खाद्य सुरक्षा को राजनीति के मैदान में नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है. यह गरिमा, राज्य की मंशाओं, आर्थिक सुरक्षा और आंतरिक सुव्यवस्था का विषय भी है. भूख कोई भी काम करवा सकती है. इस बात का अहसास भारत की सरकारों को स्वतंत्रता के बाद से लगातार होता रहा है. बहरहाल आज यह बात समझ आती है कि एक तरफ तो खाद्य सुरक्षा जरूरी राजनीतिक विषय बनता है, पर दूसरी तरफ जमीन, पानी और जंगल सरीखे प्राकृतिक संसाधनों के खेती से इतर उपयोग की लालसा में हमने कुछ बुनियादी गलतियां कर दी हैं; जैसे खेती और किसानों को अपनी ताकत मानने के बजाये, उन्हें अपनी कमजोरी मान लेना, यह मानना कि खुला बाज़ार लोगों की खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करना अपनी जिम्मेदारी मानेगा आदि.
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