दरिद्र से दरिद्र हिंदुस्तानी मजदूर भी शिक्षा के उपकारों का कायल है।उसके मन में यह अभिलाषा होती है कि मेरा बच्चा चार अक्षर पढ़ जाये। इसलिए नहीं कि उसे कोई अधिकार मिलेगा , बल्कि इस लिए कि विद्या मानवशील का एक श्रृंगार है। अगर यह जान कर भी वह अपने बच्चे को मदरसे में नहीं भेजता , तो समझ लेना चाहिए कि वह मजबूर है ।
"प्रेमचंद"
"प्रेमचंद"
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