लोकसंघर्ष ! |
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Posted: 05 Sep 2016 07:47 PM PDT
जिस तरह से कश्मीर में छर्रे के बौछार वाली बंदूकों का इस्तेमाल डेढ़ महीने से ऊपर किया जाता रहा यह सोचने वाला विषय हैकि क्या भारत के किसी और हिस्से में सरकार एक दिन भी इस तरह का हथियार लोगों के खिलाफ इस्तेमाल कर पाती? लोगशायद बगावत पर उतर आते और सरकार ही न चलने देते। सरकार के मंत्री कश्मीर की जनता को हिंसा छोड़ने की नसीहत दे रहेहैं। किंतु बुरहान वानी की मृत्यु के बाद से अब तक के कश्मीर में चले सबसे लम्बे कर्फ्यू में आम जनता से लोगों के मरने के आंकड़ेरोज बढ़ रहे थे न कि सुरक्षा बलों के लोगों के। सवाल यह है कि किसकी हिंसा ज्यादा जानलेवा या घातक थी? यदि लोगों से हिंसाछोड़ समाधान की दिशा में सहयोग की अपील की जाती है तो सरकार भी सुरक्षा बलों की हिंसा को रोक माहौल को सामान्य बनानेमें अपनी भूमिका अदा करनी होगी। 52 दिनों के बाद कर्फ्यू उठाया गया है।
अरुण जेतली ने साम्बा में अपने भाषण में कहा कि चाहे हथियार का इस्तेमाल करने वाले हों अथवा पत्थर फेंकने वाले दोनोंसे सख्ती से निपटा जाएगा। राजनाथ सिंह ने कहा कि वे कश्मीरी युवा के हाथ में पत्थर व बंदूक के बजाए पेन, कम्प्यूटर यारोजगार देखना चाहेंगे। रक्षा मंत्री मनोहर परिक्कर ने पाकिस्तान को नर्क कहा है। प्रधान मंत्री कहते हैं हिंसा के लिए उकसाने वालेबच नहीं सकेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि जान चाहे किसी की जाए, युवा हो या सुरक्षाकर्मी, तो यह देश का ही नुकसान है। नरेन्द्रमोदी ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से आने वाले शरणार्थियों के लिए रु. 2000 करोड़ की राशि आवंटित करने की घोषणा की है।भाजपा के सभी नेता मानते हैं और अब महबूबा मु्फ्ती से भी कहलवाया जा रहा है कि कश्मीर में जो भी असंतोष है उसके लिएपाकिस्तान जिम्मेदार है।
भाजपा नेताओं की सरलीकृत सोच कश्मीर समस्या को समाधान की दिशा में न ले जाकर |
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