपनिषद के ऋषियों की गौरवशाली परम्परा से कोई सरोकार नहीं था , उनका एकमात्र लक्ष्य था , कर्मकांड में ईकहरी आस्था का प्रवर्तन करते हुए अपने को श्रेष्ठ समझने वाली जातियों में नयी नयी भौतिक महत्वकांक्षाएं जगाना , उनको महिमामण्डित करना एवम उनके हिंसक संघर्षों को देवताओं के आशीर्वाद से विभूषित करना । यह विकृत वर्ण व्यवस्था था जिसमें यज्ञ , भौतिक -शोषण दमन के माध्यम बन चुके थे । पुरोहित वर्ग का बौद्धिक , सामाजिक और आर्थिक वर्चश्व समाज के विकास में बाधाएं खड़ी करने लगा था । आदि आर्यों ने जिस यज्ञ हवन का मूल आधार उच्चतर कार्यों हेतु संकल्प एवम सामाजिक हित के लिए त्याग वातावरण की शुद्धि निर्धारित किया था , इन पुरोहितों ने उसके मूल को डाला और उसके आधार को विभिन्न देवताओं एवम जगत के अधिष्ठाता की प्रसन्नता तथा पुरखों की सदगति से जोड़ दिया। दूसरी बात पुरोहितों ने वर्चश्व के बल पर समाज से यह स्वीकृति भी करा ली कि यज्ञ हवन बिना पुरोहितों के सार्थक नहीं हो सकता । दान दक्षिणा , पशु बलि ,यज्ञ की सफलता के अनिवार्य अंग करार दिए गए । पुरोहित लोग यजमानों व समाज के धनी मानी लोगों को यज्ञ हवन के लिए प्रेरित करते थे । आम जनता को अज्ञान में रखते थे तथा स्वर्ग नरक की शिक्षा समाज को देकर भरम एवम अंध विश्वास का ऐसा जाल बुनते थे जिससे अधिपत्य , उनकी श्रेष्ठता कायम रह सके । नैतिकता को अपने मुताबिक परिभाषित करते थे । मोक्ष प्राप्ति जीवन का लक्ष्य निर्धारित करते थे जबकि उनका स्वयं का लक्ष्य हकीकत में हिन्दू समाज को जड़ धार्मिक नियमों से नियंत्रित कर एक वर्ग विशेष के लिए संरक्षित रखना था । यह वह युग था जब अपने को धर्म का रक्षक समझने वाले पुरोहित जो कुछ रचते थे , व्यास, याज्ञवल्क्य , वशिष्ठ या किसी दूसरे महृषि या देवता के मत्थे मढ़ देते थे ताकि उसे लोक की स्वाभाविक स्वीकृति जाये । मनु स्मृति ने वर्ण व्यवस्था , यज्ञ , पुनर्जन्मवाद और मोक्ष के चतुर्भुज पर जो नैतिकता का कठोर धर्म शास्त्र खड़ा किया , वह द्विजों के सामाजिक , राजनैतिक एवं आर्थिक हित में था , साधारण जन अज्ञानवश उसे ईश्वरीय कथन समझ बैठता था , जिसकी प्रत्यक्ष कानून से भी बढ़कर मान्यता थी ।
वर्णाश्रम व्यवस्था का ग्राफ उत्कर्ष की ओर था । हिन्दू जो चार वर्णों ( ब्राह्मण ,क्षत्रीय ,वैश्य एवम शुद्र ) में विभाजित थी उनमें शूद्रों का स्थान समाज में निम्न कोटि का था उन्हें अछूत समझा जाता था । स्त्रियों की दशा बड़ी शोचनीय थी । धार्मिक विशेषाधिकार सम्पन्न पुरोहित वर्ग अस्तित्व में आ चुका था जिसने अपने आप को मनुष्य और ईश्वर के बीच प्रतिस्थापित कर लिया था । इस वर्ग का वस्तुतः वैदिक मुनियों एवम उपनिषद के ऋषियों की गौरवशाली परम्परा से कोई सरोकार नहीं था , उनका एकमात्र लक्ष्य था , कर्मकांड में ईकहरी आस्था का प्रवर्तन करते हुए अपने को श्रेष्ठ समझने वाली जातियों में नयी नयी भौतिक महत्वकांक्षाएं जगाना , उनको महिमामण्डित करना एवम उनके हिंसक संघर्षों को देवताओं के आशीर्वाद से विभूषित करना । यह विकृत वर्ण व्यवस्था था जिसमें यज्ञ , भौतिक -शोषण दमन के माध्यम बन चुके थे । पुरोहित वर्ग का बौद्धिक , सामाजिक और आर्थिक वर्चश्व समाज के विकास में बाधाएं खड़ी करने लगा था । आदि आर्यों ने जिस यज्ञ हवन का मूल आधार उच्चतर कार्यों हेतु संकल्प एवम सामाजिक हित के लिए त्याग वातावरण की शुद्धि निर्धारित किया था , इन पुरोहितों ने उसके मूल को डाला और उसके आधार को विभिन्न देवताओं एवम जगत के अधिष्ठाता की प्रसन्नता तथा पुरखों की सदगति से जोड़ दिया। दूसरी बात पुरोहितों ने वर्चश्व के बल पर समाज से यह स्वीकृति भी करा ली कि यज्ञ हवन बिना पुरोहितों के सार्थक नहीं हो सकता । दान दक्षिणा , पशु बलि ,यज्ञ की सफलता के अनिवार्य अंग करार दिए गए । पुरोहित लोग यजमानों व समाज के धनी मानी लोगों को यज्ञ हवन के लिए प्रेरित करते थे । आम जनता को अज्ञान में रखते थे तथा स्वर्ग नरक की शिक्षा समाज को देकर भरम एवम अंध विश्वास का ऐसा जाल बुनते थे जिससे अधिपत्य , उनकी श्रेष्ठता कायम रह सके । नैतिकता को अपने मुताबिक परिभाषित करते थे । मोक्ष प्राप्ति जीवन का लक्ष्य निर्धारित करते थे जबकि उनका स्वयं का लक्ष्य हकीकत में हिन्दू समाज को जड़ धार्मिक नियमों से नियंत्रित कर एक वर्ग विशेष के लिए संरक्षित रखना था । यह वह युग था जब अपने को धर्म का रक्षक समझने वाले पुरोहित जो कुछ रचते थे , व्यास, याज्ञवल्क्य , वशिष्ठ या किसी दूसरे महृषि या देवता के मत्थे मढ़ देते थे ताकि उसे लोक की स्वाभाविक स्वीकृति जाये । मनु स्मृति ने वर्ण व्यवस्था , यज्ञ , पुनर्जन्मवाद और मोक्ष के चतुर्भुज पर जो नैतिकता का कठोर धर्म शास्त्र खड़ा किया , वह द्विजों के सामाजिक , राजनैतिक एवं आर्थिक हित में था , साधारण जन अज्ञानवश उसे ईश्वरीय कथन समझ बैठता था , जिसकी प्रत्यक्ष कानून से भी बढ़कर मान्यता थी ।
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